श्रीमद् भागवतम् षष्ठ स्कन्ध
६-१-१९

सकृन्मनः कृष्णपदारविन्दयो -र्निवेशितं तद्गुणरागि यैरिह ।
न ते यमं पाशभृतश्च तद्भटान् स्वप्नेऽपि पश्यन्ति हि चीर्णनिष्कृताः ।।

भले ही कृष्ण को पूर्ण रूप से न प्राप्त कर लिया हो, पर वे लोग जिन्होंने कृष्ण के चरण-कमलों में एक बार भी अपने को पूर्णतया समर्पित कर दिया है और जो कृष्ण के नाम, रूप, गुण, लीला की ओर आकृष्ट हो चुके हैं, वे पाप कृत्यों से पूर्णतया मुक्त हो जाते हैं, क्योंकि उन्होने प्रायश्चित के सच्चे ढंग को स्विकार कर लिया है। ऐसी समर्पित आत्माएँ स्वप्न में भी, यमराज या यमदूतों को, जो पापियों को बाँधने के लिए रस्सियाँ लिए रहते है, नहीं देखते।

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श्रीमद् भागवतम् एकादश स्कन्ध
११-२-३७

भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्या-दीशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः ।
तन्माययातो बुध आभजेत्तं भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा ।।

जब जीव भगवान् की बहिरंगा माया शक्ति में लीन होने के कारण भौतिक शरीर के रूप में अपनी गलत पहचान करता है, तब भय उत्पन्न होता है। इस प्रकार जब जीव भगवान् से मुख मोड लेता है, तो वह भगवान् के दास रूप में अपनी स्वाभाविक स्थिती को भी भूल जाता है। यह मोहने वाली भयपूर्ण दशा माया द्वारा प्रभावित होती है। इसलिए बुद्धिमान पुरुष को प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में भगवान् की अनन्य भक्ति में लगना चाहिए। और गुरु को अपना आराध्यदेव तथा अपना प्राणधन स्विकार करना चाहिए।

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गरुड पुराण

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बह्याभ्यन्तर शुचिः ।।

कोई चाहे शुद्ध हो, दूषित हो और उसकी बाह्य स्थिती चाहे जैसी हो यदि वह कमलनेत्र भगवान् का स्मरण करता है, तो अपने जीवन को बाहर तथा भितर से स्वच्छ कर सकता है।

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गरुड पुराण

कलौ भागवतं नाम दुर्लभं नैव लभ्यते ।
ब्रह्मरूद्रपदोत्कृष्टं गुरूणां कथितं मम ।।

इस कलियुग में महान् भक्त के रूप में यश पाना दुर्लभ है। किन्तु ऐसा पद ब्रह्मा तथा महादेव जैसे देवताओं से श्रेष्ठतर है। यह सारे गुरुओं का मत है।

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