श्रद्धाहीन व्यक्ति यदि हरिनाम के लिए प्रार्थना करे तो उससे किस प्रकार का व्यवहार करना उचित है
श्रद्धा – विरहित जन शठता करिया।
हरिनाम मांगे वैष्णवेर काछे गिया ।।
ताहार वन्चना – वाक्य बुझि साधुजन।
हरिनाम नाहि देन तारे कदाचन ।।
साधु बले ओहे भाइ, शाठ्य परिहर।
प्रतिष्ठाशा दूरे राखि’ नामे श्रद्धा कर ।।
नामे श्रद्धा हैले नाम अनायासे पा’वे।
नामेर प्रभावे ए संसारे तरे या ‘वे ।।
यतदिन नाहि तव नामे श्रद्धा भाइ।
नाम लैते तोमार त’ अधिकार नाइ ।।
श्रीनाममाहात्म्य साधुशास्त्र – मुखे शुन ।
प्रतिष्ठाशा छाड़ि’ दैन्य करह ग्रहण ।।
नामे श्रद्धा ह’ले तबे गुरुमहाजन ।
नाम अर्पिवेन भाइ, नाम महाधन ।।
श्रद्धाहीनजने अर्थ – लोभे नाम दिया।
नरकेते याय नामापराधे मजिया ।।
श्रद्धाहीन व्यक्ति यदि कपटता करके वैष्णवों के पास जाकर हरिनाम माँगते हैं तो उनके धूर्ततापूर्ण वाक्यों को साधु पुरुष समझ लेते हैं और उन्हें कभी भी हरिनाम नहीं देते। साधु उन्हें बड़े स्नेह से कहते हैं कि तुम कपटता छोड़ दो तथा प्रतिष्ठा की आशा को भी छोड़कर हरिनाम में श्रद्धा करो। हरिनाम में श्रद्धा होने से अनायास ही तुम्हें हरिनाम मिल जायेगा और हरिनाम के प्रभाव से तुम इस संसार से पार हो जाओगे परन्तु जब तक तुम्हारी हरिनाम में श्रद्धा नहीं होती तब तक तुम्हारा हरिनाम लेने का कोई अधिकार ही नहीं है। तुम शुद्ध भक्तों के मुख से शास्त्रों में वर्णित हरिनाम की महिमा श्रवण करो तथा प्रतिष्ठा की आशा छोड़कर दीनता को अपनाओ। जब तुम्हारी नाम में श्रद्धा हो जायेगी, तभी हरिनाम रूपी महाधन के धनी, श्रील गुरुदेव, तुम्हें हरिनाम रूपी महाधन प्रदान करेंगे।
श्रीहरिनाम चिन्तामणि
___ _ _ _ _ _ _ _ _ __
(सुत गोस्वामी ने नैमिष्यारण्य के मुनीयों से कहा)
२-४-१५
यत्कीर्तनं यत्स्मरणं यदीक्षणं यद्वन्दनं यच्छ्रवणं यदर्हणम् ।
लोकस्य सद्यो विधुनोति कल्मषं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः ।।
मैं उन सर्वमंगलमय भगवान् श्रीकृष्ण को सादर नमस्कार करता हूँ जिनके यशोगान, स्मरण, दर्शन, वन्दन, श्रवण तथा पूजन से पाप करनेवाले के सारे पाप-फुल तुरन्त धुल जाते हैं।
_____________
(ध्रुव महाराज ने श्री भगवान से कहा)
४-९-१०
या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्म ध्यानाद्भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् ।
सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किं त्वन्तकासिलुलितात्पततां विमानात् ।।
हे भगवन् ! आपके चरणकमलों के ध्यान से या शुद्ध भक्तों से आपकी महिमा का श्रवण करने से जो दिव्य आनन्द प्राप्त होता है वह उस ब्रह्मानन्द अवस्था से बढकर है जिसमें मनुष्य अपने को निर्गुण ब्रह्म से तदाकार सोचता है। चूँकि ब्रह्मानन्द भी भक्ती से मिलनेवाले दिव्य आनन्द से परास्त हो जाता है, अतः उस क्षणिक आनन्दमयता का, जिसमें कोई स्वर्ग तक पहुँच जाय, क्या कहना, जो कालरूपी तलवार के द्वारा विनष्ट हो जाता है ? भले ही कोई स्वर्ग तक क्यों न उठ जाय, कालक्रम में वह नीचे गिर जाता है।
____________________
(श्री शुकदेव स्वामीने महाराज परीक्षित से कहा)
६-१६-१८/१९
ॐ नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय धीमहि ।
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः संकर्षणाय च ।।
नमो विज्ञानमात्राय परमानन्दमूर्तये ।
आत्मारामाय शान्ताय निवृत्तद्वैतदृष्टये ।।
नारद ने चित्रकेतु को निम्नलिखित मन्त्र प्रदान किया। ॐकार (प्रणव) नाम से सम्बोधित किये जाने वाले हे ईश्वर, हे श्रीभगवान् मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे भगवान वासुदेव ! मैं आप का ध्यान करता हूँ। हे भगवान् प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा संकर्षण ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे दिव्य शक्ती के आगार, हे परमानन्द ! मैं आत्मनिर्भर (आत्माराम) तथा परम शान्त आपको नमस्कार करता हूँ। हे परम सत्य, अद्वितीय ! आप ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् रूप में जाने जाते है, अतः आप समस्त ज्ञान के भंडार है। मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
__________________
श्री ईशोपनिषद्
ईश-स्तुति
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥१८॥
हे अग्नि के समान शक्तीशाली भगवान्, हे सर्वशक्तिमान ! अब मैं आपको नमस्कार करता हूँ और आपके चरणों पर दण्डवत् प्रणाम करता हूँ। हे भगवान्! आप अपने तक पहुँचने के लिए मुझे सही मार्ग पर ले चले और चूँकि आप मेरे द्वारा भूतकाल में किया गया सब कुछ जानते हैं अतएव मुझे विगत पापों के फलों से मुक्त किजिए जिससे मेरी प्रगती में कोई अवरोध न आए।
________________