शुभ कर्म गौण उपाय हैं जबकि हरिनाम मुख्य उपाय है

अतएव उपाय द्विविध गुणधाम।
गौणोपाय शुभकर्म, मुख्योपाय नाम ।।

अतएव शास्त्रे यत अन्य शुभकर्म।
नामसह नहे एइ सर्वशास्त्रमर्म ।।

सरल हृदये यबे कृष्णनाम गाय।
अतीन्द्रियसुख आसि’ चित्तके नाचाय ।।

सेइ सुख कृष्णनामस्वभाव – तत्पर ।
आत्मरति आत्मक्रीड़ा नाहि यार ‘पर ।।

ब्रह्मज्ञाने योगे ये – आनन्द – वैभव ।
जड़ेर विच्छेद-सुख छाया अनुभव ।।

अभेद्य कैवल्यसुख स्वल्प बलि’ जानि।
कृष्णनामानन्दसुख भूमा बलि’ मानि ।।

उपाय दो प्रकार के होते हैं- गौण उपाय एवं मुख्य उपाय। गौण उपाय शुभकर्म हैं और मुख्य उपाय भगवान का नाम है। शास्त्रों में जितने भी प्रकार के शुभ कर्मों का वर्णन पाया जाता है उनमें से कोई भी हरिनाम के समान नहीं हो सकता। यही सब शास्त्रों का मर्म है। सरल हृदय से जब कोई श्रीकृष्ण – नाम का कीर्तन करता है तब दिव्य आनन्द प्रकट होकर उसके चित्त को आनन्द से विभोर कराके उससे नृत्य कराता है। श्रीकृष्ण नाम का ऐसा चमत्कारिक स्वभाव है कि ये साधक को ऐसी आत्म रति व आत्मक्रीड़ा प्रदान करता है कि जिस आनन्द के ऊपर और कुछ होता ही नहीं। ब्रह्मज्ञान और योग में जो आनन्द है, वह तो बहुत थोड़ा है क्योंकि वह तो केवल मात्र इस दुनियाँ के दुःखों से छुटकारा मात्र है। अथवा ये भी कहा जा सकता है कि ब्रह्मज्ञान व योग में तो उस परम आनन्द की मात्र छाया है जबकि श्रीकृष्ण नाम में जो सुख है, वह असीम है।

श्रीहरिनाम चिन्तामणि
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भागवत पारमहंसी संहिता है

अनर्थोपशमं साक्षाद्भक्तियोगमधोक्षजे ।
लोकस्याजानतो विद्वांश्चक्रे सात्वत संहिताम् ॥
यस्यां वै श्रूयमाणायां कृष्णे परमपुरुषे ।
भक्तिरुत्पद्यते पुंसः शोकमोहभयापहा ॥

(श्रीमद्भागवत १/७/६-७)

अनर्थोकी शान्तिका साक्षात् साधन है- इन्द्रिय ज्ञानसे अतीत केवल भगवान्‌का अविरल भक्तियोग। परन्तु संसारके लोग इस बातको नहीं जानते। यही समझकर उन्होंने इस परमहंसोंकी संहिता श्रीमद्भागवतकी रचना की। इसके श्रवणमात्रसे पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके प्रति परम प्रेममयी भक्ति हो जाती है, जिससे जीवके शोक, मोह और भय नष्ट होकर भक्तिका उदय हो जाता है ।
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भागवत – अधोक्षज मूर्तविग्रह है

पादौ यदीयौ प्रथमद्वितीयौ तृतीयतुर्यौ कथितौ यदूरू नाभिस्तथा पञ्चम एव षष्ठौ भुजान्तरं दोर्युगलं तथान्यौ।
कण्ठस्तु राजन्नवमो यदीयो मुखारविन्दं दशमः प्रफुल्लम् एकादशो यस्य ललाटपट्ट शिरोऽपि तु द्वादश एव भाति ॥
तमादिदेवं करुणानिधानं तमालवर्ण सुहितावतारम् ।
अपारसंसार-समुद्र-सेतुं भजामहे भागवत-स्वरूपम् ॥

(पद्म-पुराण)

अपार संसार-सागर पार होनेके लिए सेतु-स्वरूप आदिदेव, करुणा-निधान, तमालवर्ण श्रीकृष्णके मङ्गलमय शाब्दिक अवतार श्रीमद्भागवतका मैं भजन करता हूँ। इस ग्रन्थावतारके द्वादश स्कन्ध द्वादश अङ्ग स्वरूप हैं। प्रथम और द्वितीय स्कन्ध इनके युगलपाद हैं, तृतीय और चतुर्थ स्कन्ध इनकी जंघाएँ हैं, पञ्चम इनका नाभिदेश है, षष्ठ स्कन्ध इनका भुजान्तर अर्थात् वक्षःस्थल है। सप्तम और अष्टम ये दोनों इनके युगल बाहु हैं, दशम स्कन्ध इनका प्रफुल्ल मुख पद्मस्वरूप है, एकादश स्कन्ध इनका ललाटदेश एवं द्वादश स्कन्ध इनका मस्तक है ।
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अहं वेद्मि शुको वेत्ति व्यासो वेत्ति न वेत्ति वा।
भक्त्या भागवतं ग्राह्यं न बुद्धया न च टीकया ॥

(चै. च. म. २४/३१३ संख्योद्धृत प्राचीनकृत श्लोक)

महादेव कहने लगे-श्रीमद्भागवतका तात्पर्य मैं जानता हूँ, शुक जानते हैं, व्यास जानते हैं अथवा नहीं- इसमें सन्देह है। एकमात्र भक्ति द्वारा ही भागवत का रहस्य समझा जाता है; बुद्धि अथवा टीका द्वारा नहीं ॥
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भागवत क्रय-विक्रयकी वस्तु नहीं है

मौन-व्रत-श्रुत-तपोऽध्ययनं स्वधर्म-व्याख्या-रहो जप समाधय आपवर्याः ।
प्रायः परं पुरुष ते त्वजितेन्द्रियाणां वार्ता भवन्त्युत न वात्र तु दाम्भिकानाम् ॥

(श्रीमद्भागवत ७/९/४६)

मोक्षके दस साधन प्रसिद्ध हैं- मौन, व्रत, पाण्डित्य, तपस्या, स्वाध्याय, स्वधर्म पालन, शास्त्रोंकी व्याख्या, एकान्त सेवन, जप और समाधि। परन्तु गोदास अर्थात् जिनकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं, उनके लिए ये सब इन्द्रियोंके भोग एवं जीविकाके साधन-व्यापार मात्र रह जाते हैं अर्थात् ग्राम्यवार्तासे विरति, व्रत, पाण्डित्य, भागवतादि शास्त्र व्याख्या आदि द्वारा गोस्वामीगण कृष्णेन्द्रियोंका तोषण करते हैं और जिनकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं ऐसे इन्द्रियपरायण व्यक्ति इन सबके द्वारा अपना और अपने परिवार स्त्री-पुत्रोंकी इन्द्रिय तर्पण करनेकी चेष्टा करते हैं।
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अवैष्णव-मुखोद्‌गीर्ण पूतं हरिकथामृतम् ।
श्रवणं नैव कर्तव्यं सर्वोच्छिष्टं यथा पयः ॥

(पद्मपुराण)

दूध अत्यन्त पवित्र वस्तु है, उसको पीनेसे तुष्टि, पुष्टि और क्षुधाकी निवृत्ति होती है, किन्तु ऐसा उत्कृष्ट दूध भी सर्पका उच्छिष्ट होनेपर वह जिस प्रकार दूधकी क्रिया न कर विषकी क्रिया ही करता है उसी प्रकार शुद्ध वैष्णवोंके मुखसे निःसृत पवित्र हरिकथामृतका पान करनेसे जीवकी भक्तिवृत्तिका प्रकाश होता है, किन्तु नामापराधी अवैष्णव व्यक्तिके मुखसे निसृत हरिकथा बाहरसे तो हरिकथाके समान दीखती है, परन्तु वह नामापराध मात्र है। इस प्रकारका ‘नामापराध’ सुनना कदाचित् कर्तव्य नहीं है। उसको सुनकर मंगल होना तो दूर रहे, सर्प द्वारा झूठे किये दूधकी भाँति उसके द्वारा जीवका अमंगल ही होता है।
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