नित्यलीला प्रविष्ट ॐ विष्णुपाद परिव्राजकाचार्य त्रिदण्डिस्वामी १०८ श्री श्रीमद्भक्तिमयूख भागवत गोस्वामी महाराज

प्रणाम

नमो ॐ विष्णुपादाय भक्तिमयूख भागवत नामिने।
सर्वेश शक्तिरूपाय कृष्णाय सेवक रूपिने।।
श्रीरूपराधाप्रेष्ठाय उन्नतोज्ज्वलरस सिन्धव ।
गुरुनाम निष्ठादात्रे हृदय देवतायै नमः ।।

बीरभूम जिलान्तर्गत श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु की आविर्भाव स्थली एकचक्रा ग्राम के निकट श्रीपुर (चिनपाई) नामक स्थान पर धन-सम्पत्ति, ज्ञान-गुण, मान-सम्मान में पूर्ण श्रीविष्णुपद चट्टोपाध्याय महोदय की द्वितीय कन्या श्रीकुसुम कामिनी देवी के साथ श्रीरामशंकर मुखोपाध्याय का विवाह हुआ। उन्होंने ग्राम के शिव जी के मन्दिर निर्माण और प्रतिष्ठा के एक वर्ष बाद सन् १९११ फाल्गुण महिना के शुक्ला त्रयोदशी तिथि पर शुभलग्न और मुहूर्त में श्रीरामशंकर एवं श्रीकुसुम कामिनी देवी को पिता-माता के रूप में स्वीकार कर एक दिव्य शिशु के रूप में जन्म लिया। शिशु के विचित्र महापुरुषोचित लक्षण देखकर पिता श्रीरामशंकर बाबू ने बहुत से ब्राह्मण-वैष्णव, अभ्यागत अतिथि, दीन-दुःखी एवं आत्मीय-स्वजनों को प्राण भर के अन्न, वस्त्र, अर्थादि दान किया। शिव भगवान् की कृपामूर्ति के रूप से शिशु का जन्म हुआ यह सोचकर माता-पिता ने शिशु का नाम श्रीशंकरलाल मुखोपाध्याय रखा। शिशुकाल से पुत्र के अद्भुत शुभ आचरण, भक्ति, वैराग्य, मौन, प्रशान्त भाव देखकर माता-पिता बहुत आनन्दित होते थे। बाल्यकाल से श्रीशंकरलाल ने अत्यन्त मेधा एवं दक्षता के साथ शिशु पाठ्य क्रम समाप्त कर लिया। पिता ने बालक को मल्लार पुर एम. इ. स्कूल में भर्ती करा दिया। पिता ने इनकी देव-द्विज, भगवान् में प्रगाढ़ भक्ति, दीन-दुःखी के प्रति अतिशय दया, सरल, उदारता देखकर ८ वर्ष की आयु में बालक शंकरलाल का उपनयन संस्कार अनुष्ठान सु-सम्पन्न किया। स्कूल के छठी क्लास में सभी विषयों में प्रथम स्थान लेकर सबको आनन्दित किया एवं उच्च अंग्रजी शिक्षा के लिए सातवीं कक्षा में भर्ती हुये। प्रधान शिक्षक ने बालक को निज पुत्रवत् स्नेह पूर्वक हमेशा अपने घर में बुलाकर खिलाते थे और प्यार करते थे। शंकर की ११ वर्ष की आयु में पितृदेव अन्तर्धान हो गये। १३ वर्ष की आयु में माता, पितामह, मातामह सभी अभिभावकों की मृत्यु के कारण बालक शंकर पूर्ण रूप से एकाकी हो गये।

उस समय की प्रथानुसार आत्मीय स्वजन और ग्रामवासियों ने हठ पूर्वक शंकर की शादी करा दी। शादी होने पर भी कॉलेज में पढ़ते समय शंकर ने सभी विषयों में स्टार लेकर मेट्रिक पास किया। उच्चशिक्षा के लिए हेतमपुर कॉलेज में भर्ती हुये। कॉलेज में अध्ययन के समय स्वार्थान्वेषी आत्मीय-स्वजनों ने विभिन्न प्रकार की छल-चतुरता के द्वारा इनकी सारी विषय सम्पत्ति हड़प ली। इस कारण शंकर की पढ़ाई बन्द हो गयी। श्रीपुर ग्राम श्रीमन्महाप्रभु के नित्य पार्षद श्रीपाद काशीश्वर गोस्वामी श्रीपाट नाम से विख्यात थे। उक्त ग्राम श्रीराधागोविन्द, राधावल्लभ, राधाश्यामसुन्दर, गोपाल जू, बलदेव रेवती देवी, रघुनाथ सीता देवी आदि भगवान् के श्रीविग्रह एवं केवल ब्राह्मण परिवार द्वारा सुसज्जित था। ग्राम के सभी ब्राह्मण शाक्त धर्मावलम्बी थे। किन्तु शंकरलाल बाल्यकाल से केवल हरिभक्ति परायण था। उनके हृदय विगलित सुमधुर कण्ठ से हरिनाम कीर्तन, विभिन्न महाजन पदावली का गान श्रवण करके सभी लोग भाव में बिह्वल हो जाते थे। वे ग्रामवासियों को लेकर हरिनाम संकीर्त्तन दल बनाकर प्रत्येक ग्राम में हरिनाम संकीर्तन करके लोगों को परमानन्द प्रदान करते थे। हरिनाम कीर्तन के द्वारा एक समय एक मृत युवक का प्राण लौटा दिया। बहुत प्रकार की व्याधि, आपद-विपद से लोगों को मुक्त करके श्रीकृष्णनाम की अलौकिक महिमा प्रचार करते थे। लोग इनको बड़ठाकुर के नाम से मानते थे और हमेशा इनके साथ रहकर श्रीहरिनामामृत रस पान करके धन्यातिधन्य होकर परमानन्द में डूबे रहते थे।

कलियुग पावनावतारी स्वयं भगवान् श्रीमन्महाप्रभु द्वारा प्रचारित श्रीहरिनाम संकीर्तन रससिन्धु में डूबे रहकर मन में चिन्तन किया कि यह संसार केबल दुःखदायी है। यहाँ का मोह-ममता, स्नेह-प्यार सभी दुःख के कारण होता है। श्रीकृष्णनाम एवं श्रीकृष्ण स्वरूप ही एकमात्र सत्य वस्तु एवं एक अभिन्न अद्वय तत्व हैं। अभी मेरे प्राणप्रिय बान्धव, नित्य जीवन धन साथी का किस उपाय से, कहाँ दर्शन मिलेगा, कौन बतायेगा, किसके पास जाने से वह मुझे सही मार्ग दिखायेगा इस चिन्तन में शंकरलाल हमेशा संसार से दूर रहते थे। केवल श्रीकृष्ण भावना में डूबे रहते थे और भगवान् के चरणों में करुणा प्रार्थना करते थे कि-काहाँ जाऊँ काहाँ पाऊँ व्रजेन्द्रनन्दन। दिन रात्रि यही उनका ध्यान था। इस अवस्था में अन्तर्यामी भगवान् ने शंकर पर कृपा करने की इच्छा की। एक दिन रात्रि में स्वप्न देखा कि सुन्दर उज्ज्वल गैरिक बसन, गले में उत्तरीय, स्कन्ध में अति उज्ज्वल उपवीत, कण्ठ में तुलसी माला एवं त्रिदण्ड धारण कर एक दिव्य ज्योतिर्मय पुरुष अलौकिक प्रकाश से सुशोभित उनके द्वार पर खड़े हैं। एक व्यक्ति अंगुलि दिखाकर उन्हें निर्देश कर कह रहे थे-यही महापुरुष तुम्हारे श्रीगुरुदेव हैं। यह देख सुनकर वे सोचने लगे कि कितने आश्चर्य की बात है, जिनके लिए इतने दिन तक रोया, ढूँढ़ते ढूँढ़ते थक गया वह आज स्वर्य मेरे सम्मुख एकदम द्वार पर हैं। भगवान् की कैसी कृपा है। इतना ही सोचते निद्रा भंग हो गयी। तब शैयापर बैठकर सोचा कि मेरे गुरुदेव को मैंने स्वप्न में देखा, किन्तु इतनी बड़ी पृथ्वी पर मेरे गुरुदेव को कहाँ ढूँढूँगा, यह कैसी विपत्ति में गिरा दिया। ठीक उसी समय बन्द दरवाजा से आवाज आयी, कोई बाहर से बुला रहा था। शीघ्र ही दरवाजा खोलकर देखा एक व्यक्ति स्वप्नादृष्ट दिव्य संन्यासी की छवि (चित्रपट) लेकर खड़े हैं। उनका परिचय पूँछने पर उन्होंने कहा- गाँव के श्रीभुजंग भूषण मित्र महोदय ने आपके पास भेजा है। यह सुनकर शीघ्र तैयार होकर मित्र महाशय के पास गये, उस समय उन्हें आसन पर बैठकर एकान्त रूप से मालिका में हरिनाम जप करते देखा। उनके साथ आलोचना करके पता चला कि स्वप्न दृष्ट दिव्य संन्यासी एवं आलेख्य दोनों एक ही महापुरुष श्रीधाम मायापुर श्रीचैतन्य मठ के प्रतिष्ठाता जगद्‌गुरु श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर हैं। मित्र महाशय उनके श्रीचरणाश्रित शिष्य हैं। बहुत समय तक मित्र महाशय के मुख से श्रील प्रभुपाद की महिमा सुनकर शंकरलाल परमानन्द सिन्धु में डूब गये। तय हुआ कि आगामी फागुन महिना श्रीमन्महाप्रभु की आविभीव तिथि दोल पूर्णिमा में श्रीधाम मायापुर दर्शन के लिए जाएंगे। किन्तु मित्र महाशय अपनी अस्वस्थता के कारण जा नहीं पाये।

शंकरलाल ने स्वयं साहस करके श्रीधाम मायापुर के लिए यात्रा की। शाम के समय श्रीधाम मायापुर श्रीचैतन्य मठ में पहुँचे। पहले श्रीगौरांग के आविर्भाव स्थान योगपीठ मन्दिर में श्रीलक्ष्मीप्रिया, श्रीविष्णुप्रिया श्रीगौरांगदेव, श्रीश्रीराधागोविन्द, पञ्चतत्त्व की सन्ध्यारती दर्शन करके कुछ समय बाद योगपीठ मन्दिर के आंगन में असंख्य वैष्णव भक्तों के बीच स्वप्न दृष्ट दिव्य ज्योतिर्मय संन्यासी महापुरुष को दिव्य उच्च आसन पर बैठकर हरिकथा सुनाते हुए देखा। उनके दर्शन एवं हरिकथा श्रवण कर शंकर के समस्त मन-प्राण एक विशेष अभिनव आनन्द सिन्धु में डूब गये। आज मेरा जीवन सार्थक हुआ यह सोचकर दूर से श्रील प्रभुपाद को अत्यन्त भक्ति पूर्वक साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करके हरिकथा सुनने लगे। थोड़े समय के बाद प्रसाद पाने के लिए घण्टी हुई। सभी लोगों को प्रसाद पाने के लिए बैठे देखकर शंकरलाल ने भी उन लोगों के साथ बैठकर प्रसाद पाया और विश्राम कक्ष में रात्रि को विश्राम किया।

प्रातः होने पर पता चला कि आज श्रीगौर पूर्णिमा पर बहुत से लोगों ने श्रील प्रभुपाद से हरिनाम दीक्षा लेने के लिए पहले से ही नाम लिखाये हुए हैं। किन्तु शंकर लाल का नाम तो नहीं है। नाम तालिकानुसार सभी गंगा स्नान करके तिलक आदि धारण कर लाइन में बैठे। शंकरलाल भी उन लोगों के साथ गंगा स्नान करके तिलक धारण कर लाइन में बैठ गये। मन में सोचते हैं कि जिन्होंने मुझे स्वप्न में दर्शन दिया यहाँ तक लाये वे क्या अपने जन को पहचान नहीं सकेंगे? कुछ समय बाद श्रील प्रभुपाद आकर दिव्य आसन पर बैठे। दो व्यक्तियों को हरिनाम देकर श्रील प्रभुपाद शंकरलाल को देखने लगे और शंकरलाल प्रभुपाद को देखते रहे। दोनों के बीच इस प्रकार की लीला के अन्त में श्रील प्रभुपाद ने शंकरलाल को बुलाकर पूँछा, आप हरिनाम दीक्षा लेंगे? यह सुनकर शंकरलाल ने प्रसन्न होकर जबाब दिया- हाँ। तब श्रील प्रभुपाद ने उनको एक साथ हरिनाम और कृष्णमन्त्र दीक्षा देकर श्रीशुभविलास ब्रह्मचारी दिव्य नाम प्रदान किया।

तृतीय सर्ग:- श्रील भक्तिमयूख भागवत गोस्वामी महाराज श्रील प्रभुपाद ने शुद्धभक्ति सदाचार सम्पन्न आदर्श सेवामय जीवन देखकर इनको श्रीभक्तिविनोद इन्सटिट्यूट उच्च विद्यालय में धर्म शिक्षक के रूप में सेवाकार्य दिया। विद्यालय के छात्रगण उनके सान्निध्य में मानव जन्म का कर्त्तव्य एवं धर्मशिक्षा प्राप्त की, यह देखकर श्रील प्रभुपाद ने उनको दैनिक नदीया प्रकाश पत्रिका के सम्पादक के सेवा में नियुक्त किया। श्रील प्रभुपाद के कृपादेश से सम्पादक की सेवा प्राप्त कर पत्रिका में अपनी ओर से लेख देना शुरू किया। पत्रिका के ग्राहक इनके लेख को पढ़कर बहुत सन्तुष्ट हुये। आगे और भी लेख देने के लिए ग्राहकों ने सम्पादक को निवेदन किया और पत्रिका का सारा खर्च ग्राहकों ने वहन करना स्वीकार किया। पहले पत्रिका छापने के लिए श्रील प्रभुपाद को अपनी ओर से खर्च देना पड़ता था। आजकल प्रायः छह महिना हो गये वर्तमान सम्पादक श्रीशुभविलास प्रभु ने श्रील प्रभुपाद से एक पैसा भी नहीं लिया। किन्तु पत्रिका की ग्राहक संख्या अधिक होने लगी एवं पत्रिका के प्रशंसा पत्र भी श्रील प्रभुपाद के नाम से आने लगे। पहले ऐसा कभी नहीं हुआ।
श्रील प्रभुपाद ने श्रीशुभविलास प्रभु को बुलाकर पूँछा इसका कारण क्या है? तब श्रीशुभविलास प्रभु ने सब कुछ निवेदन किया। यह सुनकर श्रील प्रभुपाद ने गुरुसेवा, मठ की सेवा, इतने सुन्दर लेख की योग्यता एवं सेवा आन्तरिकता, निष्कपट आत्म समर्पण, उत्तम चरित्र देखकर अति प्रसन्नता पूर्वक श्रीधाम प्रचारिणी सभा में उनको श्रीगौराशीर्वाद पत्र के साथ भक्ति मयूख विशेष उपाधि से विभूषित किया।

श्रीश्री गौराशीर्वाद पत्रम्

श्रीनदीया प्रकाशाख्य – पत्रराज प्रकाशने।

श्रीमद्भक्तिविनोदाख्य – शिक्षामन्दिर सेवने।।

अनुरक्त मतिः – शास्त्र-व्याख्या कीर्त्तन पाटवः ।

श्रीधाम सेवकः – श्रीमान गुरुभक्ति परायणः ।।

शुभविलासनास्नेहस्मै – दासाधिकारिने सते।

उपाधिदीयते – ‘भक्ति मयूख’ इति संश्रुतः ।।

गंगापूर्वतटस्थ – श्रीनवद्वीपस्थलोत्तमे।

श्रीमायापुर धामस्थे – योगपीठाश्रये परे ।।

वानषुवसु शुभ्रांशु – शाकाब्दे मंगलालये।

फाल्गुन पूर्णिमायां  – श्रीगौराविर्भाव वासरे।।

स्वा:-

सभापति – श्रील प्रभुपाद

एक समय अपने गाँव के आत्मीय स्वजन एवं ग्रामवासियों को ज्ञात हुआ कि शंकरलाल बड़ठाकुर श्रीलप्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के चरणाश्रित होकर श्रीधाम मायापुर श्रीचैतन्य मठ में विराजते हैं। तब श्रील प्रभुपाद के पास उनको घर ले जाने के लिए बहुत से लोग आये। उस समय श्रील प्रभुपाद कलकत्ता बागबाजार गौड़ीय मठ में विराजित थे। इन लोगों की बात सुनकर श्रील प्रभुपाद ने शुभविलास प्रभु को इन लोगों के साथ अपने घर जाने के लिए एक पत्र लिखकर दे दिया। वे लोग पत्र लेकर श्रीधाम मायापुर श्रीचैतन्य मठ आये एवं पत्र श्रीशुभविलास प्रभु को दिया। उन्होंने श्रील गुरुदेव का पत्र पढ़ कर गाँव वाले लोगों को समझाकर घर लौटा दिया एवं अपनी सेवा में नियुक्त रहे। इधर श्रील प्रभुपाद शुभविलास प्रभु को पत्र देने के कारण पूरी रात नींद नहीं हुई। प्रातःकाल होते ही कलकत्ता से श्रील प्रभुपाद श्रीधाम मायापुर आये एवं जब श्रीशुभविलास प्रभु को देखा तब उनको अपने हृदय से लगाकर रोते हुये कहने लगे आपको देखकर एवं आपके उचित सिद्धान्त पूर्ण विचार से मैं बहुत प्रसन्न हुआ। आप श्रील गुरुपादपद्म की सेवा छोड़कर विषय मोह में आकृष्ट नहीं हुये, ये आपने ठीक किया। आपको पत्र देकर रात्रि में मुझे नींद नहीं हुई और सोचा कि श्रीभगवान् के आदेश से जीव को माया के संसार कारागार से मुक्त कराकर भगवान् के पास ले जाने के लिए में आया हूँ, भगवान् की सेवा से छुड़ाकर संसार कारागार में भेजने के लिए नहीं। ये मैंने आज क्या गलती कर दी, भगवान् के चरणों में कितना अपराधी बन गया, यह सोचकर दौड़कर आया। यह कहकर श्रील प्रभुपाद ने अपने गले की माला शुभविलास प्रभु के गले में पहनाकर उनके सिरपर हाथ रखकर प्रचुर कृपाशीर्वाद दिया। सभी मठवासियों ने यह देख और सुनकर आश्चर्यचकित हो गये।

एक समय श्रील बंशीदास बाबाजी महाराज ने श्रीमद्भागवत पाठ सुनने की इच्छा प्रगट की। तब श्रील प्रभुपाद ने श्रीशुभविलास प्रभु को श्रील बाबाजी महाराज के पास श्रीमद्भागवत पाठ सुनाने के लिए भेजा। उन्होंने विनय, नम्रता, अतिशय दीनता और भक्ति पूर्वक श्रील बाबाजी महाराज के चरणों में साष्टांग दण्डवत् प्रणाम किया। उनकी चरण वन्दना करके अत्यन्त सुमधुर कण्ठ से श्रीमद्भागवत पाठ करके श्रवण कराया। श्रीशुभविलास प्रभु के मुख से श्रीभागवत पाठ श्रवण कर श्रीलबाबाजी महाराज बहुत सन्तुष्ट हुये और इनको प्रचुर कृपाशीर्वाद दिया। श्रीलबाबाजी महाराज ने श्रीभागवत सुनकर उसी प्रकार पूरी भागवत की आवृत्ति करके शुभविलास प्रभु को सुनाया, अतिमर्त्य महापुरुष की ऐसी अलौकिक शक्ति होती है।

श्रील प्रभुपाद की अप्रकट लीला के बाद किसी विशेष काम के लिए श्रील महाराज पूर्वबंग गये। कुछ दिन बाद लौटने के समय पद्यानदी में स्टीमर में बैठे थे, उस समय इतने जोर से तूफान आया कि स्टीमर के डूबने की स्थिति हो गई। तब स्टीमर के सभी यात्री अपना-अपना जीवन बचाने के लिए दौड़े एवं चिल्लाकर रोने लगे। किन्तु श्रीशुभविलास प्रभु चुप-चाप अपने आसन पर बैठ कर मालिका में जोर-जोर से हरिनाम करते रहे। यह देखकर सभी यात्रियों ने उनको कहा- क्या आपको मृत्यु का भय नहीं? हम सब इतने भयभीत हो गये और आपको कोई चिन्ता नहीं? तब श्रीशुभविलास प्रभु ने उन सबको समझाया- मेरे हरि कभी आग में दग्ध नहीं होते, पानी में डूबते नहीं, अस्त्र-शस्त्र से कटते नहीं, मैं उन्हीं श्रीहरि का चरणाश्रय कर उनका नाम ले रहा हूँ। मेरे हरि जब डूबते नहीं, तो मैं कैसे डूब जाऊँगा? आप सब बैठकर एकसाथ श्रीहरि की शरण में आकर मेरे साथ उनका परम मंगल मय नाम लेते रहो, भगवान् हम सबकी अवश्य ही रक्षा करेंगे। भगवान् शरणागत की हमेशा रक्षा करते हैं।” उनके कहने पर विश्वास करके सभी यात्री बैठ गये और उच्च स्वर से श्रीशुभविलास प्रभु के साथ श्रीहरिनाम कीर्तन करते रहे। कुछ समय बाद सारा तूफान शान्त हो गया और देखा नाव नदी के किनारे आ गयी। समस्त यात्री श्रीशुभविलास प्रभु को प्रणाम करके कहने लगे, आपकी कृपा से हम सब मृत्यु से बच गये। एक एक करके सभी लोग उनको प्रणाम करके अपने-अपने घर लौट गये।

श्रील प्रभुपाद की अप्रकट लीला के बाद श्रीचैतन्य मठ में अशान्ति के कारण अपने ज्येष्ठ गुरुभ्राता श्रील भक्तिभूदेव श्रौति गोस्वामी महाराज के निकट मेदिनीपुर झाड़ग्राम गौड़ीय मठ में रहे। वहीं दो वर्ष रहकर उनको संन्यास गुरु के रूप में पूजा कर उनसे त्रिदण्ड संन्यास ग्रहण किया। श्रील गुरुदेव प्रभुपाद द्वारा प्रदत्त कृपाशीर्वाद एवं उपाधि सहित त्रिदण्डि स्वामी श्रीमद्भक्तिमयूख भागवत गोस्वामी महाराज नाम से सुख्याति प्राप्त की। संन्यास लेकर पहले पूर्वस्थली चिनपाई ग्राम में समस्त लोगों के विशेष निवेदन पर श्रीभागवत आश्रम नाम से एक आश्रम एवं मन्दिर का निर्माण किया। एक समय १०/१२ मील दूर एक गाँव में श्रील महाराज जी अपने भक्तों को लेकर श्रीभागवत कथा करने गये। कथा समाप्त होने पर उस सभा में श्रीगोविन्द गोड़ई नाम का एक व्यक्ति श्रील महाराज को अपने घर ले गया और श्रील महाराज को अति सुन्दर एक गोमुखी शालग्राम शिला दी। यह शालग्राम शिला उस व्यक्ति के घर में पालित बैल के मुख से निकली थी। वह शालग्राम शिला बैल के खाने के पात्र में मिली, और कहा कि यह बैल पहले जब एक मुसलमान के घर में था वहाँ भी एक शिला उसके मुख से निकली थी। यह मुसलमान की पत्नी को मिली और पत्नी ने सारे मुसलमान लोगों को दिखाई। उन मुसलमान लोगों ने कहा कि यह हिंदू का भगवान् है, इसको घर में नहीं रखना, चाहे कोई हिंदू को दे दो नहीं तो पानी में फेंक दो। तब उस पत्नी ने मन में सोचा कि हिंदू के भगवान् के अन्दर क्या है मैं देखूँगी। इस विचार से वह शिला जब तोड़ दी, तो उसी समय उस पत्नी के मुख से खून निकला और वह मर गयी। तब भय से उस मुसलमान ने बैल को गोविन्द गोड़ई के पास बेच दिया। श्रील महाराज ने शिला को यत्न पूर्वक लाकर चिनपाई के अपने मन्दिर में रखकर सेवा प्रकाश की एवं यह कहानी सबको सुनाई।

श्रील महाराज ने चिनपाई, राईपुर, सिउड़ी, पुरुलिया आदि बहुत से स्थानों पर श्रीमठ-मन्दिर निर्माण कर श्रीश्रीगुरुगौरांग गान्धर्विका राधागोविन्द के श्रीविग्रह स्थापन, उनकी नित्य प्रेमसेवा प्रकाश की। श्रील प्रभुपाद की कथा, श्रीमन्महाप्रभु की प्रेमभक्ति की कथा एवं उनके द्वारा पूर्व आचरित श्रीहरिनाम संकीर्त्तन धर्म का प्रचार करके जीवों पर बहुत कृपा वितरण की। अन्त में ७/८ दिन पहले एक दिन श्रील महाराज ने उनके प्राणाराध्य श्रीश्रीराधागोविन्द जू के आगे जाकर श्रीचरणों में साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करके आँखों से आँसू बहाकर अन्तिम निवेदन किया आपने जिस कार्य के लिये मुझे भेजा था एवं ग्रन्थादि का सेवा कार्य निर्देश किया था, यह सब कर्तव्य अभी समाप्त हुआ। अब इस दीन-हीन अधम सेवक को आप के परम सुन्दर चरण कमल में नित्यकाल के लिए आश्रय भिक्षा दीजिये एवं इस सेवक को अपने पास बुला लीजिये। यह निवेदन करके उस दिन से थोड़ी सी अस्वस्थ लीला की। १३९३ बंगाब्द १२ पौष, २४ दिसम्बर, सन् १९८६ को कृष्णा द्वादशी तिथि ९-०५ बजे, श्रीश्रीराधागोविन्द की पूर्वाह्न गोष्ठलीला में प्रविष्ट हो गये। उनके द्वारा प्रतिष्ठित मठ में उनके स्नेहाधिक शिष्य श्रीपाद भक्तिविजय श्रीधर महाराज को वे अपने स्थान पर आचार्य के पद में बैठाकर गये।