श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदो न लभ्यते यद्धमतामुपर्यधः ।
तल्लभ्यते दुःखवदन्यतः सुखं कालेन सर्वत्र गभीररंहसा ।।18।।
( 1/5/18)

तस्य उसी; एव केवल; हेतोः = कारण का; प्रयतेत प्रयत्न करना चाहिए; कोविदः आध्यात्मिक रूप से प्रवृत्त; न नहीं; लभ्यते मिलता है; यत्-जो; भ्रमताम्-विचरण करते हुए; उपरि-अधः ऊपर से नीचे तक; तत् वहः लभ्यते प्राप्त किया जा सकता है; दुःखवत्-दुखों के समान; अन्यतः पूर्व कर्म के कारण; सुखम् इन्द्रिय-भोग; कालेन समय के साथ; सर्वत्र सभी जगह; गभीर सूक्ष्म; रंहसा उन्नति, प्रगति ।

अनुवाद – जो व्यक्ति वास्तव में बुद्धिमान तथा कोविद हैं उन्हें चाहिए कि वे उस सार्थक अन्त के लिए ही प्रयत्न करें, जो उच्चतम लोक (ब्रह्मलोक) से लेकर निम्नतम लोक (पाताल) तक विचरण करने से भी प्राप्य नहीं है। जहाँ तक इन्द्रिय-भोग से प्राप्त होने वाले सुख की बात है, यह तो कालक्रम से स्वतः प्राप्त होता है, जिस प्रकार हमारे न चाहने पर भी हमें दुख मिलते रहते हैं।

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वासुदेवं परित्यज्य योऽन्यदेवमुपासते ।
स्वमातरं परित्यज्य स्वपर्ची वन्दते हि सः ।।

जो व्यक्ति देवताओं की पूजा करता है और भगवान् वासुदेव को छोड देता है, वह उस व्यक्ति के समान है जो एक डाइन की शरण पाने के लिए अपनी माता के संरक्षण को त्याग देता है।

स्कंद पुराण

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श्रीचैतन्य महाप्रभु

नव यौवन अवस्था में कृपापात्र श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी

यौवन एक ऐसी अवस्था है जब सांसारिक मनुष्य इन्द्रियजनित क्षणिक विषय सुख में इतना प्रमत्त रहता है कि उसे भगवान की अहैतुकी कृपा से मनुष्य जीवन रूपी स्वर्ण अवसर मिला है, याद ही नहीं रहता। वह इस अवस्था को कोल्हु के बैल की तरह सिर्फ भोगों में रुपया कमाने में व स्त्री-पुत्र-परिवार के चक्कर काटता काटता ही गँवा देता है। लेकिन करुणा के सागर श्रीमन् महाप्रभु जी ने जीवों की ऐसी अन्धी अवस्था को बदल दिया, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण हमारे रघुनाथ दास गोस्वामी जी हैं। श्रीमन् महाप्रभु जी ने जब इनके हृदय में अपनी कृपा का सँचार किया तो यह गौर-प्रेम में इस प्रकार उन्मत्त हो गए कि पिता गोवर्द्धन दास तथा ताऊ-हिरण्य दास जी द्वारा लगाए कड़े पहरे तोड़कर व इन्द्र के समान ऐश्वर्य को छोड़, अप्सरा के समान परमासुन्दरी किशोरभार्या के बन्धनों को तोड़ कर चल पड़े अपने प्राणप्रिय- नित्य प्रभु, श्रीगौरहरि के पास ।

रघुनाथ जी का वैराग्य और उनकी प्रभु निष्ठा, गृहस्थ एवं गृहत्यागियों – दोनों के लिए परम अनुसरणीय है। रघुनाथ दास जी ने ही स्त्तवावली, दान चरित (दानकेलि चिन्तामणि) तथा ‘मुक्ता चरित’ नामक अद्भुत ग्रन्थों की रचना की थी।

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आश्चर्यमेतत् हि मनुष्यलोके, सुधां परित्यज्य विषं पिवन्ति ।
नामानि नारायण – गोचराणि, त्यक्त्वान्यवाचः कहकाः पठन्ति ।।45।।

इस मनुष्य लोक में यही आश्चर्य का विषय है कि लोग अमृत को छोड़कर विष पान करते हैं। वास्तव में कपटी लोग ही श्रीनारायण का अमृत तुल्य नाम छोड़कर, विष तुल्य दूसरे – दूसरे वाक्यों का उच्चारण करते रहते हैं।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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भक्त-जीवन की सर्वश्रेष्ठता

वृक्षादि स्थावर आच्छादित चेतन हैं। स्थलचर, जलचर और नभचर आदि संकुचित चेतन हैं। पुलिन्द, शबर आदि वन्यजातीय मानवगण एवं विज्ञान-शिल्प और सभ्यतासम्पन्न म्लेच्छगण नीतिशून्य हैं। बौद्ध आदि निरीश्वर मानवगण केवल-नैतिक हैं। जो लोग वेदको मौखिक रूपमें मानते हैं- वे कल्पित सेश्वर-नैतिक हैं। धर्माचारिगण-वास्तव सेश्वर-नैतिक हैं। उन लोगोंमेंसे कोई-कोई विशुद्ध तत्त्वज्ञानी होते हैं। बहुतसे तत्त्वज्ञानियोंमेंसे कोई जड़बुद्धिमुक्त होते हैं। करोड़ों जड़बुद्धिमुक्तोंमेंसे कोई विरला ही भक्त होता है। सेश्वर-नैतिकॉमेंसे जो लोग भोगरूप कर्मफल, मुक्तिरूप ज्ञानफल या सिद्धिरूप योगफलको ग्रहण करते हैं-वे सभी अशान्त होते हैं। केवल कृष्णभक्त ही शान्त होते हैं। श्रीमन्महाप्रभुके उपदेशका तात्पर्य यह है कि जंगली मानव पहले सभ्य और ज्ञानसम्पन्न बनें, फिर वे नीति स्वीकार करें, तत्पश्चात् ईश्वर-विश्वासी होकर धर्मका आचरण करें। पुनः धर्माचारीगण भोग, मोक्ष और सिद्धिरूप अवान्तर फलमें आबद्ध न होकर कृष्णभक्तिको स्वीकार करें। नर-जीवनकी क्रमोन्नतिका यही वैध सोपान है। सभी शास्त्रोंका यही मत है।

संसार भ्रमिते कोन भाग्ये केह तरे।
नदीर प्रवाहे जेन काष्ठ लागे तीरे ॥

श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर

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अपनी सुख – सुविधाओं के लिए और दूसरों की सुख-सुविधाओं के लिए जो किया जाता है, वही कर्म है। उसमें कृष्ण के सुख के अनुसन्धान की कोई बात नहीं होती । अपने और दूसरे के सुख का अनुसन्धान ही उसका तात्पर्य या उद्देश्य है। जबकि कृष्णसुखानुसन्धान का नाम है भक्ति ।

यह संसार साधारण लोगों के लिए कर्मक्षेत्र है। किन्तु भक्तों के लिए यह संसार भक्तिसाधनक्षेत्र है। कर्तृत्वाभिमान से संसार में जो कुछ किया जाता है, वह कर्म है। जबकि गुरु कृष्णदास अभिमान से भगवत् चालित होकर भगवान का कार्य समझकर जो किया जाता है, वह भक्ति है।

कर्म कब तक करणीय है ? इस प्रश्न के उत्तर में शास्त्र कहते हैं-तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता । मत्कथा – श्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ।।

जब तक कर्म के प्रति निर्वेद या विरक्ति नहीं आ जाती, तब तक कर्म करना होगा। अथवा सौभाग्य से साधुसंग के फल स्वरूप यदि किसी की भगवत् कथा में श्रद्धा या रुचि हो जाती है, तब उसे और कर्म नहीं करना पड़ेगा । इन दोनों लक्षणों में से जिसमें एक भी लक्षण दिखाई न दे, उसे संसार क्षेत्र में कर्म करना ही होगा ।

श्रीलप्रभुपाद

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दान देने से कोई हानि नहीं होती

व्रजमण्डल परिक्रमा के समय जिस-जिस स्थान पर कैम्प लगता था, गुरु महाराज वहाँ-वहाँ पर वास करने वाले पण्डों के घर पर जितने सदस्य हैं, उसके अनुसार उनके घर पर सीदा (कच्चे चावल, दाल, आटा, सब्जी, चीनी इत्यादि) भेजते थे। बहुत बार ऐसा होता था कि मेरे गुरुभ्राता श्रीभक्तिप्रसाद पुरी महाराज पण्डे लोगों को सीदा देने में आना-कानी करते थे, किन्तु गुरु महाराज सीदा भेजे बिना किसी प्रकार से मानेंगे नहीं। गुरु महाराज श्रीपुरी महाराज को कहते थे, “बीज जितना अच्छा बोओगे, फसल उतनी अच्छी उगेगी। इसलिए अच्छा किसान अच्छे बीज को उचित समय पर बोता है। बीज को भूमि में बोने से कभी कोई हानि नहीं होती, बल्कि वह एक बीज अन्य अनेक बीजों को स्वयं से उत्पन्न करके बीज बोने वाले को उपहार स्वरूप प्रदान करता है। इसलिए किसी को कुछ देने से कभी कमी नहीं पड़ती। जो हमारे लिए होगा, वह सदैव हमारे पास रहेगा। “मैंने अपनी बाल्यावस्था में एक कहानी सुनी थी, उसे थोड़ा ध्यान से सुनो। एक बार एक ज्योतिषी ने एक व्यक्ति से कहा ‘तुम्हारे भाग्य में सदैव सवा रुपया है, न तो तुम्हारे पास कभी उससे कम होगा और न ही उससे अधिक।’ जिस व्यक्ति को ज्योतिषी ने यह बात कही, उसका स्वभाव सदैव दान करने का था। उसके पास जो कोई भी आता, वह उसे दान देता ही रहता। किन्तु तब भी उसके पास सवा रुपया बचा ही रहता। एक दिन जब उसकी ज्योतिषी से भेंट हुई, तब उसने ज्योतिषी से कहा, ‘आपने तो कहा था कि मेरे भाग्य में केवल सवा रुपया है। किन्तु मैं देख रहा हूँ कि मैंने सैंकड़ों रुपये अन्य लोगों में बाँट दिए।’ “उसकी बात सुनकर ज्योतिषी ने उसे कहा, ‘भाई, तुमने जो अन्य लोगों को दिया है वह अपने भाग्य का नहीं बल्कि उन्हीं के भाग्य का उनको दिया है। तुम इच्छा करने पर भी अपने भाग्य का अन्य किसी को नहीं दे पाओगे। इसलिए जिसे जो देना सम्भवपर हो, उसे देते हुए चले जाना। तुम्हारे भाग्य में उसके कारण कुछ भी कम नहीं पड़ेगा। वह केवल तुम्हारे माध्यम से अपने भाग्य में लिखी वस्तु को ही लेगा।” गुरु महाराज की इस बात का श्रीभक्तिप्रसाद पुरी महाराज पर बहुत प्रभाव पड़ा। वे भी सम्पूर्ण जीवन पण्डे आदि सभी की यथासम्भव सेवा करते रहे।

श्रीमद भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी द्वारा एक शिक्षा
श्रील भक्ति विज्ञान भारती गोस्वामी महाराज जी द्वारा

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एकमात्र भोक्ता हैं भगवान; उस भोक्ता का आसन दखल करके अपनी इन्द्रिय तर्पण करना ही सभी समस्यायों का मूल कारण

भगवान् ने गीता में कहा है, “अहं हि सर्व्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ।।” (9/24)- ‘हे अर्जुन ! मैं ही सभी यज्ञों, और कर्मों का भोक्ता एवं फलदाता हूँ। साधारण मनुष्य यह जान नहीं पाते हैं। इसीलिए वे वास्तविक शांति से वंचित होते हैं। फिर उन्होंने यह कहा है,- “यत् करोषि यदश्नाषि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ।।” (9/27) – ‘तुम जो भी करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ दान करते हो या होम (यज्ञ) करते हो या तपस्या करते हो, वह सब मेरे उद्देश्य से करना और मुझ में समर्पण करना।’ तात्पर्य यही है कि सभी वस्तुएँ भगवान् की हैं। वे ही एकमात्र भोक्ता हैं। किन्तु मनुष्य ने उन्हें हटाकर स्वयं ही उस भोक्ता का आसन दखल कर लिया है – भगवान् की सेवा नहीं करके वह अपने इन्द्रियतर्पण में ही व्यस्त रहता है। इस प्रकार अपने कर्त्तव्य से विमुख होने के फलस्वरूप ही नाना प्रकार की अशांति और नाना समस्याएँ पैदा हो रही हैं। इसीलिए महाजन वाणी “Back to God and back to Home” (अर्थात् वापिस चलो भगवान् के पास और वापिस अपने घर) भगवान के श्रीचरण ही जीव का एकमात्र आश्रय स्थान हैं उसी स्थान पर लौट जाना होगा; इसीलिए यह जगत केवल हमारा साधनक्षेत्र है नित्य आवास स्थान नहीं है। इसीलिए यदि यहाँ हम भगवान् की सेवा को प्राधान्य देकर ही सभी कार्य करते हैं तो हम सभी समस्याओं का समाधान कर परमशान्ति और परममुक्ति लाभकर सकेंगे।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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पूरी दुनिया के लोग मिलकर भी किसी एक को संतुष्ट नहीं कर सकते हैं, यही शास्त्रों की कठोर वास्तव सत्य कथा है। इसे जानकर ही तुम सांत्वना लाभ करो।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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हमारे परम आराध्यतम श्रील गुरुदेव ने अपनी अप्रकट लीला से पूर्व निज आश्रित शिष्यों को अपनी अन्तिम उपदेश वाणी में कहा था कि कनक(धन), कामिनी(स्त्री-संग) व प्रतिष्ठा की आकांक्षा हरि-भजन में सबसे बड़ी बाधा है। साधक के लिए भक्ति के प्रतिकूल सभी कामनाओं का परित्याग करना आवश्यक है।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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