श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा
विपदः सन्तु ताः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो ।
भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ।। 25।।
(1/8/25)
विपदः = विपत्तियाँ; सन्तु = हों; ताः सारी; शश्वत् पुनः पुनः; तत्र वहाँ; तत्र तथा वहाँ; जगत्-गुरो हे जगत के स्वामी; भवतः आपकी; दर्शनम् भेंट; यत जो; स्यात्-हो; अपुनः = फिर नहीं; भव-दर्शनम् जन्म-मृत्यु को बारम्बार देखना।
अनुवाद – मैं चाहती हूँ कि ये सारी विपत्तियाँ फिर-फिर आयें, जिससे हम आपका पुनः पुनः दर्शन कर सकें, क्योंकि आपके दर्शन का यह अर्थ है कि हमें बारम्बार जन्म-मृत्यु को नहीं देखना होगा।
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सहस्रनाम्नां पुण्यानां त्रिरावृत्त्या तु यत्फलम् ।
एकावृत्या तु कृष्णस्य नामैकं तत् प्रयच्छति ।।
विष्णु के सहस्र नामों को तीन बार उच्चारण करने से जो पुण्य मिलता है, वह कृष्ण के नाम का केवल एक बार उच्चारण करने से मिल जाता है।
ब्रह्माण्ड पुराण
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श्रीचैतन्य महाप्रभु

निर्धन अवस्था में कृपापात्र
श्रीधर एक गरीब ब्राह्मण था । वह सब्जी की दुकान कर किसी तरह से अपने जीवन की रक्षा करता था । एक बार जो केले का वृक्ष खरीद कर लाता या सब्जी लाता उसे ही बेचता था। उससे दिन भर में जो कमाई होती उसके आधे से श्रीगंगा जी को भोग लगाता था और आधे से ही अपने प्राणों की रक्षा करता था। वह महासत्यवादी था। इसलिए जो मूल्य एकबार कह देता फिर दूसरा नहीं कहता था । जो लोग इनकी सत्यवादिता को जानते थे वे बीच-बीच में इनसे ही सब्जी इत्त्यादि खरीदते थे ।
श्रीधर सारी रात उच्च स्वर से हरिनाम करते थे । भक्त वत्सल श्रीचैतन्य महाप्रभु भी प्रतिदिन भक्त श्रीधर की दुकान से केले के फूल, केले के थोर व केले इत्यादि मोल लाते थे, लेकिन प्रतिदिन अवश्य ही ३-४ घड़ी श्रीधर से बहाना बनाकर झगड़ते थे । कभी-कभी झगड़ने का
बहाना न देख प्रभु वस्तु का आधा दाम देकर, वस्तु उठाकर चलने लगते तो श्रीधर भी खड़ा हो जाता और महाप्रभु जी के हाथ से उक्त वस्तु छीनने लगता । इस प्रकार श्रीधर और प्रभु में खूब देर तक छीना-झपटी और ज़िद्दम – ज़िद्दी चलती रहती ।
प्रभु कहते – “क्यों भाई तपस्वी श्रीधर ! मुझे तो लगता है कि तेरे पास बहुत धन है। क्यों मेरे हाथ से ये केले इत्यादि-छीनते हो? मेरे दिये धन से ही तो तुम अच्छी वस्तु खरीद कर गंगा को चढ़ाते हो, फिर मेरे लिए थोड़े से दाम छोड़ दोगे तो क्या हो जाएगा ? अरे ! जिस गंगा की तुम पूजा करते हो मैं तो उसका बाप हूँ।” इतना सुनते ही श्रीधर अपने कानों के ऊपर हाथ रख लेता और महाप्रभु जी से कहने लगता कि बाबा मूल्य मत दो लेकिन इस प्रकार मत बोलो ।
श्रीधर से छीनकर लाये केले के पत्ते पर ही व उसके यहाँ से लाये साग के साथ ही महाप्रभु जी भात (चावल) खाते थे। ऐसा ही प्रभु का विधान है कि भक्त की वस्तु तो छीनकर भी खा लेते हैं परन्तु अभक्त की अच्छी – अच्छी करोड़ों वस्तुओं की और उलट कर भी नहीं देखते ।
एक दिन श्रीमन् महाप्रभु श्रीधर से बोले “श्रीधर ! देख ! मेरे रूप को ! यदि तू चाहे तो आठों सिद्धियों को मैं तेरी दासी बना दूँ क्योंकि मैं तेरी सेवा – निष्ठा से बहुत प्रसन्न हूँ”। महापुरुष श्रीधर ने सिर उठाया तो गौर विश्वम्भर को तमाल के सदृश श्याम रूप में दर्शन किया। उनके हाथ में वंशी है, दाहिनी ओर बलराम हैं, सामने चतुर्मुख- पंचमुख आदि देवतागण स्तुति कर रहे हैं, शीश के ऊपर महाफणों का छत्र दिखाई देता है और हाथ जोड़े सनकादि, नारद, शुकदेव स्तुति कर रहे हैं। ये सब देखते ही श्रीधर कृतार्थ हो गए व प्रेम से मूर्च्छित होकर गिर पड़े।
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नारायणाय नम इत्यमुमेव मन्त्रं, संसार – घोरविष – निर्हरणाय नित्यम्।
श्रृन्वन्तु भव्यमतयो यतयोऽनुरागा -दुच्चैस्तरामुपदिशाम्यऽमूर्ध्व बाहुः ।।48।।
हे समझदार, कुशलमति वाले मनुष्यो ! हे मुनिगण! मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर अनुराग से भरे अति ऊँचे स्वर में उपदेश कर रहा हूँ कि जन्म-मृत्यु-प्रवाहरूप भंयकर विष को यह मन्त्र ही आप विनाश करने के लिये ‘नारायणाय नमः’ प्रति दिन सुना करें।
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
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भक्ति का परिचय
उपरोक्त दोनों प्रकारकी भक्तिका जो साधारण लक्षण है, वह वैधीभक्तिमें भी लक्षित होता है। भक्तिका सामान्य लक्षण यह है कि जिससे भक्तिकी समृद्धि हो, ऐसी अभिलाषाओंके अतिरिक्त अन्यान्य प्रकारकी अभिलाषाओंसे रहित, ज्ञान और कर्म आदि द्वारा अनावृत, अनुकूल भावसे किए गए कृष्णानुशीलनको भक्ति कहते हैं। इसका अर्थ यह है कि अनुशीलन ही भक्तिका स्वरूप है। कर्ममार्गमें वर्णाश्रमधर्म-विचारके प्रसङ्गमें जिस ईश्वरनुशीलनका विवेचन हुआ है, वह नैतिक कार्यके अन्तर्गत एक व्यवहार मात्र है, वह भक्ति नहीं है, क्योंकि वहाँपर नीति ही प्रभु या प्रधान है और ईश्वरानुगत्यरूप वृत्ति वहाँ नीतिरूप प्रभुकी दासीके रूपमें अवस्थित है। ज्ञानमार्गमें जिस ब्रह्मका विचार किया जाएगा, उसका अनुशीलन शुष्क ज्ञानमय होता है। उसमें ज्ञान ही प्रभु और ईशानुगत्यरूप वृत्ति ही दासीस्वरूप है। अतएव वह भक्ति नहीं है। इस प्रकार हम देखते हैं कि एकमात्र भगवदनुशीलन ही भक्ति है। (९) यह अनुशीलन सर्वदा आनुकूल्य भावमय होना आवश्यक है। अनुशीलन प्रातिकूल्यमय भी हो सकता है, परन्तु प्रतिकूल अनुशीलन भक्ति नहीं है। तात्पर्य यह है कि जीवनको भक्तिके अनुकूल करके भक्तिका अनुशीलन करना चाहिए। संसारमें वर्त्तमान जीवोंके शरीर सम्बन्धजनित कर्म अनिवार्य हैं। साथ ही जड़ाजड़ सम्बन्धीय विचाररूप ज्ञान भी अनिवार्य हैं। परन्तु ये कर्म और ज्ञान जहाँ भगवदनुशीलनको आवृत कर देते हैं, वहाँ भक्तिकी सत्ता नहीं रहती, बल्कि जहाँपर ईशानुगत्यरूप वृत्ति कर्म और ज्ञानके ऊपर अपना प्रभुत्व स्थापित करती है, वहीं भक्तिकी सत्ता स्वीकार की जा सकती है।
श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर
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यदि सांसारिक प्रवृत्तियों को रोकने की व्यवस्था नहीं की जाती है, तब जीव को पुनः जन्म लेकर मृत्यु को स्वीकार करना होगा । इसीलिए इन्द्रिय – चालन को रोकने की आवश्यकता है। इन्द्रियों को न रोकने पर संसार – प्रवृत्ति नहीं जाएगी एवं दुःख भी दूर नहीं होगा। असल वस्तु का अनुसरण करना आवश्यक है; ऐसा करने पर संसार वासना रुक जाएगी, चतुर्वर्ग का प्रयास (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के लिए चेष्टा) नहीं रहेगा एवं सब कुछ मंगलमय हो जाएगा अर्थात् परम मंगल प्राप्त होगा ।
श्रीलप्रभुपाद
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प्रतिष्ठार स्वभाव एइ जगते विदित।
जे ना वाञ्छे, तार हय विधाता-निर्मित ॥
[यह सर्वविदित है कि विधाता के विधान से प्रतिष्ठा का स्वभाव कुछ ऐसा है कि जो इसकी कामना नहीं करता, यह उसी को प्राप्त होती है।] “मन-ही-मन में प्रतिष्ठा की कामना रखकर भजन करने वाले व्यक्ति को भी कभी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं होती। ‘जे चाहे से पाए ना, जे पाए से चाहे ना’ अर्थात् जो चाहता है उसे प्राप्त नहीं होती तथा जिसे प्राप्त होती है वह उसे चाहता नहीं यह उक्ति ही साधक के हृदय की भावना को मापने की कसौटी है। श्रील प्रभुपाद ने प्रतिष्ठाशा की तुलना बाघिनी से की है। बाघिनी अपने शिकार को जिस प्रकार बिना चबाए पूरा ही निगल जाती है, उसी प्रकार प्रतिष्ठा की कामना वास्तव में साधक के पारमार्थिक प्राणों अर्थात् शरणागति को पूर्णतया निगल जाती है अर्थात् साधक उच्छृङ्खल बनकर जीवन यापन करने लगता है। “निज मङ्गल के इच्छुक साधक को कनक, कामिनी तथा प्रतिष्ठा की आशा का दृढ़तापूर्वक त्याग करना चाहिए, उन्हें लेशमात्र भी प्रश्रय नहीं देना चाहिए, समादर नहीं करना चाहिए। कारण ये समस्त कामनाएँ अनित्य, अमङ्गल-स्वरूप तथा जीव की सेवा-प्रवृत्ति के सम्पूर्णतः विपरीत हैं। “प्रत्येक साधक को फल्गु-वैराग्य एवं युक्त-वैराग्य के मध्य अन्तर की समझ होनी चाहिए। स्मरण रखो, प्रत्येक उज्ज्वल वस्तु सोना नहीं होती।”
श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी
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ईश्वर-विरोधी चर्चा का तिरस्कार
आप सब बहुत से अभिभावक (guardian) यहाँ उपस्थित हैं। आप लोग अपने बच्चों की पुस्तकों को थोड़ा पढ़कर देखियेगा – उसमें ईश्वर की कोई बात ही नहीं है। रामचन्द्र, कृष्ण इत्यादि को इस प्रकार से वर्णित किया गया है मानो वे सामान्य मनुष्य ही थे। आप सब इन इतिहासकारों को महापाखण्डी समझें। उन्हें हम तुच्छ मानते हैं। दुख की बात है कि, विश्वविद्यालयों से भी इसी प्रकार के पाखण्डियों की पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं। आप सब प्रतिज्ञाबद्ध होकर कहिये “ईश्वर विरोधी किसी बात को नहीं सुनेंगे। पहले भगवान् की बात करो, फिर अन्य बात।” आप सबने त्याज्य पुत्र की बात सुनी है। शास्त्रों की चर्चा करें। प्रतिज्ञा करें कि, -प्रियतम पुत्र, प्रियतमा पत्नी की बात नहीं सुनूँगा, उनका संग नहीं करूँगा, यदि उनके संग से मुझे ईश्वर विमुख होना पड़ता है।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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वास्तव सत्य में प्रतिष्ठित नहीं होने के कारण ही मन में अच्छे-बुरे की अनुभूति
स्वप्न या सुषुप्ति (निद्रा) अवस्था में जो कुछ देखा जाता है और अनुभव होता है, सब के दो पहलु हैं। स्वप्न में अच्छा या बुरा-दोनों ही विषयों को देखा जाता है। जब तक मन अतीन्द्रिय अप्राकृत विषय में स्थिर नहीं होगा, तब तक अच्छे-बुरे दोनों विषय ही अनुभव होंगे। जब वास्तव सत्य में वह प्रतिष्ठित होता है, तब सदैव सत्-वस्तु का ही दर्शन और अनुभव होता है। तब ‘कु-विचार’ दूर हटकर, ‘सु-विचार’ स्वाभाविक रूप से हृदय में आकर प्रतिष्ठित हो जाता है। जागतिक सोच-विचार (धारा) में जब तक (आबद्ध) रहेंगे, तब तक अच्छे-बुरे का विचार अवश्य ही रहेगा; उससे परे निर्गुण अवस्था प्राप्त करने पर सभी विषयों में ही “गोरार आमार सब भाल” (मेरे गौरांग का सब कुछ अच्छा है) जैसा लगने लगता है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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If you go on speaking ill of others, your mind will become polluted. Your mind will only find the bad qualities of other persons, so what benefit will you gain? You should govern yourself, discipline yourself, and restrain yourself. You should rectify yourself.
Srila Bhakti Ballabh Tirtha Goswami Maharaj
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