श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

इदं हि पुंसस्तपसः श्रुतस्य वा स्विष्टस्य सुक्तस्य च बुद्धिदत्तयोः ।
अविच्युतोऽर्थः कविभिर्निरूपितो यदुत्तम श्लोकगुणानुवर्णनम्।।
( 1/5/22)
इदम् यह; हि-निश्चय ही; पुंसः प्रत्येक व्यक्ति का; तपसः तपस्या के द्वारा; श्रुतस्य वेदों के अध्ययन से; वा अथवा; स्विष्टस्य यज्ञ का; सूक्तस्य आध्यात्मिक शिक्षा का; च तथा; बुद्धिः = ज्ञान का अनुशीलन; दत्तयोः = दान; अविच्युतः अचूक; अर्थः = प्रयोजन; कविभिः = मान्य विद्वान द्वारा; निरूपितः निष्कर्ष रूप में प्राप्त किया गया, वर्णित; यत्-जो; उत्तमश्लोक भगवान् जिनका वर्णन चुने हुए श्लोकों (पद्य) से किया जाता है; गुण-अनुवर्णनम् दिव्य गुणों का वर्णन।
अनुवाद – विद्वन्मण्डली ने यह निष्कर्ष निकाला है कि तपस्या, वेदाध्ययन, यज्ञ, दान तथा स्तुति-जप का अचूक प्रयोजन (उद्देश्य) उत्तमश्लोक भगवान् की दिव्य लीलाओं में जाकर समाप्त होता है।
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ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।
यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बह्याभ्यन्तर शुचिः ।।
कोई चाहे शुद्ध हो, दूषित हो और उसकी बाहा स्थिती चाहे जैसी हो यदि वह कमलनेत्र भगवान् का स्मरण करता है, तो अपने जीवन को बाहर तथा भितर से स्वच्छ कर सकता है।
गरुड पुराण
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श्रीचैतन्य महाप्रभु

प्रौढ़ावस्था में कृपापात्र – रायरामानन्द
श्री भवानन्द राय के बड़े लड़के राय रामानन्द जब राजा प्रताप रुद्र के अधीन उड़ीसा के गवर्नर थे तो एक दिन इनकी भेंट गोदावरी नदी के किनारे सर्वाकर्षक श्रीमन् महाप्रभु से हुई। उड़ीसा के गवर्नर राय रामानन्द जी जब वैदिक ब्राह्मणों और बाजे गाजे के साथ पालकी में बैठे गोदावरी नदी में स्नान करने जा रहे थे तो श्रीचैतन्यदेव जी ने प्रथम दर्शन से ही रायरामानन्द जी को अपनी ओर आकर्षित कर लिया। इधर रामानन्द जी ने जब प्रथम बार सौन्दर्य की खान श्रीचैतन्य देव को देखा तो आकर्षित हो गए एवं अपूर्व सन्यासी को देख कर भूमि पर लेट कर प्रणाम करने लगे। श्रीचैतन्य देव ने भी रामानन्द जी को प्रेमपूर्वक आलिंगन पाश में बांध लिया। रामानन्द जी का शरीर प्रेम से पुलकायमान हो गया। उन्होंने श्रीमहाप्रभु जी से पाँच-सात दिन वहाँ ठहरने के लिए प्रार्थना की। करुणामय महाप्रभु जी ने उनकी प्रार्थना को स्वीकार किया और उनके (राय रामानन्द जी) मुख से साध्य – साधन तत्त्व तथा राधा प्रेम की उन्नत उज्जवल महिमा को प्रकट कराया। बाद में महाप्रभु जी ने इन पर कृपा करके अपना रसराज – महाभाव मिलितरूप प्रकाशित करके इनके प्रति अपने तत्त्व को व्यक्त किया।
प्रभु के आदेश से राय रामानन्द राजकार्य छोड़ नीलाचल में उनके पास रहने लगे। यह स्वरूप दामोदर के साथ गीत व श्लोकादि द्वारा प्रभु को कृष्ण – वियोग – व्यथा के समय सान्त्वना देते थे एवं उनकी भाव पुष्टि करते थे । रायरामानन्द जी परम भागवत, महाप्रेमिक, परम पडित तथा रसज्ञ भक्त थे । महाप्रभु जी की अन्तिम १२ वर्ष की लीला में सिर्फ ये और स्वरूप दामोदर ही उनके नित्य सँगी रहे ।
इनके इलावा बँगाल के सुलतान हुसैनशाह के वित्त मन्त्री एवं प्रधान मन्त्री श्रीरूप – सनातन पर भी श्रीमन् महाप्रभु जी ने प्रौढ़ावस्था में ही कृपा की थी।
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त्यजन्तु बान्धवाः सर्वे, निन्दन्तु गुरवो जनाः।
तथापि परमानन्दो, गोविन्दो मम जीवनम् 46
चाहे समस्त बन्धु – बान्धव ही क्यों न छोड़ दें अथवा गुरुजनगण निन्दा ही क्यों न करें तथापि मैं तो यही कहूँगा कि परमानन्द – स्वरूप श्रीगोविन्द ही मेरे प्राणों से भी करोड़ गुना प्रियतम् हैं।
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
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भक्त-जीवन में समग्र नैतिक गुणों का समावेश है
कृष्णकृपा, साधुकृपा और पूर्व-पूर्व साधनोंके फलस्वरूप विघ्न विनाश इन तीनोंके द्वारा आकस्मिकी प्रथा जहाँ कार्य करती है, वहाँ क्रमोन्नति-विधि स्थगित हो पड़ती है। समस्त प्रकारकी विधियोंके निर्माता श्रीकृष्णकी स्वतन्त्र इच्छा ही इसका मूल कारण है। युक्ति-तर्कके द्वारा इसका सामञ्जस्य नहीं हो सकता। सारे विपरीत धर्म जिस तत्त्वमें सामञ्जस्य प्राप्त करते हैं, उस तत्त्वमें विधि और कृपाका युक्तिगत विरोध भी, जिसे मानवबुद्धि सामञ्जस्य करनेमें असमर्थ है-सामञ्जस्य प्राप्त करता है। देवर्षि नारदकी कृपासे अनैतिक व्याधने नीति स्वीकार न करके भी भक्त-जीवन अपना लिया था। श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे भीलनी शबरीने भी भाव (भक्तिमय जीवन) को प्राप्त किया था। उन्होंने वन्य जीवन और भक्त-जीवनके बीच जीवनके अन्यान्य अवस्थाओंके धर्मोंका अभ्यास या आचरण नहीं किया था। इससे ऐसा जाना जाता है कि भक्त-जीवनकी प्राप्तिके साथ-ही-साथ उनके जीवनमें सभ्य जीवन तथा नैतिक जीवनके गुणोंका समावेश अलंकारस्वरूप हो उठा था।
आकस्मिकी प्रथा विरल और अचिन्त्य है। अतएव उसपर भरोसा न करके क्रमोन्नति-प्रथाका अवलम्बन करना ही उचित है। यदि किसी समय सौभाग्यसे आकस्मिकी प्रथा स्वयं उपस्थित हो जाए, तो अत्यन्त उत्तम बात है।
श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर
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कर्म कब तक करणीय है ? इस प्रश्न के उत्तर में शास्त्र कहते हैं-
तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता ।
मत्कथा – श्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ।।
जब तक कर्म के प्रति निर्वेद या विरक्ति नहीं आ जाती, तब तक कर्म करना होगा । अथवा सौभाग्य से साधुसंग के फल स्वरूप यदि किसी की भगवत् कथा में श्रद्धा या रुचि हो जाती है, तब उसे और कर्म नहीं करना पड़ेगा । इन दोनों लक्षणों में से जिसमें एक भी लक्षण दिखाई न दे, उसे संसार क्षेत्र में कर्म करना ही होगा ।
श्रीलप्रभुपाद
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विषया विनिवर्त्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्ज रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्त्तते ॥
श्रीमद्भगवद्गीता (२.५९)
[इन्द्रियों के द्वारा विषयों को नहीं ग्रहण करनेवाले देहाभिमानी व्यक्ति के विषयसमूह तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु विषयों के प्रति उसका जो राग है, वह निवृत्त नहीं होता है। दूसरी ओर परमात्मा के दर्शन से स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का विषयों के प्रति जो राग है, उसकी भी निवृत्ति हो जाती है।] “इन्द्रियों को विषयों से निवृत्त कर देने से भी विषयों की अभिलाषा की निवृत्ति नहीं होती। क्या उपवास करने से किसी की खाने की अभिलाषा की निवृत्ति हो जाती है? परन्तु जब कोई व्यक्ति उत्कृष्ट रस को अनुभव करता है तो स्वाभाविक रूप से निकृष्ट रस को त्याग देता है। श्रीकृष्ण सेवा से प्राप्त होने वाले आनन्द के समक्ष भौतिक संसार से प्राप्त सुख तुच्छ है। इसी कारण श्रीमद्भागवतम् (७.१.३२) में श्रीनारद ऋषि श्रीयुधिष्ठिर महाराज को शिक्षा प्रदान करते हुए कहते हैं- ‘तस्मात् केनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत्’ अर्थात् किसी भी उपाय से अपने मन को कृष्ण में लगा दो। यह सिद्धान्त युक्त-वैराग्य का मूल है, जो कि वैराग्य का एकमात्र वास्तविक उपयुक्त स्वरूप है।”
श्री श्रीमद भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी
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जगत गुणमय है, पर भगवद्-मंदिर निर्गुण
रासबिहारी ने मुझे भगवान् के मन्दिर का उद्घाटन करने का आदेश दिया था। इसी बीच निर्मला भक्ति के द्वारा रासबिहारी मन्दिर में आ चुके हैं। इस सम्बन्ध में मुझे एक शास्त्रीय वाक्य स्मरण हो रहा है, –
“वनं तु सात्विको वासो ग्रामो राजस उच्यते ।
तामसं द्यूतसदनं मन्निकेतनन्तु निर्गुणम्।।”
“संन्यासी सभी वन में रहते हैं, आप किसी ने मुझसे पूछा था, संन्यासी होकर शहर में क्यों रहते हैं?” मैंने उत्तर दिया था, “इस चुचुड़ा शहर में रह रहा हूँ, यहाँ तो वन से भी ज्यादा हिंसक जन्तु रहते हैं। संन्यासीगण भगवान् के सान्निध्य में निवास करते हैं। भगवान् सात्विक स्थान में भी नहीं रहते हैं। भगवान् निर्गुण स्थान में निवास करते हैं। “वनन्तु सात्त्विको वासो” किन्तु “मन्निकेतनन्तु निर्गुणम्। निर्गुण वस्तु में ही, निर्गुण स्थान में ही उनका वासस्थान है। साधुजनों का निवास भी उसी प्रकार है। तीनों गुण ही मायिक हैं। “मेरा निकेतन (निवास) किन्तु किसी गुण में नहीं है। यह निर्गुण स्थान है।” वहाँ सगुण क्रिया दीखने पर भी वह सगुण क्षेत्र नहीं है। उदाहरण के तौर पर किसी सज्जन व्यक्ति और किसी पॉकेटमार के द्वारा रेल की प्रथम श्रेणी में यात्रा की बात कही जा सकती है। ऊपरी तौर पर दोनों एक जैसे दीखने पर भी दोनों में जमीन आसमान का अन्तर है। जो व्यक्ति चोर और साधु में अंतर समझ सकता
है, वह व्यक्ति ही निरपेक्ष है। यह निर्गुण स्थान है। यहाँ भगवान् निवास करते हैं। बाह्य दर्शन में हम जो Mosaic आदि का दर्शन करते हैं वह हमारा व्यक्तिगत दोष है। इससे इस स्थान को सगुण कहा जा सकता है। वस्तु का कोई दोष नहीं है, हमारे दर्शन में जो दोष है उसी से हमारा पतन होगा। इसलिए भगवान् ने निर्गुण स्थान का निर्माण किया है।
निर्गुण भी एक गुण है – इसका दूसरा नाम विशुद्ध सत्त्व है। इसके बाहरी दर्शन में लोग इसे सात्विक क्षेत्र कह सकते हैं। भगवान् भी निर्गुण है। निर्गुण का मतलब निराकार आदि नहीं है। जब हम निराकार कहते हैं तो उसमें किसी प्रकार का भौतिक आकार Applied (युक्त) नहीं होता है। गणित शास्त्र में गिनने की अक्षमता के कारण Infinity (अनन्त) हुआ है, अर्थात् वहाँ ‘अभाव’ को ‘पूर्ण’ किया गया है। यह Wrong conception (गलत धारणा) है। मन्दिर में निर्गुणत्व भी उसी प्रकार का है अर्थात् भौतिक गुण वहाँ Applied नहीं हो सकता है, चूंकि मन्दिर भौतिक जगत की कोई वस्तु ही नहीं है। निर्गुण चित्त के बिना कोई भगवान् के मन्दिर का निर्माण नहीं कर सकता है। आप सब यहाँ आयेंगे और ठाकुर के समक्ष हृदय की अभिव्यक्ति प्रस्तुत करेंगे।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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अपनी विचारधारा को छोड़कर, श्रीगुरु-वैष्णवों के उपदेश-निर्देश मानकर चलने से ही, मैं समझता हूँ कि, तुम्हारा अधिक मंगल होगा।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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एक शुद्ध भक्त कृष्णप्रेम (श्रीकृष्ण के प्रति अहैतुकी अनन्य भक्ति) से परिपूर्ण होता है एवं वह संसार के सभी जीवों में प्रीति भाव रखता है। वह सर्वत्र कृष्ण-दर्शन करता है व सभी जीवों को कृष्ण-सम्बन्ध में देखता है; संसार में किसी को भी अपने शत्रु रूप से नहीं देखता।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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