श्रीहरिदास ठाकुरके द्वारा शास्त्रीय प्रमाण प्रस्तुत करना
श्रील हरिदास ठाकुर उसे समझाते हुए बोले- “मेरी बातोंमें तुम संशय क्यों कर रहे हो? ये वचन मेरे नहीं, बल्कि शास्त्रोंके हैं। यदि तुम कहो कि जब नामाभाससे ही मुक्तिकी प्राप्ति होती है, तब फिर भक्त उसे ग्रहण क्यों नहीं करते? और क्यों इतना कष्ट करके भक्तिका साधन-भजन करते हैं? तो सुनो ! भक्तिके सुखके सामने मुक्तिका सुख अत्यन्त तुच्छ और हेय है, इसीलिए भगवान्के देनेपर भी भक्त मुक्तिको ग्रहण नहीं करते।
भक्ति के साथ मुक्तिकी तुलना सम्भवपर नहीं
“त्वत्साक्षात्करणाह्लादाविशुद्धा स्थितस्य मे।
सुखानि गोष्पदायन्ते ब्राह्मण्यपि जगद्गुरो ॥
(हरिभक्तिसुधोदय १४/७६)
“श्रीप्रह्लाद महाराजने प्रार्थना करते हुए भगवान् श्रीनृसिंहदेवसे कहा- हे जगद्गुरो (भगवान्) ! साक्षात् रूपमें आपका दर्शनकर मैं विशुद्ध आनन्दके जिस समुद्रमें डूब रहा हूँ, उसके समक्ष सभी प्रकारके सुख यहाँ तक कि मुक्तिका सुख भी ऐसा प्रतीत हो रहा है, जैसे गायके खुरसे बने हुए गड्डेमें भरा हुआ जल। अर्थात् जिस प्रकार उस खुरसे बने हुए गड्ढेमें भरे हुए पानीकी समुद्रसे तुलना सम्भव नहीं है, उसी प्रकार भक्तिके सुखके साथ किसी भी प्रकारके सुखकी तुलना सम्भव नहीं है।”