पुज्यपाद त्रिदंडीस्वामी श्रीमद्भक्तिकमल मधुसूदन महाराज ने पूर्व बंगाल में फरीदपुर जिले के अंतर्गत बाजितपुर गाँव में एक कुलीन ब्राह्मणकुल में प्रकट-लीला की। उनके स्वधर्मनिष्ठ पिता का नाम श्रीयुक्त उपेन्द्रनाथ सन्याल और माता का नाम श्रीयुक्ता पार्वती देवी था। महाराज को पहले श्री नृपेन्द्रनाथ सन्याल के नाम से जाना जाता था। उनकी नवाबी काल की उपाधि ‘मजूमदार’ थी। उस समय धनाढ्य जमींदारों को ऐसी उपाधियों से सम्मानित किया जाता था। महाराज ने उच्च शिक्षा प्राप्त की थी, अंग्रेजी भाषा में उनका विशेष कौशल था। पढ़ाई के बाद वे कोलकता शहर आ गए और कुछ समय के लिए उन्होंने ‘अमृतबाजार’ पत्रिका के कार्यालय के संपादकीय विभाग में काम किया। यही समय था, जब उन्होंने बागबाजार स्थित श्री गौड़ीय मठ में मेरे परम आराध्यतम गुरुदेव प्रभुपाद श्री श्रीमद्भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी ठाकुर के दर्शन और उनके श्रीमुख से सुंदर कृष्णकथा सुनने का सौभाग्य प्राप्त किया। अतिशीघ्र ही वे श्री प्रभुपाद से दीक्षा-मंत्र एवं श्री हरिनाम मंत्र प्राप्त कर श्री नरोत्तमदास ब्रह्मचारी नाम से प्रसिद्ध हुए, एवं गृहस्थाश्रम त्याग कर मठवासी हुए। वे आकुमार ब्रहमचारी थे। परमराध्य प्रभुपाद ने उनका श्री हरि-गुरु-वैष्णव सेवा और श्री हरिकथा श्रवण-कीर्तन में विशेष अनुराग देखकर, उन्हें प्राचीन वरिष्ठ त्रिदंडी संन्यासी महाराजगण के साथ भारत के विभिन्न स्थानों पर श्रीमन्महाप्रभु के श्रीमुख नि:सृत शुद्ध-भक्तिसिद्धांत-वाणी प्रचार सेवा में नियुक्त किया। श्री प्रभुपाद ने विभिन्न स्थानों पर अनेक विद्वानों से सुशोभित सभाओं में उनके पाठ-कीर्तन-प्रवचन, मठ-मंदिर-प्रतिष्ठा सम्बन्धित विविध सेवाकार्यों में उनका अदम्य उत्साह और निपुणता के विषय में अन्य भक्तों से श्रवणकर एवं स्वयं भी अपने चक्षुओं से दर्शनकर, अम्लानवदन से प्रसन्न चित्त और हास्य-पूर्ण मुख से सभी सेवा-कार्यों में उनकी तत्परता से संतुष्ट होकर, उनको श्री नवद्वीप धाम प्रचारिणी सभा की ओर से ‘भक्तिकमल’ इस भक्ति-सूचक उपाधि से विभूषित कर, उन पर प्रचुर स्नेह-आशीर्वाद वर्षण किया।

दिसंबर 1936 के अंतिम दिन की शेष-रात्रि में जब परमराध्य श्री प्रभुपाद ने श्री श्री राधागोविंद की निशांत लीला में प्रवेश किया, तब गौड़ीय-गगन घनघोर घटा से आच्छान्न हो गया। इस समय, प्रभुपाद के विरह से कातर उनके अंतरंग भक्त विभिन्न स्थानों पर वास करते हुए भगवद्-भजन में लीन हुए। पूज्यपाद नरोत्तमप्रभु उस समय बर्धमान शहर के मीठापुकुर लेन में रहते हुए भजन कर रहे थे। उनके श्रीमुख से नि:सृत हरिकथा-श्रवण से आकर्षित होकर एक धनाढ्य और धर्मपरायण सज्जन ने उनके लिए वहाँ पर एक सुंदर मंदिर और मठ-निर्माण की व्यवस्था की। पूज्यपाद महाराज ने इस मठ का नाम रखा ‘श्री कृष्ण चैतन्य मठ’। बाद में श्री धाम मायापुर ईशोद्यान पल्ली में भी इसी प्रकार का एक मठ स्थापित किया गया। इसमें एक सुंदर ऊंचा चुडा मंदिर और सुन्दर नक्काशी के साथ एक सुरम्य तोरण भी बनाया गया। इस मठ को भी ‘श्री कृष्ण-चैतन्य मठ’ नाम दिया गया। यहाँ के मुख्य मंदिर के दायीं ओर बाद में एक सुंदर शिव मंदिर भी स्थापित किया गया। पूज्यपाद महाराज ने उनके ज्येष्ठ गुरुभ्राता श्रीमद्भक्ति प्रमोद पुरी महाराज द्वारा उन सभी मठ-मंदिर और श्री विग्रह के प्रतिष्ठा-कार्य को संपन्न करवाया। पूज्यपाद महाराज ने कलकत्ता शहर के दक्षिणी भाग में रायपुर नामक स्थान पर भी, एक मठ की स्थापना की। निश्चित रूप से श्री धाम मायापुर मठ बाद में प्रकट हुआ, किन्तु इसके स्थान के गौरव अनुसार में इसे मूल मठ और अन्य दो मठों को शाखा मठ कहा गया।

परमाराध्य प्रभुपाद के प्रकट समय बागबाजार में गौडीय मठ में रहते हुए, श्री महाराज, नित्यलीला प्रविष्ट पूज्यपाद त्रिदंडी यति श्रीमद्भक्ति रक्षक श्रीधर देव गोस्वामी महाराज के भजन-नैपुण्य व श्री प्रभुपाद के मुख से नि:सृत वाणी का परिवेषण करने की उनकी कला से आकर्षित थे। श्री प्रभुपाद के अप्रकट के बाद श्री महाराज ने पूज्यपाद श्रीधर महाराज से नवद्वीप शहर के कोल-गंज में स्थित श्री सारस्वत गौडीय मठ में चतुर्थ आश्रम उचित ‘त्रिदंड संन्यास’ ग्रहण करने के बाद ‘त्रिदंडी भिक्षु श्रीमद्भक्ति कमल मधुसूदन महाराज’ कहलाए और बाद में उनके आनुगत्य में वे भारत के विभिन्न स्थानों में श्री प्रभुपाद की वाणी का प्रचार करते रहे।

नित्यलीला प्रविष्ट पूज्यपाद श्रीधर देव गोस्वामी महाराज, पूज्यपाद श्रीमद्भक्ति विचार यायावर गोस्वामी महाराज, पूज्यपाद नाम-भजनानंदी श्री कृष्णदास बाबाजी महाराज, पूज्यपाद त्रिदंडी यति श्रीमद्भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज श्री प्रभुपाद के प्रमुख पार्षदगण पूज्यपाद श्री मधुसूदन महाराज के श्रीमद्भागवत पाठ एवं प्रवचनों को श्रवणकर बहुत आनंदित होते थे। कलकत्ता के श्री चैतन्य गौड़ीय मठ में प्रतिवर्ष पूज्यपाद माधव महाराज द्वारा उनके प्रकट-काल में श्री कृष्ण-जन्माष्टमी एवं श्रीमठ के अधिष्ठात्री विग्रहगण के प्रकट-उत्सव के समय, पूज्यपाद मधुसूदन महाराज को निमंत्रित किया जाता था और प्रतिदिन संध्या की सभा में शुद्ध भक्ति मूलक गंभीर भाषण द्वारा वे उपस्थित सभापति, सभा के मुख्य अतिथि, विशिष्ट त्रिदंडीपादगण एवं सभी वैष्णवों का आनंद वर्धन करते थे। श्री मधुसूदन महाराज ने पूज्यपाद माधव महाराज के अन्यान्य मठों में भी आमंत्रित होकर हरिकथा द्वारा वैष्णवों का आनंद वर्धन किया। वे वैष्णवोचित अनंत गुणों से सुशोभित थे। कृष्ण भक्त में कृष्ण के सभी गुणों का संचार होता है।

अंतिम 3 श्रावण (1398), 13 जुलाई (1991) शनिवार शुक्ल दशमी तिथि में अपराह्न 3-30 बजे नित्यलीला प्रविष्ट प्रभुपाद जगद्गुरु 108 श्री श्रीमद् भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर के प्रिय शिष्य त्रिदंडीस्वामी श्रीमद्भक्ति कमल मधुसूदन महाराज, अभिन्न ब्रजधाम श्री मायापुर इशोद्यान पल्ली स्थित अपने – ‘श्री कृष्ण चैतन्य मठ’ में, उनके विरह से विह्वल भक्तों के सामूहिक महासंकीर्तन के बीच, श्रीमठ के अधिष्ठात्री देवता, श्री श्री गुरु गौरांग-राधागोविंद तथा श्री गोविंद के प्रियतम सपरिकर वैष्णवराज श्री गोपीश्वर सदाशिव के चरण कमलों का स्मरण करते-करते श्री राधा गोविंद की अपराह्न कालिय नित्यलीला में प्रविष्ट हुए। आज हम उनके जैसे सर्वगुण संपन्न वैष्णव-संन्यासी का विशेष रूप से अभाव अनुभव कर रहे हैं।

पूज्यपाद महाराज अपनी अस्वस्थ लीला के समय वर्धमान शहर स्थित मठ में सद्-वैध्य द्वारा सु-चिकित्सा एवं उनके गुरुगत-प्राण सेवकों द्वारा यथोपयुक्त सेवा-सुश्रुषा प्राप्त करते हुए भी श्री जगन्नाथ देव की रथ-यात्रा से कुछ दिन पहले, अभिन्न व्रजधाम श्री मायापुर में स्थित उनके मठ में आने के लिए उनके प्राण अतिशय व्याकुल हो उठे। उनकी अत्याधिक व्याकुलता को देखते हुए सेवक-वृन्द अतिशीघ्र ही उनको मोटर वाहन द्वारा मायापुर ले आए। साक्षात् ब्रजधाम श्री मायापुर के दक्षिण भाग में श्री सरस्वती और श्री भागीरथी के संगम के निकट इशोद्यान अथवा ‘श्री राधावन’ में स्थित ‘श्री कृष्ण चैतन्य मठ’ में उनके प्राणाधिक प्रियतम आराध्यदेव श्री श्री गुरु गौरांग राधा-गोविन्द एवं श्री राधा-गोविन्द के प्रियतम श्री गोपीश्वर के चरणकमलों में आने के बाद से उनके अप्रकट-काल तक उन्हें प्रसन्न-वदन ही देखा गया। श्रीमद् भक्ति प्रमोद पुरी महाराज 7 जुलाई को पुरीधाम की यात्रा से दो दिन पूर्व श्री महाराज को दर्शन, स्पर्शन और प्रणाम करने के लिए गए थे। उस समय उनके मुख से नि:सृत वाणी भले ही अस्पष्ट, समझ में न आये ऐसी थी, किन्तु वे अति स्वस्थ-चित्त दिखाई दे रहे थे। उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता था कि वे सदैव अपने प्राण-देवता के श्री पादपद्म के चिन्तन में लीन हैं। बाद में पुरी महाराज जब पुनर्यात्रा के एक दिन पहले, 20 जुलाई को, कलकत्ता के श्री चैतन्य गौड़ीय मठ में लौटे, तब उन्होंने जाना कि उसी दिन श्री मायापुर से एक ट्रंक कॉल द्वारा पूज्यपाद मधुसूदन महाराज के अप्रकट होने की घोषणा की गई है।

साक्षात् ब्रजधाम श्री मायापुर में, साक्षात् श्री राधावन में, श्री राधा-भावकान्ति सुवलित-श्री राधामाधव मिलित- तनु श्री गौरसुंदर के अपने पार्षदों के साथ मध्याह्न संकीर्तन-लीला विलासस्थल में पूज्यपाद महाराज का श्री राधा-गोविंद की नित्य-लीला में प्रवेश पारमार्थिक विचार से परम सुखप्रद होने पर भी इस जगत में, उनका अदर्शन-जनित दुःख हमारे लिए बहुत असहनीय है।

श्रीमन्महाप्रभु ने अपने प्रियपार्षद नामाचार्य हरिदास ठाकुर के निर्याण के समय विरह से विह्वल अश्रु भरे नेत्रों के साथ कहा-

हरिदास आछिल पृथ्वीर रत्नशिरोमणि।
ताहा बिना रत्न-शुन्य हईल मेदिनी।।
कृपा करि कृष्ण मोरे दियाछिल संग।
स्वतन्त्र कृष्णेर इच्छा हईल संगभंग।।

श्रीमन्महाप्रभु ने अपने प्रिय-पार्षद रामानंद राय से प्रश्न किया,

(प्रभु कहे,) “दुःख मध्ये कौन दुःख हय गुरुतर।”

(राय कहे-) कृष्ण-भक्त-विरह बिना दुःख नाही देखि पर।

वस्तुत: श्री श्री गुरु गौरांग नि:सृत शुद्ध-भक्ति-सिद्धांत वाणी कीर्तन परायण भक्त संसार में बहुत दुर्लभ है। ऐसे भक्त का अदर्शन कितना गहन हृदय पीड़ा दायक है, उसे शब्दों में व्यक्त करना कभी भी संभव नहीं है। किन्तु सर्वतंत्र स्वतन्त्र स्वराट पुरुषोत्तम कृष्ण की इच्छा पूर्णतः स्वतंत्र और दुस्तर्क्य है। वे अपनी प्रिय वस्तु को अपने चरणों में स्थान देकर हमें विरह-समुद्र में निमज्जित करके, ‘वैष्णवेर गुणगान करीले जीवेर त्राण’, यह वाक्य स्मरण कराते हुए भक्तों का भजन-आदर्श अनुसरण करने का उपदेश देते हैं। यही विरहाग्नि से तप्त-हृदय के लिए सांत्वना रूपी वर्षा का जल है।

श्री धाम मायापुर स्थित श्री कृष्ण चैतन्य मठ के नाट्य मंदिर में मंगलवार 27 श्रावण, 13 अगस्त को पूज्यपाद मधुसूदन महाराज का विरहोत्सव मनाया गया। सभा का प्रारंभ सुबह 10 बजे हुआ। इस सभा के सभापति और मुख्य अतिथि के रूप में क्रमशः श्रीमद् भक्ति प्रमोद पुरी गोस्वामी महाराज और त्रिदंडी यति श्रीमद् भक्ति कुमुद संत गोस्वामी महाराज थे; श्रीमद् भक्ति जीवन आचार्य महाराज, त्रिदण्डी स्वामी श्रीमद् भक्ति तोषण गिरि महाराज, त्रिदण्डी स्वामी श्रीमद् भक्ति वल्लभ तीर्थ महाराज, त्रिदण्डी स्वामी श्रीमद् भक्ति सुहृद अकिंचन महाराज और त्रिदण्डी स्वामी श्रीमद् भक्ति वैभव सागर महाराज (तरुणकृष्ण प्रभु) ने सभा में हरिकथा की।

सभा में उपस्थित अन्य त्रिदंडियती थे – श्री चैतन्य गौड़ीय मठ के त्रिदण्डी स्वामी श्रीमद् भक्ति शरण त्रिविक्रम महाराज, त्रिदण्डी स्वामी श्रीमद् भक्ति बांधव जनार्दन महाराज, त्रिदण्डी स्वामी श्रीमद् भक्ति रक्षक नारायण महाराज, श्री देवानंद गौड़ीय मठ के श्रीमद् भक्ति वेदांत आचार्य महाराज, श्री शांत महाराज के मठ से त्रिदण्डी स्वामी श्रीमद् भक्ति वेदांत जनार्दन महाराज, त्रिदण्डी स्वामी श्रीमद् भक्ति वेदांत दामोदर महाराज, त्रिदण्डी स्वामी श्रीमद् भक्ति वेदांत गोविंद महाराज, श्री गौड़ीय संघ के त्रिदण्डी स्वामी श्रीमद् भक्ति किरण गिरि महाराज, इस्कॉन के त्रिदण्डी स्वामी श्रीमद् भक्ति वेदांत सुभग महाराज, नवद्वीप श्री चैतन्य सारस्वत मठ के श्रीमद् हरिशरण दास ब्रह्मचारी। इसके अतिरिक्त विरहसभा में और भी सैकड़ों भक्त सम्मिलित हुए। दोपहर 1 बजे भोग आरती के बाद महोत्सव में सम्मिलित सैकड़ों भक्तों ने विभिन्न प्रकार के महाप्रसाद को ग्रहण किया।

इस विरह-सभा में पूज्यपाद मधुसूदन महाराज के शिष्य, श्रीमद् भक्ति जीवन आचार्य महाराज को, उनके स्थान पर सर्व-सम्मति से ‘श्री कृष्ण चैतन्य मठ’-संस्थान के वर्तमान आचार्य के रूप में नियुक्त किया गया।

–श्री चैतन्य वाणी, 31वां वर्ष, अक्टूबर 1991, पृष्ठ 173-175