नित्यलीला प्रविष्ट ॐ विष्णुपाद परिव्राजकाचार्य त्रिदण्डिस्वामी १०८श्री श्रीमद्भक्तिगौरव वैखानस गोस्वामी महाराज

प्रणाम

नमो ॐ विष्णुपादाय सरस्वती प्रियाय च।
श्रीमते भक्तिगौरव वैखानसेति नामिने।।
नमो उत्कल वासिने कुतर्कवाद हारिणे।
वेदादि-शास्त्र-पारिणे वैष्णव गुण धारिणे।।
वन्दे सदा राजगुरूं ब्रह्मकुल भूषणं।
सरस्वत्य दिव्यवरं दैव शास्त्रेषु प्रधानम्।।
श्रीविग्रह मन्दिरादि स्थापकाय सुकीर्त्तये।
सद्व्रत धारिणे साक्षाच्छास्त्र वाणी श्रीमूर्त्तये।।
गौरवाणी प्रचारिणे पतितजन तारिणे।
सदा सारस्वत्यू वर्य पूज्याय नमो नमस्ते।।

श्रीलमहाराज ने सन् १८७७ कार्त्तिक महीना के कृष्ण प्रतिपद तिथि में गञ्जाम जिला के बड़गढ़ ग्राम निवासी जमींदार कुलीन ब्राह्मण पिता यदुमणी रथ एवं माता ललिता देवी का आश्रय कर ज्येष्ठ पुत्र के रूप से जन्म ग्रहण किया। वे उत्कल ब्राह्मण थे। पिता व पितामह सभी पुरुषानुक्रम से बड़गढ़ राजा के राज पुरोहित कार्यभार को सम्मान पूर्वक करते थे। पुरुषानुक्रम से उस परिवार के सभी वेदज्ञ पण्डित एवं कर्मकाण्ड कार्य में विशेष दक्ष थे। माता-पिता ने इनके जन्मलक्षण एवं शुभलग्न का विचार करके उज्ज्वलकान्ति शिशु का नाम रखा उज्ज्वलेश्वर रथ। सात वर्ष की आयु में बालक का उपनयन संस्कार कर विद्याध्ययन के लिए गुरु के पास भेजा। बालक बाल्यकाल से गम्भीर एवं मौनी स्वभाव के थे। वे बाल्यकाल से अल्प समय में सभी विषयों में अग्रणी अधिकार के साथ बंगला, संस्कृत, इंग्लिश, उड़ीसा और राजनीति, अर्थनीति, तर्कनीति तथा दर्शनशास्त्र में महापाण्डित्य पूर्ण अप्रतिद्वन्द्वी पारदर्शिता प्रतिभा के साथ राज्य में सबके प्रीत्यषद सम्मानीय एवं आदरणीय हुए।

एक समय महामान्यवर बड़गढ़ राजा ने अपने राजपुरोहित के पुत्र श्रीउज्जलेश्वर रथ के विशेष प्रतिभा सुनकर स्नेहवश राजसभा कवि एवं राजपण्डित मण्डली के साथ विभिन्न प्रश्नोत्तर आलोचना के द्वारा पाण्डित्य प्रदर्शन के लिए सादर आमन्त्रित किया था। राजा के आमन्त्रण को सम्मान के साथ स्वीकार कर श्रीउज्जलेश्वर रथ राजसभा में पहुँचे और सभा में सभापति के समस्त प्रश्नों का यथार्थ शास्त्रयुक्ति के द्वारा उत्तर दिया एवं सभा में सभी मतवाद को सहजता से खण्ड-विखण्डित कर शुद्धभक्तिवाद को स्थापित करके सभा के समस्त पण्डितों को पराजित कर जयलाभ किया। राजा ने समस्त परिषदों के साथ इनके इस प्रकार पाण्डित्य से अत्यधिक मुग्ध होकर सबके सम्मुख इनको पाट्टयोशी उपाधि प्रदान की और सभा के श्रेष्ठ सभाकवि एवं राजगुरु के पद पर सम्मानित पूर्वक घोषित किया। राजा इनको अपने अभिन्न आत्मा के समान हमेशा अपने पास रखते थे।

एक समय धराकोट राजा के पुरोहित लिंगराज मिश्र के पास तन्त्र साधना शिक्षा के लिए व्रत लिया। एकदिन अमावस्या की रात में तन्त्रगुरु लिंगराज के साथ श्मशान जाकर एक मृत शरीर के ऊपर बैठकर मन्त्र साधना करने लगे। मन्त्रशक्ति के प्रभाव से शव हाथ-पैर-शिर हिलाकर जाग्रत हुआ। यह देखकर मन्त्रगुरु लिंगराज श्मशान छोड़कर भागा। इधर पाट्टयोशी के मृषा-मृषा कह कर मन्त्र उच्चारण करने से शव ने शान्त होकर इनसे पूँछा है।

प्रेत—हे साधक! आप किस लिए इस प्रकार श्मशान में आकर मेरी साधना करते हो?

पाट्टयोशी—मैं पराविद्या प्राप्त करना चाहता हूँ।

प्रेत—अति कम समय में आपकी यह अभिलाषा पूरी होगी। आप एक अतिमर्त्य महापुरुष के दर्शन करेंगे। यह कहकर प्रेत चुप हो गया।

एक समय राजा और सभाकवि पाट्टयोशी अन्यान्य परिषदों के साथ वन भ्रमण के लिए निकले। वन के अन्दर घूमते-घूमते बहुत दूर चले गये एवं शाम भी हो गयी। राजा थक कर विश्राम के लिए वन छोड़कर एक पल्लीपर गये। आश्रय का सन्धान करने से वहाँ के लोगों ने एक साधु का आश्रम राजा को दिखाया। राजा सबको लेकर उसी आश्रम पर विश्राम करने लगा। तान्त्रिक साधु ने कुछ समय बाद इन सभी को भोजन के लिए बुलाया एवं प्रत्येक पत्ता में खिचड़ी दी। किन्तु पाट्टयोशी के मन में सन्देह हुआ कि भोजन पकाने की कोई व्यवस्था नहीं देखी गई, अति शीघ्र कैसे बनाया। यह सोचकर पाट्टयोशी ने घास की अंगूठी बनाकर सबके हाथों में पहना दी और कहा—आप सब भोजन से पूर्व पत्ते में अंगूठी स्पर्श करके फिर भोजन करना। कथा के अनुसार अंगूठी स्पर्श की तो देखा प्रत्येक पत्ता में खिचड़ी नहीं साधु ने टट्टी खाने को दी है। यह जानकर राजगुरु ने शीघ्र ही साधु का पूरा आश्रम सरसों को मन्त्रित करके बन्द करा दिया। राजा ने अत्यन्त क्रोधित होकर उसका दण्ड विचार किया किन्तु राजगुरु ने मना किया एवं रात बीतने के बाद ग्रामवासियों को सारी कथा सुनाकर अपने राजपुरी में लौट आये। यह देखकर राजा ने पाट्टयोशी को बहुत सम्मानित किया। ग्रामवासियों ने साधु का आश्रम जला दिया और बहुत मार-मार कर साधु को गाँव से भगा दिया।

एक समय राजा परिषदों सहित राजगुरु के साथ वन भ्रमण के लिए निकल गये। राजा दिनभर वन में घूमते-घूमते बहुत दूर पहुँचे और अत्यन्त क्षुधार्त्त एवं क्लान्त होकर एक वृक्ष के नीचे बैठ गये। इधर शाम हो गयी। राजा ने कहा मैं बहुत थक गया, अभी मुझे विश्राम चाहिये और कुछ खाने को दीजिये। देखो आस-पास में कहीं कुछ विश्राम और खाने को मिल जाये तो ठीक है। राजगुरु ने यह सुनकर थोड़ी दूर जाकर अपनी दिव्यशक्ति से एक कुटीर एवं एक वनवासी शबर को प्रकट करके राजा को बुलाकर उसी कुटीर में पहुँचे। शबर के द्वारा बहुत सुन्दर मीठा कन्दमूल खिलाया गया एवं रातभर शान्ति पूर्वक राजा ने विश्राम किया। सुबह होने पर राजा कुटीर से बाहर आया और पाट्टयोशी को कहा, सुन्दर कन्दमूल खाकर आनन्द हुआ और रात्रि में सुखदायक विश्राम किया। आप उस शबर को बुलाइये मैंने उसको कुछ उपहार देने के लिए विचार किया है। यह सुनकर पाट्टयोशी राजा के साथ दो-चार बातें करने लगा, कुछ समय बीत ने पर राजा ने देखा कि वहाँ कोई शबर या कोई कुटीर आदि कुछ नहीं है। पिछले दिन शाम को जिस वृक्ष के नीचे बैठे थे अभी उसी स्थान पर सब बैठे हैं। यह देखकर राजा ने आश्चर्य पूर्वक कहा—यह कैसे हुआ? राजा की बात सुनकर पाट्टयोशी मुस्कुराने लगे। तब राजा को समझने में क्षण मात्र भी विलम्ब नहीं हुआ। ज्ञात हुआ कि यह सब राजगुरु की अलौकिक शक्ति है। सन् १९२१ को पाट्टयोशी ने गान्धी जी के असहयोग आन्दोलन में भाग लेकर ब्रह्मपुर कारागार में कुछ दिन के लिये रहे। इनका व्यवहार और कथा सुनकर और दिव्य दर्शन से मुग्ध होकर सरकार ने शीघ्र ही इनको कारागार से मुक्त कर दिया।

एक समय श्रीवृन्दावन की यात्रा की। दूसरे दिन ट्रेन में सफर के समय देखा कि आकाश में बादल के कारण सूर्य दिखाई नहीं दे रहा है। इनका नियम था कि सूर्य दर्शन बिना भोजन नहीं करना। बहुत चिन्तित होकर वे विधि पूर्वक सूर्य स्तव करने लगे। स्तव के अन्त में देखा बादल हट गया और सूर्य निकल आये हैं। सूर्य दर्शन कर बहुत आनन्दित हुये। उस समय ट्रेन एक स्टेशन पर पहुँच कर रुक गई। मन में सोचा कि गाड़ी में जो कुछ मेरे पास है यह खाना ठीक नहीं होगा, किन्तु क्या किया जाये? यह सोचने लगे, अचानक एक वृद्ध अपने शिर पर एक टोकरी रखे आया और फल लाकर इनको दिया एवं कहा, आप यह फल भोजन कीजिये। इतना ही कहकर अदृश्य हो गया। पाट्टयोशी सोचने लगे कि किसने इतने फल भेजे, फिर यह वृद्ध भी कहाँ चला गया? फल का मूल्य भी नहीं लिया। इतना सोचते ही उसी समय दिव्यवाणी सुनी कि—तुम भूखे हो, यह जानकर मैंने ये फल भेजे थे, तुम इनका भोजन करो। मैं सूर्यदेव हूँ। यह सुनकर इनकी आँखों में जल भर आया। तब सूर्यदेव को प्रणाम कर क्षमा प्रार्थना की। उन्होंने मन में विचार किया कि भगवान् सूर्यदेव के दिये हुये ये फल मुझे ग्रहण करना बिलकुल ठीक नहीं होगा। श्रीधाम वृन्दावन पहुँचकर पहले यह फल श्रीराधागोविन्द, गोपीनाथ, मदनमोहन को भोग लगायेंगे, उसके बाद प्रसाद ग्रहण करूँगा।

एक समय वे किसी काम से बहुत दूर चले गये। लौटने के समय शाम हो चुकी थी। तब गाँव में कहीं आश्रय के लिए लोगों से पूँछा तो गाँव वाले इनको एक घर में रहने की व्यवस्था करके चले गये। मध्यरात्रि में विशाल शरीरधारी एक ब्रह्मदैत्य ने दर्शन दिया। उसको देखकर पाट्टयोशी ने पूँछा कि,—तुम कौन हो?

दैत्य— मैं ब्रह्मदैत्य हूँ।

पाट्टयोशी— तुम किस लिए आये हो। क्या चाहिये?

दैत्य— आपको खाऊँगा।
पाट्टयोशी— किसलिए तुम मुझे भोजन करोगे?

दैत्य — आप मेरा भोजन हैं। इस कमरे में जो आते हैं वह मेरा भोजन होता है।

पाट्टयोशी— मुझे खाकर फिर भी तुम इसी प्रेतयोनि में रहोगे। इसमें तुम्हारा क्या लाभ होगा? तुम इस जीवन से मुक्त होना चाहते हो कि नहीं? सोचकर कहो।
दैत्य— मेरा कौन उद्धार करेगा?

पाट्टयोशी — मैं तुम्हारा उद्धार करूँगा। तुम इस पाप योनि से मुक्त होकर श्रीहरि की आराधना करो, उससे तुम्हारा मंगल होगा।

दैत्य— तब वही कीजिये। मैं आपका भोजन नहीं करूँगा।

तब पाट्टयोशी ने साथ-साथ कमण्डलु से जल लेकर उसमें अपने जीवन की एक एकादशी का पूर्ण फल मन्त्र उच्चारण करके ब्रह्मदैत्य को प्रदान किया। तुरन्त वह ब्रह्मदैत्य प्रेतयोनि त्यागकर एक दिव्य शरीर प्राप्त होकर पुनः-पुनः पाट्टयोशी को प्रणाम और प्रदक्षिणा करके आकाश मार्ग से उत्तर दिशा में चला गया। उसके बाद पाट्टयोशी सो गये। सुबह होने पर गाँव वालों ने आकर देखा कि पाट्टयोशी कमरे में दरवाजा बन्द कर चुपचाप पड़े हैं। यह देखकर लोगों ने सोचा कि पूर्व घटना के अनुसार वह मर गया है। लोगों की आवाज से पाट्टयोशी की नींद छूट गई और उठकर जब बैठा तो लोग भयभीत होकर भूत-भूत चिल्लाकर भागने लगे। तब पाट्टयोशी ने बाहर आकर सबको बुलाया और पूँछा कि आप सब किसलिए भागते हो? तब गाँव वालों ने पूर्व घटना सुनाई। हम सबने सोचा कि आपकी भी वही हालत हो गयी है, इसलिए हम सब भाग रहे हैं। यह सुनकर पाट्टयोशी ने रात की सारी कथा सुनाई और कहा कि उस ब्रह्मदैत्य का उद्धार हो गया है। आप सब उस ब्रह्मदैत्य के भय से हमेशा के लिए मुक्त हो गये। यह सुनकर सभी लोगों ने लज्जा, श्रद्धा एवं भक्ति से उनके चरण पकड़े और बार-बार प्रणाम करके क्षमा प्रार्थना की।

सन् १९२४ श्रीमद्भक्तिप्रदीप तीर्थ महाराज एवं अन्यान्य संन्यासी और ब्रह्मचारियों को साथ लेकर उड़ीसा गंजाम जिला में श्रीलप्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर के श्रीमन्महाप्रभु की वाणी प्रचार करते समय पाट्टयोशी ने श्रीलप्रभुपाद के दिव्य दर्शन और मुखारविन्द से अत्यन्त तेजस्वी हरिकथा सुनकर एवं अन्यान्य संन्यासियों के द्वारा कथा सुनकर उनके हृदय में गौड़ीय मठ के प्रति अत्यन्त श्रद्धा एवं भक्तिभाव जाग्रत हुआ। सन् १९३२ कलकत्ता से श्रीलप्रभुपाद के साथ नौका से गंगा पार कर पाट्टयोशी श्रीधाम मायापुर पहुँचे। कुछ दिन श्रीचैतन्यमठ में रहकर गौरलीला स्थान दर्शन और श्रीलप्रभुपाद से हरिकथा सुनकर उनके चरणों में आश्रय लेकर उनसे श्रीहरिनाम ग्रहण की तथा श्रीचैतन्य मठ की सेवा में आत्म समर्पण किया।

पाँच-छह महिना वाद एक दिन श्रील प्रभुपाद के चरणों में साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करके निवेदन किया कि आप मुझे एकान्त में हरिकथा सुनाइये। यह सुनकर श्रील प्रभुपाद ने थोड़ी दूर बगीचा में काम करते हुये श्रीरामदास प्रभु की ओर अंगुलि दिखाकर कहा कि- मैं इतनी अधिक हरिकथा नहीं जानता हूँ, आप उनके पास जाइये वे बहुत सुन्दर हरिकथा कीर्त्तन करते हैं। यह सुनकर वे बगीचा में काम करने वाले श्रीपाद रामदास प्रभु के पास गये और श्रीलप्रभुपाद का निर्देश सुनाया एवं हरिकथा कीर्त्तन के लिए निवेदन किया। श्रीपाद रामदास प्रभु ने यह सुनकर आश्चर्य पूर्वक कहा ये क्या कहते हो आप? मैं तो एक अक्षर भी पढ़ा नहीं हूँ, कैसे आपको हरिकथा सुनाऊँ। हरिकथा तो श्रील प्रभुपाद ही जानते हैं, मेरे पास क्यों आये? आप गुरुदेव के पास जाओ वे ही हरिकथा सुनायेंगे। यह सुनकर पाट्टयोशी ने कहा— तब प्रभुपाद ने क्या मुझसे झूठ कहा? तुरन्त रामदास प्रभु ने कहा—नहीं-नहीं, प्रभुपाद ने कभी झूठ नहीं बोल सकते, उन्होंने ठीक ही कहा है। उस समय श्रीलप्रभुपाद अपने कृपाशक्ति द्वारा श्रीरामदास प्रभु के हृदय में तत्व के साथ सम्पूर्ण ज्ञान प्रकाशित कर दिया। तब आइये हम दोनों इस फूलों की पैड़ के छाया मे बैठकर कथा करूँगा। श्रीरामदास प्रभु ने अत्यन्त विह्वल अवस्था में रो-रोकर हरिकथा सुनाई, कथा सुनते-सुनते अपराह्न ४ बजे से रात्रि के ७-८ बज गये वहीं बगीचा में बैठकर हरिकथा सुनाते रहे। कथा सुनते-सुनते इतना मुग्ध हुये, आँखो में आँसू बहाकर पाट्टयोशी ने श्रीपाद रामदास प्रभु के चरण में लुण्ठित हो गये। उस दिन का घटना जीवन भर पाट्टयोशी कहते रहे कि, उस दिन मैंने श्रीलप्रभुपाद के निर्देश से श्रीपाद रामदास प्रभु के पास इतनी सुन्दर हरिकथा सुनी थी कि आज तक ऐसी हरिकथा प्रभुपाद को छोड़कर किसी अन्य के पास नहीं सुनी। श्रीरामदास प्रभु के पास हरिकथा सुनकर बहुत आनन्द हुआ। पाट्टयोशी ने जब प्रभुपाद के चरणों में यह निवेदन किया, श्रीलप्रभुपाद ने विचार किया कि इसने ठीक वैष्णव पहचाना। इनका हृदय में सामान्यतम कुल और पाण्डित्य का जो अहंकार था, अब सारा अहंकार लुप्त हो गया। तब श्रीलप्रभुपाद ने इनके प्रति सन्तुष्ट हृदय से बहुत कृपा पूर्वक १ मार्च, सन् १९३४ फाल्गुन श्रीगौर पूर्णिमा के दिन एकसाथ वैदिक वाधान के अनुसार कृष्णमन्त्र वैष्णवी दीक्षा एवं त्रिदण्ड संन्यास प्रदान करके श्रीमद्भक्तिगौरव वैखानस महाराज नाम से विभूषित किये। संन्यास के बाद श्रीलप्रभुपाद की इच्छा पूर्ति के लिए श्रीचैतन्य मठ की सेवा में बहुत से गौड़ीय ग्रन्थ प्रकाशित किये और हमेशा के लिए श्रीलप्रभुपाद के पास रहकर संस्कृत में श्रीमन्महाप्रभु की कथा प्रचार करते रहे।

एक समय श्रील प्रभुपाद ने समस्त शिष्यों को एकत्रित करके कहा कि—आप सब मिलकर मुझे एकलक्ष धन भिक्षा में दीजिये। यह सुनकर सब मिलकर सौ, दो सौ, पाँच सौ हजार इस प्रकार अर्थ संग्रह करके प्रभुपाद को देने लगे, सात दिन बाद देखा कि प्रभुपाद को सन्तोष नहीं है। तब सब ने मिलकर सलाह की कि श्रीलप्रभुपाद को किस कारण सन्तोष नहीं हुआ एवं प्रभुपाद हम सबसे वास्तव में क्या चाहते हैं? तब श्रीलभक्तिगौरव वैखानस महाराज ने कहा कि—एक काम करें, हम सब दो-दो व्यक्ति करके कोलकाता के एक एक चौके पर खड़े होकर चिल्ला-चिल्लाकर श्रीमन्महाप्रभु की कथा, श्रीलप्रभुपाद की कथा, कलियुग का धर्म एकमात्र हरिनाम संकीर्तन है एवं मनुष्य जन्म का कर्त्तव्य क्या है यह सुनाते रहेंगे, सुन्दर रूप से समझाते रहेंगे। आलोचना सभा में इनका परामर्श सुनकर सबको बहुत आनन्द हुआ। जैसी आलोचना हुई वैसा ही काम शुरू कर दिया। इन सबके मुख से इस प्रकार हरिकथा सुनकर तीन-चार दिन बाद धीरे-धीरे करके दो-चार लोग प्रत्येक दिन आने लगे और श्रीलप्रभुपाद का चरण आश्रय कर हरिनाम-दीक्षा ग्रहण करने लगे। कुछ दिन बाद श्रीलप्रभुपाद ने इन सबसे पूँछा कि—ऐसा तो कभी नहीं देखा। प्रत्येक दिन दो-चार लोग आकर हरिनाम लेकर जाते हैं, यह कैसे सम्भव होता है? तब इन सबने पूरी कहानी सुनाई। यह सुनकर श्रील प्रभुपाद ने कहा—मैंने आप सबके पास जो लक्ष धन भिक्षा माँगा था वह आज पूर्ण हुआ। आप सबने यह भिक्षा दान देकर आज मुझे धन्य कर दिया।

श्रीलप्रभुपाद की इच्छा से उड़िसा भंजनगर में ब्रह्ममाध्व गौड़ाय मठ स्थापित हुआ एवं उसी समय से वहाँ श्रीगौरवाणी का प्रचार कार्य होता रहा। एकदिन श्रीलप्रभुपाद ने पत्र लिखा कि, श्रीधामपुरी पुरुषोत्तम मठ में एकमाह दो सौ भक्तों को लेकर कार्त्तिक व्रत पालन करेंगे, प्रतिदिन पाठ-कीर्तन और इन सभी के प्रसाद पाने की उत्तम व्यवस्था हो यह मेरी इच्छा है। यह जानकर श्रीमद्भक्तिगौरव वैखानस महाराज बहुत आनन्दित हुये और चिन्तित हो गये। एक माह तक इतनी बड़ी व्यवस्था कैसे सम्भव होगी। तब श्रीलगुरुपादपद्म का स्मरण करके दूसरे दिन सुबह अपने बंधुवर पुरीधाम के भक्तप्रवर श्रीपाद परमानन्द साहू को श्रीलप्रभुपाद की इच्छा निवेदन की एवं सब आलोचना की। उन्होंने यह सुनकर परम आनन्द पूर्वक कहा, आप प्रभुपाद की इच्छानुसार सारी व्यवस्था कीजिये समय पर मैं सबकुछ भेज दूँगा। यह हम सबके लिए बहुत सौभाग्य की बात है। श्रीलप्रभुपाद के पुरीधाम पहुँचने के पहले ही सारी व्यवस्था हो गई, यह देखकर प्रभुपाद ने आश्चर्य पूर्वक सन्तोष प्राप्त किया एवं श्रील महाराज को बहुत आशीर्वाद दिया।

एक समय आन्ध्रप्रदेश सिकाकुलम जिला के मंजूषा गाँव की एक बड़ी ब्राह्मण-वैष्णव सभा में सभापति के रूप से बहुत सम्मान पूर्वक श्रीलवैखानस महाराज को आसन प्रदान किया। सभा में निर्धारित विषय को छोड़कर ब्राह्मणों के समस्त प्रश्न-तर्क, सिद्धान्त को खण्डित कर शास्त्रानुसार एवं विशुद्ध वैष्णव सिद्धान्तानुसार ब्रह्मा, नारद आदि परम्परानुगत कृष्णनाम-कृष्णमन्त्र दीक्षा प्राप्त वैष्णव ही वास्तविक रूप से ब्राह्मण हैं यह सिद्धान्त स्थापन किया। यह देखकर ब्राह्मणों ने असन्तोष पूर्वक दोबारा सभा का आयोजन किया और सभा में ब्राह्मण के पक्ष से चिकिटी राजपुरोहित को सभापति के रूप से सम्मानित किया। उन्होंने श्रीलमहाराज को असम्मान पूर्वक वैष्णव के श्रेष्ठत्व को छोटा करके ब्राह्मण के श्रेष्ठत्व को स्थापन करने की चेष्टा की। इसमें श्रीलमहाराज एक घण्टा तक जो कुछ प्रश्न करते रहे चिकिटी राजपुरोहित केवल मा, मा, मा, शब्द छोड़कर और कुछ बोल नहीं सके एवं उनके प्राण निकलने तक की अवस्था हो गयी। यह देखकर सभा के सभी लोगों से जैसे लज्जित, अपमानित हुआ, वैसे ही विपदापन्न हो पड़ा। तब श्रीलमहाराज ने श्रीलप्रभुपाद को स्मरण करके विभिन्न शास्त्र युक्ति एवं सिद्धान्त के साथ बहुत समय तक भाषण देकर सिद्ध किया कि ब्रह्मज्ञ ब्राह्मण मात्र ही अर्थात् भगवत उपासना करने वाले ही विशुद्ध वैष्णव हैं। इस प्रकार समस्त शास्त्र समन्वित सिद्धान्त अनुसार वैष्णव व विष्णुभक्त का सर्व श्रेष्ठत्व स्थापन किया। यह सुनकर सभा के सभी लोगों ने श्रीलमहाराज को बहुत सम्मान पूर्वक पुनः-पुनः जयध्वनि के साथ पुष्पमाला से विभूषित कर पूजन किया।

श्रीलप्रभुपाद के अन्तर्धान होने के बाद श्रीलमहाराज बहरमपुर में रहकर भजन करने लगे। श्रीलमहाराज जी का शिष्य करहे की बिलकुल इच्छा नहीं था। सन् १९५० में पहले श्रीसोमनाथ साहू, राममोहन पट्टनायक को हरिनाम कृष्णमन्त्र दीक्षा प्रदान कर चार-पाँच शिष्य किया। उसके बाद सन् १९५९ में गौञ्ज नगर में रहकर भजन किये एवं एक मठ स्थापना करके श्रीगुरु-गौरांग राधानयनमणि विग्रन प्रतिष्ठा कर नित्य सेवा प्रकाशित किये। गौञ्ज नगर में मठ के पास एक को शिष्य किये उनके नाम श्रीपाद कृष्णदास प्रभु, और इनके एक पाँच वर्ष आयु पोता को भी श्रीलमहाराज से हरिनाम दिया हुआ। वह पोता आखीर में श्रीमद्भक्तिवैभव पुरी गोस्वामी महाराज से दीक्षा और त्रिदण्ड सन्यास लेकर श्रीपाद आश्रम महाराज नाम से परिचित हुये। श्रीमद्भक्तिदयित माधव गोस्वामी महाराज, श्रीपाद नित्यानन्द प्रभु, श्रीपाद कृष्णदास प्रभु एवं धराकोट के राजपुरोहित श्रीपाद आनन्दलीलामय प्रभु आदि इन सबको लेकर उड़ीसा राज्य में अविराम हरिकथा का प्रचार किया। इनके पास परमाराध्यतम श्रीमद्भक्तिदयित माधव महाराज, भक्तिप्रमोद पुरी महाराज, भक्तिवैभव पुरी महाराज, भक्तिसौध आश्रम महाराज, भक्तिशरण साधु महाराज बहुत से गुरुभ्राताओं ने त्रिदण्ड संन्यास ग्रहण किया। वे हमेशा समस्त गुरुभ्राताओं को मठ मन्दिर एवं श्रीविग्रह प्रकाश करके शिष्य करने और श्रीमन्महाप्रभु एवं श्रीलप्रभुपाद की कथा प्रचार करने के लिए परम उत्साह प्रदान करते थे।

एक समय श्रीलमहाराज ने अत्यन्त अस्वस्थ लीला प्रकाश कर अपने गुरुभ्राता श्रीपाद कृष्णदास प्रभु से कहा—मुझे वृन्दावन ले चलो, मैं वृन्दावन जाऊँगा। ठीक उसी समय श्रीधाम वृन्दावन से श्रीपाद आनन्दलीलामय प्रभु श्रील महाराज के श्रीचरण दर्शन के लिये गौंजनगर आश्रम पर पहुँचे। तब श्रीपाद कृष्णदास प्रभु ने उनसे कहा—श्रील महाराज वृन्दावन जाने के लिए अत्यन्त व्याकुल हो रहे हैं इसका उपाय क्या किया जाये? आप शीघ्र ही व्यवस्था कीजिये। तब श्रीपाद आनन्दलीलामय प्रभु ने एक दिन सुबह तैयार होकर श्रील महाराज से कहा—महाराज चलिये वृन्दावन चलें। यह कहकर श्रीलमहाराज को पकड़ कर आश्रम से बाहर लाये कुछ दूर तक आकर सम्मुख में एक जलाशय दिखाकर कहा महाराज हम सब वृन्दावन पहुँच गये। ये देखिये यमुना। फिर कुछ दूर जाकर दो तालाब दिखाकर कहा महाराज ये देखिये राधाकुण्ड और श्यामकुण्ड। एक पर्वत दिखाकर कहा, ये देखिये गिरिगोवर्धन पर्वत। यह सुनकर श्रीलमहाराज ने अप्राकृत भाव से विभावित होकर जो देखा उसी को भक्ति पूर्वक गद्गद होकर प्रणाम किया और कहा वाह! वाह! हम दोनों इतने शीघ्र ही वृन्दावन पहुँच गये? आनन्दलीलामय प्रभु! आप साथ आये थे इसलिए आप की कृपा से संसार छोड़कर जाने के समय मुझे श्रीश्रीराधाकृष्ण की दिव्य लीलास्थली श्रीधाम वृन्दावन के दर्शन हो गये। मेरी और कुछ भी अभिलाषा नहीं। अब आनन्द पूर्वक अपने स्थान पर जा सकेंगे।

वन देखि भ्रम हय एइ वृन्दावन।
शैल देखि मने हय एइ गोवर्धन।।
याँहा नदी देखे ताँहा मानये कालिन्दी।
महाप्रेमावेशे नाचे प्रभु पड़े कान्दि।।

इस प्रकार वृन्दावन दर्शन के दो दिन बाद जनवरी, सन् १९६६, १३६० बंगाब्द २२, माघ शुक्ला प्रतिपद, श्रवण नक्षत्र मध्याह्न समय ८५ वर्ष की आयु में गौंजनगर आश्रम में अन्तर्धान लीला प्रकाश कर नित्य गोलोकलीला में प्रवेश किया। श्रीलमहाराज जी के अन्तर्धान के पश्चात् श्रील भक्तिगौरव वैखानस गोस्वामी महाराज से हरिनाम प्राप्त श्रीपाद कृष्णदास प्रभु के पोता ने श्रीमद्भक्तिवैभव पुरी गोस्वामी महाराज जी से दीक्षा और त्रिदण्ड संन्यास ग्रहण करके श्रीपाद आश्रम महाराज वह गौंजनगर की आश्रम का सेवा रक्षा करते हैं।