Today's Updesh

यथार्थ मंगल लाभ करने के लिए आपको श्रीमद् भागवत् के सातवें स्कंध में प्रह्लाद महाराज द्वारा वर्णित नवधा भक्ति अथवा श्रीचैतन्य महाप्रभु की शिक्षा के अनुसार साधु-संग, नाम-कीर्तन, भागवत्-श्रवण, मथुरा-वास व श्रद्धा से श्रीमूर्ति-सेवन आदि भक्ति के पांच मुख्य अंगों का यथावत् पालन करना होगा। भक्ति के इन सभी अंगों में से कलियुग के जीव के लिए नामसंकीर्तन सर्वश्रेष्ठ है।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

श्री श्रीमद् भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज का संक्षिप्त परिचय

‘ऊदाहरण उपदेश से श्रेष्ठ है’ – यही आपकी प्रचार-शैली थी। जो कोई भी आपके श्रेष्ठ व्यक्तित्व के संपर्क में आया उसने आपकी जीवों के प्रति करुणा, पूर्ण वैराग्य, पूर्ण सहिष्णुता, गहन आध्यात्मिक आनंद, श्री गुरु में अनन्य विश्वास और श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रति पूर्ण भक्ति एवं समर्पण के भाव को स्पष्ट रूप से देखा। आप शास्त्रों के सिद्धांतों से बिंदुमात्र भी विचलित न होने के लिए जाने जाते हैं। आपके सभी के प्रति अनुरागशील स्वभाव और गुरु-वैष्णवों की सेवा के प्रति समर्पण जैसे गुणों के लिए आप कई गौड़ीय संस्थाओं के आचार्यों के लिए आदर्श हैं।

आज की तिथि - April 2, 2026

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प्रयाग तत्त्व

स्नान यात्रा के उपलक्ष में

किसकी सेवा सर्वश्रेष्ठ है ?

गृहस्थभक्तों को सदा सर्वदा

श्रील गदाधर पण्डित गोस्वामी की महिमा

❅───✧ Aacharya ✧───❅

श्रीरामानुजाचार्य

श्रील जीव गोस्वामी

श्रीधर पण्डित

श्रीमुकुन्द दत्त ठाकुर

गंगा माता गोस्वामीनी

श्रीबलदेव विद्याभूषण

श्रील भक्त्यालोक परमहंस महाराज

❅───✧ Article ✧───❅

गोविंद-भाष्य का लेखन

Message of Srila Prabhupad

भगवान श्रीरामचन्द्र

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बद्धजीव

अभ्यास-योग

बन्धन व शोक

श्रीकृष्ण के प्रति अहैतुकी अनन्य भक्ति

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जो भक्ति करता है वही श्रेष्ठ है

गुरु जी की कृपा दृष्टि सदैव हम पर है

उनकी अपूर्व ADJUSTMENT

भक्तों की भावना ही उनके लिए सर्वोपरि है

Gaudiya kanthahara

हर्षे प्रभु कहे-शुन स्वरूप-रामराय।
नाम-संकीर्तन कलौ परम उपाय ।।
संकीर्तन-यज्ञे कलौ कृष्ण-आराधन।
सेइ त' सुमेधा, पाय कृष्णेर चरण।।

(चै० च० अ० २०/८-९)

हर्ष से श्रीमन्महाप्रभु, श्रीस्वरूपदामोदर एवं श्रीरायरामानन्द से कहते हैं कि, कलियुग में श्रीहरिनाम संकीर्तन ही सर्वश्रेष्ठ साधन है।

कलियुग में श्रीहरिनाम संकीर्तन यज्ञ द्वारा, श्रीकृष्ण की आराधना करने की शास्त्रीय विधि है। जो श्रीहरिनाम संकीर्तन द्वारा श्रीकृष्ण की आराधना करते हैं, वही सुबुद्धिमान् हैं और वे ही श्रीकृष्ण के चरणों की सेवा प्राप्त करते हैं।

आजकल के तथाकथित मतावलम्बी श्रीनाम के स्वरूप को नहीं जानते हैं। नाम से नामी को पृथक् बुद्धि करते हुये घोर अपराध करते हैं। नाम का मुख्य फल धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष नहीं, अपितु कृष्णप्रेम ही हमारे लिये मुख्य प्रयोजन है।

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