
प्रणाम
नमो ॐ विष्णुपादाय गौरप्रेष्ठाय भूतले।
श्रीमते भक्तिशरण शान्त गोस्वामीति नामिने ।।
श्रील प्रभुपाद मनोऽभीष्ट श्रीगौरवाणी प्रचारिणे।
संन्यास कृच्छमोशान्तो जीव कल्याण दायिने ।।
पूर्वबंग के किसी स्थान पर इनका जन्म हुआ। ढाका हाईस्कूल में विद्याध्ययन किया। एक समय श्रील प्रभुपाद द्वारा श्रीचैतन्यवाणी प्रचार की एक सभा में उनके श्रीमुख से अति सुन्दर सुसिद्धान्त पूर्ण श्रीचैतन्य महाप्रभु के विशुद्ध प्रेमभक्ति धर्म विषय पर अत्यन्त वीर्यवती हरिकथा श्रवण करके संसार से वैराग्य प्रकट हुआ। यह समझा कि जीवन का एकमात्र कर्तव्य हरिभजन और श्रीहरि की आराधना है। यह विचार कर एक दिन संसार त्याग करके श्रीधाम मायापुर श्रीचैतन्य मठ आकर श्रील प्रभुपाद के श्रीचरणाश्रय किया। उनका विनम्रभाव, दैन्यता, वैष्णवता, वैष्णव सेवा, गुरु सेवा निष्ठा, भजन-कीर्त्तन, हरिकथा श्रवण में विशेष आग्रह और प्रीति देखकर श्रील प्रभुपाद बहुत सन्तुष्ट हुये। मठवासी वैष्णवों की कृपा से श्रील प्रभुपाद ने उनको श्रीहरिनाम एवं दीक्षा प्रदान कर अपना कर लिया। दीक्षा का नाम दिया श्रीपाद परमानन्द दास ब्रह्मचारी। श्रील गुरुदेव प्रभुपाद के कृपानिर्देश से कई वर्षों तक अत्यन्त निष्ठा पूर्वक श्रीचैतन्य मठ में श्रीविग्रह पूजा अर्चनादि सेवा की। श्रील प्रभुपाद के अप्रकट लीला करने पर पूज्यपाद श्रील भक्तिगौरव वैखानस गोस्वामी महाराज के निकट त्रिदण्ड संन्यास ग्रहण करके त्रिदण्डिस्वामी श्रीमद्भक्तिशरण शान्त गोस्वामी महाराज नाम से गौड़ीय वैष्णव जगत् में प्रसिद्ध हुये।
संन्यास ग्रहण के बाद अन्यान्य गुरुभ्राताओं के साथ भारत में बहुत से स्थानों पर श्रीचैतन्य वाणी का प्रचार किया। एकदिन एकान्त भजन करने की इच्छा से श्रीधाम मायापुर ईशोद्यानस्थ मूल श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ के सम्मुख पतित पावनी गंगा के किनारे एक भजनाश्रम श्रीमन्दिर निर्माण करके श्रीविग्रह प्रतिष्ठा एवं नित्य सेवा प्रकाश की। महाराज जी ने दो-चार शिष्य किये और समस्त जीवन निष्ठापूर्वक एकान्त भजन किया। काल की इच्छानुसार उत्पातग्रस्त, जड़-स्वार्थान्वेषी, अशालीन व्यवहार सम्पन्न, आनुगत्य शून्य भजनानुपयोगी शिष्य के द्वारा बहुत दुःखित हुये। अन्त में ४९७ गौराब्द, १६ माधव, १३९० बंगाब्द १९ माघ, ३ फरवरी, सन् १९८४ शुक्रवार को श्रील नामाचार्य हरिदास ठाकुर के श्रीपाट फुलिया स्थान पर अपने एक शिष्य के घर में पाठ-कीर्तन हरिनाम संकीर्तन करते समय अकस्मात् श्रील महाराज भावावेश में नित्यलीला में प्रविष्ट हो गये।
यह लेख श्री चैतन्य वाणी वर्ष -24, खंड – 3, पृष्ठ 58, 1984 में प्रकाशित श्रील भक्ति शरण शांत गोस्वामी महाराज के तिरोभाव होने की घोषणा का अनुवाद है।
वे पूर्व-बंग (वर्तमान बांग्लादेश) के निवासी थे। अति-अल्प आयु में ही उन्होंने श्री धाम मायापुर में आकर श्री श्रील प्रभुपाद के श्री चरणाश्रय को वरण करके मठ में रहकर श्री हरि-गुरु-वैष्णव की सेवा करने का सुनहरा अवसर प्राप्त किया था। उनका दीक्षा-नाम ‘श्री परानन्द ब्रह्मचारी’ था। श्री चैतन्य मठ के मुख्य मंदिर में लंबे समय तक उन्होंने श्री विग्रह की अर्चनादि सेवाओं को प्राप्त किया था। श्री श्रील प्रभुपाद की अप्रकटलीला के बाद, उन्होंने श्री श्रील प्रभुपाद के श्री चरणाश्रित और उनसे ही त्रिदंड संन्यास वेष प्राप्त पूज्यपाद त्रिदंडि स्वामी श्रीमद्भक्ति गौरव वैखानस महाराज से श्री पुरी-धाम में त्रिदंड-संन्यास ग्रहण किया। उनका संन्यास नाम हुआ ‘त्रिदंडी स्वामी श्रीमद्भक्ति शरण शांत महाराज’। उसके बाद उन्होंने श्री धाम मायापुर में इशोध्यान में मूल श्री चैतन्य गौड़ीय मठ के पास एक भजनाश्रम स्थापित किया और वहाँ रहकर भजन करते रहे। हाल ही में पिछले 16वें माधव (497), 19वें माघ (1390), 3 फरवरी (1984) शुक्रवार को श्रीनामाचार्य ठाकुर हरिदास के श्रीपाट फुलिया में एक शिष्य गृह में अन्नप्राशन-उत्सव के समापन के समय अचानक श्री हरि-गुरु-वैष्णव पादपदम को स्मरण करते-करते सचेत अवस्था में ही उन्होंने नित्य-लीला में प्रवेश किया। उनके श्री अंग को शीघ्र ही श्रीधाम मायापुर स्थित उनके आश्रम में लाया गया और धामवासी वैष्णवों की सहायता से श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी द्वारा रचित संस्कार-दीपिका विधि-विधान के अनुसार कीर्तन के साथ समाधि दी गयी।
उनकी प्रयाण लीला अद्भुत् थी—साक्षात् श्रीनामाचार्य ठाकुर के श्रीपाट में नामसंकीर्तन के बिच में ही उन्होंने यह लीला की। एक-एक करके वैष्णव हमें इसी प्रकार आत्म-संगोपन के आदर्श द्वारा सावधान कर रहे हैं।