धूर्त व्यक्ति के द्वारा हरिनाम के बलबूते पर पाप करना मर्कट वैराग्य ही है

शास्त्रे शुनियाछे, नाम यत पाप हरे।
कोटि जन्मे महापापी करिते ना पारे ।।

पन्चविध पाप, महापातक अवधि।
नामाभासे याय, शास्त्र गाय निरवधि ।।

सेइत भरसा करि’ प्रवन्चक जन।
शठता करिया नाम करये ग्रहण ।।

कष्टेर संसार छाड़ि’ वैरागीर वेशे।
कनक – कामिनी आशे फिरे देशे देशे ।।

तुमि त’ बलेछे प्रभु मर्कट – वैरागी।
कामिनी सम्भाषि’ फिरे धर्म गृहत्यागी ।।

श्रील हरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि मैंने शास्त्रों से सुना है कि भगवान का एक नाम जितने पापों को धो सकता है उतने पाप कोई महापापी करोड़ों जन्मों में भी नहीं कर सकता। घर में मसाला पीसते हुए, झाडू-पोचा लगाते हुए तथा रसोई बनाने के लिए आग जलाते हुए इत्त्यादि तरीकों से कीड़े-मकोड़ों के अनजाने में भी मर जाने से जो पाँच तरह के पाप लगते हैं तथा दुनिया के महापाप भी नामाभास मात्र से दूर हो जाते हैं। परन्तु शास्त्रों के इन वाक्यों के बलबूते पर धोखेबाज लोग हरिनाम करने का ढोंग करते हैं। गृहस्थी के झंझटों से बचने के लिए वे वैरागी का वेश धारण करके दौलत और कामिनी की लालसा से जर्जरित होकर देश विदेश में घूमते रहते हैं।

श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि हे प्रभु! आपने ही तो कहा था कि जो मर्कट – वैराग्य करता है अर्थात् वह व्यक्ति जो गृहत्यागी होते हुये भी स्त्रियों के संग सम्भाषण करता है अर्थात् उनसे अश्लील मज़ाक करता है, उसका वैराग्य – वेश सिर्फ दिखावे के लिए ही होता है।

श्रीहरिनाम चिन्तामणि

_ _ _ _ _ _ _ _ _ _

(शिवजीने पार्वतीदेवी से कहा)

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनामभिस्तुल्यं रामनाम वरानने ।।

मैं राम, राम, राम नाम का कीर्तन करता हूँ और इस सुन्दर ध्वनि का आनन्द लुटती हूँ। रामचन्द्र का यह नाम भगवान् विष्णु के एक सहस्र नामों के तुल्य है।
(उत्तरखण्ड ७२-३३५)

(शिवजीने पार्वतीदेवी से कहा)

आराधनानां सर्वेषां विष्णोराराधनं परम् ।
तस्मात् परतरं देवि तदीयानां समर्चनम् ।।

हे देवी! यद्यपी वेदों में देवताओं की पूजा की संस्तुती की गई हैं, लेकिन भगवान् विष्णु की पूजा सर्वोपरि है। किन्तु विष्णु की सेवा से भी बढकर है उन वैष्णों की सेवा जो भगवान् विष्णु से सम्बन्धित हैं।

_ _ _ _ _ _ _ _

महाभारत
(शान्तिपर्व ४७-९१)

एकोऽपि कृष्णस्य कृतः प्रणामो दशाश्वमेधावभृथेन तुल्यः ।
दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय ।।

भगवान् श्रीकृष्ण को किया हुआ एक प्रणाम भी दस अश्वमेघ के समान है, उनमें भी दस अश्वमेघ करनेवाला तो फिर जन्म लेता हैं, किन्तु श्रीकृष्ण को प्रणाम करनेवाला फिर जन्म नहीं लेता।

_ _ _ _ _ _ _ _ _