नित्यलीला प्रविष्ट ॐ विष्णुपाद परिव्राजकाचार्य त्रिदण्डिस्वामी १०८ श्री श्रीमद्भक्त्यालोक परमहंस गोस्वामी महाराज

प्रणाम नमो ॐ विष्णुपादाय प्रभुपाद प्रियात्मने।
श्रीमते भक्त्यालोक परमहंस नामिने ।।
अशेष क्लेशनाशाय श्रीगौरांग सन्तोषनाय च।
कृष्ण सेवार्त्ति प्रदानाय तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।
१३०० बंगाब्द, वैशाख शुक्ला प्रतिपद तिथि अश्विनी नक्षत्र रविवार को श्रील महाराज का शुभाविर्भाव हुआ। वे बहुत भजन परायण थे। वैष्णव के सभी गुण उनमें उपस्थित थे। पिता-माता ने उनका नाम श्रीमहेन्द्र नाथ रखा था। श्रील प्रभुपाद का चरणाश्रय कर श्रीहरिनाम एवं दीक्षा ग्रहण करके श्रीपाद महानन्द ब्रह्मचारी नाम से परिचित हुये। उनका भजन, श्रीगुरु-वैष्णव-भगवान् की सेवा एवं अत्यन्त महद् गुणों से सन्तुष्ट होकर श्रील प्रभुपाद ने श्रीगौराविर्भाव शुभ तिथि में विश्व वैष्णव राजसभा की ओर से भक्त्यालोक उपाधि से भूषित किया। श्रील गुरुदेव के निर्देशानुसार कृष्णनगर में भागवत प्रेस की स्थापना और श्रीधाम मायापुर श्रीचैतन्य मठ के मैनेजमेन्ट की सेवा संभाली। श्रील प्रभुपाद की अप्रकट लीला के पश्चात् गुरुभ्राता श्रील श्रीमद्भक्तिरक्षक श्रीधरदेव गोस्वामी महाराज से त्रिदण्ड संन्यास ग्रहण करके समस्त वैष्णव जगत् में त्रिदण्डिस्वामी भक्त्यालोक परमहंस गोस्वामी महाराज नाम से सुख्याति प्राप्त की। संन्यास लेकर बहुत दिनों तक श्रीगौड़ीय वेदान्त समिति के सभापति एवं आचार्य श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज के साथ श्रीचैतन्यवाणी का प्रचार एवं अन्यान्य सेवा की। झाड़ग्राम स्थित श्रीगौरसारस्वत मठ में श्रील भक्तिभूदेव औति गोस्वामी महाराज के आनुगत्य में बहुत दिनों तक प्रचार आदि किया। बाद में कोलकाता १०६ नं. हाजरा रोड स्थित श्रीगौरांग प्रेमार्थ प्रचारिणी सभा की सेवा ग्रहण की। श्रीमायापुर में श्रीमठ निर्माण कर श्रीविग्रह प्रकाश करके एकान्त भजनानन्द में निमग्न रहे। अन्त में श्रीधाम मायापुर के निज कृत मठ में अन्तर्धान लीला प्रकाश की।