श्रद्धाहीन व्यक्ति को हरिनाम देने से नाम-अपराध होता है
श्रद्धा नाहि जन्मे या’र, हरिनाम तारे।
साधुजन नाहि देन वैष्णव आचारे ।।
श्रद्धाहीनजन यदि हरिनाम पाय।
अवज्ञा करिवे मात्र सर्वशास्त्रे गाय ।।
शूकरके दिले रत्न से चूर्ण करिवे।
वानरके दिले वस्त्र छिड़ियां फेलिवे ।।
श्रद्धाहीन पेये नाम अपराधे मरे।
संगे संगे गुरुके अभक्त शीघ्र करे ।।
वैष्णवों के आचरण के अनुसार उस व्यक्ति को हरिनाम – दीक्षा प्रदान नहीं की जाती, जिनकी भगवान के नाम के प्रति श्रद्धा न हो। श्रद्धाहीन – व्यक्ति यदि हरिनाम – दीक्षा प्राप्त कर लेते हैं तो वह अवश्य ही हरिनाम के प्रति अवज्ञा करेंगे, ऐसा शास्त्रों में कहा गया है। जिस प्रकार सूअर को रत्न देने से वह उसे तोड़-फोड़ देगा, बन्दर को वस्त्र देने से वह उसे फाड़ देगा, उसी प्रकार श्रद्धाहीन – व्यक्ति नाम को प्राप्त करके खुद अपराधी बन जाता है और साथ ही अपने गुरु को भी शीघ्र ही अभक्त बना देता है।
श्रीहरिनाम चिन्तामणि
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नारद पञ्चरात्र
आराधितो यदि हरिस्तपसा ततः किं नाराधितो यदि हरिस्तपसा ततः किम् ।
अन्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा ततः किं नान्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा ततः किंम् ।।
यदि कोई भगवान् हरी की पूजा करता है, तो फिर बाह्य तपस्या करने से क्या लाभ ? और यदि कोई भगवान हरि को नहीं पूजता तो ऐसी तपस्या उसे बचा नहीं सकती। यदि कोई यह समझ लेता है कि हरि अन्दर तथा बाहर सर्वव्यापक है, तो फिर तपस्या करने की आवश्यकता क्या है? और यदि कोई यह नहीं समझ सकता कि हरि सर्वव्यापक है, तो उसकी सारी तपस्या व्यर्थ है।
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श्रील प्रबोधानन्द सरस्वती विरचित
चैतन्य चन्द्रोदय
अचैतन्यमिदं विश्वं यदि चैतन्यमीश्वरम् ।
न विदुः सर्वशास्त्रज्ञा ह्यपि भ्राम्यन्ति ते जनाः ।।
यह भौतिक संसार कृष्णभावनामृत विहीन है। श्री चैतन्य महाप्रभु साक्षात् कृष्णभावनामृत हैं। अतएव यदि कोई विद्वान् या विज्ञानी श्री चैतन्य प्रभु को नहीं समझता तो समझिये की वह इस जगत में व्यर्थ घूम रहा है।