श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च।
नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नमः ॥21॥
(1/8/21)
कृष्णाय भगवान् को; वासुदेवाय वसुदेव के पुत्र को; देवकी नन्दनाय देवकी के पुत्र को; च तथा; नन्द-गोप नन्द तथा ग्वालों के; कुमाराय पुत्र को; गोविन्दाय भगवान् को, जो इन्द्रियों तथा गौवों के प्राण हैं; नमः सादर नमस्कार; नमः = नमस्कार ।
अनुवाद – अतः मैं उन भगवान् को सादर नमस्कार करती हूँ, जो वसुदेव के पुत्र, देवकी के लाडले, नन्द तथा वृन्दावन के अन्य ग्वालों के बालक (लाल) एवं गौवों तथा इन्द्रियों के प्राण बनकर आये हैं।
* * * * * * * * * * * * * * * *
अर्चिते देवदेवेशे शंकचक्रगदाधरे ।
अर्चिताः सर्वदेवाः स्युर्यतः सर्वगतो हरिः ।॥
जब शंख, चक्र, गदा तथा पद्मधारी श्रीभगवान् की पूजा की जाती है तो अन्य सभी देवों की पूजा स्वतः हो जाती है, क्योंकि श्रीभगवान् हरि सर्वव्यापी हैं।
स्कन्द पुराण
* * * * * * * * * * * * * * * *
श्रीचैतन्य महाप्रभु

बुढ़ापे में कृपापात्र – सार्वभौम भट्टाचार्य
जब श्रीनित्यानन्द प्रभु जी ने महाप्रभु जी के दण्ड (सन्यास का चिन्ह) को तोड़ कर भार्गी नदी में फेंक दिया तो श्रीमन् महाप्रभु जी ने जगत को यह शिक्षा दी कि भगवान व उत्तम वैष्णवों के आत्मसंशोधन के लिए विधान की कोई आवश्यकता नहीं। सार्वभौम भट्टाचार्य पर कृपा करने के लिए ही श्रीमन् महाप्रभु सब भक्तों को पीछे छोड़ स्वयं जगन्नाथ जी के दर्शन के लिए अकेले दौड़ पड़े थे। जगन्नाथ जी के दर्शन करते ही श्रीमन् महाप्रभु को प्रेमावेश हो गया और मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। उनके दिव्य सन्यासी शरीर में प्रेम के अष्ट सात्विक विकार देखकर पुरी के राजपडित सार्वभौम भटट्राचार्य समझ गए कि यह कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं और उन्हें अपने घर ले आए ।
सार्वभौम ने जब सुना कि उक्त सन्यासी उनके पिता के दोस्त श्रीनीलाम्बर चक्रवर्ती का नाती है तो वे महाप्रभु जी को अपना निकट सम्बन्धी जानकर व महाप्रभु जी के नवयौवन को देख कर आकर्षित हो गए और गोपीनाथ आचार्य से कहने लगे “इसका अभी नवीन यौवन है जिसमें मन सदा चंचल होने की सम्भावना रहती है, इसलिए मैं इसे वेदान्त सुनाकर इसके हृदय में वैराग्य भर दूँगा तभी इसके सन्यास धर्म की रक्षा हो सकेगी”।
ये बात गोपीनाथ आचार्य को सहन नहीं हुई। उन्होंने सार्वभौम भट्टाचार्य को खूब भला बुरा कहा और उन्हें महाप्रभु जी के तत्व से अवगत कराना चाहा। उन्होंने कहा “भट्टाचार्य ! तुम इनकी महिमा नहीं जानते। इनमें तो भगवत्ता के लक्षणों की परम सीमा है अर्थात् इनमें समस्त भगवत् लक्षणों का पूर्ण विकास है। अतः वे परम ईश्वर या स्वयं भगवान हैं।”
परन्तु कुत्तकों से सार्वभौम का हृदय अत्यन्त कठोर हो चुका था इसलिए गोपीनाथ आचार्य की बातों से उनके हृदय पर कुछ भी असर नहीं हुआ । (क्योंकि निर्मल हृदय में ही भगवान व उनकी लीलाओं का आविर्भाव होता है)
गोपीनाथ आचार्य व सार्वभौम आपस में तर्कातर्की कर ही रहे थे कि परम कृपामय श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने सार्वभौम पर कृपा करने के लिए दोनों की बातों को काटते हुए सार्वभौम से कहा ‘आप तो जगत्गुरु हैं एवं सबके हितकारी हैं। मैं बालक सन्यासी हूँ, अपना भला बुरा भी नहीं जानता, आप मुझ पर कृपा करें । आप जो कहेंगे में वही करूँगा” । तत्पश्चात् सार्वभौम जी ने उन्हें एक सप्ताह तक वेदान्त श्रवण कराया। सार्वभौम जी ने देखा कि बालक सुनता तो है पर न मालूम कि इसकी समझ में भी कुछ आता है कि नहीं, क्योंकि ये ‘हाँ’ ‘ना’ कुछ भी नहीं बोलता है। आठवें दिन सार्वभौम जी ने कहा “आपने सात दिन तक वेदान्त सुना किन्तु आपने भला-बुरा कुछ नहीं कहा, चुप चाप बैठे रहते हो, आपने कुछ समझना भी कि नहीं।” श्रीमहाप्रभु जी ने कहा “मैं मूर्ख हूँ, कुछ पढ़ा लिखा नहीं हूँ, आपने सुनने के लिए बोला तो सुन रहा हूँ। हाँ, जहाँ तक समझने का सवाल है आप जो वेदान्त सूत्र पढ़ते हो उनका अर्थ तो मैं भली भाँति जान लेता हूँ पर आप जो व्याख्या करते हैं वो मेरी समझ में नहीं आती । आपकी व्याख्या सुनकर मुझे ऐसा लगता है जैसे आपका किया भाष्य वेदान्त सूत्रों के अर्थ को भी ढक लेता हो, उसी से मेरा मन चंचल हो उठता है।” श्रीमन् महाप्रभु जी का जवाब सुन कर सार्वभौम कुपित हो उठे और नाना प्रकार के तर्क करने लगे। सर्वज्ञ, भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने शास्त्रों के प्रमाण, विचारों और तर्कों के द्वारा सार्वभौम को परास्त कर दिया ।
इसके बाद श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य जी ने महाप्रभु जी से श्रीमद् भागवत के “आत्मारामश्च’ (भा० १-७-१०) श्लोक की व्याख्या सुनने की इच्छा की तो महाप्रभु जी ने पहले सार्वभौम जी को ही व्याख्या करने को कहा। सार्वभौम जी ने अपने अद्भुत पॉडित्य से उक्त श्लोक की नौ प्रकार से व्याख्या कर महाप्रभु जी को सुनाई। जब दर्पहारी श्रीमन् महाप्रभु जी ने सार्वभौम द्वारा की गई व्याख्या का एक अंश भी न लेकर अट्ठारह प्रकार की व्याख्या की तब सार्वभौम को गोपीनाथ आचार्य की बात स्मरण हो आयी कि ये सन्यासी स्वयं कृष्ण ही हैं और कोई नहीं। उन्हें आत्म ग्लानि होने लगी कि मैंने साक्षात् भगवान के आगे अपने पाँडित्य को आज़माना चाहा; ऐसा चिन्तन करते-करते उनकी आँखों से आँसू बह निकले। वह श्रीमन् चैतन्य महाप्रभु जी के चरणों में गिर पड़े और अपने आपको महान् अपराधी मानते हुए व अपनी निन्दा करते हुए उन्होंने महाप्रभु जी की शरण ग्रहण की। श्रीप्रभु जी का मन भी उन पर विशेष कृपा करने के लिए आतुर हो उठा । इसलिए महाप्रभु जी ने पहले उन्हें अपने चतुर्भुज नारायण स्वरूप के दर्शन कराये एवं फिर श्यामसुन्दर, मुरलीधारी रूप दिखाया । इस प्रकार कृपामय श्रीचैतन्य देव ने पुरी के राज पंडित, प्रसिद्ध नैयायिक जैसे कुतार्किक पर भी कृपा की। इसीलिए श्रीकृष्णदास गोस्वामी जी ने श्रीमन् महाप्रभु को अपने प्रणाम मन्त्र में कहा कि –
नौमि तं गौरचन्द्र य कुतर्क कर्कशाशयन्
सार्वभौम सर्वभूमा भक्तिभूमानमाचरत् ।।
(चै० च० म० 6/1)
अर्थात् कुतर्क के द्वारा जिनका हृदय कठोर हो चुका था ऐसे सार्वभौम भट्टाचार्य को जिन्होंने परम भक्ति सम्पन्न कर दिया, उन सर्वेश्वर गौरचन्द्र को मैं नमस्कार करता हूँ।
* * * * * * * * * * * * * * *
सत्यं ब्रवीमि मनुजाः स्वयमूर्ध्वबाहुर्यो
यो मुकुन्द नरसिंह जनार्दनेति ।
जीवो जपत्यनुदिनं मरणे रणे वा,
पाषाण – काष्ठ – सदृशायददात्यभीष्टम् ।।47।।
हे मानवो! मैं स्वयं दोनों हाथ ऊपर उठाकर इस सत्य बात की घोषणा कर रहा हूँ कि जो कोई भी जीव, हे मुकुन्द ! हे नारायण ! हे जनार्दन ऐसे नामों का प्रतिदिन अथवा मरने के समय या युद्ध के मैदान में ही क्यों न उच्चारण करे, वे भगवान श्रीहरि उसे उनकी अभीष्ट वस्तु को प्राप्त करा देते हैं; अर्थात् श्रीकृष्ण उसे अपना दिव्य प्रेम प्रदान करते हैं चाहे वह व्यक्ति पत्थर और लकड़ी के समान कठोर चित्त वाला ही क्यों न हो।
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
* * * * * * * * * * * * * * *
क्रमोन्नति-पथ
क्रमोन्नति-पथमें जीवका यह कर्त्तव्य है कि वह जिस किसी भी जीवनमें क्यों न अवस्थित हो, उस जीवनसे अधिक उच्च जीवनमें प्रवेश करनेके लिए विशेष प्रयत्न करें। स्वभावकी गतिमें ऐसा कोई कल्याणका बीज होता है, जिससे समयानुसार जीवकी स्वाभाविक रूपसे उच्चगति होती रहती है। परन्तु इसमें विघ्न बाधाएँ भी इतनी अधिक होती हैं कि अधिकांश क्षेत्रोंमें इच्छित फलकी प्राप्ति नहीं होती। इसलिए जो लोग उच्च गति चाहते हैं, उनको इन विघ्न-बाधाओंके प्रति सदैव जागरूक रहना चाहिए। एक जीवनसे दूसरे जीवनमें पदार्पण करते समय दो बातोंपर विशेष रूपसे विचार करना चाहिए। पहली बात यह है कि मैं जिस जीवनमें स्थित हैं, उसमें दृढ़तापूर्वक स्थित रहनेके लिए निष्ठाकी आवश्यकता है। दूसरी बात यह कि जिस जीवनमें मैं दृढ़ रूपसे प्रतिष्ठित हो चुका हूँ, उससे उच्च जीवनमें पदार्पण करनेके लिए पूर्वनिष्ठाका त्याग करनेके लिए एक पैर एक सोपानपर दृढ़तासे जमाकर निचले पैरको निचले सोपानसे उठाकर उच्चस्थ सोपानपर रखना होगा। एक सोपानगत निष्ठाका त्याग और दूसरी उच्च सोपानगत निष्ठाकी प्राप्ति एक ही समयमें होती है। अधिक जल्दबाजी करनेसे गिरनेका डर रहता है। साथ ही अधिक विलम्ब करनेसे फल प्राप्तिमें विलम्ब होता है। जीवको जंगली असभ्य जीवन, सभ्य जीवन, केवल नैतिक-जीवन, कल्पित सेश्वर-नैतिक जीवन, वास्तव सेश्वर-नैतिक जीवन और साधनभक्त-जीवन-इन सब सोपानोंको क्रमोन्नति-विधिके अनुसार क्रमशः पारकर प्रेममन्दिरमें जाना पड़ता है। किसी सोपानमें जल्दबाजी हो जानेपर विघ्न द्वारा नीचे गिरना पड़ता है। किसी सोपानमें विलम्ब होनेपर आलस्य आकर उन्नतिमें बाधा देता है। इसलिए अतिशीघ्रता और विलम्ब दोनोंको विघ्न समझकर आवश्यकताके अनुसार यथायोग्य निष्ठाको ग्रहण करके तथा अनुपयुक्त निष्ठाका त्यागकर जीवको क्रमशः ऊपर उठना पड़ेगा। कुछ लोग ऐसा दुःख प्रकाश करते हैं कि मुझे क्यों कृष्णभक्ति नहीं होती? परन्तु उनमें कृष्णभक्तिके सोपानपर चढ़नेके लिए उपयुक्त चेष्टाका अभाव देखा जाता है। वे लोग असभ्य अवस्था, सभ्यता, जड़ विज्ञान, निरीश्वर-नीति या सेश्वर-नीति-इनमेंसे किसी एकके प्रति आसक्त होकर वहीं रुक जाते हैं-उन्नतिके लिए चेष्टा नहीं करते। किसी एक सोपानमें आबद्ध रहनेपर या रुक जानेपर ऊपरवाले सोपानपर कैसे चढ़ा जा सकता है? अथवा राजप्रसादकी सबसे ऊपरी मंजिलमें कैसे पहुँचा जा सकता है? अनेक वैधभक्त भाव पानेके लिए चेष्टा नहीं करते, फिर भी भावके अभावमें प्रचुर दुःख प्रकाश किया करते हैं। अनेक वर्णाश्रमी लोग वर्ण-धर्मकी निष्ठाके प्रति इतने आसक्त हो पड़ते हैं कि उन्हें भाव और प्रेम आदिकी आवश्यकता प्रतीत ही नहीं होती और इसलिए वे भाव और प्रेम-प्राप्तिकी चेष्टाके प्रति सर्वथा उदासीन रहते हैं। इससे उनकी क्रमोन्नतिमें प्रचुर बाधा होती है। जिन लोगोंको सौभाग्यवश श्रीचैतन्य-शिक्षामृत मिल गया है, उनकी शीघ्रतासे उन्नति होती है। ऐसे सौभाग्यवान लोग इसी क्षुद्र जीवनमें ही सामान्य वर्णाश्रमधर्म निष्ठासे ऊपर उठकर निरुपाधिक प्रेमरत्नको सहज ही प्राप्त करते हैं। जो लोग क्रमोनति-विधिका ठीक-ठीक रूपमें पालन करते हैं, उनको अधिकांश रूपमें जन्मान्तरकी अपेक्षा नहीं रहती। इसके विपरीत जो लोग मरी हुई मछलीकी भाँति अपनी सत्ताको भाग्यके स्रोतमें विसर्जन कर देते हैं- भाग्यसे जैसा होगा-इसपर भरोसाकर स्वयं चेष्टारहित हो जाते हैं, वे इस अनन्त, अथाह और भयंकर भवसमुद्रमें बहते-बहते कभी समुद्रके ज्वारके साथ कुछ दूर आगे जाते हैं और कभी भाटेके साथ पीछेकी ओर बह जाते हैं। वे अभिलषित स्थानपर शायद ही कभी पहुँच सकें।
श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर
* * * * * * * * * * * * * * * *
किसका संग करणीय है ?
हमारे गुरुवर्ग कर्म और ज्ञान को ठग का धर्म कहते हैं । इसलिए कर्म के पथ और ज्ञान के पथ का परित्याग कर भक्ति का पथ ही हमारा एकमात्र अनुसरणीय पथ है। जो लोग उसी पथ के पथिक हैं, उन भक्तों का संग ही हमारे लिए आवश्यक है। अपने से श्रेष्ठ भक्त का संग ही करणीय है। चैतन्य के मनोभीष्ट – संस्थापक श्रीरूप की चरणधूल ही हमारी एकमात्र आकांक्षा की वस्तु है । भक्तसंग द्वारा ही भक्ति होती है। कर्मी, ज्ञानी और योगी ये सभी अभक्त एवं स्व-पर- वञ्चक हैं। इसलिए इनका संग परित्यज्य है। शुद्धभक्त के संग के अतिरिक्त अन्य का संग अमंगलजनक है ।
श्रीलप्रभुपाद
* * * * * * * * * * * * * * * *

जो लोग कहते हैं कि हम धर्म नहीं मानते, वे भुलेखे में हैं। क्योंकि मनुष्य की बात छोड़ो, दुनियाँ में एक भी प्राणी नहीं है जो धर्म को नहीं मानता हो। डिक्शनरी के अनुसार धर्म शब्द का एक अर्थ होता है-“स्वभाव”। सभी प्राणी अपने शरीर के स्वभावानुसार कार्य करते हैं। अतः वे शरीर के धर्म को मानते हैं। इसके अलावा अपने मन की प्रवृति के अनुसार मनुष्य चलता है। इससे पता चलता है कि वह मनोधर्म को भी मानता है। अतः मैं धर्म नहीं मानता हूँ, ये बोलना बिल्कुल फिजूल बात है। देह और मन के कारण के रूप में आत्मा रहती है। आत्मा के रहने से ही देह व मन की चेतनता है। वास्तविकता यह है कि ये देह व मन दोनों ही जड़ वस्तु हैं। इनमें इच्छा क्रिया व अनुभूति नहीं होती। श्रीमद् भगवद् गीता शास्त्र में शरीर व मन आदि को अपरा प्रकृति के अन्तर्गत कहा गया है। हाँ, बद्धजीव आत्मधर्म के अनुशीलन के विमुख है। इस हिसाब से कह सकता है कि वह आत्म-धर्म को नहीं मानता। किन्तु हमें ये स्मरण रखना चाहिए कि आत्म-धर्म ही जीवों के स्वरूप का धर्म है। उसी से जीव का वास्तिवक कल्याण होता है व उसे परम शान्ति की प्राप्ति होती है। माया के संग के प्रभाव से जो बहुत से विरूप-धर्म प्रकाशित हुए हैं, वे जीवों के लिए सिर्फ अनर्थ ही हैं।
श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी
* * * * * * * * * * * * * * * *
एक तथाकथित धर्म प्रवक्ता के द्वारा अधर्म का विस्तार
कुछ दिन पहले जगत में एक धर्म प्रवक्ता का प्रादुर्भाव हुआ था। उस धर्म-प्रचारक ने अमरीका का भ्रमण कर लौटने के बाद, धर्म प्रवक्ता के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त की है। उनकी बातें अत्यन्त तुच्छ हैं। उन्होंने तुच्छ कर्मकाण्ड सम्बन्धी बातों का प्रचार किया है। उस धर्म प्रवक्ता का मत है ‘जो मुझे भोजन देंगे, वही सबसे बड़ा ईश्वर है।’ आजकल शिक्षा का मूल मंत्र ही है ‘खाओ, पियो, मौज करो। इसके अतिरिक्त और कुछ मत सोचो।’ अतिरिक्त विचार वे करने भी नहीं देंगे। उनके मत में ‘जो हमें नौकरी देता है, वह भी हमारा ईश्वर है’ शिक्षा विभाग यही सब बातें हमें पढ़ा रहा है किन्तु भगवान् की क्रिया-लीला-विलासादि की शिक्षा नहीं देता है। देश के कर्ताधर्ता धर्म को समाप्त कर देने का जी-जान से प्रयास कर रहे हैं। हम कहते हैं कि, वे सब पाखण्डी कभी भी हमारे देश से धर्म को समाप्त नहीं कर पायेंगे। गोस्वामी महाराज ने इसी महाप्रभु की वाणी का प्रचार कर पूरे विश्व में सनसनी फैला दी है। लंदन में जाकर उन्होंने प्रमाणित किया है कि ईश्वर हैं, कृष्ण हैं।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *
वैष्णव धर्म आनुगत्य का धर्म है। अतः आनुगत्य या सेवा त्याग देने से, साधक, अपने धर्म से च्युत होकर, अच्युत श्रीभगवान् की सेवा से विमुख हो जाता है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *