नित्यलीला प्रविष्ट ॐ विष्णुपाद परिव्राजकाचार्य त्रिदण्डिस्वामी १०८श्री श्रीमद्भक्तिकुमुद सन्त गोस्वामी महाराज

प्रणाम

ॐ अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन-शलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।
नमो ॐ विष्णुपादाय-गौर प्रेष्ठाय भूतले।
श्रीमते भक्तिकुमुद सन्त गोस्वामीति नामिने ।।
धृत-भक्त्युज्ज्वलांगाय-गुरोऽभीष्ट प्रदाय च।
जीव कल्मष नाशाय नमो नाम प्रदायिने ।।
नमो आचार्य-वर्याय गुरु सेवैक जीविने।
गौरवाणी प्रचारार्थायावतीर्णायत्र भूतले ।।
नमः श्रीभक्तिसिद्धान्त सरस्वत्याश्रिताय च।
आकुमार व्रतान्ताय त्रिदण्डि वेष धारिणे ।।
भ्रमण प्राच्य-प्रतीच्ययो-प्रेमभक्ति प्रदायिने ।
नमो लब्ध प्रतिष्ठाय परा श्रीवाग् विभूतये ।।
कु-सिद्धान्त समूहानां खण्डने तत्परः सदा।
सु-सिद्धान्ताय प्रतिष्ठायां विक्रमी केशरी यथा ।।
श्रीचैतन्याश्रमादीनां चतुर्ना स्थापकाय वै।
निष्ठा योगेन यत्र श्रीविग्रह-सेवनं सदा।।
संसार मोह नाशाय गौरानुग्रह लब्धये।
भृत्या वयं नमामो हि तव पादाम्बुजं सदा ।।

वंश – परिचय

भारतवर्ष में पश्चिमबंग मेदिनीपुर जिला, नारायण गढ़ थाना के नारमा ग्राम में आनुमानिक सन् १०१० में कायस्थ कुलोद्भुत यह जमींदार वंश चार-सौ वर्ष से अधिक काल तक श्रीश्रीराधाकिशोरी मोहन जू की सेवा-पूजा और सदा ही ब्राह्मण वैष्णव अतिथि सेवा, व्रत-ध्यान, वैष्णवाचार निष्ठा रक्षा कर प्रजारंजन द्वारा जमींदारी शासन करते थे। यह जमींदार वंश पहले पूर्वबंग ढाका जिलान्तर्गत विक्रमपुर का गुह परिवार के नाम से परिचित था। उस समय मुसलमानों का अत्याचार और शासन स्वीकार न कर उस स्थान को त्याग करके हुगली जिलान्तर्गत गंगा के किनारे कुतरंगपुर गाँव में निवास किया। इस वंशोद्भुत श्रीनीलाम्बर गुह महाशय का अपनी भार्या और पुत्र के साथ श्रीपुरुषोत्तम धाम श्रीजगन्नाथ देव के दर्शन कर लौटते समय नारायण गढ़ के राजा श्रीयुक्त श्यामसुन्दर पाल के साथ बहुत बड़ी युद्ध हुआ। उसमें पाल राजा पराजित हो गया। तब श्रीनीलाम्बर गुह ने राज्य पर शासनाधिकार कार्यकरी कर प्रजा पालन करते रहे। कुछ दिन बाद पाल राजा ने सैन्य संग्रह कर युद्ध करके नीलाम्बर गुह का वध कर अपना राज्य लौटा लिया। नीलाम्बर गुह के पुत्र पितृशोक में दुःखी होकर दिल्ली बादशाह के दरवार में शरणागत हुये। कुछ दिन बादशाह के साथ रहकर उनको सन्तुष्ट कर उनसे सन् १५०२ में खान्दार परगणा का अधिकार पाञ्जा एवं राय चौधुरी पदवी प्राप्त हुई।

दिल्ली से लौट कर खड़गपुर थाना के अन्तर्गत साँकुया ग्राम में जमींदारी स्थापन की। नीलाम्बर गुह के ज्येष्ठ पुत्र श्रीवंशीधर गुहराय ने श्रीविग्रह स्थापन कर उनकी राजसेवा एवं सदा ही ब्राह्मण-वैष्णव, अतिथि सेवा में जीवन बिताया। वंशीधर गुह के ज्येष्ठ पुत्र श्रीजयकृष्ण गुहराय ने नारायण थानान्तर्गत नारमा ग्राम में वास किया। इनके पौत्र श्रीगोपीनाथ गुह राय ने श्रीश्रीराधाकिशोरीमोहन जू का श्रीविग्रह प्रतिष्ठित किया। श्रीविग्रह की नित्य भोगराग सेवा में आधा मन चावल का अत्रभोग एवं तत् परिमित व्यञ्जनादि के द्वारा श्रीभगवान् की सेवा, ब्राह्मण, वैष्णव, अतिथि सेवा की व्यवस्था की। इनके पुत्र श्रीगौरहरि राय ने मेदिनीपुर जिला के उस समय हेरिसन् साहब के निकट देओयान पद एवं राय बहादुर उपाधि प्राप्त की। इनके दो पुत्र श्रीकान्त राय, श्रीराधाकान्त राय के प्रपौत्र एकान्त हरिभक्त श्रीरमाकान्त राय की अचानक मृत्यु होने से उनके पुत्र दीनबन्धु राय ने पिता का श्राद्ध क्रिया कैसे किया जाये इस बारे में बहुत चिन्तित होने पर उज्ज्वल श्याम वर्ण ब्राह्मण के रूप में स्वयं भगवान् श्रीकिशोरीमोहन जू ने श्राद्ध क्रिया की। उसका प्रमाण उस समय नारमा जमींदार के मन्दिर में पुजारी ने दोपहर के समय श्रीकिशोरीमोहन जू के सारे श्रीअंग में बहुत पसीना और चरण में धूलि को देखा एवं सबको दिखाया। श्रीरमाकान्त राय के ज्येष्ठ पुत्र श्रीमधुसूदन राय, इनके ज्येष्ठ पुत्र श्रीवैकुण्ठ नाथ राय, कनिष्ठ पुत्र श्रीद्वारिका नाथ राय थे। श्रीवैकुण्ठ नाथ राय एक सम्भ्रान्त जमींदार, सु-चिकित्सक एवं ज्योतिर्विद्या में अद्वितीय थे। किन्तु जमींदार बाबू और पत्नी श्रीरत्नमयी देवी सांसारिक विषय में उदासीन एवं अत्यन्त धर्मप्राण थे। सदा ही श्रीहरि गुरु-वैष्णव-ब्राह्मण, दीन-दुःखी-अतिथियों के लिए परम उदार और सेवानुरागी थे। इनके तीन पुत्र थे श्रीराधाश्याम, राधाविनोद एवं राधारमण राय। श्रीराधाविनोद राय के पुत्र श्रीतुलसी राय ये सब श्रीलप्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के चरणाश्रित गौड़ीय वैष्णव थे। श्रीगोपाल चन्द्र राय भक्तिशास्त्री पुराणरत्न थे। श्रीरमाकान्त राय एवं भ्राता श्रीअक्षय नारायण राय प्रजा वत्सल जमींदार एवं देव-द्विज, गुरु-वैष्णव के प्रति प्रगाढ़ भक्तिमान थे। इनके दो पुत्र कृपासिन्धु एवं त्रैलोक्य नाथ राय। त्रैलोक्य नाथ राय के दो पुत्र मोहिनी मोहन और रमनी मोहन राय थे। श्रीमोहिनी मोहन राय श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर के चरणाश्रित विख्यात रसिक राग-रागिनी उच्चांगकीर्तन विशारद थे। श्रील गुरुदेव प्रभुपाद के द्वारा दिये हुये भक्तिशास्त्री राग भूषण प्रभु नाम से परिचित थे। इन्होंने संसारी होकर भी अधिक समय श्रील गुरुदेव की सेवा में ही अपना जीवन बिताया। इनके दो पुत्र हरिदास राय भक्तिशास्त्री और राधाचरण राय थे। श्रीहरिदास राय भक्तिशास्त्री श्रील प्रभुपाद के चरणाश्रित प्रियतम श्रीमद्भक्ति भूदेव श्रौति गोस्वामी महाराज के चरणाश्रित थे। ये दोनों ही श्रीगौड़ीय वैष्णव थे। श्रीपुलिन विहारी राय स्वदेश प्रेमिक थे। इनके सुयोग्य पुत्र श्रीकृष्णदास राय कलकत्ता विश्व विद्यालय की उच्च शिक्षा प्राप्त करके कांग्रेस के एम. पी. पद पर देश की सेवा की और एक आदर्श प्रधान शिक्षक के पद पर अधिष्ठित रहे।

श्रीमद्भक्तिकुमुद सन्त गोस्वामी जीवन आलेख्य

पश्चिमबंग राज्य के प्राचीन ऐतिहासिक मेदिनीपुर जिला नारायणगढ़ थाना अन्तर्गत नारमा ग्राम निवासी चार सौ वर्ष से भी अधिक वंश परम्परानुक्रम से श्रीश्रीराधाकिशोरीमोहन जू के नैष्ठिक सेवा परायण भक्त्यानुरागी ज्ञानी-गुणी महान् ज्योतिष शास्त्रविद् सिंह पराक्रमी जमींदार श्रीयुत वैकुण्ठ नाथ राय एवं श्रीमती रत्नमयी देवी को पिता-माता के रूप में आश्रय करके कनिष्ठ पुत्र के रूप से १३२१ बंगाब्द, २ वैशाख, सन् १९१४ में परम मंगलमयी कृष्णा षष्ठी तिथि के ब्राह्म मूहूर्त में श्रीवैकुण्ठ भवन को आलोकित कर श्रील भक्तिकुमुद सन्त गोस्वामी महाराज का आविर्भाव हुआ। शिशु की दिव्य लक्षणों से युक्त रूपरेखा देख पितृदेव ने जन्म लग्न विचार करके शिशु के भविष्य का अलौकिक रहस्य पूर्ण जीवन और अतिमर्त्य महापुरुषोचित सर्व सद्गुण देखकर जन्म पत्री के अनुसार शिशु का नाम श्रीराधारमण रखा। शिशु राधारमण ऐश्वर्य सम्पन्न पिता-माता, आत्मीय स्वजन, दास दासी के अस्वाभाविक स्नेह से लालित-पालित होते रहे। शिशुकाल से इनमें एक असाधारण आचरण दिखाई दिया। अपने भाई-बहिन और अन्यान्य साथियों को लेकर अपने आप ही गीली मिट्टी से कृष्ण ठाकुर बनाकर वन्य पुष्प-फल-मूल लेकर आँख बन्द कर ध्यान से ठाकुर को भोग लगाते थे एवं सबको वह प्रसाद देते थे। प्रतिदिन माता के पास ठाकुर को भोग लगाने के लिए कुछ मांगते थे। भक्तिमती माताश्री यह देखकर बहुत आनन्दित होती और एक छोटी सी थाली में फल-मूल-मिठाई इत्यादि सजाकर बालक के हाथों में देती थी। वालक बहुत खुश होकर वह फलमूल ठाकुर को भोग लगाकर सभी साथियों को प्रसाद देते थे। कभी श्रीराधाकिशोरीमोहन जू के मन्दिर में बैठकर आँख बन्द करके ध्यान करते थे, कभी रोते थे, कभी हँसते थे फिर कभी बड़े मधुर कण्ठ से गान भी करते थे, हमेशा इस प्रकार भाव में डूबे रहते थे। राधारमण का इस प्रकार अलौकिक भक्तोचित आचरण और चरित्र देखकर माता-पिता एवं परिवार के अन्यान्य सदस्य बहुत आनन्दित होते थे।

बालक का विषय वैभव, जड़ विद्या में बिलकुल मन नहीं लगता था। उसको देखकर ऐसा लगता जैसे उसका कहीं कुछ खो गया है और उसी के ध्यान में सदा ही डुवे रहते थे। एक दिन दादी माँ गया, काशी, वृन्दावन आदि तीर्थ करने जा रही थीं, यह देखकर दादी के साथ जाने के लिए बालक बहुत रोने लगा। दादी ने उसको बहुत समझा-बुझाकर पूँछा, अच्छा बोलो तो भाई! वृन्दावन से तुम्हारे लिए क्या लाऊँगी ? तब छोटे से राधारमण ने कहा, मेरे लिए गोपाल लाना। दादी ने वही लाकर उसको दिया, तब राधारमण को बहुत खुश हुआ। यह गोपाल ही बालक का एकमात्र जीवन साथी हुआ। आज तक वही गोपाल मन्दिर में विराजित हैं।

जमींदार परिवार में मेदिनीपुर संस्कृत शिक्षा परिषद के अध्यक्ष श्रीयुत द्वारिका नाथ राय महोदय के द्वारा आयोजित भारत के चारों ओर से श्रीधाम वृन्दावन, काशी, वाराणसी और दाक्षिणात्य के आमन्त्रित शास्त्रज्ञ विद्वान् पण्डित एवं साधु-सन्तों के द्वारा भारतीय संस्कृति विषय पर वार्षिक धर्मालोचना सभा अनुष्ठित होती थी। इस प्रकार पूर्व नियमानुसार सन् १९२२ की वार्षिक धर्मसभा में आमन्त्रित होकर श्रीधाम नवद्वीप मायापुर श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ के संन्यासी ब्रह्मचारी आदि श्रील प्रभुपाद के निर्देश से नारमा जमींदार श्रीयुत वैकुण्ठ राय के घर पर आये एवं श्रीचैतन्य महाप्रभु की वाणी का प्रचार किया। बालक राधारमण ने सबके साथ सभा में बैठकर बहुत प्रेम से साधु-सन्तों के श्रीमुख से हरिकथा सुनी। फिर सन् १९२३ की धर्मसभा में श्रीधाम मायापुर से श्रील प्रभुपाद के निर्देशानुसार त्रिदण्डि स्वामी श्रीमद्भक्तिस्वरूप पुरी महाराज, वाग्मीश्रेष्ठ त्रिदण्डि स्वामी श्रीमद्भक्तिहृदय वनदेव गोस्वामी महाराज, श्रीमद् प्रणवानन्द ब्रह्मचारी, श्रीमद् महाजन अधिकारी आदि संन्यासी और ब्रह्मचारियों ने जमींदार श्रीवैकुण्ठ नाथ बाबू के घर में शुभविजय की। इन सभी की उपस्थिति में पाँच दिन तक धर्मसभा अनुष्ठित हुई। बालक राधारमण ने प्रचुर भक्ति गद्गद हृदय से उस धर्मसभा में आलोचित कथा सुनी एवं उन साधु-सन्त वैष्णवों की सेवा की। यहाँ तक कि इन संन्यासी ब्रह्मचारी वैष्णवों के साथ भोजन, शयन, बैठना आदि का संग भी किया। यह देखकर श्रीमद् वनदेव गोस्वामी महाराज एवं श्रीमद् प्रणवानन्द ब्रह्मचारी जी ने वैकुण्ठ बाबू से कहा-आपका छोटा पुत्र राधारमण का आचरण चरित्र एवं भाव बहुत सुन्दर देखा। आपकी इच्छा हो तो राधारमण को हम सबके साथ श्रील प्रभुपाद के पास श्रीचैतन्य मठ में ले जाऊँ, वहाँ रहकर पढ़ाई लिखाई करेगा और उसके साथ श्रील गुरुदेव प्रभुपाद एवं भगवान् की सेवा भी करेगा। यह सुनकर राधारमण का मन परमानन्द से भर गया। इन संन्यासी ब्रह्मचारियों की कथा वैकुण्ठ बाबू अपने मन में सोचकर अच्छी लगी।

बालक राधारमण

सभानुष्ठान समाप्त होने पर संन्यासी, ब्रह्मचारियों बिदा के समय श्रील वनगोस्वामी महाराज एवं श्रीपाद प्रणवानन्द प्रभु ने विशेष आदपपूर्वक श्रीवैकुण्ठनाथ बाबू को श्रीधाम मायापुर दर्शन के लिए चैतन्य मठ में आमन्त्रित किये। प्रचारकों ने श्रीमायापुर लौटकर नारमा जमींदार बाबू की सारी कथा श्रील प्रभुपाद के चरणों में निवेदन की उसके साथ श्रील वन गोस्वामी महाराज ने छोटे राधारमण को श्रील गुरुदेव के सेवा में लाने के लिए भी निवेदन की। यह सुनकर अपने प्रियभक्त के दर्शनाभिलाषी विगलित हृदय से श्रील प्रभुपाद ने विशेष प्रसन्नता प्रदर्शन किया।

प्रचारकों के आमन्त्रण से एक समय श्रीवैकुण्ठ नाथ बाबु श्रीमायापुर चैतन्य मठ में पधारे। उनको देखकर प्रचारकप्रवर श्रीमद् वन गोस्वामी महाराज एवं श्रीपाद प्रणवानन्द प्रभु ने अत्यन्त प्रीतिपूर्वक अभ्यर्थना किया एवं श्रील प्रभुपाद के पास ले जाकर उनके दर्शन कराया एवं जमींदार बाबु का परिचय दिलाया। उन्होंने अतिमर्त्य महापुरुष श्रील प्रभुपाद के दिव्य दर्शन और मठ मन्दिर, भगवान् की सेवा पूजा, उनके प्रति मठवासियों के आतिथ्य अभ्यर्थना, प्रसाद सेवा, व्यवहार एवं रहने की सुन्दर व्यवस्था आदि देखकर श्रीवैकुण्ठबाबु का एकदम प्राण भर गया। कुछ दिन रहकर मायापुर दर्शन और श्रील प्रभुपाद वेर्नित्य दर्शन के साथ उनकी श्रीमुख से अत्यन्त वीर्यवती हरिकथा श्रवण कर परमानन्दित और सन्तुष्ट होकर अपने घर लौटे। घर में पहुंच कर सारे कथा अपने परिवार लोगों को सुनायी।

सन् १९२४, १३३२ बंगाब्द वैशाख महीना के नारमा संस्कृत परिषद् के द्वारा आयोजित धर्मसभा के अन्त में बालक की माता के साथ परामर्श कर श्रीमायापुर चैतन्य मठ के आमन्त्रित श्रीमद्भक्तिहृदय वन गोस्वामी महाराज, श्रीपाद प्रणवानन्द प्रभु आदि भक्तों के साथ राधारमण को लेकर श्रीवैकुण्ठनाथ बाबू ने श्रीधाम मायापुर स्थित श्रीचैतन्य मठ में अपने पुत्र को वहाँ रखने के लिए आये। पिता वैकुण्ठ बाबू ने पुत्र को सिखाया- श्रील गुरुदेव प्रभुपाद तुमको जो कुछ पूछेंगे तुम सभी प्रश्नों के उत्तर में हाँ बोलना। अपने पिता के साथ श्रीचैतन्य मठ पहुँच कर आजानुलम्बित बाहु विशिष्ट उज्ज्वल स्वर्णकान्ति तेजपुंज श्रीलप्रभुपाद के चरणों में साष्टांग प्रणाम करके प्रथम दर्शन मात्र से ही राधारमण आश्चर्यचकित हो गये। मन में विचार करते रहे कि ये क्या मानव, क्या देवता या क्या प्रतिमा का दर्शन कर रहा हूँ। ११ वर्ष आयु में बालक राधारमण श्रील प्रभुपाद को दर्शन करके एक दिव्य आनन्द से उनके हृदय भर गया। सोचने लगे कि अतीत में खोये हुये परम प्रियजन आज मुझे मिल गये। श्रीलप्रभुपाद और राधारमण गुरु-शिष्य दोनों आँखों से आँखें मिलाकर एक दूसरे से परिचित हो गये। श्रील प्रभुपाद ने पूँछा कि खोका! तुम यहाँ रह सकोगे ? उत्तर में बालक ने कहा-हाँ प्रभु! मैं रह सकूँगा। कुछ दिन श्रीधाम मायापुर में रहकर श्रीवैकुण्ठ बाबू ने मायापुर दर्शन और श्रील प्रभुपाद के मुख से अति सुन्दर वीर्यवती हरिकथा श्रवण की एवं श्रील प्रभुपाद के चरणों में पुत्र रत्न राधारमण को रखकर अपने घर लौट आये।

श्रील प्रभुपाद ने बालक राधारमण को अर्थात् अपने नित्य प्रिय सेवक को पहचान कर परम पवित्र स्नेह पूर्ण हृदय से बहुत कृपाशीर्वाद करके शुभदिन एवं शुभक्षण में श्रीहरिनाम दीक्षा दी। उनके निर्देशानुसार राधारमण को विद्याध्ययन के लिए कलकत्ता डलहौसी में स्कटीश्चार्ज स्कूल के निकट दि न्यू हाईस्कूल में भर्ती किया गया। श्रील गुरुदेव एवं वैष्णव-साधु-सन्त के निष्कपट कृपाशीर्वाद से राधारमण विद्याध्ययन करने लगे। इनके स्वभाव, चरित्र, आचरण, आदर्श, विद्याध्ययन में मनोयोग और सु-मधुर कण्ठ से विभिन्न प्रकार की आवृत्ति, संगीत सुनकर विद्यालय के अपने सहपाठी एवं शिक्षकों को बहुत आनन्द प्राप्त हुआ। एक दिन विद्यालय के सभाकक्ष में समस्त छात्र एवं शिक्षकों ने एकत्रित होकर कहा- आज राधारमण हम सबको गाना सुनायेगा। राधारमण यह सुनकर बड़े घबड़ा गये। शिक्षकों ने कहा- राधारमण! आज तुम हम सबको दो गाना सुनाना। एक ऐसा गाना सुनाना जो सुनकर सबकी आँखों में आँसू आ जाये और दूसरा गानां ऐसा सुनाना जिसे सुनकर सब बहुत हँसने लगें। यह सुनकर श्रीराधारमण ने पहला गाना सुनाया, भगवान् श्रीरामचन्द्र का सीता के विरह में विलाप

अन्धकारे अन्तरेते अश्रु बादल झरे।
लक्ष्मी हीनेर, लक्ष्मी हीनेर शून्यपुरी
मन जे केमन करे ।।

कोथाय आलो, कोथाय आलो,
आकाश भरा कालोय कालो।
फिरबो ना आर, फिरबो ना आर
मा हारानो, प्राण काँदानो घरे।। अन्धकारे अन्तरेते.

आय सरयू सदल सुरे शोकेर गीता गो,
डाकच्छे येन करुण स्वरे कोथाय सीता गो,
कोथाय सी-ता, कोथाय सी-ता,

ज्वलच्छे बुके शोकेर चिता,
काँदना रातेर बेदन बाँशी बाजछे नीरव सुरे।। अन्धकारे अन्तरेते..

यह गाना सुनकर सत्य ही सभी के आँखों से आँसू बहने लगे। इसके बाद दूसरा गाना गाया-

हेले दुले नेते तलो गोत्त विहारी,
तन्तल दिति-दिति रंग विहारी।
बंकिम थाम थिरे थिखि पाखा थोबये,
थुन्दर पीतधरा कति तते धरये ।।

मूल गान है-
हेले दुले नेचे चलो गोष्ठविहारी,
चंचल दिठि-मिठि रंग विहारी।
वंकिम ठाम शिरे शिखिपाखा शोभये,
सुन्दर पीतधड़ा कटीतटे धरये ।।

यह गान सुनकर सभी हँसते-हँसते पागल हो गये। समवेत शिक्षक और सभी छात्रों ने राधारमण की बहुत प्रशंसा की एवं करतालि से सभास्थली को मुखरित कर बहुत आनन्द प्राप्त किया।

सन् १९३१ में दशम क्लास पास किये। उसके बाद मन में विशेष विचारपूर्वक जड़ विद्याचर्चा छोड़कर राधारमण ने परमार्थ अनुशीलन के लिए श्रीलगुरुदेव प्रभुपाद के चरणों में निवेदन किया। इनका इस प्रकार महती विचार जानकर श्रील प्रभुपाद बहुत खुश हुये। अपने चरणाश्रित श्रीधाम मायापुर में श्रीगौरदास पण्डित काव्य-व्याकरण-तीर्थ महाशय के निकट राधारमण को श्रील जीव गोस्वामी पाद के हरिनामामृत व्याकरण अध्ययन करने के लिए व्यवस्था की। श्रीधाम मायापुर श्रीचन्द्रशेखर भवन श्रीचैतन्य मठ में सत् शिक्षा प्रदर्शनी के मुख्य सेवाधिकारी के रूप में श्रील प्रभुपाद के आदेश से सेवा की। इनकी इस प्रकार सभी विषयों में योग्यता और दक्षता देख कर श्रील प्रभुपाद अत्यन्त सन्तुष्ट होकर श्रील प्रभुपाद ने राधारमण को कलकत्ता बागबाजार गौड़ीय मठ में सन् १९३२ में श्रील प्रभुपाद ने राधारमण को गेरुआ वत्र एवं कृष्णमन्त्र दीक्षा प्रदान की। श्रीमद् भक्तिविवेक भारती महाराज ने श्रील प्रभुपाद के निर्देश से उपनयन संस्कार एवं विष्णु होम सम्पत्र किया। श्रील प्रभुपाद ने नाम न बदलकर पूर्व का ही श्रीपाद राधारमण दास ब्रह्मचारी दीक्षा नाम रखा। दीक्षा के पश्चात् संन्यासी अन्यान्य गुरुभाताओं सभी ने राधारमण ब्रह्मचारी को प्रभु कहकर सम्बोधित करते थे। इसमें ब्रह्मचारी जी अत्यन्त दुःखी अन्तर से श्रील प्रभुपाद को प्रणाम करके हाथ जोड़कर निवेदन किया गुरुदेव ? मैं इतना छोटा हूँ, फिर भी मुझे बड़े-बड़े संन्यासी महाराज एवं गुरुभ्राताओं ने प्रभु कहते थे, ये मुझे अच्छा नहीं लगा। तब श्रील प्रभुपाद ने उनको पास में बैठाकर कहा-गुरुदेव का सेवक सदा ही मान्य होता है। श्रीमन्महाप्रभु का सेवक सदा ही प्रभु होता है। एक महाप्रभु आर प्रभु दुईजन। दुई प्रभु सेवेन एक महाप्रभुर चरण।। इस शुद्ध सिद्धान्तानुसार कोई छोटे बड़े की बिचार नही, श्रीभगवान् के सेवक मात्र ही प्रभु पद वाच्य होते हैं। फिर भी गुरुर सेवक हय मान्य आपनार। इस विचारानुसार इसमें कोई दोष नहीं है। श्रील गुरुदेव के इस प्रकार महत्वपूर्ण उपदेश के द्वारा विशेष शिक्षा प्राप्त होकर राधारमण प्रचुर सन्तुष्ट हुये।

फिर ६ जनवरी, सन् १९३३ को पूर्वबंग ढाका पुरानी पल्टन मैदान में सत् शिक्षा प्रदर्शनी की आयोजित सेवा में श्रील गुरुदेव के निर्देशानुसार राधारमण ने मुख्य सेवा में काम किया। श्रील प्रभुपाद की इच्छानुसार उक्त प्रदर्शनी के श्रीगौरलीला, श्रीकृष्णलीला, श्रीरामलीला और अन्यान्य सकल विषय दर्शनार्थियों को समझाने की सेवा में श्रीराधारमण, श्रीहरेकृष्ण दास एवं श्रीनिताई दास को आदेश दिया। श्रील गुरुदेव के निर्देशानुसार श्रीराधारमण प्रदर्शनी के विषय में समस्त दर्शनार्थियों को विभिन्न शास्त्र और महाजनों के सिद्धान्त कह कर समझाते थे। श्रील प्रभुपाद बहुत से दर्शनार्थियों के बीच छुप-छुप कर श्रीराधारमण आदि तीनों को समझाते हुए उनकी कथा सुनकर अपने कमरा में चले गये।

प्रदर्शनी समाप्त होने के एक महीना बाद एक दिन सुबह सभी मठवासियों को बुलाकर सबके सम्मुख इन तीनों को खड़ा किया गया। प्रदर्शनी के भाव समझाने की सेवा में इन तीनों के नाम घोषित कर श्रील प्रभुपाद ने कहा- हरेकृष्ण दास का लोगों को समझाना नीरस, अहंकार युक्त और जैसे गुरुगिरी करने के बराबर था, यह एक दिन मठवास त्याग कर गुरु गिरी करेगा। निताई का लोगों को समझाना ठीक संसारी लोगों के बराबर था, किसी कथा का माथा-मुण्ड नहीं, आबोल-ताबोल बहुत कथा सुनाते रहे, कथा का सार कुछ नहीं था। यह एक दिन मठवास त्याग कर संसार करेगा। एकमात्र यह राधारमण पारमार्थिक जीवन में उन्नति कर रसिक वक्ता होगा। संन्यास लेकर मठ-मन्दिर स्थापन कर श्रीमन्महाप्रभु की कथा प्रचार करके जीवों का बहुत कल्याण करेगा। इनकी कथा के अन्दर जैसे शास्त्र युक्ति प्रमाण है, ऐसे ही ज्ञान गर्भता एवं भाषा का लालित्य है। लोगों को समझाने का कौशल जानता है एवं परिवेशन करने की योग्यता है। अतिमर्त्य महापुरुष की वाणी एक दिन सत्य हुयी।

एक समय पूज्यपाद संन्यासी और अन्यान्य गुरुभ्राताओं के साथ श्रीचैतन्य मठ की माधुकरी संग्रह के लिए मेदिनीपुर काँथि स्थान पर गये। काँथि में रहने वाले अपने काका जी को पता चला कि मेरे जमींदार वंश का एक पुत्र श्रीराधारमण अपनी प्रजा के द्वार-द्वार पर भिक्षा माँग रहा है। तब उन्हें अत्यन्त क्रोधित होकर राधारमण को बहुत तिरस्कार किया और गाली दी। यह सुनकर भी राधारमण ने उस दिन काका जी को कुछ नहीं कहा। फिर काका जी ने अपने ज्येष्ठ भ्राता जमींदार श्रीयुक्त वैकुण्ठ बाबू को इस विषय में अत्यन्त दुःखदायी पत्र लिखा कि हमारे वंश में एक कुलांगार ने जन्म लिया, जिसके कारण आज जमींदार वंश-कुल की मान-मर्यादा-सम्मान सब लुप्त होने जा रही है। ये सबकुछ जानते हुये भी आप चुपचाप रहते, ये आपकी कैसी विचार है?

फिर एक समय भगवान् की इच्छा से श्रीलप्रभुपाद के निर्देशानुसार श्रीमद्भक्तिप्रकाश अरण्य गोस्वामी महाराज और अन्यान्य ब्रह्मचारियों के साथ श्रीपाद राधारमण ब्रह्मचारी जी ने मेदिनीपुर जिला में कौथि महकुमा की आस-पास की गाँव में श्रीमन्महाप्रभु की वाणी का प्रचार एवं भिक्षा संग्रह करने आये। श्रीपाद राधारमण ब्रह्मचारी जी का अत्यन्त तेजस्वीपूर्ण भाषण सुनकर काँथि अंचल के स्थानीय समस्त लोगों ने बहुत सन्तोष हृदय से प्रशंसा की। काका जी ने लोगों के मुख से राधारमण के इस प्रकार प्रशंसा सुनकर उनके बहुत आनन्द हुआ। उस समय किसी कारण वश सभी भिक्षार्थियों को लेकर राधारमण को काका जी के घर में आना पड़ा। काका जी ने अचानक राधारमण को देखकर आश्चर्यचकित हो गये। शीघ्र ही अत्यन्त आदरपूर्वक उन सभी को अभ्यर्थना करके घर में लाया एवं सेवा की व्यवस्था किया। विश्राम के उपरान्त काका जी ने राधारमण को विशेष स्नेहपूर्वक पूँछा कि बाबा! तुम सबके लिए मुझे क्या करना होगा ? तब उत्तर में राधारमण ने कहा- आप समस्त ग्रामवासियों को आमन्त्रित कर एक सभा का आयोजन कीजिए। यह सुनकर प्रचुर आनन्दित होकर राधारमण की कथानुसार शाम के समय सभा का आयोजन किया। उस सभा में पूज्यपाद श्रीमद्भक्तिप्रकाश अरण्य गोस्वामी महाराज के भाषण के पश्चात् श्रीपाद राधारमण ब्रह्मचारी ने पूर्व घटित विषय को अवलंबन कर राजा चाहे राजपुत्र होकर भी श्रीगुरु-वैष्णव भगवान् के लिए माधुकरी भिक्षा करने का प्रकृत तात्पर्य क्या है, वह श्रीमन्महाप्रभु की नीलाचल गमन के समय स्वयं अपने ही गाँव में भिक्षा मांगकर भक्तों सेवा की दृष्टान्त उल्लेख कर दीर्घ समय तक एक महत्त्वपूर्ण भाषण प्रदान की। उस दिन राधारमण के मुख से इतने सुन्दर मधुर एवं सिद्धान्त पूर्ण कथा सुनकर उसी सभा स्थली में ही काका जी ने श्रीपाद राधारमण को हृदय से लगाकर रो-रोकर बहुत स्नेह-प्यार से प्रचुर आशीर्बाद किया एवं अपनी भूल स्वीकार कर कहा- नहीं बाबा! तुम ही हमारे वंश और कुल के कुल प्रदीप हो। उस दिन तुम्हारे प्रति मेरे द्वारा अशालीन आचरण से मैं बहुत दुःखी और लज्जित हूँ। आज मैं तुम्हारे पास क्षमा प्रार्थी हूँ। तुम ने जो किया वह ठीक ही किया। ये मुझे पहले बिलकुल पता नहीं थी, आज तुम्हारे मुख से कथा सुनकर पूरा ज्ञान हुआ। श्रमन्महाप्रभु की इच्छा से उसी दिन से राधारमण ब्रह्मचारी के द्वारा काका जी का श्रील प्रभुपाद के साथ एक विशेष पारमार्थिक सम्बन्ध स्थापित हुआ।

एक समय कलकत्ता बागबाजार श्रीगौड़ीय मठ में श्रील प्रभुपाद के निर्देशानुसार प्रतिदिन शाम को नाट्य मन्दिर में भाषण करने के लिए बोर्ड में वक्ता का नाम पहले लिख दिया जाता था। इस प्रकार पूर्व नियमानुसार आज श्रीमद्भक्तिभूदेव श्रौति महाराज ने सुबह बोर्ड पर वक्ता श्रीपाद राधारमण ब्रह्मचारी, विषय-वेदान्त सूत्र लिख दिया। यह देखकर ब्रह्मचारी जी शीघ्र ही श्रील श्रौति महाराज जी के पास गये और कहा, ये आपने क्या किया? आज मेरा नाम क्यों लिखा, और विषय वेदान्त सूत्र लिख दिया? आपको पता नहीं क्या, वेदान्त सूत्र के बारे में क्या जानूँ? मैंने कभी पढ़ा नहीं, मुझे कुछ पता नहीं। मैं कैसे पाठ करूँगा ? सुनकर श्रीमहाराज जी ने कहा- भाई! मुझे तो कुछ पता ही नहीं। श्रीलप्रभुपाद ने कहा, और मैने लिख दिया। आप जाने और गुरुदेव जाने। यह सुनकर ब्रह्मचारी जी बिलकुल घबड़ा गया। तब श्रीलश्रौति गोस्वामी महाराज ने कहा- श्रीलप्रभुपाद ने क्या न जाने समझकर आपका नाम दिया? एक उपाय है, मैं आपको कुछ वेदान्त सूत्र समझा देता हूँ। आप उसको दिनभर में अभ्यास कर लीजिए, तब आपको कुछ दिक्कत नहीं होगी। किन्तु बोर्ड का नाम परिवर्तन नहीं कर सकूँगा। ब्रह्मचारी जी ने कहा- हाँ, वह हो सकता है। आप कृपा करके मुझे समझा दीजिए, तब मैं बोल सकता हूँ। कथानुसार वही हुआ और शाम को मठवासी, भक्त एवं श्रद्धालु व्यक्तियों से समस्त नाट्य मन्दिर भर गया। श्रीपाद राधारमण ब्रह्मचारी जी ने श्रील गुरुपादपद्म के चरणों में पूर्ण शरणागति के साथ करुणा प्रार्थी होकर साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करके विषय वस्तु वेदान्त सूत्र के ऊपर एकदम दिल खोल कर विभिन्न शास्त्र के श्लोक, प्रमाण युक्ति, उदाहरण और महाजन कीर्तन के साथ सु-सिद्धान्त पूर्ण ऐसा भाषण दिया कि समस्त श्रोतृवृन्द एवं समस्त मठवासी और श्रीलश्रौति महाराज भी सुनकर आश्चर्य हो गये। श्रीलप्रभुपाद छुप कर उस दिन श्रीराधारमण की ऐसी सुन्दर व्याख्या सुनकर और भाषण देने की अपूर्व योग्यता देखकर बहुत सन्तुष्ट हुये। दूसरे दिन सबके सामने श्रीलप्रभुपाद ने कहा- राधारमण ने इतनी कम आयु में जिस प्रकार वचन भंगिमा से वक्तृता एवं तत्त्वपूर्ण व्याख्या करना शिखा है, इसे देख मेरे मन में होता है कि भविष्य में राधारमण एक दिन एक बड़ा वक्ता होगा। सारे जगत में मानव समाज का बहुत कल्याण साधन करेगा। केवल ऐसा नहीं, राधारमण की वक्तृता और समझाने की पद्धति अतीव सुन्दर, रसाल एवं मन को मुग्ध करने वाली है। श्रीपाद राधारमण की इस प्रकार पारमार्थिक सेवानिष्ठा, योग्यता, उत्साह और समस्त साधु-गुरु-वैष्णव-भगवद् सेवा में आन्तरिक चेष्टा, अनुराग देखकर श्रील प्रभुपाद ने अत्यन्त प्रसन्न हृदय से उनको अपनी अति अन्तरंग सेवा दी।

एक समय श्रील गुरुपादपद्म के चरण दर्शन और पुत्र राधारमण को देखने के लिए श्रीवैकुण्ठ बाबू बागबाजार गौड़ीय मठ आये थे। वहाँ से लौटते समय कलकत्ता बड़ा बाजार से काजू बादाम श्रीश्रीराधाकिशोरीमोहन जू को भोग लगाने के लिए लाये थे। घर लौटकर मन्दिर के पुजारी ब्राह्मण के हाथ में देकर कहा-प्रतिदिन १०/१५ बादाम तोड़ कर बीज निकाल कर भगवान् को बाल भोग लगाना। बाबू के कहे अनुसार पुजारी ऐसा ही करता था और एक-दो करके बादाम प्रसाद भी पाते थे। एक दिन पुजारी ब्राह्मण को बादाम खाने की लोभ आ गया। उस दिन अपराह्न के समय मन्दिर बन्द कर भगवान् को भोग लगाने के बदले, बादाम अपने खाने के लिए तैयार किया, किन्तु इतना शख्त बीज कैसे तोड़ा जाए, तब मन में विचार किया कि ये शालग्राम तो पत्थर है, उसी से बादाम तोड़ कर खालूँ, जैसा विचार आया वैसा ही काम किया। शालग्राम से बादाम तोड़ कर खाना शुरू कर दिया। इधर बहुत समय तक मन्दिर नहीं खोला और मन्दिर के अन्दर से हमेशा आवाज आ रही है, यह देखकर परिवार के एक-एक करके सभी सदस्यों ने पुजारी को बुलाया किन्तु पुजारी ने मन्दिर नहीं खोला। तब इन सब ने बाबू को खबर भेजी। यह सुनकर जमींदार बाबू ने आकर जब पुजारी को बुलाया, तब जमींदार बाबू की आवाज सुनकर भय से पुजारी ने मन्दिर खोला और बाबू के चरणों में गिर पड़ा। बाबू ने पूछा कि पुजारी जी! भीतर मन्दिर में आप क्या कर रहे थे? आज इतने समय तक मन्दिर नहीं खोला? पुजारी थर-थर करके काँपने लगा कुछ बोल नहीं सका, उस समय उपस्थित सभी ने पुजारी के मुख में भरा हुआ बादाम देखा, और देखा मन्दिर के अन्दर तोड़ा हुआ बहुत बादाम एवं सिंहासन के श्रीशालग्राम विग्रह नीचे जमीन में पड़े रहे हैं। यह देखकर जमींदार बाबू को समझने में देर नहीं हुई कि, पुजारी ने शालग्राम से बादाम तोड़ कर खाया है। तब जमींदार बाबू ने पुजारी को बहुत तिरस्कार करके मन्दिर से निकाल दिया। कुछ दिन वाद एक समय श्रीलप्रभुपाद के दर्शन के लिए आकर जमींदार बाबू ने यह कहानी सुनायी। श्रीलप्रभुपाद ने सुनकर उनके स्व-हस्त लिखित गल्पे उपनिषद् ग्रन्थ में शालग्राम से बादाम तोड़ा शीर्षक यह कहानी लिखकर प्रकाशित की।

एक समय बागबाजार गौड़ीय मठ में पूज्यपाद श्रीमद्भक्तिभूदेव श्रौति गोस्वामी महाराज, श्रीमद्भक्तिहृदय वनदेव गोस्वामी महाराज, श्रीमद्भक्तिरक्षक श्रीधरदेव गोस्वामी महाराज, श्रीप्रणवानन्द ब्रह्मचारी, श्रीहयग्रीव ब्रह्मचारी, श्रीराधारमण ब्रह्मचारी आदि इन सभी ने मिलकर श्लोक टुर्नामेन्ट खेल किया। खेल का नियम ऐसा था कि पहले कोई एक श्लोक आवृत्ति करेगा, उस श्लोक का शेष अक्षर लेकर दूसरा श्लोक बोलना होगा। इस खेल में सबको पराजित कर श्रीपाद राधारमण ब्रह्मचारी जीते। इनके पितृदेव एक महान् ज्योतिष शास्त्रविद् थे, इस सम्बन्ध में श्रीलप्रभुपाद ने भी इनको ज्योतिष शास्त्र का पूर्ण ज्ञान प्रदान किया। इनका ज्योतिष विचार अखण्डनीय अव्यर्थ था। हस्त रेखा विचार करके जिनको जो कुछ बताते थे वह पूर्ण रूप से फलप्रद होता था।

एक समय हावड़ा जिलान्तर्गत मुन्सीर हाट थाना ब्राह्मण पाड़ा स्थित प्रपन्न आश्रम का षड़भुज महाप्रभु की सेवा के साथ सारी सम्पत्ति उनके सेवाइत श्रीगौरभूषण विद्याभूषण महोदय ने श्रील प्रभुपाद को समर्पित कर दी। श्रीलप्रभुपाद ने उस आश्रम का सेवा दायित्व देकर श्रीराधारमण ब्रह्मचारी को भेजा। वहाँ एक वर्ष तक श्रीविग्रह सेवा, पाठ-कीर्तन, नृत्य-गीत के द्वारा सबको बहुत सन्तुष्ट किया। उन स्थानीय लोगों के मुख से ब्रह्मचारी जी की बहुत प्रशंसा सुनी। तब श्रीलप्रभुपाद ने उनको बुलाकर श्रीमद्भक्तिरक्षक श्रीधरदेव गोस्वामी महाराज, श्रीमद्भक्तिगभस्ति नेमि महाराज, श्रीपाद नरोत्तम प्रभु आदि के साथ श्रीराधारमण ब्रह्मचारी को मुम्बई श्रीमन्महाप्रभु की वाणी प्रचार के लिए भेजा। वहाँ के श्रीगौड़ीय मठ में और मुम्बई शहर, पूना, मीरोड, भयन्दर आदि विभिन्न स्थानों पर हिन्दी में पाठ-कीर्त्तन वक्तृता के द्वारा श्रीमन्महाप्रभु की वाणी प्रचार करके बहुत प्रशंसा लेकर श्रील प्रभुपाद का कृपाशीर्वाद प्राप्त किया। श्रील प्रभुपाद ने इनकी इस प्रकार प्रचार कार्य में दक्षता और योग्यता देखकर परम सन्तुष्ट हृदय से पूज्यपाद श्रीमद्भक्तिसुधीर याचक महाराज के साथ उत्तर बंग में श्रीमन्महाप्रभु की वाणी-प्रचार के लिए भेजा। श्रील गुरुदेव के निर्देशानुसार श्रीधाम वृन्दावन और उसी के आस-पास के राईवेलि, पीलीभीत, अलीगढ़, हाथरस, कानपुर, लखनऊ,
उत्तरांचल आदि एवं राजस्थान, मध्यप्रदेश, पञ्जाब, बिहार, दिल्ली, हरियाना, जम्बु, काश्मीर आदि स्थानों पर हिन्दी, बिहारी, पञ्जाबी, अंग्रेजी विभिन्न आंचलिक भाषाओं में अस्वाभाविक वीर्यवती वाणी से तथा अत्यन्त तेजस्वी भाषण, पाठ-कीर्तन, नृत्य गीत के द्वारा दो महीना तक श्रीमन्महाप्रभु का वाणी प्रचार करके श्रील गुरुदेव प्रभुपाद के चरणों में लौटे। प्रचार कार्य में इस प्रकार विस्मयकर योग्यता देखकर श्रीलप्रभुपाद बहुत सन्तुष्ट हुये एवं प्रचुर कृपाशीर्वाद किया।

भारत के बाहर ब्रह्मदेश में श्रीमन्महाप्रभु की वाणी-प्रचार के लिए विचार किया। तब पूज्यपाद श्रीमद्भक्तिसुधीर याचक महाराज और श्रीराधारमण ब्रह्मचारी को, साथ में सत्यगोविन्द ब्रह्मचारी को लेकर ब्रह्मदेश प्रचार के लिए आदेश दिया एवं तीनों का जलजहाज का टिकट भी बना लिया। निर्धारित दिन को तीनों विदेश प्रचार में जाने के लिए तैयार होकर बहुत उत्साह से श्रील गुरुदेव प्रभुपाद को प्रणाम करने गये। श्रील प्रभुपाद ने बड़े गम्भीर भाव से कहा- ब्रह्मदेश प्रचार के लिए नहीं जाना होगा। यह सुनकर तीनों ही घबड़ा गये और मन में बहुत दुःखी होकर दिनभर सोचते रहे कि, श्रीलप्रभुपाद ने पहले आदेश देकर फिर क्यों मना किया। शाम को श्रील प्रभुपाद ने इन तीनों और सभी मठवासियों अपने कमरा में बुलाकर कहा- तुम सब बड़े ध्यान से रेडियो की खबर सुनो। रेडियो में शाम को संवाद में कहा- आज दिन में इस समय पर इस नम्बर का जहाज हावड़ा बाबूघाट से ब्रह्मदेश जाने के समय मध्य समुद्र में सम्पूर्ण डूब गया। उसमें एक भी जीवित नहीं बचा। यह संवाद सुनकर श्रील प्रभुपाद ने कहा कि राधारमण ! आज इसी जहाज में तुम सब जाते तो कैसा होता? यह सुनकर सबके मुख-गला सूख गया और थर-थर काँपने लगे। त्रिकालदर्शी श्रील प्रभुपाद ने पहले ही जानकर मना किया यह सबको पता चला। तब इन्होंने हाथ जोड़कर चरणों में निवेदन किया प्रभो! एकमात्र आपकी असीम कृपा से आज हम सब मृत्यु के द्वार से लौट आये। अन्यथा हम सबकी मृत्यु अवश्यम्भावी थी। आज आप ने हम सबका जीवन लौटा दिया। सब ने श्रील प्रभुपाद गुरुदेव की प्रकृत महिमा एवं वास्तव रूप में गुरुदेव अन्तर्यामी हैं यह ज्वलन्त प्रमाण स्वरूप समझा। तुमि त’ राखिबे जारे, के तारे मारिते पारे। फिर श्रीभगवान् ने सखा अर्जुन को कहा है-कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति। आश्रय लइया भजे, तारे कृष्ण नाहि त्यजे, आर सब मरे अकारणे। ये सब बातें अखण्डनीय त्रिकाल सत्य हैं, यह यथार्थ रूप में समझा।

ब्रह्मदेश जाने के लिए फिर दोबारा टिकिट करके श्रीलप्रभुपाद ने कलकत्ता बाबूघाट जाकर अपने गले की प्रसादी माला श्रीराधारमण को पहनाकर दोनों हाथ सिरपर रखकर पूर्ण कृपाशीर्वाद दिया। जहाज में चढ़ने के समय श्रील प्रभुपाद ने कहा- राधारमण! तुम बहुत कम आयु में जहाज पर चढ़कर भारत के बाहर विदेश प्रचार के लिए समुद्र से जा रहे हो। श्रीमन्महाप्रभु तुम सबका मंगल करें। यह सुनकर सभी ने पूर्व कि घटना स्मरण करके अश्रु बहाकर भू-लुण्ठित साष्टांग प्रणाम करके उच्चस्वर से पुनः पुनः श्रीलप्रभुपाद की जयध्वनि देकर ब्रह्मदेश की शुभ यात्रा की। तीन दिन बाद रंगून गौड़ीय मठ में पहुँचे। विश्राम के उपरान्त ब्रेसिं, प्रोम, थ्याटन, प्यापन, म्याण्डेल, ब्रह्मदेश की राजधानी नामटु, सोएबो, मोनाक, भामो एवं चीन का बार्डर आदि समस्त रंगून और ब्रह्मदेश में पाठ-कीर्त्तन, नृत्य-गीत, बहुत बड़ी बड़ी. सभाओं में अत्यन्त तेजस्विता पूर्वक वीर्यवती भाषण के द्वारा बृहद् रूप में श्रीमन्महाप्रभु की वाणी का प्रचार किया। प्रचार काल में एक दिन श्रीचैतन्य चरितामृत अध्ययन के समय श्रील सनातन शिक्षा में श्रीमन्महाप्रभु ने सनातन को कहा- जीवेर स्वरूप हय कृष्णेर नित्यदास। यह पढ़कर श्रीपाद राधारमण ब्रह्मचारी जी ने श्रीमद्भक्तिसुधीर याचक महाराज से कहा महाराज! श्रील कविराज गोस्वामी पाद का इस प्रकार के लेख को मैं अपने भावानुसार स्वीकार नहीं करता। इनके मुख से यह सुनकर श्रील महाराज जी विस्मित हुए और कहा ये आप क्या कहते हो? आपने कविराज गोस्वामी की कथा को ग्रहण नहीं किया ? तब श्रीपाद ने कहा मैं इस विषय में एक प्रबन्ध लिखकर आपको दिखाऊँगा वह कृपा करके पाठ करना तब आपको पता चलेगा। यह कहकर श्रीपाद ने “भृत्येर परिचय” शीर्षक नाम देकर प्रबन्ध लिखा-

भृत्येर परिचय

श्रीगोलोक वृन्दावने याँर अवस्थान।
सेइ कृष्ण पिता-माता नित्य धन प्राण ।।
कृष्ण नित्य-प्रभु मोर आमि नित्य दास।
एड़ कथा भुलि मोर ह’ल सर्वनाश।।
सेड़ क्षणे माया मोर धरिया केशेते।
आनिलेन सु-सज्जित ताँहार राज्येते ।।
परिधेय वस्त्र-जामा दिलेन आमारे।
स्थूल-सूक्ष्म-देह, शास्त्रे बलेन याहारे।।
सत्त्व-रज-तम एइ त्रिगुण शृखले।
मोर हस्त-पद शृखलित करिलेन बले ।।
सेइ दिन ह’ते मोर द्विगुण भावेते।
भोगानल प्रज्ज्वलित हइल देहेते ।।
जन्मिल से कतदिने विवेक आमार।
हा कृष्ण ! हा कृष्ण ! बलि डाकि बार बार।।
तखन अन्तरेते चैत्तगुरु दिलेन प्रेरणा।
श्रीगुरुर पादपद्म करह भावना।।
ताँहार निकटे तब परिचय पावे।
स्वरूपेर परिचये सब दुःख जावे।।
किसा गुरुदेव ! तुमि हओ पतित पावन ।
मो-सम-पतिते -प्रभु ! करह मोचन ।।
तोमा सम दयावान नाहि ए जगते।
तोमा बिना अन्य केह ना पारे तारिते।।
परम दयालु प्रभु नित्यानन्दाभिन्न।
प्प्रेरिलेन निज जने बिलाते चैतन्य ।।
अचैतन्य आमा प्रति चैतन्येर जन।
उच्चैः स्वरे कहिलेन मधुर वचन ।।
उठ-उठ, जाग-जाग, आर ना घुमाओ।
मायार दासत्व छाड़ि कृष्णपाने चाओ ।।
जीवेर स्वरूप हय कृष्णेर दासत्व।
से दासत्व छाड़ि केन विषये प्रमत्त ?
श्रीगुरु चरण हय जीवेर रतन।
जाँहार सेवाते पावे कृष्ण प्रेमधन ।।
गुरुदेव ह’न ‘कृष्ण’ शास्त्र परमाण।
गुरुर सेवाते हय कृष्णेर सेवन ।।
गुरु-कृष्णे भेद बुद्धि जेड़ जन करे।
से कभु गुरुर तत्त्व जानिवारे नारे।।
उद्धवेर प्रति कृष्ण वलिला वचन।
आमार स्वरूप बलि’ गुरुदेवे जान।।
गुरुदेव हन, निजे सर्व देवमय।
नर बुद्धे जेइ निन्दे सेइ जाय क्षय ।।
कृष्ण पेते हले अग्रे गुरुर सेवन।
गुरुर सेवने मिले कृष्ण प्रेमधन।।
बुझिलाम एतदिने श्रीगुरु कृपाय।
गुरु’र दासत्व हय मोर परिचय ।।

अतः श्रीगुरुपादपद्म दासत्व की महिमा, श्रीकृष्ण दासत्व की महिमा की अपेक्षा से अधिक महिमान्वित है। कारण जीव मात्र ही स्वाभाविक रूप में श्रीकृष्ण का नित्यदास है यह सत्य वचन है, किन्तु अनादि काल से श्रीकृष्ण बहिर्मुखता के कारण मायाधीन व मायाबद्ध जीव का स्व-स्वरूप विस्मृति के कारण श्रीकृष्ण के साथ उसका नित्य सम्बन्ध है यह भूल गया। सम्बन्ध ज्ञान प्रदाता श्रीगुरुपादपद्म की काय-मन-वाक्य से सेवा करते-करते जब गुरुदेव में पूर्ण रूप से शरणागति आनुगत्य द्वारा गुरुसेवामय जीवन होगा, तब श्री गुरुदेव की कृपा से साधक क्रमानुसार श्रीकृष्ण दासत्व उपलब्ध कर पायेगा। गुरु रूपे कृष्ण कृपा करेन भक्तगणे। ऐसा है कि जीव की मुक्तावस्था में अर्थात् स्वरूप सिद्धावस्था में भी श्रीगुरुदेव के पूर्ण आनुगत्य के बिना साधक को कोई भी साधन का फल प्राप्त नहीं हो पायेगा। स्वरूप सिद्धि के बाद जो भूमिका वः अवस्था प्राप्त होती है वह वस्तु सिद्धि होती है। उस अवस्था में भी भक्त को श्रीश्रीराधाकृष्ण युगल सेवा प्राप्त होना भी गुर्वानुगत्य द्वारा ही सम्भव है। श्रीभगवद् कृपामूर्ति श्रीगुरुदेव की कृपा एवं आनुगत्य ही एक मात्र जगत् में प्रयोजन है। श्रीगुरुदेव के साथ जीव का जो दासत्व सम्बन्ध दीक्षाकाल में स्थापित होता है वह नित्य है। कृष्णभक्त सद्‌गुरु से मन्त्र प्राप्त चिदानन्दमय शरीर में रहकर स्वरूप सिद्धि प्राप्त करता है। इस पांचभौतिक शरीर के नाश होने पर स्वरूप सिद्ध देह में वस्तु सिद्धि प्राप्त होती है। साधन करते समय जो भाव होगा सिद्धिकाल में भी वही प्राप्त होगा। इस सिद्धान्त के अनुसार श्रीकृष्णलीला तथा श्रीकृष्णलीला राज्य पर शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर इन मुख्य पञ्च प्रकार से श्रीकृष्णकी नित्य सेवा भूमिका में अपने-अपने भावानुसार नित्यलीला में भी श्रीगुरु पादपद्म का आनुगत्यमय सम्बन्ध विशेष रूप से विद्यमान रहता है। उस अवस्था में श्रीगुरुरूपा सखी एवं मंजरी के आनुगत्य में साधक की श्रीश्रीराधाकृष्ण युगल सेवा सम्पादित होती है। अतः जीव के लिए श्रीकृष्ण का नित्यदासत्व उपलब्ध करने के लिए श्रीगुरु पादपद्म की पूर्ण शरणागति, आनुगत्य और दीनता पूर्वक दासत्व स्वीकार करना ही प्रयोजन एवं एकमात्र अपने घर भगवद्धाम लौटने का मार्ग है। विश्रम्भेन गुरोसेवा साधु वर्मानुवर्त्मनम् श्रीगुरुदेव श्रीभगवान् की पूर्ण करुणाशक्ति के मूर्तिमान विग्रह हैं। कृपाशक्ति में श्रीगुरुदेव और श्रीभगवान् में कोई भी अन्तर नहीं, एक ही हैं। सुतरां हर अवस्था में एकमात्र गुरुकृपा हि केवलम्। श्रील याचक महाराज ने श्रीराधारमण प्रभु के मुख से इस प्रकार व्याख्या सुनकर आनन्द पूर्वक इस प्रबन्ध को लिखकर श्रीधाम मायापुर के पते पर श्रील प्रभुपाद के चरणों में भेज दिया।

श्रीगौड़ीय पत्रिका के सम्पादक श्रीपाद प्रणवानन्द ब्रह्मचारी और प्रकाशक श्रीमत् कृष्णकान्ति ब्रह्मचारी, श्रीसुन्दरानन्द प्रभु एवं श्रीकुञ्ज बाबू सभी इस प्रबन्ध को पढ़कर घबड़ा गये। आखिर में इस प्रबन्ध को इन्होंने श्रीप्रभुपाद के चरणों में निवेदन किया। प्रबन्ध पढ़कर श्रील प्रभुपाद ने अत्यन्त सन्तुष्ट होकर कहा- राधारमण ने जो लिखा यह ठीक ही लिखा है। इतनी कम आयु में उसमें इस प्रकार पारमार्थिक विचक्षणता आयी यह बहुत आनन्द का विषय है। इसका लिखा हुआ सिद्धान्त सम्पूर्ण रूप से निर्भूल एवं यथार्थ है। अतः वास्तविक भजन मार्ग के इस सिद्धान्त को अवश्य ही जगत् के सभी लोगों को ज्ञान होने के लिए विशेष रूप से चेष्टा करनी चाहिए। यह प्रबन्ध श्रीगौड़ीय पत्रिका में शीघ्र ही प्रकाशित करने के लिए श्रीपाद प्रणवानन्द ब्रह्मचारी जी को आदेश दिया। उसके बाद श्रीलप्रभुपाद ने स्व-हस्त लिखित पत्र द्वारा श्रीपाद राधारमण ब्रह्मचारी को अत्यन्त आन्तरिक स्नेहाशीर्वाद भेजा।

रंगून प्रचार के समय एक विशिष्ट उच्च्च शिक्षित इन्जीनियर नैष्ठिक कालीभक्त एक मिठाई दुकानदार के साथ श्रीपाद राधारमण ब्रह्मचारी जी का विशेष सम्बन्ध हो गया। वह प्रतिदिन दुकान पर इन्हें बुलाते थे और बैठाकर जगत् में कौन श्रेष्ठ है, यह प्रश्न कर दुकानदार अपनी आराध्या काली माँ को श्रेष्ठ कहते थे एवं ब्रह्मचारी जी अपने आराध्य श्रीहरि को श्रेष्ठ कहते थे। इस प्रकार तर्क-विवाद प्रतिदिन होता रहता था। मिठाई खिलाने के लिए बहुत चेष्टा करता था किन्तु ब्रह्मचारी जी नहीं खाते, यह सोचकर कि तुम जब तक मेरे श्रीहरि को श्रेष्ठ स्वीकार नहीं करोगे तब तक मैं तुम्हारी मिठाई नहीं खाऊँगा। एक दिन उसने कुछ लोगों के साथ एक मुरदा को कन्धे पर लेकर सबके साथ बोल हरि हरिबोल, बोल हरि हरिबोल इस प्रकार कहते हुए श्मशान पर जाते हुये देखा। यह देख सुनकर ब्रह्मचारी जी ने विचार किया अब तुमको पराजित करूँगा। कुछ दिन दुकान पर नहीं गये। एकदिन जब गये तो दुकानदार ने पूछा- क्या है, ब्रह्मचारी जी! मेरी दुकान पर क्यों नहीं आये? क्या मेरी कुछ गलती हुई है? ब्रह्मचारी ने कहा-मन में बहुत दुःख हुआ। दुकानदार- क्यों, मैंने आपको क्या दुःख दिया? ब्रह्मचारी, आप काली माँ को संसार में सर्वश्रेष्ठ मानते थे। उनसे बड़ा कोई नहीं, यह आपने मुझे समझाया। किन्तु मैंने अपनी आँखों से देखा और कानों से सुना, आप उस दिन एक मुरदा लेकर जाते समय जोर-जोर से चिल्ला-चिल्लाकर बोलो हरि हरि बोल, बोलो हरि हरिबोल कहते हुए श्मशान जा रहे थे। तब मेरे मन में बहुत दुःख हुआ कि, जो इतना बड़ा काली माँ का भक्त है, यह आज बोल काली काली बोल न कहकर क्यों मेरे हरि को पुकार रहा है। आप इतने बड़े भक्त होकर काली माँ का नाम क्यों नहीं लेते थे? इसलिए मैं नहीं आया। तब दुकानदार ने कहा- ब्रह्मचारी जी आज मैं तुम्हारे पास हार स्वीकार करता हूँ। क्योंकि संसार में केवल हरि ही एकमात्र बड़े हैं एवं आराध्य हैं। जो कुछ आपद-विपद, सुख-दुःख, आखिर में हरि को छोड़कर कुछ नहीं होता, यहाँ तक कि संसार से मुक्त भी नहीं होता ये आज मैं मानता हूँ। आपके हरि ही एकमात्र सर्वश्रेष्ठ हैं।

ब्रह्मदेश प्रचार के समय एक दिन एक पर्वत का झरना देखने के लिए झील पर घूमने गये। देखा थोड़ी दूर झील के एक शिला पर बैठकर एक किशोर अपने भाव में बड़ी ही करुण और मधुर कण्ठ से गान गा रहे थे जिसे सुनकर ब्रह्मचारी जी का दिल टूट गया। ब्रह्मचारी जी ने यह गान सुनते हुए मन में विचार किया कि इस प्रकार भाव और दिल से भगवान् को पुकारा जाये तो भगवान् एकपल भी रह नहीं सकेंगे। यह गान सुनकर मैंने पूरा ही याद कर लिया। वह गान ऐसा है

अपार तूफान आगे, पार हब मा बल केमने।
मने करि पारे जाबो, माझखानेते तरी पाबो,
आमार सन्देह हय मा, हांगरे कुम्भीरे खाबे।
जादेर हाथे पैसा छिल, तारा तो मा पारे गेल,
आमि अधम रईलाम पड़े, दया करे ने मा तुले,
ए अधम सन्ताने ।।

रवि तो वसेछेन पाटे, कि करि मा भांगा हाटे,
सबाइ गेल जे जाहार पथे, आमि जे मा पथ चिनिने ।
दया करे ने मा तुले, ए अधम सन्ताने,
तोर रांगा अभय चरणे।।
नइले पार हं’ब मा बल केमने ।।

ब्रह्मदेश प्रचार कार्य की सफलता से श्रीलप्रभुपाद ने अत्यन्त सन्तुष्ट होकर श्रीपाद राधारमण ब्रह्मचारी को भक्तिशास्त्री उपाधि से भूषित किया। इनके सु-मधुर कण्ठ से पाठ-कीर्त्तन-नृत्य, भाषण के साथ श्रीधाम नवद्वीप मण्डल परिक्रमा के अन्त में श्रीनवद्वीप धाम प्रचारिणी विश्वच वैष्णव राजसभा के सभापति जगद्‌गुरु श्रीश्रील प्रभुपाद भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर ने अपने स्नेह स्निग्ध श्रीचरणाश्रित सेवक श्रीपाद राधारमण ब्रह्मचारी को निज स्वहस्त लिखित श्रीगौराशीर्वाद पत्र में राग कुमुद उपाधि से विभूषित किया।

श्रीश्रीमायापुर चन्द्रो विजयतेतमाम् श्रीश्रीनवद्वीप धाम प्रचारिन्या सभायाः- श्रीश्रीगौराशीर्वाद पत्रम् –

गीतसेवानुरक्ताय विपुलोत्साह-संयुजे ।
ब्रह्मचारी पदांक श्रीराधारमण-संज्ञिने ।।
धाम प्रचारिणी-संसत्-सभ्यैस्तस्मै प्रदीयते।
राग कुमुद इत्येतदुपनामाद्य सादरम् ।।
मुनीषु-बसु-सुभ्रांशु-शाके-मायापुरे वरे।
फाल्गुन-पूर्णिमायां-श्रीगौराविर्भाव वासरे।।

स्वाः-
सभापति

श्रीनाम संकीर्तन अनुरागी विपुल उत्साही निरासक्त ब्रह्मचारी श्रीराधारमण को श्रीधाम प्रचारकारी संघ के प्रचारक की भूमिका का पद प्रदान किया गया है। ये वर्तमान रागकुमुद नाम से शुभ्रचन्द्र करोज्ज्वल फाल्गुनी पूर्णिमा श्रीगौराविर्भाव तिथि वासर श्रीधाम मायापुर में सादरपूर्वक अभिनन्दित हुए।

श्रील प्रभुपाद के निर्देश से उनका अन्तिम दर्शन और असीम कृपाशीर्वाद शिरोधार्य कर सन् १९३६ में श्रीपाद राधारमण रागकुमुद ब्रह्मचारी, श्रीपाद हयग्रीव ब्रह्मचारी एवं श्रीमद्भक्तिकेवल औडुलौमि महाराज मद्रास मठ में पहुँचे। वहाँ मठ परिचालन एवं मद्रास आदि दक्षिण भारत में परम उत्साह के साथ श्रीमन्महाप्रभु की वाणी का प्रचार करते थे। १ जनवरी सन् १९३७ १३४३ बंगाब्द, १३ पौष प्रातः ५-३० बजे श्रील प्रभुपाद ने अन्तर्धान लीला की। अचानक यह हृदय बिदारक संवाद शाम को मद्रास मठ में पहुँचा। यह सुनकर ट्रेन द्वारा कलकत्ता बागबाजार गौड़ीय मठ आये। इस शोचनीय अवस्था में कुछ दिन मठ में रहकर श्रीमद्भक्तिभूदेव श्रौति महाराज और श्रीपाद गोपाल दास प्रभु के साथ पूरे भारत में श्रीमन्महाप्रभु एवं श्री प्रभुपाद की वाणी का प्रचार किया। श्रील प्रभुपाद के अन्तर्धान के बाद श्रीचैतन्य मठ में अशान्त परिवेश के कारण कोई उपाय न देखकर अत्यन्त दुःखी मन से अपने पूर्वाश्रम नारमा लौट आये। श्रीपाद राधारमण की इस प्रकार अवस्था देख और सारी कथा सुनकर माता-पिता एवं परिवार के सभी सदस्य बहुत दुःखी हुये। ब्रह्मचारी जी पूर्वाश्रम के अपने कमरा में रहकर निरन्तर हरिनाम जप और रो-रोकर श्रील गुरुदेव प्रभुपाद की याद करते थे। महान् ज्योतिष शास्त्रविद् पिता श्रीवैकुण्ठ बाबू दिन-रात श्रीराधारमण की जन्मपत्री पर विचार करते थे। राधारमण के जीवन में संसार नहीं, संन्यास के पूर्ण लक्षण हैं। किन्तु ये क्या हो गया? यह सोचकर पिताश्री निरन्तर श्रीलगुरुदेव प्रभुपाद को पुकारते थे। हे गुरुदेव ! प्रभुपाद ! आपके सेवक राधारमण पर कृपा कीजिए, रक्षा कीजिए, मेरा ज्योतिष विचार कभी मिथ्या नहीं हो सकता, आप रक्षा कीजिए प्रभुपाद। रक्षा कीजिए।

इधर माताश्री ने पुत्र को इतने वर्ष बाद घर आये देखकर राधारमण का विवाह करने के लिए कन्या देखकर उसके आशीर्वाद का दिन भी चुन लिया। कन्या के आशीर्वाद के दिन की पूर्वरात्रि में राधारमण को शयन कक्ष में श्रील प्रभुपाद ने साक्षात् रूप से दर्शन दिया। उनके दर्शन मात्र ही राधारमण चरणों में गिरकर प्रणाम करके बहुत रोने लगे। तब श्रील प्रभुपाद ने कहा- राधारमण! तुम यह कौन सा जीवन बिताने जा रहे हो ? तू क्या घर में रहकर संसार करने के लिए
मेरे पास आये थे? तुम्हारा इस प्रकार जीवन बिताना ठीक नहीं है। तुमको संन्यास लेना होगा। संन्यास लेकर समस्त विश्व में श्रीमन्महाप्रभु की निर्मल प्रेमभक्ति धर्म एवं हरिनाम संकीर्तन बृहद् रूप से प्रचार करना होगा। श्रील रूप-रघुनाथ और श्रीभक्तिविनोद ठाकुर की शुद्धभक्ति की कथा का प्रचार करनी होगा। मठ-मन्दिर करके जगत् में जीवों के लिए यथार्थ मंगल का मार्ग दिखाना होगा। श्रीमद्भक्तिविचार यायावर महाराज से संन्यास लेकर तुम सब मिल-जुल कर श्रीमन्महाप्रभु की वाणी का प्रचार करना। जगत् में प्रत्येक मानव के निकट श्रीगौरसुन्दर एवं श्रीभक्तिविनोद ठाकुर की कथा पहुँचाने की व्यवस्था करना। तुमको बहुत काम करना होगा। कोई चिन्ता मत करना, हमेशा के लिए मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। यह कहकर श्रील प्रभुपाद अदृश्य हो गये।

श्रीराधारमण ब्रह्मचारी तत्क्षणात् परमानन्द-परमोल्लास में यह शुभ संवाद देने के लिए हरिनाम मालिका लिये हुए दौड़ कर पिताश्री के कमरे में गये। पिताश्री को साष्टांग दण्डवत् प्रणाम किया, पिताश्री ने पुत्र को हृदय से लगाकर आँसू बहाते हुए कहा- रहने दो, तुमको कुछ कहने की कोई आवश्यकता नहीं। मुझे सब कुछ पता है। राधारमण! ज्योतिष शास्त्र कभी झूठा नहीं, बिलकुल सत्य है। श्रील गुरुदेव परम करुणामय, अन्तर्यामी, दीनबन्धु एवं शरणागत पालक हैं। श्रीभगवान् दीन वत्सल और शरणागत के प्रति सदा ही परम दयाशील होते हैं। आज मेरे आनन्द की सीमा नहीं। श्रील गुरुदेव प्रभुपाद ने तुमसे जो कहा, तुम केवल उनका ही वह पवित्र आदेश पालन करने के लिए सदा ही तैयार रहो। तुम्हारा परम मंगल होगा। श्रील प्रभुपाद की इच्छा पूर्ण करना ही तुम्हारे जीवन का एकमात्र कर्त्तव्य है। तब मैं सुखी रहूँगा। यह मेरा आदेश है। आज श्रील प्रभुपाद ने इस अभागा दीन-हीन की प्रार्थना ग्रहण की, इससे बढ़कर मेरे जीवन में परम आनन्द और क्या हो सकता है? यह कहकर श्रीराधारमण के सिर पर दोनों हाथ रखकर प्रचुर आशीर्वाद दिया और राधारमण की माता श्रीरत्नमयी देवी से कहा- इस शुभयात्रा में राधारमण को कोई बाधा नहीं देना। उसको जाने दो। यह मेरा आदेश है कि तुम माता होकर अपने पुत्र को प्राण भरकर आशीर्वाद करो, जिससे वह श्रील गुरुदेव प्रभुपाद का पवित्र आदेश पालन करके जीवन सार्थक कर अपना कर्त्तव्य निभाये।

जमींदार परिवार का आबाल-वृद्ध, दास-दासी सभी दर्शकवृन्द इस अलौकिक दृश्य के एकमात्र साक्षी हैं। मातृदेवी ने दोनों आँखों से अश्रु बहाते हुए अपने पुत्र को हृदय से लगाकर स्नेहविह्वल शत् चुम्बन लेते हुए रो-रोकर आशीर्वाद देते हुये कहा- बाबा! तुम जिस काम के लिए इतना कठिन मार्ग चुन कर आगे जा रहे हो, अवश्य ही वह पूरा करना। तब हम सब सुखी होंगी। यह कहकर राधारमण के हाथों में ‘साढ़े छै आना’ पैसा देकर कहा- जाते समय भूख लगे तो कुछ लेकर खा लेना। इतना ही कहकर पुत्र को विदा दिया। राधारमण ब्रह्मचारी ने पिता-माता को साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करके, कुल के आराध्य देवता श्रीराधाकिशोरीमोहन जू को पुनः पुनः साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करके नित्यकाल के लिए संसार से विदाई लेकर जय गुरुदेव । जय गुरुदेव । जय प्रभुपाद ! जय प्रभुपाद ! जय राधाकिशोरीमोहन । पुनः पुनः जयध्वनि के साथ घर से निकलकर समस्त जग‌द्वासियों के लिए अपना जीवन समर्पण कर दिया।

उसी रात्रि में श्रीमद्भक्तिविचार यायावर महाराज जी को श्रील प्रभुपाद ने दर्शन देकर कहा- राधारमण तुम्हारे पास आ रहा है। तुम उसको रेमुना क्षीरचोरा गोपीनाथ के सम्मुख संन्यास देना इतना ही कहकर अदृश्य हो गये। श्रीराधारमण ब्रह्मचारी जी ने मेदिनीपुर शिव बाजार स्थित श्रीश्यामानन्द गौड़ीय मठ में आकर पूज्यपाद श्रीमद्भक्तिविचार यायावर गोस्वामी महाराज को प्रणाम किया। साथ साथ श्रील महाराज ने अपने गुरुभ्राता ब्रह्मचारी जी को हृदय से लगा कर आँखों में आँसू भरकर कहा- भाई। मैं रात्रि से किसी को कुछ न कहकर केवल तुम्हारी प्रतीक्षा में हूँ। श्रील गुरुदेव ने तुम्हारे संन्यास के लिए मुझे आदेश दिया। फिर श्रीपाद हयग्रीव प्रभु (श्रीमद्भक्तिदयित माधव गोस्वामी महाराज) ने अपने गुरुभ्राता को देखते ही हृदय से लगाकर आँसू बहाते हुए कहा- भाई! आज मेरी आँखों के आँसू सार्थक हुई। श्रील गुरुदेव ने इस दीन-अधम की प्रार्थना श्रीचरणों में स्वीकार कर ली। आज मेरे आनन्द का कोई ठिकाना नहीं है। यह कहकर सभी ने एकसाथ उच्चस्वर से जय प्रभुपाद ! जय गुरुदेव ! पुनः पुनः कहकर परमानन्दोत्सव मानाया।

पूर्व निर्धारित दिन अनुसार समस्त गुरुभ्राताओं के साथ श्रीपाद राधारमण ब्रह्मचारी जी को लेकर श्रीमद्भक्तिविचार यायावर गोस्वामी महाराज श्रीगौड़ीया के परम महान् तीर्थ कृष्णप्रेम कल्पवृक्ष के मूल स्कन्ध श्रील माधवेन्द्र पुरीपाद की अन्तिम भजनस्थली और दिव्य समाधिस्थली एवं श्रील रसिकानन्द प्रभु के श्रीगोपीनाथ जू के श्रीअंग में महामिलन अन्तर्धान लीला क्षेत्र प्रसिद्ध रेमुना क्षीरचोरा श्रीगोपीनाथ जू के मन्दिर में पहुँचे। शाम को श्रीगोपीनाथ जू का दर्शन एवं उनकी महिमा कीर्तन के साथ बहुत नृत्य-गीत के द्वारा उपस्थित समस्त लोगों को परमानन्द प्रदान किया। दूसरे दिन ११ गोविन्द ४५५ गौराब्द, २८ माघ १३४८ बंगाब्द, १२ फरवरी, सन् १९४२ बृहस्पतिवार प्रातः काल से श्रीराधारमण ब्रह्मचारी जी की त्रिदण्ड संन्यास लीला शुभानुष्ठान में श्रील श्रौति गोस्वामी महाराज एवं श्रील वैखानस गोस्वामी महाराज के पुरोहित्य के द्वारा श्रीविष्णुयज्ञ-होमादि कार्य सु-सम्पन्न हुआ। श्रील प्रभुपाद के कृपानिर्देशानुसार श्रीमद्भक्तिविचार यायावर गोस्वामी महाराज जी ने श्रीपाद राधारमण ब्रह्मचारी जी को श्रीमद् गोपाल भट्ट गोस्वामी की सत् क्रियासार दीपिका और श्रीनारद पंचरात्र के विधानानुसार श्रीगोपीनाथ जू के सम्मुख त्रिदण्ड एवं संन्यास मन्त्र प्रदान किया। उसी के साथ समस्त गुरुभ्राताओं की इच्छानुसार पूर्व से श्रील प्रभुपाद द्वारा दिये हुये प्रिय शिष्य को रागकुमुद अलंकार के भूषण से भूषित राधारमण ब्रह्मचारी जी श्रीलप्रभुपाद के भवितव्य इंगितानुसार त्रिदण्डि भिक्षु श्रीमद्भक्तिकुमुद सन्त गोस्वामी महाराज नाम से समस्त गौड़ीय वैष्णव जगत् में आदरणीय हुये।

संन्यास लीला में श्रीराधारमण ब्रह्मचारी

संन्यास ग्रहण करके श्रीश्यामानन्द गौड़ीय मठ में श्रीमद्भक्तिविचार यायावर गोस्वामी महाराज जी के चरणों में रहकर समस्त गुरुभ्राताओं और बहुत से भक्तों के साथ मिलकर श्रीब्रजमण्डल, गौरमण्डल, क्षेत्रमण्डल आदि स्थानों में पाठ-कीर्तन, वक्तृता, नृत्य-गीत के द्वारा आसमुद्र हिमाचल तक समस्त भारतवर्ष में बृहद् रूप से श्रीमन्महाप्रभु का विशुद्ध प्रेमभक्ति धर्म एवं श्रील प्रभुपाद और श्रील भक्तिविनोद ठाकुर की कथा का प्रचार किया। समस्त गुरुभ्राता मिलकर एक मठ में एक साथ रहने से कभी एक दूसरे के बीच अशान्ति तथा विवाद हो सकता है, यह सोचकर श्रील प्रभुपाद की इच्छा से स्वतन्त्र रूप में श्रीमन्महाप्रभु की कथा प्रचार करने के विचार से संन्यास गुरु पूज्यपाद श्रील भक्तिविचार यायावर महाराज जी को समझा-बुझाकर श्रीश्यामानन्द गौड़ीय मठ छोड़कर अपने शिष्य (सत्यविग्रह प्रभु) को साथ में लेकर विभित्र स्थानों पर अकेले प्रचार करते रहे। मेदिनीपुर जिलान्तर्गत केशियाड़ी थाना के विभिन्न स्थानों पर प्रचार करते समय अपने गुरुभ्राता भक्त प्रवर जमींदार श्रीपाद श्यामसुन्दर महापात्र ने श्रील महाराज जी को मठ मन्दिर बनाने के लिए अपने मौहल्ला का कुछ स्थान एवं खेती जमीन दान दे दी। उनकी पूर्ण सहायता से केशियाड़ी में श्रीगौरांग मठ, मन्दिर एवं नाट्य मन्दिर बनाकर आमन्त्रित समस्त गुरुभ्राताओं की उपस्थिति में पाठ-कीर्तन, नृत्य-गीत आदि श्रीहरिनाम संकीर्त्तन के द्वारा बृहद् रूप से अनुष्ठान करके प्राण प्रियतम श्रीश्रीगुरु गौरांग श्रीश्रीमन्महाप्रभु राधागोपीनाथ जू की प्रतिष्ठा कर सेवा प्रकाश की।

एक समय श्रील महाराज ने मन में विचार किया इतने दिन बाद भगवान् ने थोड़ा सा आश्रय कर दिया अब मैं निश्चिन्त होकर श्रीश्रील गुरु-गौरांग राधागोपीनाथ जू की सेवा कर सकूँगा। उसी रात्रि स्वप्न में श्रीगोपीनाथ जू ने श्रील महाराज जी को दिव्य दर्शन देकर कहा- मैं तुझे पहले आश्रय दान करता तो, आ-समुद्र हिमाचल तक मेरी कथा का प्रचार कार्य इतने सुन्दर रूप से तू नहीं होता। केवल प्रचार के लिए मैंने इतने दिन इन्तजार में था। आज मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ। इतना ही कहकर अदृश्य हो गये। इस प्रकार श्रीगोपीनाथ जू की कृपा देखकर, दूसरे दिन श्रील महाराज ने बहुत आनन्दित होकर प्रेम भावित हृदय से श्रीश्रीराधागोपीनाथ जू के श्रीचरणों में एक निवेदन पत्र लिखकर समर्पित किया और बहुत बड़े उत्सव मनाया।

श्रीभक्तिसिद्धान्त सरस्वतीर चरण आमि पूजबो बले।
एसे छिलाम सकल फेले ताँहार रातुल चरण तले।।
शिक्षादातार अभाव नाइक, ए विश्व माझे भरपूर।
गुरुवेषे अनेक आसे, फक्काबाजी सु-चतुर।।
भवेर एइ मायार हाटे जखन एलेन प्रभुपाद ।
ताँर चरणे स्थान लभिते ए अधम ओ रयनि बाद।।
(प्रभु) भाग्यदोषे मोदेर छेड़े गेलेन जखन गोलोके।
(मोर) तखन हते कलुष चित्त एदिक-ओदिक केवल झोके ।।
दयामयेर अपार कृपा वर्णिवार कि साध्य आछे।
(हेथाय) गौर गोपीनाथेर सेवा दिया राखलेन तिनि आपन काछे।।
केशियाड़ीवासी श्रीश्यामसुन्दर दास महापात्र वर।
अकैतव भक्ति-भूषण गौर-गोपीनाथेर सेवापर।।
(आज) मन्दिरेर पूर्ण व्यय वहन करे धन्य हलेन तिनि
सेवा सुयोग पेये आमि ताँर निकटे रइनु ऋणी।
भोग-मोक्ष दुई महावीर तुष्टि खोजे सकल लोके ।
जगत् तादेर वासे भालो’ तादेर पाये सबाई लोटे ।।

उसके बाद श्रील महाराज जी ने खड़गपुर हिजली स्टेशन के पास श्रीचैतन्य आश्रम के निर्माण कर श्रीश्रीगुरु-गौरांग-राधागोविन्द जू की प्रतिष्ठा कर उनकी सेवा प्रकाश की। इस मन्दिर के श्रीमहाप्रभु एक ब्राह्मण के घर में सेवित होते थे, उस ब्राह्मण को स्वप्नादेश दिया- मैं तुम्हारी सेवा से बहुत सन्तुष्ट हूँ। अब मैं राजसेवा ग्रहण करूँगा। तुम मुझे खड़गपुर श्रीचैतन्य आश्रम में श्रीसन्त गोस्वामी के पास दे देना। तब उस ब्राह्मण ने श्रीसन्त गोस्वामी महाराज के शिष्य श्रीपाद कृष्णवल्लभ प्रभु को श्रीगौर सुन्दर का आदेश सुनाया और उनके हाथों में श्रीमहाप्रभु को सौंप दिया। इधर उसी रात्रि में श्रील महाराज जी ने स्वप्न देखा कि श्रीमन्महाप्रभु आ रहे हैं। श्रीपाद कृष्णवल्लभ प्रभु अपने मस्तक पर श्रीमन्महाप्रभु को लेकर खड़गपुर श्रीचैतन्य आश्रम आये और श्रील महाराज जी के हाथों में उन्हें सौंपा। श्रीश्रीजगन्नाथ क्षेत्र पुरीधाम में गौरवाट साही स्थान पर श्रीचैतन्य आश्रम निर्माण कर श्रीश्रीगुरु-गौरांग राधारमण-जगन्नाथ-बलराम सुभद्रा जू के श्रीविग्रह प्रतिष्ठा कर उनकी सेवा प्रकाश की। दक्षिण कलकत्ता बिहाला में श्रीचैतन्य आश्रम निर्माण कर श्रीश्रीगुरु-गौरांग-राधामदनमोहन जू के श्रीविग्रह प्रतिष्ठा कर उनकी सेवा प्रकाश की। स्थानीय लोगों के अत्याचार से श्रीलमहाराज जी ने श्रीविग्रह को अपने गुरुभ्राता श्रील माधव गोस्वामी महाराज को देकर खड़गपुर लौट जायेंगे यह विचार कर लिया। गाड़ी मंगाकर उसमें चढ़ाने के लिए श्रीविग्रह के पास गये तब श्रीमदनमोहन जू ने कहा- ना रे ना मुझे मत देना, सुन्दर मठ स्थापन करके मेरी सेवा प्रकाश कर, मैं इसी स्थान पर रहूँगा। यह सुनकर श्रील महाराज जी ने रो-रो कर श्रीमदनमोहन के चरणों में क्षमा प्रार्थना की और श्रीविग्रह की सेवा प्रकाश की। श्रील महाराज जी ने पूर्वबंग में बहुत प्रचार और शिष्य किये। वहाँ के जशोहर जिला के बड़दिया स्थान पर अपने गुरुभ्राता श्रीमद्भक्तिसम्बन्ध तूर्याश्रमी महाराज जी के प्रतिष्ठित मठ में सेवित श्रीविग्रह की सेवा प्राप्त हुई।

सन् १९७८ के कार्त्तिक महिना में केशियाड़ी श्रीगौरांग मठ में अखण्ड हरिनाम संकीर्तन, दिन-रात्रि श्रीमद्भागवत पाठ कीर्तन के साथ श्रीलगुरु महाराज असंख्य भक्तों को लेकर श्रीश्रीराधादामोदर व्रत पालन करते थे। ठीक उसी समय मेरे ज्येष्ठ गुरुभ्राताद्वय पूज्यपाद श्रीमद्भक्तिप्रेमिक सागर गोस्वामी महाराज एवं श्रीमद्भक्तिविचार भारती गोस्वामी महाराज जी की निष्कपट आन्तरिक कृपा से केशियाड़ी में मुझे श्रील गुरुमहाराज जी के चरणों का दर्शन हुआ। वहाँ ५/६ दिन रहा और पाठ-कीर्त्तन सुनता था। एक दिन सुबह श्रील गुरुमहाराज जी को प्रणाम करने गया, प्रणाम करके उठा तो महाराज जी ने मुझसे कहा-सुनो, आज मैंने स्वप्न में देखा श्रीराधागोपीनाथ जू के मन्दिर में उनके सम्मुख बैठकर तुम्हें हरिनाम दीक्षा दे रहा हूँ। अच्छा तुमको मैं हरिनाम दीक्षा दूँ, तो तुम लौंगे कि नहीं? यह सुनकर मैंने तुरन्त उत्तर दिया, हाँ गुरु महाराज मैं लूँगा। तब श्रील गुरुमहाराज जी ने बहुत आनन्द पूर्वक कहा- जाओ, मस्तक मुण्डन कर स्नान करके आओ। आज श्रीगिरिराज गोवर्द्धन पूजा अत्रकूट महोत्सव है, इस शुभ दिन में तुमको हरिनाम दीक्षा दूँगा। उस दिन श्रीश्रीराधागोपीनाथ जू के सम्मुख बैठकर श्रील गुरुमहाराज ने मुझे हरिनाम दीक्षा प्रदान की।

एक साल बाद कलकत्ता बिहाला श्रीचैतन्य आश्रम में सन् १९७९ के वैशाख महीना में श्रीमन्नृसिंह भगवान् के आविर्भाव शुभ तिथि में श्रील गुरुमहाराज ने अपने हाथों से श्रीविष्णुयज्ञ होम आदि करके मुझे पञ्चरात्र विधानानुसार कृष्णमन्त्र, उपनयन दीक्षा प्रदान कर श्रीनयनाभिराम दास ब्रह्मचारी नाम दिया। सन् १९८५ फागुन महिना में श्रीमन्महाप्रभु के पंचशत वर्ष पूर्ति आविर्भाव महा महोत्सव के उपलक्ष में श्रीधाम मायापुर श्रीनन्दनाचार्य भवन में श्रीगौर पूर्णिमा शुभ तिथि पर श्रील गुरुमहाराज ने मुझे अयाचित कृपा करके त्रिदण्ड संन्यास मन्त्र प्रदान की। संन्यास के साथ त्रिदण्डि भिक्षु श्रीमद्भक्ति स्वरूप गोविन्द महाराज नाम दिया। ये अधम के प्रति श्रील गुरु पादपद्म की निष्कपट आन्तरिक विशेष कृपाशीर्वाद से इतनी बड़ी दुःसाध्य सेवा कर सका, अन्यथा ये कार्य मुझ से कभी भी सम्भव नहीं था। इसके साथ परमाराध्यतम श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर एवं उनके सारे प्रियजनों के अशेष कृपा से आज आपको इतना सुन्दर उपहार दे सकता हूँ।

श्रील गुरुदेव परमाराध्यतम पतित पावन ॐ विष्णुपाद परिव्राजकाचार्य त्रिदण्डिस्वामी १०८ श्री श्रीमद्भक्तिकुमुद सन्त गोस्वामी महाराज जी ११ वर्ष की आयु से पूरा जीवन देश-विदेश में सर्वत्र श्रील प्रभुपाद, श्रीमन्महाप्रभु की निर्मल प्रेमभक्ति की कथा, हरिनाम संकीर्तन प्रचार करके अन्त में ९८ वर्ष की आयु में
श्रीनयनमणि मंजरी की अति प्रियतमा श्रीरागकुमुद मंजरी श्रील गुरुमहाराज ने कलकत्ता बिहाला श्रीचैतन्य आश्रम में २७ नारायण ५२५ गौराब्द, २१ पौष १४१८ बंगाब्द, ६ जनवरी, सन् २०१२ रात्रि १-६ मिः श्रीगौर त्रयोदशी तिथि रोहिणी नक्षत्र योग का अवलम्बन करके दिव्य अन्तर्धान लीला प्रकाशित कर अपने नित्य आश्रय विग्रह परमाराध्यतम श्रीश्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर श्रीनयनमणि मंजरी की चरण सेवा में प्रविष्ट हुए।

श्रील गुरु महाराज जी की उपदेशावली

(१) श्रीकृष्ण की बहिरंगा शक्ति सत्त्व, रज, तम त्रिगुणमयी महामाया द्वारा रचित इस संसार कारागार में हमेशा आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक त्रिताप से दग्धीभूत जीव के वास्तविक कल्याण, नित्य शान्ति एवं मुक्ति का मार्ग दिखाने के लिए भगवान् अपने भक्तों को हमेशा इस संसार में भेजते हैं। भगवान् से आने वाले जन हम सबके समान कोई साधारण मनुष्य नहीं होते। उन सबको शास्त्र में महत् पुरुष, सद्‌गुरु, शुद्धभक्त, निष्किञ्चन उत्तम वैष्णव बताया गया है। पूर्व जन्मार्जित सुकृति से साधु-गुरु वैष्णव दर्शन उपलब्ध होता है।

(२) जिनको वास्तविक रूप से भगवद् अभाव पैदा हुआ, गुरुतत्त्व उनको ही उपलब्ध होगा। श्रीगुरुदेव ऐसी कोई वस्तु नहीं जो प्राकृत वस्तु के द्वारा प्रभावान्वित हो जाये। श्रीगुरुदेव भगवान् के अभिन्न मूर्तिमन्त करुणाशक्ति के प्रकाश विग्रह हैं। वे प्राकृत जगत् में रहकर भी अप्राकृत वस्तु विशेष, भगवान् के साथ जीव को जोड़ने वाले सम्बन्ध तत्त्व हैं। इस प्रकार सद्‌गुरु संसार में बहुत दुर्लभ हैं।

(३) वास्तविक भगवत् प्रेमभक्ति भण्डारी महद् साधु वैष्णव शुद्धभक्त का साक्षात् दर्शन भगवान् का ही दर्शन है, इसमें कोई सन्देह नहीं। साधु-गुरु-वैष्णव के हृदय में भगवान् नित्य विश्राम करते हैं। उनकी हृदयस्थली नित्य वृन्दावन है। साधु-गुरु श्रीकृष्णकथा रूप दिव्य ज्ञान के द्वारा भगवान् का दर्शन कराते हैं।

(४) केवल निष्काम, निष्कपट, दृढ़ता, सरलता, उदारता और शरणागति के द्वारा श्रीकृष्ण भजन सम्भव है। हरिकथा और भगवतत्त्व, प्रकृत आत्मतत्त्व श्रीकृष्णतत्त्ववेत्ता साधु एवं महत् व्यक्ति के मुखारविन्द द्वारा नित्य श्रवण करने से समस्त शास्त्रानुशीलन हो जाता है। अलग से शास्त्राध्ययन का कोई प्रयोजन नहीं। समस्त साधनों में श्रीकृष्ण श्रवणांग एवं कीर्त्तनांग अनुशीलन ही श्रेष्ठ बताया गया है।

(५) प्रकृत रूप से जो व्यक्ति सरल और उदार हैं उसको साधु-महद् एवं भगवान् की कृपा शीघ्र ही प्राप्त होती है। किन्तु चतुर, छली-कपटी एवं अहंकारी व्यक्ति हमेशा के लिए इस कृपा से वञ्चित रहते हैं।

(६) संन्यासी कभी पूर्वाश्रम के किसी प्रकार के विषय में सम्बन्ध नहीं रखता। जिस वस्तु का त्याग किया उसको फिर ग्रहण नहीं करता। जो व्यक्ति वह ग्रहण करता है, उसको परित्यक्त विष्ठाभोजी बान्ताशी कहते हैं।

(७) भगवान् की कथा कीर्तनकारी को यथार्थ आचरण, आदर्श एवं भजन निष्ठा अवश्य ही प्रयोजनीय है। अन्यथा वक्ता और श्रोता दोनों के जीवन में अमंगल पैदा होगा।

(८) संसार में वास्तविक बुद्धिमान् व्यक्ति हजारों बाधा-विपत्ति, प्रतिकूलता आने पर भी सद्‌गुरु से प्राप्त श्रीहरिनाम नहीं छोड़ता है।

(९) इस संसार में भगवान् के नाम, रूप, लीला, धाम, भक्त और भगवान् ये छह वस्तु सत्य, चिन्मय, निर्गुण हैं। निखिल विश्व में केवल एकमात्र भगवान् श्रीहरि मंगलमय वस्तु हैं। उनको परित्याग करके किसी प्रकार से कभी मंगल सम्भव नहीं है।