श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

ब्राह्मण बालक द्वारा महाराज परीक्षित को शाप

तुलयाम लवेनापि न स्वर्ग नापुनर्भवम्।
भगवद्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिषः ॥13॥
(1/18/13)

तुलयाम के साथ तुलना करना; लवेन क्षण मात्र से; अपि भी; न कभी नहीं; स्वर्गम् = स्वर्गलोक; न=न तो; अपुनः भवम् = पदार्थ से मोक्ष; भगवत्-सङ्गिः भगवद्भक्त; सङ्गस्य = संगति का; मर्त्यानाम् मरनेवालों का; किम् क्या रखा है; उत कहने में; आशिषः सांसारिक आशीर्वाद, वर।

अनुवाद – भगवद्भक्त के साथ क्षण भर की संगति के महत्व की तुलना न तो स्वर्गलोक की प्राप्ति से, न पदार्थ से मुक्ति की प्राप्ति से की जा सकती है। उन सांसारिक वरदानों के विषय में क्या कहा जाय जो भौतिक सम्पत्ति के रूप में होते हैं और मर्यों के लिए हैं?

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अवशेनापि यन्नाम्नि कीर्तिते सर्वपातकैः ।
पुमान विमुच्यते सद्यः सिंहत्रस्तैर्मृगैरिव ।।

यदी कोई असहायावस्था में भी या बिना इच्छा के ही पवित्र नाम का कीर्तन करता है तो उसके सारे पाप तुरन्त भाग जाते है जिस तरह सिंह की गर्जना वन के छोटे पशुओं को भय के मारे भागने के लिए बाध्य करती है।

गरुड पुराण

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श्रीचैतन्य महाप्रभु

धनी अवस्था में कृपापात्र राजा प्रताप रुद्र

श्रीजगन्नाथ जी के रथ के आगे महाप्रभु जी ने सात पार्टियों में अपने सात रूप बनाकर प्रत्येक पार्टी में खूब नृत्य कीर्तन किया । नृत्य कीर्तन करने के बाद श्रीमन् महाप्रभु बलगण्डि नामक उपवन में विश्राम कर रहे थे कि उनको प्रेमावेश हो गया। उसी समय भक्तों की आज्ञा से राजा प्रताप रुद्र वैष्णव वेश में वहाँ अकेले उपस्थित होकर श्रीमन् महाप्रभु के पैर दबाते हुए श्रीमद्भागवत के ‘गोपी-गीत’ के एक श्लोक का पाठ करने लगे। राजा के मुख से श्रीमन् महाप्रभु जी ने तत्कालोचित भागवतीय श्लोक का पाठ सुनकर प्रेमाविष्ट हो राजा का आलिंगन किया। राजा की वैष्णव सेवा में निष्ठा देखकर महाप्रभु जी ने राजा को विषयी न जानकर वैष्णव सेवक समझा और उस पर कृपा की ।

(राजा प्रताप रुद्र जी ने महाप्रभु जी की कृपा प्राप्त करने के लिए पहले भी खूब चेष्टा की थी। उन्होने राजा होते हुए भी स्वयं जगन्नाथ जी के रथ के जाने के मार्ग को सोने की झाडू से साफ किया था और स्वयं ही सारे मार्ग के ऊपर चन्दन का जल छिड़का था।)

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चित्तं नैव निवर्त्तते क्षणमपि श्रीकृष्णपादाम्बुजात्,
निन्दन्तु प्रियबान्धवा गुरुजना गृह्णन्तु मच्यन्तु वा।
दुर्वादं परिघोषयन्तु मनुजा वंशे कलंकोऽस्तु वा,
तादृक् – प्रेमधरानुरागमधुना मत्ताय मानं तु मे ।।49।।

श्रीकृष्ण के चरणकमलों से मेरा मन क्षण काल के लिये भी दूर नहीं हो रहा है, इस कारण चाहे मेरे बन्धु – बान्धव, रिश्तेदार मेरी निन्दा ही क्यों न करें। मेरे गुरुजन मुझे अपनायें या त्याग ही क्यों न कर दें; लोग चाहे मेरे बारे में तरह-तरह की बातें बनाएँ, चाहे भगवद् – चरणों के अनुराग से मेरे वंश में कलंक ही क्यों न लग जाये, परन्तु आजकल ऐसे भगवान के प्रेम में ही मैं मस्त रहता हूं, ये ही मेरा सम्मान प्रदायक है।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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वैधीभक्तिका लक्षण

वैधभक्तजन भगवदनुशीलनको ही जीवनका प्रधान कार्य समझेंगे। उन्हें सदैव अनुकूल रूपमें भगवदनुशीलन करना चाहिए। वे किसी भय और द्वेषसे प्रेरित होकर उसका अनुशीलन नहीं करेंगे, बल्कि प्रीतिपूर्वक अनुशीलन करेंगे। इसीका नाम आनुकूल्य है। वर्णाश्रमधर्म द्वारा शरीर-यात्रा निर्वाह करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उस धर्मका मूल जो नीति है, वह नीति भगवदनुशीलनके ऊपर किसी प्रकारका प्रभुत्व न जमाने पावे, बल्कि नैतिक व्यवहारको भगवदनुशीलनके सेवक रूपमें रखेंगे। साथ ही आत्मा जड़ातीत और चिद्वस्तु है-ऐसी उपलब्धि करनके लिए जो ज्ञानालोचना की जाए, उसे भी भगवदनुशीलनके सेवकरूपमें रखेंगे, इन विचारोंको कभी भी अनुशीलन वृत्तिके ऊपर प्रभुत्व न करने देंगे। संसारमें जो भी कर्म करें या जो भी विचार करें, उनके द्वारा भक्तिकी उन्नति साधनके अतिरिक्त और कोई दूसरी अभिलाषा न करें। वैधभक्तोंका जीवन ऐसा ही होना चाहिए।

श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर

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बह्माण्ड भ्रमिते कोन भाग्यवान् जीव ।
गुरु – कृष्ण – प्रसादे पाय भक्तिलता-बीज ॥
माली हञा सेइ बीज करे आरोपण ।
श्रवण – कीर्तन -जले करये सेचन ।।

श्रीगुरुदेव के कीर्तन करने पर अन्य सभी श्रवण करते हैं। परन्तु आज के जगत में इसका उल्टा नियम हो गया है। किराये के कथावाचक और पाठक स्वयं श्रवण न करके अर्थात् शिष्य न होकर गुरु के आसन पर बैठकर स्वयं कीर्तन करने के लिए व्यस्त हो रहेहैं। श्रीगुरुदेव कौन सी वस्तु हैं एवं उनकी उपासना किस प्रकार होती है, यह जानना आवश्यक है। शास्त्र में कहा गया है –

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।
चक्षुरून्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।

श्रीगुरुदेव दिव्यज्ञानरूपी अञ्जन-शलाका के द्वारा हमारे अज्ञानान्ध चक्षुओं को उन्मीलित करते हैं। हमारी जड़ आँखों की बीमारी दूर होने पर हम foreign elements (बाह्य विषयों) के विचारों से मुक्त होते हैं। श्रीगुरु – वैष्णवों के पास केवलमात्र आ जाने पर ही सर्वसिद्धि हो गयी, ऐसा नहीं समझना चाहिए। पेड़ के नीचे आकर ही नारियल मिल गया, ऐसा सोचना झूठ है। पेड़ पर चढ़ना होगा और नारियल तोड़कर उससे छिलका उतारने पर गूदा और जल मिलेगा । गुरु-वैष्णवों के आनुगत्य में भजन और योग का मार्ग एक नहीं हैं। भक्तियोग के अतिरिक्त कोई सुविधा नहीं है। यदि केवल खान-पान किया एवं वेदान्त और न्याय आदि पढ़ा, तो उससे सुविधा नहीं होगी। न्यायशास्त्र और वेदान्त के निर्विशेषत्व आदि में पाण्डित्य प्राप्तकर वैकुण्ठ-लोक में नहीं जा सकते । सद्‌गुरु के चरणों का आश्रय लेकर हरिभजन करने से ही मंगल होता है।

श्रीलप्रभुपाद

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धन-सम्पत्ति का उद्देश्य माधव की सेवा

(परम) गुर महाराज के आश्रित पंजाब निवासी श्रीइन्द्र कुमार कनाडा में औषधि की दुकान खोलकर वहीं पर वास करते थे। एक बार जब वह भारत आए तो अपने साथ कनाडा से एक सोने की जेब में रखने वाली घड़ी (पॉकेट-वॉच) गुरु महाराज के लिए लेकर आए। जब उन्होंने गुरु महाराज को उपहार बॉक्स के भीतर बन्द घड़ी दी, तब तो उन्होंने उस उपहार बॉक्स को बिना खोले अपने पास रख लिया किन्तु बाद में जब उसे खोल कर देखने पर सोने से निर्मित घड़ी मिली तब गुरु महाराज ने मुझे बुलाया तथा घड़ी दिखलाई एवं श्रीइन्द्र कुमार को बुलाकर लाने के लिए कहा। मैं जब श्रीइन्द्र कुमार को बुलाकर ले आया तब गुरु महाराज ने उनसे कहा, “मैं आपके द्वारा प्रदत्त इस घड़ी को किसी भी अवस्था में उपयोग में नहीं ले सकता। साथ ही इसे अन्य किसी मठवासी को भी उपयोग करने हेतु नहीं दे सकता। कारण, कलि के स्थान स्वर्ण आदि से निर्मित वस्तुओं का उपयोग करने से विषयों में आवेश होगा, इससे हरिभजन से छुटकारा हो सकता है। श्रील प्रभुपाद ने भी स्वरचित कीर्त्तन में हमें निर्देश दिया है- तोमार कनक, भोगेर जनक। कनकेर द्वारे सेवह माधव ॥ वैष्णव के [तुम्हारे पास जिस किसी उपाय से आने वाली धन-सम्पत्ति को अपनी मानने पर वह तुम्हारे भोग की जनक अर्थात् भोग-प्रवृत्ति को जागृत करने वाली बनेगी। अतएव यदि तुम्हें धन-सम्पत्ति की प्राप्ति हो तो उसे माधव अर्थात् लक्ष्मीपति की सेवा में ही लगाना।] “अतएव आप इस घड़ी को ले जाइए और इच्छा रहने पर आप इसे बेचकर ठाकुरजी के लिए कुछ बनाकर ले आ सकते हैं। इसके द्वारा आपकी ठाकुर सेवा हो जाएगी तथा हमें भी किसी प्रकार की दुविधा अथवा असमञ्जस में नहीं पड़ना पड़ेगा।”

श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी

श्रीमद भक्ति विज्ञान भारती गोस्वामी महाराज जी द्वारा शिक्षा प्रकाशित।

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परतत्त्वच की एकता के सम्बन्ध में श्रील प्रभुपाद की शिक्षा

परतत्त्व की चर्चा के सम्बन्ध में भी विचारधारा की विविधता है एवं उसके अनुसार परतत्त्व में विविधता देखी जाती है। किन्तु यहाँ सावधान होने की जरूरत है की ‘विचारधारा की विविधता के अनुसार परतत्त्व में विविधता’ इस कथन में परतत्त्व का बहुत्व (अर्थात् परतत्त्व बहुत सारे हैं) नहीं समझा जाता है। श्रील प्रभुपाद ने हमें बताया है कि, – वस्तु एक ही है; किन्तु एक वस्तु के सम्बन्ध में ही अनुभूति अलग-अलग होने पर मात्र उसकी विभिन्नता प्रकाशित होती है। जैसे कोई यदि हाथी को पीछे से देखता है तो उसने उसकी पूँछ और दो पैरों को देखकर ही अपने उस दर्शन के सम्बन्ध में बताया, और एक व्यक्ति ने हाथी को सामने से देखकर केवल उसकी सूँड और दोनों कानों को देखकर अपने उस दर्शन का अनुभव व्यक्त किया, तृतीय व्यक्ति ने हाथी के एक ओर से उसके विशाल शरीर मात्र का दर्शन कर हाथी का वर्णन कर डाला। अब यहाँ तीन लोगों के तीन प्रकार के वर्णनों से हाथी तीन प्रकार के नहीं हो गये। भले ही ग्रह उदाहरण सर्वांगसुन्दर नहीं है, फिर भी केवल इसका यही तात्पर्य है कि परतत्त्व की विभिन्न अनुभूतियों के वर्णन से उसका अनेकत्व नहीं समझा जायेगा, वह परतत्त्व एक ही है, ऐसा समझना होगा। श्रीव्यासदेव ने वेदान्त के भाष्यरूप में जो श्रीमद्भागवत को प्रकाशित किया है, उसमें परतत्त्व के सम्बन्ध में विभिन्न अनुभूतियाँ होने पर भी वे तत्त्वतः एक ही वस्तु हैं, यही प्रदर्शित किया है-

“वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम् ।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ।।”
(भाः 1/2/11)

इस श्लोक में ‘यज्ज्ञानमद्वयम्’ नाम का एक शब्द है। अर्थात् वह ‘परतत्त्व’ वस्तु – ‘अद्वयज्ञान’ स्वरूप है। ‘अद्वय’ कहने तर ‘भौतिक-भेद से रहित’ समझना होगा। इस भौतिक जगत में देह-देही का भेद, नाम-नामी का भेद, पुरुष-प्रकृति का भेद, अंश-अंशी का भेद आदि समस्त प्रकार के जो भेद देखे जाते हैं, उसके मूल में है अविद्या। ‘अद्वय’ वस्तु में इस प्रकार की अविद्या से जनित भेद का स्थान नहीं है। ‘अद्वय’ शब्द में द्वय या द्वितीय नहीं है ऐसा समझा जाता है। किन्तु इसका मतलब वे वास्तव में पूर्ण रूप से द्वितीय-रहित हैं, ऐसा नहीं है वे भौतिक स्थूल द्वितीय-रहित हैं, ऐसा ही समझना होगा। अर्थात् उस परतत्त्व का नाम-नामी अभेद है, देह-देही अभेद है, शक्ति-शक्तिमान अभेद है, अंश-अंशी अभेद है इसीलिए उन्हें ‘अद्वय’ कहा जाता है। नहीं तो परम दार्शनिक मनीषियों की विचारधारा में जो तारतम्य रहता है, उसकी उपयोगिता नहीं रहती। तत्त्ववस्तु पूर्ण है इसीलिए पूर्ण में अंश के अवस्थान को स्वीकार किया जाता है। यहाँ चूंकि अंश मायातीत है, अतः वह पूर्ण के समान है या कहा जा सकता है कि, वह पूर्ण की अभिव्यक्ति है। अतः ‘अंश’ तत्त्व को भी ‘पूर्ण’ के रूप में स्वीकार किया जाता है। इसीलिए शास्त्रीय युक्ति-रूप में देखा जाता है-“पूर्णस्य पूर्णामादाय पूर्णमेवावशिष्यते।” इस वैदिक युक्ति को स्वीकार नहीं करने पर नास्तिक होना पड़ेगा। ‘पूर्ण’ एक वस्तु है, उसे ‘तत्त्व’ भी कहा जा सकता है। इस ‘पूर्ण’ से पूर्ण को ग्रहण करने पर अवशिष्ट कुछ भी नहीं रहेगा ऐसा नहीं है। यहाँ अवशिष्ट भी पूर्ण ही रहता है। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि, ‘पूर्ण’ से पूर्ण को ग्रहण कौन करेगा? पूर्ण से पूर्ण का जो ग्राहक है, वह भी पूर्ण है। जो पूर्ण से पूर्ण को ग्रहण करते हैं, वे ‘पूर्ण’ को ही अवशिष्ट रखते हैं।

जगत में गणित शास्त्र में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है। गणित में ‘असीम’ (Infinity) के रूप में एक संख्या को माना जाता है। उस ‘असीम’ से ‘असीम’ को घटाने पर ‘असीम’ ही शेष रहता है। अतः प्राकृत वैज्ञानिक युक्ति में भी इस प्रकार की घटना को स्वीकार किया गया है। इसके अलावा लौकिक युक्ति में भी देखा जाता है कि, एक, प्रदीप से बहुत से प्रदीप प्रज्वलित करने पर भी मूल प्रदीप को कोई हानि नहीं होती है और जिन समस्त प्रदीपों को प्रज्वलित किया जाता है वे सब मूल प्रदीप से किसी भी प्रकार कम नहीं होते हैं। अतः वे सब प्रदीप का अंश होने के बावजूद पूर्ण और एक हैं। अतएव परतत्त्व एक ही है और अद्वय है। वे मात्र एकत्व को संरक्षित रखकर ही विविधता प्रकाशित करते हैं।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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जो दीक्षागुरु की सेवा को छोड़कर वैष्णवसेवा या शिक्षागुरु, नामगुरु के अधिक महिमा-महात्म्य का प्रचार करते हैं, उन्हें दुःसंग समझकर परित्याग करना होगा। गुरुसेवा और वैष्णक् सेवा एक ही तात्पर्यपर है।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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श्रीकृष्ण हमारे रक्षक व पालक हैं—अपने आराध्य में हमारा ऐसा दृढ़ विश्वास होना आवश्यक है।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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