नित्यलीला प्रविष्ट ॐ विष्णुपाद परिव्राजकाचार्य त्रिदण्डिस्वामी १०८श्री श्रीमद्भक्तिविलास भारती गोश्वामी महाराज

प्रणाम

नमो ॐ विष्णुपादाय गौर प्रेष्ठाय भूतले।
श्रीमते भक्तिविलास भारती गोस्वामीति नामिने ।।

१३१० बंगाब्द १८चैत्र, ३१ मार्च, सन् १९०४ में बृहस्पतिवार श्रीकृष्ण बलदेव जू की बसन्तरास लीला और श्रीश्यामानन्द प्रभु की आविर्भाव विष्णुचक्री पूर्णिमा तिथि पर पश्चिमबंग २४ परगना जिलान्तर्गत पिता श्रीयुक्त फटिक चन्द्र दासाधिकारी एवं माता श्रीमती गिरिवाला देवी का आश्रय कर पुत्र के रूप में आविर्भाव लीला प्रकट की। सन् १९०९ पाँच वर्ष की आयु में स्वप्न में श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर के दिव्य दर्शन प्राप्त हुये। सन् १९१३ में अपने पिता के साथ अप्रैल महीना में कोलकाता श्रीगौड़ीय मिशन में श्रील प्रभुपाद के साक्षात् दर्शन किये। सात वर्ष की आयु में बालक को श्रीगीता एवं श्रीभागवत अध्ययन में स्वर्णमुद्रा पुरस्कार प्राप्त हुये। विद्याध्ययन में अस्वाभाविक मेधावी छात्र थे। एक वर्ष में दो-दो क्लास की परीक्षा देकर अत्यन्त सफलता के साथ उत्तीर्ण होकर उच्च शिक्षा प्राप्त की। जड़ विद्या छोड़कर धर्मग्रन्थ अध्ययन शुरू किया। बाल्यकाल से विभिन्न कविता रचना में विशेष दक्षता प्रकाशित की। कभी-कभी अत्यन्त व्याकुल होकर श्रील प्रभुपाद के दर्शन को चले जाते। बाल्यकाल से तीव्र व्रत आचरण, सद्धर्म पालन, धार्मिक एवं कठोर निष्ठावान् थे। कभी-कभी बहुत कष्ट स्वीकार कर घर से डाव (नारियल) सिरपर लेकर श्रीधाम मायापुर श्रीचैतन्य मठ में श्रील प्रभुपाद की सेवा में लाते थे। यह देखकर श्री प्रभुपाद ने समस्त मठवासियों को सजग कराया कि इस बालक का विशेष रूप से ध्यान रखना। कारण एक दिन यह बालक हम सबका होगा। अल्प समय में अपनी सेवा से श्रील गुरुपादपद्म एवं मठवासी सभी के हृदय को जीत लिया था। सन् १८२२ उन्हें १९ वर्ष आयु में श्रीचैतन्य मठ में श्रीलप्रभुपाद के पास आये एवं सन् १९२५ तक अति कठिन परीक्षा में उत्तीर्ण होकर श्रील प्रभुपाद के निकट श्रीहरिनाम और वैष्णवी दीक्षा प्राप्त हुई। श्रील प्रभुपाद ने उनको दीक्षा के पश्चात् श्रीपाद सेवाविलास दास ब्रह्मचारी नाम दिया। मठ की सभी सेवा, भजन-साधन, कीर्तन, हरिकथा, बंगला, अंग्रेजी आदि भाषाओं में मधुर भाषण से सभी के हृदय को विगलित करते थे। श्रील जगन्नाथ मिश्र के नित्य सेवित श्रीअधोक्षज वासुदेव मूर्त्ति की सेवा उनके प्राण थे।

श्रील प्रभुपाद की अन्तर्धान लीला के बाद श्रीचैतन्य मठ के मठाध्यक्ष के रूप में सेवा की। तीन साल तक सारे देश-विदेश में श्रीमन्महाप्रभु का प्रेमभक्ति धर्म का प्रचार किया। सन् १९४० में श्रील भक्तिभूदेव श्रौति गोस्वामी महाराज के निकट त्रिदण्ड संन्यास ग्रहण कर त्रिदण्डिस्वामी श्रीमद्भक्तिविलास भारती गोस्वामी महाराज नाम से सुख्याति अर्जन की। श्रीमन्महाप्रभु और श्रील प्रभुपाद की वाणी प्रचार के लिए श्रील महाराज स्वयं अर्थ संग्रह कर श्रीभक्तिविलास ग्रन्थावली के संकलन एवं प्रकाशन के माध्यम से हरिकथा का प्रचार किया। भुवनेश्वर, पुरी, कोलकाता आदि स्थानों पर श्रीभजनाश्रम निर्माण कर जीवन में श्रीधामवास की चिन्ता से श्रीधाम मायापुर हुलोरघाट पर श्रीरूपानुग भजनाश्रम निर्माण कर श्रीश्रीगुरु-गौरांग एवं स्वप्न प्रदत्त श्रीश्रीराधाश्यामसुन्दर की श्रीविग्रह प्रतिष्ठा के द्वारा नित्य सेवा प्रकाश की। वे निज हाथ से ढँकि छाटा चावल, लकड़ी की आग से सरस्वती गंगा के पानी और मिट्टी के पात्र में रसोई बनाकर श्रीभगवान् को भोग लगाते थे एवं यह प्रसाद दिन में एकबार ग्रहण कर तीव्र भजन में डूबे रहते थे। अन्त में श्रील महाराज ने अपने गुरुभ्राताओं के पास निज इच्छामृत्यु की अभिलाषा बताकर एकमात्र शिष्य श्रीमाधव दास स्वामी को समस्त आश्रम का दायित्व समर्पण करके ७ जनवरी, सन् १९९५ शनिवार को प्रातः ४-४५ बजे. नारायण गौर सप्तमी तिथि में अन्तर्धान लीला प्रकाश की।