श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

तद्वाग्विसर्गो जनताघविप्लवो
यस्मिन् प्रतिश्लोकमबद्धवत्यपि ।
नामान्यनन्तस्य यशोऽङ्कितानि यत्
शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधवः ।॥11॥

( 1/5/11)

तत्-उस; वाक् वाणी; विसर्गः सृष्टि; जनता जनसामान्य; अध-पाप; विप्लवः = क्रान्तिकारी; यस्मिन् जिसमें; प्रति-श्लोकम् प्रत्येक श्लोक; अबद्धवति अनियमित रूप से रचा गया; अपि होते हुए भी; नामानि दिव्य नाम आदि; अनन्तस्य असीम भगवान् के; यशः = महिमा; अङ्कितानि चित्रित; यत्-जो; शृण्वन्ति सुनते हैं; गायन्ति गाते हैं; गृणन्ति स्वीकार करते हैं; साधवः शुद्ध मनुष्य जो ईमानदार हैं।

अनुवाद – दूसरी ओर, जो साहित्य असीम परमेश्वर के नाम, यश, रूपों तथा लीलाओं की दिव्य महिमा की चर्चाओं से पूर्ण है, वह कुछ भिन्न ही रचना है जो इस जगत की गुमराह सभ्यता के अपवित्र जीवन में क्रान्ति लाने वाले दिव्य शब्दों से ओतप्रोत है। ऐसा साहित्य, चाहे वह ठीक से न भी रचा हुआ हो, नितान्त ईमानदार पवित्र व्यक्तियों द्वारा सुना, गाया तथा स्वीकार किया जाता है।

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श्रीचैतन्य महाप्रभु

महाप्रभु जी की लीला संगोपन इच्छा

एक बार जगदानन्द पँडित जब नवद्वीप और शान्तिपुर होते हुए पुरी में आए, तब श्रीअद्वैत प्रभु ने श्री जगदानन्द के द्वारा श्रीमन्महाप्रभु के पास पहेली के बहाने इस प्रकार की कुछ बातें कहलवा भेजीं –

बाउलके कहिह, लोक हइल बाउल ।
बाउलके कहिह, हाटे न बिकाय चाउल ।।
बाउलके कहिह, काये वाहिक ‘आउल’ ।
बाउलके कहिह, इहा कहियाछे बाउल ।।
– चै०च० अ० 19 | 20-21

अर्थात् प्रेमोन्मत्त (श्रीकृष्ण-विरहिणी गोपी के भाव में विभावित श्रीमहाप्रभु) से कहना कि लोग प्रेम में उन्मत्त हो गए हैं। प्रेम की हाट में प्रेम रूपी चावल विक्रय के लिए अब स्थान नहीं है। उनसे कहना कि आउल अर्थात् प्रेमातुर (अद्वैताचार्य) अब सांसारिक कार्य में नहीं हैं। प्रेम पागल को कहना कि प्रेम पागल या प्रेमोन्मत्त श्रीअद्वैत ने इस प्रकार से कहा है अर्थात् श्रीमहाप्रभु जी के आविर्भाव का जो तात्पर्य था वह पूरा हो गया है।, अब प्रभु की जो इच्छा हो, वही करें।

इस पहेली को सुन कर श्रीमन्महाप्रभु जी कुछ हँसे, ‘आचार्य की जो आज्ञा’ कह कर चुप हो गए। जब श्री स्वरूपगोस्वामीपाद ने इस पहेली का अर्थ पूछा तो श्री महाप्रभु ने संकेत मात्र करके कहा

** आचार्य हय पूजक प्रबल ।
आगम – शास्त्रेर विधि-विधाने कुशल ।।
उपासना लागि’ देवेर करेन आवाहन ।
पूजा लागि कत काल करेन निरोधन ।।
पूजा निर्वाहण हैले पाछे करेन विसर्जन ।।

(चे.च.अ. 19/25-27)

* ‘बाउल’ बातुल (पागल) शब्द का अपभ्रंश है।
‘आउल’ ‘आकुल’ या ‘आतुर’ शब्द का अपभ्रंश है।

(आचार्य प्रबल पूजक हैं। वे आगम शास्त्र के विधि-विधान में कुशल हैं। उपासना के लिए देवता का आवाहन करते हैं। पूजा के लिए उनको कुछ समय तक के लिए रखते हैं। जब पूजा समाप्त हो जाती है तब उनका विसर्जन कर देते हैं।)

श्रीमन्महाप्रभु ने इशारे से जताया कि श्रीअद्वैताचार्य प्रभु ने ही श्री मायापुर के गंगातीर पर गंगाजल और तुलसी के द्वारा पूजा करके श्रीमन्महाप्रभु जी को गोलोक से आवाहन कर भूलोक में अवतीर्ण किया था। पूजा का निर्वाह करके जिस प्रकार पुजारी देवता का विसर्जन करता है, जान पड़ता है कि श्रीअद्वैताचार्य अब उसी प्रकार की इच्छा प्रकट कर रहे हैं।

आचार्य की इस पहेलिका को पढ़ने के बाद से श्रीमन्महाप्रभु जी की कृष्ण विरह दशा और भी बढ़ने लगी। विरहोन्माद में महाप्रभु जी रात में गम्भीरा की दीवारों से मुँह रगड़ा करते थे। श्री स्वरूप तथा श्री रामराय समयोचित गान के द्वारा श्रीमहाप्रभु को सान्त्वना देने की चेष्टा करते थे परन्तु प्रभु का कृष्ण – विरह-सिन्धु नाना प्रकार से उद्वेलित हो उठता था ।

इस प्रकार श्रीमन्महाप्रभु जी ने प्रथम चौबीस वर्ष गृहस्थ लीला का अभिनय, द्वितीय चौबीस वर्ष में पहले छः वर्ष सन्यासी शिरोमणि आचार्य की लीला में समस्त भारत में शुद्ध भक्ति का प्रचार, शेष अठारह वर्षों में छः वर्ष भक्तों के संग वास और पुरी में आचार्य लीला का अभिनय तथा सब के अन्त के बारह वर्ष अन्तरंग भक्तों के साथ निरन्तर रसास्वादन लीला करते हुए कुल अड़तालीस वर्ष प्रकट लीला की थी। इसके बाद भक्तगणों को अधिकतर विरह में और श्रीकृष्ण भजन में उन्मत्त कराने के लिए अपनी प्रकट लीला का संगोपन किया था ।

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अन्धस्य मे हृत-विवेक – महाधनस्य, चौरैः प्रभो ! बलिभिरिन्द्रय – नामधेयैः ।
मोहान्धकूप – कुहरे विनिपातितस्य, देवेश ! देहि कृपणस्य करावलम्बम् ।। 43 ।।

हे प्रभो ! हे देवेश! बलवान इन्द्रियनाशक चोरों ने मेरा विवेक रूपी महाधन अपहरण करके, मुझे मोहरूपी अन्धे कुएँ में गिरा दिया है। हे प्रभो! अभी मैं अन्धा और निराश्रय हूँ, मुझे हाथ पकड़कर ऊपर उठा लो।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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आर्थिक और पारमार्थिक धर्म

शास्त्रीय विधिसे जो धर्म उत्पन्न होता है, उसे वैध-धर्म कहते हैं। वैध-धर्म दो प्रकारका है-आर्थिक और पारमार्थिक। आर्थिक-धर्मको त्रैवर्गिक वैध-धर्म और पारमार्थिक-धर्मको आपर्गिक वैध-धर्म भी कहते हैं। धर्म, अर्थ और काम-ये तीन वर्ग जिस धर्मके द्वारा पाए जाते हैं-उसे त्रैवर्गिक धर्म कहते हैं। इससे केवल शरीर, मन, समाज और न्यायपर जीवनकी उन्नति होती है तथा परलोकमें स्वर्गसुख लाभहोता है। स्वर्गसुख अनित्य है। उसे भोगकर पुनः जीवको कर्मक्षेत्रमें आना पड़ता है। पहले जिस वर्णाश्रमधर्मका वर्णन किया गया है, वह आर्थिक है। धर्म, अर्थ और काम-चक्रकी भाँति आते-जाते रहते हैं। इसके द्वारा कर्मजड़ मुक्ति नहीं होती। इस धर्मका उद्देश्य अर्थ होता है, इसलिए इसका नाम आर्थिक है। कर्मके जितने प्रकारके गौण फल हैं, वे सभी अर्थ ही हैं। एक प्राप्त अर्थ पुनः कर्मका रूप धारणकर अन्य अर्थको उत्पन्न करता है। इस प्रकार धर्म और अर्थकी श्रृंखला जहाँ समाप्त हो जाती है, उस अन्तिम अर्थका नाम परमार्थ या अपवर्ग है। त्रैवर्गिक धर्म-बहुदेवतानिष्ठ या भगवत्रिष्ठ होता है। इस विषयमें केवल एक उदाहरण पर्याप्त होगा। विवाह एक कर्म है। विवाहका अर्थ है-सन्तान उत्पत्ति। पुनः सन्तान-उत्पत्ति कर्मका रूप धारण करके पिण्डदानरूप अर्थको उद्देश्य करता है। फिर पिण्डदान कर्मका रूप होकर पितृलोगोंकी तृप्तिरूप अर्थको उत्पन्न करता है। पितृलोग तृप्त होनेपर वे सन्तानके मङ्गलरूप अर्थको देते हैं। सन्तानका मङ्गल पुनः कर्मरूप धारणकर दूसरे दूसरे अर्थोंको प्रदान करता है। ये समस्त अर्थ अनित्य फल हैं। सन्तानका सुख और अन्तमें मोक्षजन्य शान्ति तथा ब्रह्मसुखतक धर्म-अर्थकी श्रृंखला चली गई है। जिस समय ब्रह्मसुख और भी स्पष्ट होकर परम पुरुषके सेवासुखके रूपमें परिणत हो जाता है, उस समय अर्थ श्रृंखला समाप्त हो जाती है और केवल चरमफलरूप परमार्थकी प्राप्ति होती है। अपवर्ग शब्दके दो अर्थ हैं-मोक्ष और भक्ति। मोक्ष होनेपर आत्मा जड़से मुक्त होकर नित्य-धर्मरूप भक्तिको प्राप्त करती है।

श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर

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वैष्णवों में सर्वश्रेष्ठ हैं श्रीगुरुदेव । उन कृष्णप्रेष्ठ श्रीगुरुदेव के उपदेशों का श्रवण नित्यकाल करना चाहिए। प्रत्यह उनके उपदेशों की आलोचना और श्रवण न कर अन्य कर्म करने पर भयंकर दुःख को बुलावा देना होगा । गुरु-वैष्णवों का अनुकरण करना या असत्संग करना अनुचित है । उनका अनुसरण करना होगा। भगवान जिनके हृदय में वास करते हैं, उनका संग ही करणीय है। भक्त और अभक्त, मुक्त और बद्ध सिद्ध और असिद्ध एक नहीं हैं। जिस प्रकार असिद्ध (बिना पके हुए) चावल खाने से नहीं चलता है, चावल सिद्ध होने पर और कुछ शीतल होने पर खाने योग्य होता है, उसी प्रकार सिद्ध भक्तों का संग ही सबसे अधिक आवश्यक और मंगलजनक है।

श्रीलप्रभुपाद

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अशरणागत लोग श्रीविष्णु की त्रिगुणात्मिका माया से मोहित होकर माया के रंगीन चश्मे से जब भगवान् को देखते हैं तो वे निर्गुण श्रीभगवान् को भी रंगीन ही समझते हैं जबकि भगवान् की तो स्वाभाविक ही सिद्धावस्था होती है। केवल मात्र श्रीविष्णु के शरणागत एकान्त भक्त को ही श्रीविष्णु के वास्तविक स्वरूप की उपलब्धि हो सकती है। ये सभी अनुभूतियाँ केवल भगवान् की कृपा सापेक्ष ही हैं।

‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ॥’

(कठोपनिषद 1/2/23)

श्रीविष्णु के पूजक व वैभव के साथ श्रीविष्णु की सत्ता का दर्शन करने वालों में तथा उनकी सेवा करने वालों में से उनकी सेवा करने वाले व्यक्ति ही श्रेष्ठ-वैष्णव हैं।

‘तस्मात् परतरं देवि तदीयानां समर्चनम् ।’
(मंगलमय शिव की उक्ति)।

यही कारण है कि श्री विष्णु की सेवा करने की अपेक्षा वैष्णव सेवा करने वालों की महिमा अधिक है।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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श्रीभगवान की शरण लेना ही मानव जीवन का एकमात्र कर्त्तव्य श्रीमद् भगवद्गीता में स्वयं भगवान् ने कहा है, “सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज।” अर्थात् जगत में तथाकथित जितने सभी धर्म-अधर्म के विचार हैं, सबका परित्याग करके मेरी शरण में आ जाओ।’ भगवान् की शरण ग्रहण करना ही जीव का धर्म है। फिर शास्त्र-चूड़ामणि श्रीम‌द्भागवत में (11/12/14-15) दो श्लोक देखने को मिलते हैं-

“तस्मात् त्वमुद्धवोत्सृज्य चोदनां प्रतिचोदनाम् ।
प्रवृत्तिंच निवृत्तिंच श्रोतव्यं श्रुतमेव च।।
मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम् ।
याहि सर्वात्मभावेन मया स्या ह्यकुतोभयः ।।”

यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं ‘हे उद्धव ! क्या श्रुति-स्मृति, या विधि 1- निषेध अथवा जितने श्रवणयोग्य एवं जितने श्रुत (सुने जा चुके) विषय हैं, तुम सब कुछ त्याग करके अनन्यभाव से मेरी शरण ग्रहण करो। मैं समस्त प्राणियों का अन्तर्यामी हूँ मेरी शरण में आने पर तुम्हें कोई भय नहीं रहेगा- मैं ही समस्त भय का त्राता (रक्षा करने वाला) हूँ। इस प्रकार भगवान् ने जीवों को सभी शास्त्रों में उनके चरणों में शरण ग्रहण करने के लिए कई उपदेश दिये हैं। इससे समझा जाता है कि, श्रीभगवान् की शरण लेना ही हमारा एकमात्र कर्त्तव्य है। यही शरणागति ही मनुष्य जीवन का सर्वश्रेष्ठ गुण और सर्वश्रेष्ठ अलंकार है। यह गुण जिसमें प्रकट होता है, वे ‘भगवद्-भक्त’ के रूप में परिचित होते हैं। भगवद्-भक्ति और भगवद्-भक्त की महिमा का कीर्तन सभी शास्त्रों में किया गया है। यहाँ तक कि महाजन भी उसी भक्त-संग की कामना ही सदैव करते हैं। इसीलिए

श्रील नरोत्तम ठाकुर ने कहा है-

गृहे वा वनेते थाके, हा गौरांग बले डाके, नरोत्तम मागे तौर संग।।

(अर्थात् जो घर में या वन में रहते हैं, किन्तु ‘हे गौरांग’ कहकर पुकारते हैं, नरोत्तम उन्हीं के संग की कामना करते हैं।)

– श्रीगौड़ीय पत्रिका, 12 वर्ष, 7 संख्या

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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सेवा-पूजा वास्तविक है, काल्पनिक नहीं

तुम ‘गुरुदेवतात्म’ (श्रीगुरु को देवता और आत्मा मानने वाला) होकर श्रीविग्रह की पूजार्चन्न सेवा आदि निष्ठा के साथ करना। श्रीविग्रह और अर्चालेख्य (चित्रपट) की पूजा से क्या साक्षात् सेवा नहीं होती? साधन-भजन क्या सब ही theoretical (सैद्धान्तिक) है? साधु-शास्त्र-गुरुवाक्य से हमें पता चलता है कि, सेवापूजा- वास्तव है, वह साक्षात् रूप से ही की जाती है। साधारण विचार में यह परोक्ष लगने पर भी, अधिकारी के लिए वही वास्तव सत्य है। साधक-साधिका के लिए पूजार्चन जिस प्रकार निर्धारित की गई है, उसी प्रकार सिद्ध-महात्मा- उन्नत अधिकारी-भक्त भी पूर्जाचन के द्वारा अपनी भावमय-प्रेममय सेवा का संरक्षण करते हैं। कीड़े-मकौड़ों के लिए साक्षात् रूप से सेवा-अधिकार संभव नहीं है, इसीलिये विशेष अधिकार में यह प्राप्त होता है। लौकिक-व्यवहारिक जगत की कुछ-कुछ विचार-विवेचनाएँ, पारमार्थिक क्षेत्र में भी आ जाती हैं, इसीलिए इस बारे में कुछ बाधा-निषेध की व्यवस्था की गयी है। विधिमार्ग में जिसको पालन करना आवश्यक है, राग मार्ग में वह अनावश्यक और सभी विधियों से परे है। सेवा के माध्यम से ही गुरु-वैष्णवों के साक्षात् दर्शन होते हैं, जान लेना।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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तुमि त’ चैतन्यदास, हरिभक्ति तव आश,
आश्रमेर लिंगे किबा फल? प्रतिष्ठा करह दूर,
वास तव शान्तिपुर साधु-कृपा तोमार सम्बल ॥
वैष्णवेर परिचय, आवश्यक नाहि हय,
आडम्बरे कभु नाहि जाओ।
विनोदेर निवेदन, राधाकृष्ण-गुणगान,
फुकारी’ फुकारी’ सदा गाओ ॥

आप श्री चैतन्य महाप्रभु के दास हो, अतएव आपको भगवद्भक्ति की अभिलाषा रखनी चाहिए। व्यक्ति के निजी आश्रम के बाह्य चिन्हों का क्या लाभ? कृपया भौतिक मान-सम्मान को त्यागकर शांतिपुर में वास करो। क्योंकि, भक्तों की कृपा ही आपकी एकमात्र पूँजी है। स्वयं को वैष्णव दिखाने के भव्य प्रदर्शन की आवश्यकता नहीं है। मात्र भौतिक समृद्धि एकत्रित करने हेतु कठिन परिश्रम न करें। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर निवेदन करते हैं कि आप सदा श्रीश्री राधा-कृष्ण के दिव्य गुणों तथा लीलाओं का उच्चस्वर में गान करो।

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अशितिम् चुतरश्चैव लक्षांस्तन जीव जातिषु भ्रमद्भिः पुरूषैः प्राप्यं मानुष्यं जन्म पर्ययात् ।
तदप्य अभलतां जातः तेषाम् आत्माभिमानिनाम् वराकाणाम् अनाश्रित्य गोविन्द चरण द्वयम् ।।

जीव को 84 लाख योनीयों से यथाक्रम उत्क्रांती करने के बाद मनुष्य जन्म प्राप्त होता है। लेकिन जो श्री गोविन्द के चरणकमलों का आश्रय नही स्विकारता ऐसे दुराभिमानी, मुर्ख के लिये ऐसा महत्त्वपूर्ण मनुष्य जीवन निष्फल होता है।

ब्रह्म वैवर्त पुराण

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बाहरी रूप से लौकिक कार्यों के प्रति उदासीनता प्रदर्शित करने का प्रयास नहीं करके साधक को आतंरिक रूप से वैराग्य का अभ्यास व निष्कपट मति से श्रीकृष्ण-भजन करना है। श्रीकृष्ण अविलंब ही उन्हें सांसारिक संताप से मुक्त कर देंगे।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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