नित्यलीला प्रविष्ट ॐ विष्णुपाद परिव्राजकाचार्य त्रिदण्डिस्वामी १०८ श्री श्रीमद्भक्तिरक्षक श्रीधरदेव गोस्वामी महाराज

प्रणाम
कनक-सुरुचिरागं-सुन्दरं-सौम्यमूर्ति
विबुधकुलवरेण्यं श्रीगुरुं सिद्धिपूर्तिम्।
तरुणतपनवासं भक्तिदञ्चिद्विलासं
भज भजतु मनोरे श्रीधरं सम्विधानम् ।।
श्रीस्वरूप-राय-रूप-बीजभाव-सम्भरं
वर्णधर्म-निर्विशेष-सर्वलोक निस्तरम् ।
श्रीसरस्वती-प्रियञ्च-भक्तिसुन्दराश्रयं
श्रीधरं नमामि भक्तिरक्षकं जगद्गुरुम् ।।
देवं दिव्यतनुं सुछन्दवदनं बालार्कचेलाञ्चितं
सान्द्रानन्दपुरं सदेकवरणं वैराग्य-विद्याम्बुधिम् ।
श्रीसिद्धान्त निधिं सुभक्तिलसितं सारस्वतानाश्वरं
वन्दे तं शुभदं मदेकशरणं न्यासीश्वरं श्रीधरम् ।।
गौर-श्रीरूप-सिद्धान्त-विद्य-धाराधरं गुरुम्।
श्रीभक्तिरक्षकं देवं श्रीधरं प्रणमाम्यहम् ।।
ॐ विष्णुपाद श्रील श्रीधरदेव गोस्वामी महाराज ने वर्द्धमान जिला कालना महकुमा के अन्तर्गत काटोया लाइन पाटुली स्टेशन के निकट हाँपानिया गाँव में १३०२ बंगाब्द, सन् १८९५, २६ आश्विन शनिवार पण्डितप्रवर श्रीयुत उपेन्द्र चन्द्र भट्टाचार्य विद्यारत्न महोदय एवं श्रीमती गौरीदेवी को माता पिता के रूप से स्वीकार कर श्रीलबीरचन्द्र प्रभु की शुभाविर्भाव तिथि में प्रकटलीला की। इनके माता पिता दोनों ही स्वधर्म निष्ठ भगवद् परायण सज्जन थे। इन दोनों ने मिलकर पुत्र का नाम श्रीरामेन्द्र सुन्दर भट्टाचार्य रखा। उन्होंने छात्र जीवन में अत्यन्त बुद्धिमान और मेधावी था, प्रत्येक परीक्षा में श्रेष्ठ अंक लेकर सबके आगे चलते थे। बाल्यकाल में इनके मधुर व्यवहार, मिठा बाणी, धीर स्वभाव, प्रशान्त-सोम्य मूर्ति एवं प्रचुर भक्तिपूर्ण हृदय से भगवान में विश्वास सुन्दर चरित्र देखकर माता-पिता परिवार के एवं अन्यान्य पड़ोसियों के बहुत् प्यारा थे। वे वाल्यकाल में माता सुन्दर-सुन्दर सब्जी बनाकर इनको खाने की देने से वे सबसे प्यारी की रूप से निम्ब आदि कड़वा सब्जी जादा से जादा खाते थे। वचपन से सूर्योदय के पूर्व तीन मील दूर चलकर गंगा-स्नान करने में जाते थे एवं प्रत्येक दिन अति भक्ति गद्गद हृदय से गंगा और शिव जी के पूजा करते थे, ये इनके नियम था।
कट्टर स्मार्त ब्राह्मण होने पर भी श्रीमहाप्रभु की संकीर्तन में बहुत रुचि थे। संस्कृत में बहुत सुन्दर काव्य रचना करते थे। एकवार इनके हस्तरेखा देखकर एक योगवीर ने तीन भविष्यवाणी कहा, (१) आप स्वरूप-सिद्ध होंगे, (२) विश्व में गौरवाणी के श्रेष्ठ प्रचारक के रूप में प्रसिद्धि होंगे, (३) आप ९३ वर्ष आयु में शरीर छोड़ेंगे। उस योगी की भविष्य वाणी सब सत्य हुआ। कोलकाता विश्वविद्यालय के बी. ए. परीक्षा में प्रथम स्थान लेकर पास करके आइन पढ़ने के समय महात्मा गान्धीजी के भारत छोड़ो असहयोग आन्दोलन में योगदान किया। काँलेज के प्रथम वर्ष में नवागत छात्र सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य से मित्रता हुई। इनके जन्म भारत सेवा संघ के प्रतिष्ठाता श्रीप्रणवानन्द के गाँव में हुआ। एकवार दो मित्र के वीच बातचित् होते हुए समय श्रीरामेन्देर सुन्दर ने मित्र को पुछा कि, हमारा असली सम्बन्ध किससे है? तब मित्र ने श्रीचैतन्यदेव की साहित्य इनको दिया। वह पढ़कर श्रीचैतन्य महाप्रभु के प्रति आकर्षित हुये एवं गौड़ीय भजन करने की मन में अभिलाषा हुई। पिता के अन्तर्धान के बाद इन्होंने उसी दिन से जीवन में पादुका एवं चाता व्यवहार त्याग कर दी।
सन् १९२३ से परमाराध्यतम श्रीश्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर के कृपाकर्षण से १नं. उल्टाडिंगि जंक्शन रोड गौड़ीय मठ में आप प्रायः आते रहे एवं श्रीलप्रभुपाद के मुखारविन्द से सौभाग्यवश हरिकथा सुनकर मनुष्य जीवन का प्रकृत उद्देश्य अनुभव किया। तीन वर्ष बाद दिसम्बर, सन् १९२६ में पूर्ण रूप से श्रीगौड़ीय मठ में योगदान करके श्रीलप्रभुपाद के विशेष स्नेहभाजन हुये एवं वैशाख महीने में श्रीलप्रभुपाद ने २३, श्रावण को पाञ्चरात्र विधानानुसार श्रीहरिनाम महामन्त्र एवं कृष्णमन्त्र दीक्षा प्रदान कर श्रीपाद रामानन्द ब्रह्मचारी नाम प्रदान किया। श्रील प्रभुपाद इनकी साधन भजन में ऐकान्तिक निष्ठा, गुरु-वैष्णव सेवा में विशेष रूप से अनुराग और श्रीलप्रभुपाद की चिन्तन-भावधारा का अनुसरण एवं सच्छास्त्र-सिद्धान्त परिवेशन कार्य में विशेष निपुणता देखकर श्रील प्रभुपाद ने सन् १९३० में श्रीपाद रामानन्द ब्रह्मचारी को त्रिदण्ड संन्यास वेष प्रदान किया। संन्यास ग्रहण करके त्रिदण्डिभिक्षु श्रीमद्भक्तिरक्षक श्रीधरदेव गोस्वामी महाराज नाम से समस्त गौड़ीय वैष्णव जगत् में आदरणीय हुये। वास्तविक रूप से श्रीलगुरुदेव के दिये हुये नाम की यथार्थता सम्पादन करके आज जगद्वरेण्य हुये हैं। वैष्णवोचित समस्त सद्गुण इनमें मोजूद थे। श्रीलगुरुपादपद्म की कृपा से भगवत् कृपा प्राप्त होती है। उच्च ब्राह्मण कुल में जन्म, ऐश्वर्य, पाण्डित्य, सौन्दयादि पाकर भी जीवन में कोई अभिजात्य एवं पाण्डित्य का अहंकार कभी नहीं था। विद्वद्धन मण्डित विचार सभा में अत्यन्त धीर-स्थिर एवं गम्भीर भाव से भक्तिशास्त्र विरुद्ध अपसिद्धान्तों को खण्ड-विखण्डित करके सुसिद्धान्त स्थापित करना, इनके जीवन में एक बहुत सुन्दर कौशल देखा गया। उनके मुखारविन्द से श्रीमद्भगवद् गीता, श्रीमद्भागवत शास्त्र की सुन्दर युक्तिपूर्ण भक्तिपरक व्याख्या एवं शुद्धभक्ति सिद्धान्तपूर्ण भाषण सुनकर बहुत सारग्राही सज्जन लोगों ने जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के श्रीचरणों में आश्रय लेकर अपने जीवन को सार्थक किया।
श्रील भक्तिरक्षक श्रीधरदेव गोस्वामी महाराज ने जिस समय गृहत्याग करके श्रीगौड़ीय मिशन में पूर्ण रूप से आत्म समर्पण किया, उस समय श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने अत्यन्त प्रसन्न होकर गीता के एक विख्यात श्लोक का उच्चारण करके कहा- यद् यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्त्तते।। (गीः ३/२१) साधारण व्यक्ति महान् व्यक्तियों का अनुसरण करते हैं, क्योंकि महान् व्यक्ति सही काम करते हैं यह सबको ज्ञात है। श्रीलप्रभुपाद ने श्रील महाराज के हृदय में आनन्द प्रकाश करके कहा कि श्रीधर महाराज के समान शिक्षित व्यक्ति ने श्रीचैतन्य महाप्रभु के मिशन में योगदान दिया है, अतः इससे और सुखकर विषय क्या हो सकता है? श्रील महाराज ने समस्त भारतवर्ष में महाप्रभु की वाणी का बहुत प्रचार किया है। आप स्वाभाविक रूप से अंग्रेजी, हिन्दी, बंगला एवं संस्कृत भाषा में भाषण देने की बहुत सुन्दर योग्यता रखते थे। उन्होंने विभिन्न कॉलेज विश्वविद्यालय, बिहार गिरिडि में बैरिस्टर की लाईब्रेरी, राजा-महाराजा की आयोजित सभा आदि बहुत बृहत-बृहत जनसभाओं में श्रीमन्महाप्रभु के विषय में भाषण प्रदान किया। गिरिडि की एक सभा में एक विशेष शिक्षित व्यक्ति मि. वसाक सभापति के रूप से विराजित थे। वहाँ श्रील महाराज का भाषण सुनकर सभापति महोदय ने मन्तव्य प्रकाश किया कि हम सबको इतने दिन तक पता था कि वैष्णव धर्म हिन्दूधर्म का ही एक अंश व शाखा है। किन्तु आज हम सबको पूर्ण रूप से पता चला कि यह ठीक नहीं है, वैष्णवधर्म ही जैवधर्म व प्रत्येक आत्मा का नित्यधर्म है और सभी धर्म इसी वैष्णवधर्म के ही अंश हैं। श्रीलमहाराज ने बताया कि श्रीमन्महाप्रभु के विशुद्ध सिद्धान्त एवं विचारधारा से यह प्रमाणित है कि प्रेम और मुक्ति का कभी एक तात्पर्य नहीं है। दोनों की सम्पूर्ण रूपसे पृथक् सत्ता है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष ये सब नित्य सनातन श्रीकृष्ण के अंश आत्मा के लक्ष्य नहीं हैं। अप्राकृत चिन्मय श्रीकृष्णप्रेम ही प्रत्येक आत्मा का चरम लक्ष्य एवं प्रयोजन है। श्रीलप्रभुपाद ने श्रीलमहाराज की दिव्य सचेतनता, संस्कृत रचनादि एवं शास्त्र में गम्भीर ज्ञान और गूढ़ार्थ निर्णय में निपुणता देखकर इनको शास्त्रनिपुण श्रीधर महाराज एवं निवेदितात्मा कहा है। श्रीलप्रभुपाद के निर्देशानुसार प्रेस का काम, विभिन्न स्थानों पर श्रीचैतन्यवाणी प्रचार, डुमुरकोंदा मठ, बंगाल, बनारस, वृन्दावन और दिल्ली मठ में कलेक्शन एवं मठ रक्षक के रूप से सेवा, कुरुक्षेत्र में मठ की प्रतिष्ठा तथा वहाँ मठ रक्षक के रूप से उन्होंने सेवा की। कोलकाता श्रीगौड़ीय मठ के एक माह व्यापी उत्सव के बाद श्रीमद्भक्तिहृदय वन महाराज एवं हयग्रीव प्रभु (श्रीमद्भक्तिदयित माधव महाराज) के साथ श्रील प्रभुपाद ने मद्रास जाकर श्रीमन्महाप्रभु का पादपीठ प्रकाशित किया। इसी वर्ष में श्रीलप्रभुपाद ने बहुत से स्थानों पर श्रीचैतन्य-पादपीठ प्रकाशित किये, मद्रास मठ के इन्चार्ज के रूप में सेवा की, मुम्बई मठ का दायित्व संभालना, विभिन्न समय गौरमण्डल, क्षेत्रमण्डल, व्रजमण्डल एवं समग्र भारत परिक्रमा के सारे दायित्व संभलना, इस प्रकार श्रीलमहाराज ने अधिक समय तक श्रीलप्रभुपाद के साथ रहकर उनके सारे मनोभीष्ट पूर्ण किये।
श्रीलगुरुमहाराज के मुखारविन्द से हम सब ने सुना है कि श्रीलप्रभुपाद की पूरी तरह इच्छा थी कि मैं विदेश जाऊँ और प्रचार करूँ किन्तु श्रीलप्रभुपाद इस जगत् में अधिक दिन नहीं रहेंगे, यह सोचकर मैंने श्रीलप्रभुपाद को निवेदन किया कि मेरी विदेश में प्रचार करने की इतनी योग्यता नहीं है। फिर उन लोगों की भाषा मुझे समझ में नहीं आती और विदेशी लोगों के साथ ज्यादा मिलना-जुलना मुझे अच्छा नहीं लगता। मेरे विदेश जाने के लिए इतना अर्थ खर्च करेंगे किन्तु आपको सन्तोषजनक फल प्राप्त नहीं होगा। अगर आप चाहें तो मैं आपके आदेश पालन के लिए अवश्य ही जाऊँगा। किन्तु इसमें मेरी योग्यता कितनी है यह मैंने आपके श्रीचरणों में निवेदन किया। यह सुनकर मेरे स्थान पर श्रीलप्रभुपाद ने श्रीयुक्त ए. बी. अप्राकृत भक्तिसारंग गोस्वामी प्रभु (गोस्वामी महाराज) को भेजा। एक समय मैंने श्रीलभक्तिविनोद ठाकुर के बारे में संस्कृत में एक कविता रचना की थी,
श्रीगौरानुमतं स्वरूपविदितं रूपाग्रजेनादृतं
रूपादैः परिवेशितं रघुगणैरास्वादितं सेवितम् ।
जीवाद्यैरभिरक्षितं शुक-शिव-ब्रह्मादि सम्मानितं
श्रीराधापदसेवनामृतमहो ! तद्दातुमीशो भवान् ।।
श्रीगौरचन्द्र का करुणामय दान, जो अन्तरंग लीला स्वरूपदामोदर को ज्ञात है, श्रील सनातन गोस्वामी ने जिनकी पूजा की है, रसतत्वाचार्य श्रीरूपगोस्वामी के नेतृत्व में जो वितरित है, जो रूप-रघुनाथगणा द्वारा आस्वादित, जो श्रीजीवगोस्वामी द्वारा कोमलभाव से सुरक्षित है, बहुत पूर्वकाल से अनन्य व्यक्तित्व देवादिदेव महादेव एवं विश्वपिता ब्रह्मा जी ने भी पूजा करने के लिए जिनकी शरण ली है उस महिमामय परमानन्दमय श्रीराधापद सेवामृत को आपने प्राप्त करके हम सबको दान किया, यह जानकर श्रीलप्रभुपान ने कविता पढ़ने के लिए मुझे आदेश किया। कविता सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुये और कहा- बहुत सुखक रचना शैली है। बाद में श्रीमद्भक्तिभूदेव श्रौति महाराज से कहा कि यह कविता बहुत सुन्दर है, य इनके द्वारा लिखी नहीं है। श्रीलभक्तिविनोद ठाकुर ने स्वयं लिखाया है और इनके माध्यम से प्रकाशि कराया है। यह बहुत प्रशंसनीय है। एक समय श्रीपाद अप्राकृत प्रभु को श्रीलप्रभुपाद ने कहा कि बहुत सन्तुष्ट हूँ, मैं जो बोलने के लिए आया था वह मेरे चले जाने के बाद भी रहेगा। यह इस श्लोक अन्दर देखा गया है।
श्रीलगुरुमहाराज के मुखारविन्द से और भी सुना है- गरुड़ पुराण में समस्त वेदमाता को ब्रह्मगायत्री का भाष्य स्वरूप बताया है श्रीलभक्तिरक्षक श्रीधरदेव गोस्वामी महाराज जी ने श्रीमद्भागवतानुगत्य में ब्रह्मगायत्री को श्रीराधापदं धीमहि रूप से जो अपूर्व व्याख्या व माधुर्य प्रकाश किया है, वह अप्राकृत रसज्ञ सुधी समाज में विशेष रूप से समादृत हुआ है। अनयाराधितो नूनं यह भागवतीय कथा में (भाः१०/३०/२६) जिसमें श्रीकृष्ण द्वारा सम्यक् रूप से आराधित व आनन्द प्राप्त बताया है, उन्हीं श्रीकृष्ण की हादिनी स्वरूपशक्ति राधारानी के एकान्त रूप से आनुगत्य को छोड़कर व्यतीत श्रीकृष्ण पादपद्म प्राप्त करने का दूसरा कोई मार्ग नहीं है। यह केवल ब्रजवधूवर्गकल्पिता रम्या काचिदुपासना राधा भजने यदि मति नाहि भेला। कृष्ण भजन तब अकारणे गेला।। यह स्वरूप रूपानुगवर गुरुपादपद्म की विशेष उपदेश वाणी है, इसी उपदेश मन्त्र का जप करने से अवश्य ही माया पिशाची भाग जायेगी। यह ददामि बुद्धियोग तं येन मामुपयान्ति ते इस वाक्य में वेदमाता गायत्री के पास प्रार्थनीया एवं श्रीभगवत पादपद्म की नित्यसेवा प्राप्ति के लिए शुद्ध निश्चयात्मिका बुद्धिरूप बताया गया है। श्रील भक्तिरक्षक श्रीधरदेव गोस्वामी महाराज के हृदय में श्रीराधानित्यजन श्रीवार्षभानवी दयितदास्याभिमानी श्रीगुरुकृपा से ही इस व्याख्या की स्फूर्ति प्राप्त हुई है। श्यामाच्छवलं प्रपद्ये शवलाच्छयामं प्रपद्ये वेद वाक्य की अभिधा वृत्ति के द्वारा श्रीकृष्ण के आश्रय में स्वरूपशक्ति ह्लादिनी के सारभाव का आश्रय करता हूँ एवं ह्लादिनी के सारभाव के आश्रय में श्रीकृष्ण का आश्रय करेंगे। जब इस प्रकार न्यायसिद्ध वाक्य मिलता है तब लक्षणा वृत्ति के माध्यम से श्याम शब्द का हार्द्रब्रह्मत्व किसलिये अनुमान करेंगे? सुतरां श्रीराधापदं धीमहि इस अर्थानुगत्य करने से ही श्रीश्रीराधाश्यामसुन्दर के पादपद्म अवश्य ही प्राप्त होंगे। कारण भगवान् परम सत्य हैं। श्रीलगुरुदेव के निकट अपने गुरुभ्राता श्रीमद्भक्तिसारंग गोस्वामी महाराज, श्रीमद्भक्तिकमल मधुसूदन महाराज, श्रीमद्भक्तिआलोक परमहंस महाराज इत्यादि बहुत लोगों ने त्रिदण्ड संन्यास ग्रहण किया। एक समय श्रीमद्भक्तिवेदान्त स्वामी महाराज ने श्रीलगुरुदेव को इस्कॉन मन्दिर में रहने के लिए कहा। श्रीलगुरुदेव ने कहा- मुझे किसी प्रकार बड़ा मानव होने की इच्छा नहीं है। श्रील गुरुदेव की कृपा से मुझे जो मिला उसमे मैं सन्तुष्ट हूँ। अध्यात्म चिन्तन ही मेरा जीवन है। समस्त शास्त्रों का तात्पर्य महाजनों के उपदेशों को अनुभव करना, आचरण करना और एकदम अन्तरंग भाव से क्षुद्र मण्डली में वह सब आलोचना करना ही मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है।
प्रथितनामा पण्डितवंश में जन्म परमाराध्य श्रीलभक्तिरक्षक श्रीधरदेव गोस्वामी महाराज ने बाल्यावस्था में पाठ्य पुस्तक पढ़ने के साथ-साथ अंग्रेजी और उसी के साथ संस्कृत भाषा में भी ज्ञान प्राप्त किया। अत्यन्त कम उम्र से संस्कृत भाषा में उनका कविता रचनादि में स्वाभाविक रूप से प्रभाव देखा गया। जब परमाराध्यतम श्रीश्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर का श्रीचरणाश्रय किया तब उनकी स्वाभाविक भगवत शक्ति और अधिक प्रसारित होने लगी। श्रीलप्रभुपाद श्रीलभक्तिरक्षक श्रीधरदेव गोस्वामी के रचित श्रीमद्भक्तिविनोद-विरह दशकम् स्तोत्र का पाठ करके अत्यन्त प्रसन्न हुये थे। श्रीलमहाराज के रचित श्रीप्रभुपादपद्मस्तवकः, श्रीदयितदास प्रणति पञ्चकम्, श्रीदयितदास दशकम् एवं श्रीलप्रभुपाद प्रणतिः आदि श्लोक के माध्यम से श्रीलगुरुपादपद्म में किस प्रकार गाढ़ अनुराग व उर्जिता भक्ति विराजित थी यह प्रमाणित होता है। उसके बाद श्रीमद् श्रीगौरकिशोर नमस्कार दशकम्, श्रीमन्नित्यानन्द दशकम्, श्रीलगदाधर प्रार्थना, श्रीप्रपन्नजीवनामृतम्, ऋकतात् पर्यम्, श्रीगायत्री निर्गलितार्थम्, श्रीगुरुवन्दना, प्रेमधाम देवस्तोत्रम्, श्रीगौरसुन्दर नति स्तोत्रम् प्रभृति श्रीगौड़ीय वैष्णव समाज में विशेष रूप से समादृत हैं। इनके रचित श्लोक और ग्रन्थादि श्रीलप्रभुपाद के चरणाश्रित नित्यलीला प्रविष्ट भजनानन्दी वैष्णव प्रवर श्रीमद् कृष्णदास बाबाजी महाराज और श्रीमद्भक्ति विचार यायावर महाराज ने बहुत प्रशंसा की एवं आदर पूर्वक उनका कीर्तन करके आस्वादन किया। श्रीलगुरुमहाराज जी द्वारा रचित श्रीगौरसुन्दर की आविर्भाव तिथि में अरुण-वसने-सोनार-सूरज, सारस्वत आरती, प्रभृति गीतिगुच्छ समस्त वैष्णवगण अत्यन्त आदर पूर्वक कीर्त्तन करते हैं। फिर श्रील महाराज ने सम्पादक के रूप से श्रीश्रीलरूपगोस्वामी पाद द्वारा प्रणीत समग्र श्रीभक्तिरसामृत सिन्धु (मूल श्लोक, टीका, अन्वय बंगानुवाद सहित) का जो नये रूप में आस्वादन किया है, यह वैष्णव समाज को पूरा ज्ञात है। शाश्वत सुखनिकेतन, श्रीभक्तिरक्षक दिव्यवाणी, श्रीभक्तिरक्षक हरिकथामृत, प्रेम अन्वेषण, श्रीगौरसुन्दर की विप्रलम्भ लीला के समाहार आदि बंगला और अंग्रेजी में रचित ग्रन्थ समूह हमेशा के लिए प्रकाशित हैं एवं देश और विदेश में विशेष रूप से समादृत एवं प्रचारित हैं। श्रीलगुरुमहाराज द्वारा रचित ग्रन्थ और हरिकथा टेप रिकार्ड के माध्यम से विदेश में विशेष विशेष स्थानों पर प्रचार केन्द्र स्थापित हुये हैं एवं उसके साथ श्रीश्रील प्रभुपाद की शुद्धभक्ति सिद्धान्तवाणी विभिन्न भाषाओं में विशेष रूप से प्रचारित हुई है। श्रीलमहाराज अपने प्रकटकाल में ही पृथिवीते आछे यत नगरादि ग्राम। सर्वत्र प्रचार हइबे मोर नाम।। श्रीमन्महाप्रभु के श्रीमुखनिः सृत इस दिव्यवाणी की अद्भुत रूप से सार्थकता करके गये। भारतवर्ष में श्रीचैतन्य सारस्वत मठ, (नवद्वीप), श्रीचैतन्य सारस्वत आश्रम (हाँपानिया वर्द्धमान), श्रीचैतन्य सारस्वत कृष्णानुशीलन संघ, पुरी स्वर्गद्वार, दमदमपार्क एवं कैखाली आदि स्थानों में मठ स्थापित करके प्रचार कार्य होता है।
जगद्गुरु परमाराध्यतम श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर अन्तिम समय में परम पूज्यपाद श्रील भक्तिरक्षक श्रीधरदेव गोस्वामी महाराज के मुखारविन्द से श्रीलनरोत्तम ठाकुर महाशय का कीर्त्तित- श्रीरूपमञ्जरी पद, सेइ मोर सुसम्पद, सेइ मोर भजन पूजन। गीति श्रवण करके श्रीलमहाराज को अतिमर्त्य आशीर्वाद व करुणा करके गये। परम पूज्यपाद श्रीलमहाराज ने परमाराध्यतम गुरुपादपद्म श्रीश्रीलप्रभुपाद का यही कृपाशीर्वाद अपने सिरपर धारण कर उनके अप्रकट काल के अन्तिम मुहूर्त तक श्रीश्रील स्वरूप-रूपानुगवर श्रीलप्रभुपाद के मनोभीष्ट पूर्ति के लिए बहुत प्रयत्न किया। श्रीलगुरुमहाराज ने अत्यल्प अस्वस्थ लीला करके १३९५ बंगाब्द, २७ श्रावण, १२ अगस्त, सन् १९८८ शुक्रवार अमावस्या को प्रातः ५/४८मि. बजे निज प्रतिष्ठित श्रीधाम नवद्वीप श्रीचैतन्य सारस्वत मठ में समस्त जगद्वासियों को+नित्य ही विरह सिन्धु में निमज्जित करके निज नित्याराध्य श्रीश्रील गुरुपादपद्म प्रभुपाद श्रीमद्भक्तिसि द्धान्तसरस्वती गोस्वामी ठाकुर के श्रीचरणों में शुभ विजय की।