इस अपराध से छुटकारा प्राप्ति का उपाय
प्रमादे यद्यपि नाम-उपदेश हय।
श्रद्धाहीने तबे गुरु पाय महाभय ।।
वैष्णव – समाजे ताहा करि’ विज्ञापन।
सेइ दुष्ट – शिष्यत्याग करे महाजन ।।
ताहा ना करिले गुरू अपराधक्रमे ।
भक्तिहीन दुराचार हय मायाभ्रमे ।।
अतएव प्रभु या रे आदेश करिले।
नाम प्रचारिते तारे एइ आज्ञा दिले ।।
असावधानीवश श्रद्धाहीन व्यक्ति को हरिनाम दे दिया जाये तो उससे गुरु के पतन का डर बना रहता है। ऐसी अवस्था में गुरु को चाहिए कि वह वैष्णव – समाज में जाकर श्रद्धाहीन को हरिनाम देने के बारे में बताये और उस दुष्ट – शिष्य को त्याग दे। ऐसा नहीं करने से इसी अपराध के कारण धीरे-धीरे वह गुरु भक्तिहीन और दुराचारी होकर माया के जाल में फंस जाता है।
श्रीचैतन्य महाप्रभु जी को श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि हे प्रभु! आपने हरिनाम का प्रचार करने वाले भक्तों को यही आदेश दिया है कि श्रद्धावान व्यक्ति को ही श्रीहरिनाम का उपदेश प्रदान करें तथा गाँव गाँव व शहर – शहर में श्रीहरिनाम की महिमा का प्रचार करें। उच्च नाम संकीर्तन के द्वारा श्रीकृष्ण नाम के प्रति श्रद्धा का प्रचार करें।
श्रीहरिनाम चिन्तामणि
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