नित्यलीला प्रविष्ट ॐ विष्णुपाद परिव्राजकाचार्य त्रिदण्डिस्वामी १०८श्री श्रीमद्भक्ति सम्बन्ध तूर्याश्रमी महाराज

प्रणाम
नमो ॐ विष्णुपादाय गौरप्रेष्ठाय भूतले।
श्रीमते भक्तिसम्बन्ध तूर्याश्रमी गोस्वामिने नमः ।।
श्रीवृषभानु नन्दिनी श्रीमती राधारानी की अत्यन्त प्रियतम नयनतारा सखी जगद्गुरु श्रीलप्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर के श्रीचरणाश्रित अन्यतम दशम संन्यासी प्रवर ॐ विष्णुपाद १०८ श्रीमद्भक्तिसम्बन्ध तूर्याश्रमी महाराज थे। उन्होंने बंगदेश यशोहर जिला के पाटना गाँव में पिता जनार्दन दास एवं माता सरस्वती देवी का आश्रय कर अत्यन्त रूपश्री लेकर १३०० बंगाब्द पौष, ४ माधव, जनवरी, सन् १८९४ को कृष्णा चतुर्थी तिथि में जन्म लिया। मातापिता ने इनका नाम रखा था श्रीभुवनमोहन दास। वे अध्ययन समाप्त कर पूर्वबंग खुलना शहर में एक प्राइवेट मेनेजर के पद पर नौकरी करते थे। उस समय श्रीलप्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर श्रीचैतन्यवाणी प्रचार के लिए प्रत्येक सप्ताह खुलना जाकर उनके चरणाश्रित श्रीविष्णुपद कर, श्रीअमलाकान्त वसु (श्रीमद्भक्तिविवेक भारती गोस्वामी महाराज), श्रीनगेन्द्र गोपाल विश्वास, श्रीउपेन्द्र गोपाल विश्वास, श्रीरासविहारी साहा और श्रीकान्ति साहा इन सब भक्तों की प्रचेष्टा से विशेष सभा में हरिकथा कीर्त्तन करते थे। श्रीभुवन मोहन दास ने प्रत्येक सभा में श्रीलप्रभुपाद की अत्यन्त वीर्यवती कथा सुनकर संसार की अनित्यता समझकर श्रीलप्रभुपाद के चरणों में आश्रय लेने का विचार किया एवं मन-मन में सोचने लगे कि वे मेरे जन्म-जन्म के परम आत्मीय जन हैं।
परिवार के नियमानुसार जब इनके विवाह करने का विचार होने लगा, तब वे मन में अत्यन्त दुःखी होकर संसार परित्याग कर नित्यकाल के लिए श्रीलप्रभुपाद का चरणाश्रय कर हरिनाम दीक्षा ग्रहण करके मठवासी श्रीपाद भुवनेश्वर दास ब्रह्मचारी नाम से परिचित हुये। यह जानकर तुरन्त इनके पिता श्रीजनार्दन दास ने श्रीलप्रभुपाद के निकट आकर कहा- मेरा यह केवल एकमात्र पुत्र ही कर्मठ एवं उपार्जनकारी है और सब बाल्यावस्था में हैं। इस परिस्थिति में आपने मेरे पुत्र को ले लिया तो मैं क्या करूँगा? आप मेरे पुत्र को लौटा दीजिये। तब श्रील प्रभुपाद ने यह सुनकर कहा- ठीक है, आप के दस पुत्रों के विद्याध्ययन का सारा दायित्व मैं स्वीकार करता हूँ। उसी वचन के अनुसार श्रील प्रभुपाद ने सब को मठ में रखकर पढ़ाया एवं श्रीपाद जामिनी बाबू को एम. ए. तक पढ़ा कर नौकरी में लगवाया। श्रीपाद भुवनेश्वर ब्रह्मचारी ने अत्यन्त दीनता एवं आनुगत्य स्वीकार कर वैष्णव सेवा, मठ की सारी सेवा एवं पाठ-कीर्त्तन करने लगे, यह देखकर श्रीलप्रभुपाद ने १३४० बंगाब्द, श्रीगौर पूर्णिमा तिथि में इनको त्रिदण्ड संन्यास मन्त्र दीक्षा के साथ संन्यास दिया। संन्यास लेकर श्रीमद्भक्तिसम्बन्ध तूर्याश्रमी महाराज के नाम से समस्त वैष्णव समाज में परिचित हुये। श्रीलप्रभुपाद के निर्देशानुसार उन्होंने श्रीगौड़ीय पत्रिका का कार्य भार लेकर अपने द्वारा रचित बहुत सी कविता, लेख प्रबन्ध प्रकाशित किये। श्रीलप्रभुपाद ने इनको दिल्ली मठ के सेवाध्यक्ष का पद देकर श्रीचैतन्यवाणी का प्रचार करने का आदेश दिया।
श्रीलगुरुदेव प्रभुपाद के १ जनवरी, सन् १९३७ अन्तर्धान के पश्चात् श्रील महाराज ने मन में अतिशय दुःखी होकर विचार किया कि मैं कहीं भी एकान्त में बैठकर भजन करूँगा। यह सोचकर पूर्वबंग बड़दिया पहुँचे वहाँ के श्रीभोलानाथ भौमिक नाम के एक भक्त ने जमीन खरीद कर श्रीलमहाराज को एक मठ स्थापन करने के लिए बहुत निवेदन किया। तब श्रील महाराज ने उनका निवेदन स्वीकार कर बड़दिया में एक मठ मन्दिर निर्माण कर श्रीश्रीगुरुगौरांग गान्धर्विका गिरिधारी जू की विग्रह की प्रतिष्ठा की। इस मठ का नाम श्रीश्रीगौरसारस्वत गौड़ीय मठ रखा। श्रीलमहाराज हरिकथा कीर्त्तन की कोई समय सीमा नहीं रखते थे। कीर्त्तन के समय अश्रु, पुलकादि अष्ट सात्विक भाव से विभावित होते थे यह हम सबने देखा। श्रीलमहाराज के श्रीचरणाश्रय कर हरिनाम दीक्षा लेकर बंगदेश के बहुत से लोगों ने अपना जीवन और जन्म सार्थक किया।
४९२ गौराब्द, १३८५ बंगाब्द, वैशाख माह में श्रील महाराज ने अस्वस्थ लीला प्रकाश की। श्रील महाराज उस समय पश्चिमबंग ब्याराकपुर के श्री अन्नपूर्णा देवी के घर में विराजित थे। १३८५ बंगाब्द, ६ अग्रहायन कृष्णा सप्तमी तिथि में प्रातः श्रीहरिनाम जप करते हुये आपने नित्यलीला में प्रवेश किया।