श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

त्यक्त्वा स्वधर्म चरणाम्बुजं हरे-र्भजन्नपक्वोऽथ पतेत्ततो यदि ।
यत्र क्व वाभद्रमभूदमुष्य किं को वार्थ आप्तोऽभजतां स्वधर्मतः ॥17॥
( 1/5/17)
त्यक्त्वा त्याग कर; स्व-धर्मम् अपने वृत्तिपरक कार्य को; चरण-अम्बुजम् = चरणकमल; हरेः- हरि (भगवान्) के; भजन् भक्ति के दौरान; अपक्वः = कच्ची, अप्रौढ; अथ के लिए; पतेत्-गिरता है; ततः उस स्थान से; यदि यदि; यत्र जहाँ; क्व-किस तरह का; वाया (व्यंग्य से); अभद्रम् प्रतिकूल; अभूत् – होगा; अमुष्य उसका; किम् कुछ नहीं; कः वा अर्थ: क्या लाभ है; आप्तः = प्राप्त किया हुआ; अभजताम् अभक्तों का; स्व-धर्मतः अपनी वृत्ति में लगे रह कर।
अनुवाद – जिसने भगवद्भक्ति में प्रवृत्त होने के लिए अपनी भौतिक वृत्तियों को त्याग दिया है, वह कभी-कभी कच्ची अवस्था में नीचे गिर सकता है, तो भी उसके असफल होने का कोई खतरा नहीं रहता। इसके विपरीत, अभक्त, चाहे अपनी वृत्तियों (कर्तव्यों) में पूर्णतया रत क्यों न हो, उसे कुछ भी लाभ नहीं होता।
* * * * * * * * * * * * * * * *
न देश कालावस्थात्मशुद्ध्यादिकम् अपेक्षते ।
किन्तु स्वतन्त्रमैवैतं नाम कामितकामदम ।।
भगवन्नाम का कीर्तन देश, काल, परिस्थिती, आत्मशुद्धि या किसी अन्य कारण से नहीं किया जाना चाहिए, प्रत्युत यह अन्य समस्त विधियों से पूर्णतया स्वतन्त्र है और उन सबको इच्छित फल देनेवाला है, जो उत्सुकतापूर्वक इसका उच्चारण करते हैं।
स्कंद पुराण
* * * * * * * * * * * * * * * *
श्रीचैतन्य महाप्रभु

प्रत्येक अवस्था में महाप्रभु जी की दया
श्रीकृष्ण चैतन्य दया करह विचार ।
विचार करिले चित्ते पाचे चमत्कार ।।
श्रीचैतन्य चरितामृत के रचियता श्रीलकृष्णदास कविराज गोस्वामी जी कहते हैं कि “श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु में करुप्पा के विकास को विचार करने से चित्त चमत्कृत हो उठता है।” उन्होने प्रेम को इतनी उदारता से बाँटा कि उसकी उपमा देने के लिए शायद किसी के पास कोई भी शब्द नहीं होंगे ।
आप ही सोचें कि क्या कोई ऐसा जीव था जिस पर उन्होंने कृपा न की हो – चाहे वह पापी, अपराधी हो या पुण्यात्मा, गरीब से गरीब हो या अमीर से अमीर, चोर डाकू हो या दानी, ब्रह्मचारी हो या महादुराचारी, आस्तिक हो या घोर नास्तिक, पतिव्रता हो या कोई कुल्टा, मोची हो चाहे नाई, दर्जी हो या कसाई, यहाँ तक कि मनुष्य हो चाहे देवता, पशु हो चाहे पक्षी, पेड़ हो चाहे लता, मातृगर्भ में हो, या बचपन में हो, बुढ़ापे में हो या भरी जवानी में प्रत्येक अवस्था वाले पर महाप्रभु जी ने अपनी अमूल्य कृपा को इस जगत में बिखेरा ।
* * * * * * * * * * * * * * *
इदं शरीरं परिणाम – पेशलं, पतत्यवश्यं शतसन्धि – जर्जरम् ।
किमौषधं पृच्छसि मूढ़ दुर्मते ! निरामयं कृष्ण – रसायनं पिव।।44।।
निरन्तर खराब होने वाला, निरन्तर नष्ट होने वाला, सौ हड्डियों के जोड़ से बना, पांच महाभूतों का ये जर्जरित देह एक दिन अवश्य ही विनष्ट हो जाएगा। इसकी औषधि पूछ रहे हो ?
हे मूर्ख ! दुर्बुद्धे ! इसको निरोग करने की, तन्दुस्त करने की एक ही औषधि है, वह है – ‘श्रीकृष्ण रसायन’ अर्थात् तुम श्रीकृष्ण – नामरूपी रसायन का पान करो।
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
* * * * * * * * * * * * * * *
आर्थिक और पारमार्थिक धर्मका भेद
जब तक धर्म-आचरणका उद्देश्य केवल अर्थ होता है, तब तक वह धर्म ‘आर्थिक’ कहलाता है। जब वही धर्म परमार्थको उद्देश्य करता है, तब उसका नाम ‘पारमार्थिक धर्म’ होता है। आर्थिक धर्मका दूसरा नाम नैतिक-धर्म या स्मार्त्त-धर्म भी है। पारमार्थिक धर्मका नाम साधनभक्ति है। नैतिक या स्मार्त्त-धर्ममें जो पूजा, वन्दना, सन्ध्योपासना और भगवत्-पूजा आदि ईश आराधना देखी जाती है, वह पारमार्थिकी नहीं होती, क्योंकि इन नित्य और नैमित्तिक आराधनाओंसे साधकके जड़स्वभावकी पुष्टि होती है अथवा सामाजिक उन्नति होती है। वे समस्त पूजाएँ कर्मकी श्रेणीमें हैं, क्योंकि वे अर्थको उत्पन्नकर निरस्त हो जाती हैं। ईशपूजा-स्मार्त्त-धर्मकी दूसरी दूसरी नीतियोंके अन्तर्गत एक नीतिमात्र है। वह नित्य ईशानुगत्य लक्षणयुक्त पारमार्थिक विधि नहीं है। जो कर्म केवल जगतके शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण करते हैं, वे कर्म नैतिक हैं। त्रैवर्गिक धर्ममें परमेश्वरको तत्त्वतः अस्वीकार करके भी प्रवृत्तिका शोधन करनेके लिए नैतिक कार्यके रूपमें ईश्वर-उपासनाकी व्यवस्था दी है। पाश्चात्य देशीय नास्तिक प्रधान कमेटीने भी चित्त शुद्धिके लिए ईश्वर उपासनाकी व्यवस्था दी है। कर्ममार्गमें जहाँ भी ईश-आराधना देखी जाती है, वे सभी इसी श्रेणीकी उपासनाएँ हैं। योगशास्त्रमें ईश्वर-प्रणिधानका विधान देखा जाता है। परन्तु उनकी इस ईश्वर-प्रणिधान क्रियाका उद्देश्य योगसिद्धि है। अतः यह ईश्वर-प्रणिधान भी पूर्ववत् कर्माङ्ग ही है। परन्तु भक्तिशास्त्रमें जिस वैधीभक्तिकी व्यवस्था है, वह पारमार्थिक या विशुद्ध आपर्गिक धर्म है। स्थिर चित्तसे विचार करनेपर ऐसा विदित होगा कि नैतिक या स्मार्त्त मतके वैध आर्थिकधर्म और नित्य-ईशानुगत्यरूप वैध पारमार्थिक धर्ममें बहुत बड़ा तात्त्विक भेद है। यह तात्त्विक भेद क्रियाका आकारगत भेद नहीं, प्रत्युत चित्तका निष्ठागत भेद है। निरीश्वर नैतिक और कर्म-प्रिय स्मार्त्तगण केवल नैतिक निष्ठाको प्रधान मानते हैं तथा वैध आर्थिक धर्ममें कटौतीकर धर्म, अर्थ और काम तक उसकी सीमा निर्धारितकर उसे त्रैवर्गिक धर्मका नाम देते हैं। वैध पारमार्थिक भक्तजन वैध आर्थिक धर्मके फल धर्म, अर्थ और काममें अपवर्गको और उससे भी आगे निरुपाधिक प्रीतिरूप अफुरन्त अनन्त फलको जोड़कर उसकी सीमा बढ़ाकर उसको जो आकार देते हैं वह स्मार्त्तधर्मसे अवश्य ही पृथक् है। वास्तवमें नैतिक स्मार्तधर्म पारमार्थिक धर्मका क्रोड़ीभूत खण्डधर्म विशेष है। वैध-धर्म पूर्णता लाभकर मुख्यविधि नाम ग्रहणकर पारमार्थिक धर्म हो पड़ता है। (०) आर्थिक वैध-धर्मको उन्नत करनेसे पारमार्थिक वैध-धर्म होता है। ईशानुगत्यरूप जीवके नित्य-धर्मको आर्थिक वैध-धर्ममें जोड़ देनेसे ही आर्थिक वैध-धर्मरूप कली प्रस्फुटित होकर पारमार्थिक वैध-धर्म होता है। संसार-स्थित जीव पारमार्थिक धर्मको स्वीकार करनेपर भी उनको वर्णाश्रमगत वैध आर्थिक धर्म त्याग नहीं करता। उनका शरीर, मन और समाज वर्णाश्रमधर्मकी सहायतासे सदैव पुष्ट होता रहेगा। परन्तु शरीर, मन और समाजकी पुष्टिसे स्वच्छन्दतापूर्वक स्थिर होनेपर उसकी आत्मा परमेश्वरकी उपासनामें नियुक्त होकर नित्यानन्दको प्राप्त होती है। (४) वैध आर्थिक धर्मको कर्मकाण्ड और वैध पारमार्थिक धर्मको भक्ति अर्थात् साधनभक्ति कहते हैं। इसलिए वैज्ञानिक विचारसे गौणविधिरूप कर्म एक पर्व तथा मुख्य विधिरूप भक्ति एक दूसरे पर्वके रूपमें दिखलाई पड़ते हैं।
श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर
* * * * * * * * * * * * * * * *
किससे चिरस्थायी मंगल होगा ?
जिस दिन हम भोगपरक और त्यागपरक हो जाते हैं, उसी दिन यथेष्ट लाभवान् हुआ – ऐसा सोचने पर भी हमारा वह लाभ अति कम समय के लिए रहता है, किन्तु गुरु-वैष्णव की सेवा चिरस्थायी है। इसी से नित्य मंगल होता है ।
विष्णुसेवा गुरु-वैष्णवों की सेवा द्वारा ही होती है । यद्यपि प्राक्तन (पूर्व) कर्मदोष से मैं भोगी हो गया हूँ, फिर भी एकमात्र गुरु-वैष्णवों की कृपा ही मुझे समझा सकती है कि भोग और त्याग आत्मधर्म नहीं, बल्कि मनोधर्म हैं। यह सत्य है कि मैं अयोग्य हूँ, किन्तु यदि मैं गुरु-वैष्णवों की कुछ सेवा कर सकूँ, तो योग्य हो सकता हूँ। गुरु-वैष्णवों की सेवा के अतिरिक्त योग्य बनने का या मंगल का अन्य कोई उपाय नहीं है। विष्णुसेवा किस प्रकार की जाती है, वह हम प्रारम्भ में नहीं जान सकते। तारतम्य का विचार करने पर हम समझ सकते हैं कि विष्णुसेवा से विष्णु भक्तों की सेवा सब प्रकार से बड़ी है। विष्णु की खोज इस जगत में किसी भी प्रकार से न कर पाने पर भी जो लोग विष्णु की सेवा करते हैं, उनकी सेवा करने से किस प्रकार विष्णु की सेवा की जाती है, वह जान सकता हूँ ।
इन्द्रियज ज्ञान के द्वारा भगवान की सेवा की बात जानना सम्भव नहीं है, इसलिए हताश होने की जरूरत नहीं है। भगवान अधोक्षज वस्तु हैं । जो लोग अधोक्षज वस्तु की सेवा में लगे हुए हैं, वे भी अधोक्षज वस्तु हैं । अतः उनके लिए अधोक्षज की सेवा अज्ञेय, दुज्ञेय या परोक्ष नहीं है; अधोक्षज- सेवा अधोक्षज भगवत् सेवकों की सेवा प्रस्फुटित आत्मा का प्रत्यक्ष विषय है ।
श्रीलप्रभुपाद
* * * * * * * * * * * * * * * *
अनन्य श्रीभगवद्भक्त ही श्रीभगवान की कृपा की प्रकाशमूर्ति हैं। अनन्य भक्त की बाहरी कोई भी वर्ण व आश्रम आदि की पहचान नहीं है। वे किसी भी वर्ण या आश्रम में हो सकते हैं तथा उसी वर्ण या आश्रम में रहते हुए भी वे गुणातीत व शुद्धस्वरूप हैं। भक्ति के बिना उस भक्त का जीवन में दूसरा कोई कृत्य नहीं रह सकता। ये भगवद्भक्ति ही अवस्था के अनुसार दया और सेवारूप से प्रकट रहती है। इस प्रकार के एकान्त शुद्ध प्रेमिक भक्त की कृपा ही जगत में श्रीभगवत् कृपा है व उनकी सेवा ही जगत् में साक्षात् भगवत्-सेवा है।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *
कर्म के द्वारा समस्याओं का समाधान असम्भव
इस तरह का कर्म के द्वारा सचमुच सुख लाभ होता है या नहीं प्रश्न आने पर समस्त शास्त्रों के सार, श्रीमद्भागवत ने कहा है मनुष्य कर्ममार्ग का आश्रय करता है, उसका उद्देश्य केवल दुख का नाश करके सुख प्राप्त करना है। किन्तु अंत में देखा जाता है कि इसका फल विपरीत होता है। जिसके द्वारा दुख समाप्त होगा, ऐसा समझा गया था, किन्तु उसके द्वारा ही दुख प्राप्त होता है। जिसके द्वारा सुख का मुँह देखने की आशा जगती है, उसी के द्वारा ही दुख आकर उपस्थित हो जाता है। इसीलिए कहते हैं मनुष्य सोचता है कुछ, लेकिन होता है और कुछ। श्रीमद्भागवत ने भी कहा है, जैसे दुख न चाहने पर भी आता है, सुख भी उसी तरह से अप्रत्याशित रूप से आ जाता है- “तल्लभ्यते दुःखवदन्यतः सुखं कालेन सर्वत्र गभीर रंहसा ।” (भाः 1/5/18)
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *
पूर्ण-शरणागति या आत्म-मंगल एक दिन में ही नहीं होता है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *
वैष्णव-सेवा के सुयोग को कभी नहीं छोड़ना
श्रीलगुरु महाराज जी ने वृन्दावनस्थ श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ में विग्रह प्रतिष्ठा के उपलक्ष्य में तीन दिन के उत्सव का आयोजन किया। उत्सव में तीन दिन पर्यन्त उत्तम प्रसाद की व्यवस्था की गई, प्रथम दिवस आमन्त्रित समस्त वैष्णवों के लिए, द्वितीय दिवस वैष्णवों के साथ व्रज के समस्त पण्डागण एवं उनके परिजनों के लिए तथा तृतीय दिवस युगल रूप से समस्त वैष्णवों, पण्डागण एवं साधारण समस्त लोगों के लिए। गुरु महाराज ने इस उत्सव पर लगभग बीस हजार रुपये से भी अधिक व्यय किया। उन दिनों एक रुपये में ढाई किलो आटा मिलता था। उस समय, हमारे मठ में रसोईघर तक भी नहीं बना था। टीन की छत वाले एक अस्थाई कक्ष में रसोई बनती थी। मठ की इस अवस्था को लक्ष्य कर किसी ने गुरु महाराज से कहा, “आपने जितना पैसा इस उत्सव में व्यय किया है, उसमें तो हमारे आठ कमरे बन जाते।” गुरु महाराज ने उत्तर दिया, “कमरे बनाने के लिए योगदान देने वाले बाद में इतने लोग मिल जाएँगे कि आपके पास स्थान का अभाव पड़ जाएगा। किन्तु आज जिन श्रेष्ठ वैष्णवों की एक साथ एक ही स्थान पर सेवा का सुयोग प्राप्त हुआ है, बाद में वैसा सुयोग पुनः नहीं मिलेगा
श्रील भक्ति विज्ञान भारती गोस्वामी महाराज जी द्वारा सञ्चित
* * * * * * * * * * * * * * * *

शास्त्र-वाणी व एक महाभागवत साधु की शिक्षाओं का वास्तविक अर्थ एक पूर्ण शरणागत भक्त के हृदय में प्रकाशित होता है।
* * * * * * * * * * * * * * * *
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
_ _ _ _ _ _ _ _ _