शुभकर्म के उपाय

जड़द्रव्य काल हय निरानन्दमय।
कौशले जीवेर ताहे क्रमसिद्धि हय ।।

अतएव शुभकर्म सकलइ उपाय ।।
उपेय चरमसिद्धि प्रेमरूपे भाय ।।

सर्व शुभकर्म सिद्धि विलम्बे उदय।
उपेय उपाये व्यवधानहेतु हय ।।।

जड़ीय द्रव्य और जड़ीय काल आनन्द से रहित होते हैं परन्तु बद्धजीव इन जड़ीय वस्तुओं के बिना नहीं रह पाता। उसकी तमाम क्रियाओं में तथा चिन्ता में जड़ीय – भाव अवश्य ही विद्यमान रहता है किन्तु इस जड़ीय वस्तुओं तथा जड़ीय काल में रहते हुये जड़ातीत शुद्ध भक्ति की खोज करना ही कर्म आदि की कुशलता है। अतः क्रमानुसार देखा जाये तो सभी शुभ – कर्म जीव के प्रयोजन भगवद् – प्रेम के उपाय ही हैं लेकिन इस मार्ग से जीव को भगवद् – भक्ति व भगवद् – प्रेम बहुत विलम्ब से मिलता है क्योंकि यहाँ पर उपाय तो दुनियावी है, जो कि जड़ है व उपेय भगवद् प्रेम है, जोकि पूर्णतया चेतन है। अतः शुभकर्मों के द्वारा भगवद् – प्रेम की प्राप्ति में होने वाले विलम्ब का कारण कर्मों का जड़ होना और भगवद् – प्रेम का दिव्य होना है।

साधनकाल में हरिनाम किस प्रकार उपाय है?

हरिनाम ए जगते दिले कृपा करि’।
सिद्धि लाभे शिष्ट जीव लइवेक बरि’ ।।

उपाय हइल नाम शास्त्रेर सम्मत ।
अन्य शुभकर्ममध्ये हइल गणित ।।

सर्वेश्वर विष्णु येन ब्रह्मा – शिवसने ।
देवता – लक्षणे गण्य हइल त्रिभुवने ।।

हे प्रभु! आपने विशेष कृपा करके जगत्वासियों को हरिनाम प्रदान किया इसलिए अपना मंगल चाहने वाले जीव, कृष्ण- प्रेम रूपी सिद्धि को प्राप्त करने के लिए हरिनाम का ही आश्रय लेते हैं। शास्त्रों के मतानुसार हरिनाम ही कृष्ण – प्रेम प्राप्ति का उपाय है इसलिए इसे दूसरे दूसरे सुकर्मों के साथ गिना गया है; ठीक उसी प्रकार जैसे सर्वेश्वर भगवान श्रीविष्णु जी की ब्रह्मा जी एवं शिवजी के साथ इस त्रिभुवन में देवता के रूप में गणना की जाती है।

श्रीहरिनाम चिन्तामणि
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