नित्यलीला प्रविष्ट ॐ विष्णुपाद परिव्राजकाचार्य त्रिदण्डिस्वामी १०८श्री श्रीमद्भक्तिकेवल औडुलोमि गोस्वामी महाराज

प्रणाम
नमो ॐ विष्णुपादाय प्रभुपाद प्रियात्मने।
श्रीद्भक्तिकेवल औड्डुलोमीति नामिने ।।
श्रीगौरधाम संसेवा विधानोत्साहदायिने ।
श्रीविनोद सरस्वती धारा संरक्षिणे नमः ।।
गौर गोविन्द सद्भक्ति प्रचाराचार मोदिने।
नृत्य संकीर्त्तनोल्लासिन्नमस्ते प्रभवे नमः ।।
श्रीलमहाराज पूर्वबंग वरिशाल जिलान्तर्गत वानरीपाड़ा ग्राम में पिता श्रीशरत चन्द्र गुह ठकुरता एवं माता श्रीभुवनमोहिनी देवी का आश्रय लेकर सन् १८९५, १३०२ बंगाब्द २८ अग्रहायन कृष्णाष्टमी तिथि में आविर्भूत हुये। माता-पिता द्वारा दिया हुआ नाम श्रीप्रमोद विहारी था। बाल्यावस्था से बहुत शान्त, सरल, मौनी, कवित्वशक्ति इत्यादि बहुत सद्गुणों से विभूषित थे। १८ वर्ष की आयु में उन्होंने श्रीलप्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर के चरणों का दर्शन किया एवं कृपाभिषिक्त होकर हरिनाम प्राप्त किया। श्रीलभक्तिविनोद ठाकुर के भी श्रीचरण दर्शन का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ। सन् १९१९ में विश्वविद्यालय की बी. ए. डिग्री परीक्षा में उत्तीर्ण होकर काशी जाकर दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया।
कुछ दिन तक शिक्षक की नौकरी भी की थी। गान्धी जी के स्वदेशी आन्दोलन में काम किया। लेकिन इन सभी विषय में अति नश्वरता अनित्यता उपलब्धि कर श्रीलगुरुपादपद्म प्रभुपाद के चरणों में एकान्त रूप से आश्रय लेकर कृष्णमन्त्र दीक्षा प्राप्त कर श्रीपाद पतितपावन दास ब्रह्मचारी नाम से परिचित हुये। ब्रह्मचारी रूप से गुरु-वैष्णव-भगवान् की सेवा, पाठ-कीर्त्तन, भिक्षा, श्रीविग्रह अर्चन एवं अन्यान्य प्रचारकों के साथ श्रीचैतन्यवाणी का प्रचार कार्य इत्यादि मठ की सारी सेवा की। यह देखकर श्रीलप्रभुपाद ने अत्यन्त सन्तुष्ट होकर सन् १९३३ में श्रीब्रजमण्डल परिक्रमा के समय श्रीपाद पतितपावन ब्रह्मचारी को श्रीमथुरा धाम में त्रिदण्ड संन्यास मन्त्र दीक्षा प्रदान की। संन्यास ग्रहण कर त्रिदण्डिस्वामी भक्तिकेवल औड्डुलोमि महाराज के नाम से आप समस्त वैष्णव समाज में परिचित हुये।
१ जनवरी, सन् १९३७ को जगद्गुरु श्रीलप्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर ने अप्रकट लीला प्रकाश की। उस समय कलकत्ता बागबाजार श्रीगौड़ीय मठ के आचार्य श्रीमद्भक्तिप्रसाद पुरी गोस्वामी महाराज के निर्देशानुसार सन् १९४० से सात वर्ष तक श्रीधाम नवद्वीप मण्डल परिक्रमा का बृहद् दायित्व ग्रहण कर गुरु-वैष्णव-भगवान् और श्रीधाम की सेवा की। सन् १९४३ में श्रीगौड़ीय मिशन की परिचर्या परिषद के सदस्य के रूप में निर्वाचित हुये। भक्तिग्रन्थ प्रचार, ग्रन्थ लेखन एवं श्रील भक्तिविनोद ठाकुर के श्रीचैतन्य शिक्षामृत ग्रन्थ का अंग्रेजी में अनुवाद किया। कुछ वर्ष तक पूर्वबंग ढाका, मयमनसिंह, नारायण गंज एवं भारत के बहुत से स्थानों पर श्रीमन्महाप्रभु की वाणी का प्रचार किया। १६ फरवरी, सन् १९५४ श्रील भक्तिकेवल औड्डुलोमि महाराज श्रीगौड़ीय मिशन के सभापति एवं आचार्य के रूप से निर्वाचित हुये। इनकी विशेष चेष्टा से मेदिनीपुर जिला में श्रीभागवत भजनानन्द मठ का नया मन्दिर, नाट्यमन्दिर, सेवक खण्ड और भजन कुटीर का निर्माण हुआ। श्रीधाम वृन्दावन किशोर पुरा में श्रीकृष्णचैतन्य मठ के श्रीमन्दिर, नाट्यमन्दिर और सेवक खण्ड आदि का निर्माण हुआ। श्रीब्रजमण्डल परिक्रमा में प्रतिवर्ष बहुत से यात्रियों को लेकर परिक्रमा करके लोगों का बहुत कल्याण किया। सन् १९५७ में श्रीनवद्वीप धाम के अन्तर्गत कीर्त्तनाख्य गोद्रुम द्वीप में नया मठ, श्रीमन्दिर, नाट्यमन्दिर, सेवक खण्ड, यात्रीनिवास आदि निर्माण हुआ। पुरी जिलान्तर्गत आलालनाथ में श्रीब्रह्म गौड़ीय मठ का नया मन्दिर, नाट्य मन्दिर, सेवक खण्ड और लक्ष्मी शहर में नया मन्दिर, नाट्यमन्दिर, सेवक खण्ड आदि का निर्माण किया। ६ जनवरी, सन् १९८२ को श्रीगोद्रुम धाम में एकादशी तिथि की रात्रि में श्रीमद्भक्तिकेवल औडुलोमि महाराज ने नित्यलीला में प्रवेश किया।