श्रद्धाहीन व्यक्ति को हरिनाम देने का फल
इहा ना करिया यिनि देन नामधन ।
सेइ अपराधे ताँ’र नरके पतन ।।
नाम पेये शिष्यकरे नाम – अपराध।
ताहाते गुरुर हय भक्तिरसबाध ।।
एइ नाम अपराधे मुँहे शिष्य गुरु।
नरकेते याय एइ अपराध उरू ।।
पापियों की पापमय बुद्धि को खत्म न करके तथा उनके हृदय में भगवद् – नाम के प्रति श्रद्धा उत्पन्न न करके जो व्यक्ति उन्हें हरिनाम – धन प्रदान करता है, उसका इसी अपराध से पतन हो जाता है। श्रद्धाहीन शिष्य हरिनाम प्राप्त करके नामापराध करता है, जिससे गुरु की भक्ति रस प्राप्ति में बाधा पहुँचती है। इस नाम अपराध के कारण गुरु और शिष्य, दोनों ही नरक में जाते हैं।
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जो नामकीर्तन करते हैं, उनका समस्त प्रकार से मंगल होता है । तब एक बात है – जो नामकीर्तन करेंगे, पहले उनको श्रवण करने की आवश्यकता है । श्रीकृष्णनाम – संकीर्तन ही साधन-शिरोमणि है । श्रीनामभजन में जीव की सर्वसिद्धि होती है । साधुसंग में नामकीर्तन के अतिरिक्त हमारा अन्य कोई कार्य नहीं है । श्रीमद्भागवत का प्रतिपाद्य विषय – श्रीनामसंकीर्तन है । जो मुक्त हो चुके हैं, उनके लिए भी नामसंकीर्तन के अतिरिक्त अन्य कर्तव्य नहीं है । जो मन्त्र उच्चारणकारी हैं, वे अपने को श्रीनाम के चरणकमलों में अर्पण करते हैं। जिस दिन मन्त्रसिद्धि होती है, उसी दिन से उसके मुख में सब समय हरिनाम नृत्य करने लगते हैं । जो कृष्णकीर्तन करते हैं, ऐसे मठवासी भक्तों की सेवा से विमुख होकर भजन का अभिनय करने पर मंगल नहीं होगा । श्रीमद्भागवत – पाठ गृहस्थ एवं मठवासी सभी के लिए आवश्यक है ।
प्रभुपाद
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परम कल्याणकी चेष्टा करना जीवमात्र का कर्त्तव्य है-
लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः ।
तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु यावत् निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात् ॥
(श्रीमद्भागवत ११/९/२९)
अनेक जन्मोंके बाद यह मानव जन्म प्राप्त हुआ है, इसलिए यह अत्यन्त दुर्लभ है। यह जन्म अनित्य होनेपर भी परमार्थप्रद है। अतः बुद्धिमान् व्यक्ति मृत्यु से पूर्व ही क्षणमात्रका विलम्ब किये बिना चरम कल्याणके लिए चेष्टा. करे ।
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