श्रीमद् भागवतम् श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

एतावान् साङ्ख्ययोगाभ्यां स्वधर्मपरिनिष्ठया।
जन्मलाभः परः पुंसां अन्ते नारायणस्मृतिः ॥
(2/1/6)
एतावान् – ये सब; साङ्ख्य-पदार्थ तथा आत्मा विषयक पूर्ण ज्ञान; योगाभ्याम् – योगशक्ति के ज्ञान से; स्व-धर्म-विशिष्ट वृत्तिपरक कर्तव्य; परिनिष्ठया – पूर्ण अनुभूति के द्वारा; जन्म-जन्म; लाभः लाभः परः – परम; पुंसाम् -पुरुष का; अन्ते-अन्त में; नारायण – भगवान् की; स्मृतिः – स्मृति, याद ।
पदार्थ तथा आत्मा के पूर्ण ज्ञान से, योगशक्ति के अभ्यास से या स्वधर्म का भलीभाँति पालन करने से मानव जीवन की जो सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त की जा सकती है, वह है जीवन के अन्त में भगवान् का स्मरण करना।
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तुलसीदल मात्रेण जलस्य चुलुकेन वा।
विक्रीणीते स्वमात्मानं भक्तेत्यो भक्तवत्सलः ।।
अपने भक्तों के प्रती अत्यन्त वत्सल श्रीकृष्ण अपने को उस भक्त के हाथों बेच देते हैं जो उन्हें केवल तुलसीदल तथा एक चुल्लू पानी अर्पित करता हैं।
गौतमीय तन्त्र
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श्रीचैतन्य महाप्रभु

भक्त का कुत्ता भी महाप्रभु का कृपापात्र
जिस समय महाप्रभु जी श्रीवृन्दावन से नीलाचल वापिस लौटे तो श्रीस्वरूप गोस्वामी जी ने गौड़देश में (बंगाल में) प्रभु के लौट आने का समाचार भिजवा दिया। उस समाचार को सुनकर श्रीशचीमाता एवं समस्त गौड़ीय भक्त आनन्दित हुए और कुलीनवासी, श्रीखण्ड वासी तथा अन्य भक्तों के साथ मिलकर नीलाचल की ओर चल दिए। मार्ग में अनेक स्थानों पर यात्री – कर देना पड़ता था, सो शिवानन्द सेन ही सब यात्री कर भुगतान करते हुए चल रहे थे । यहाँ तक कि सबके खान-पान तथा निवास स्थान का प्रबन्ध भी शिवानन्द जी ही करते थे। उन्हीं भक्त लोगों के साथ एक कुत्ता भी चल रहा था। श्रीशिवानन्द जी रास्ते में उसे भी भोजनादि देते हुए उसकी रक्षा कर रहे थे। एक दिन एक नदी को पार करते समय वहाँ के उड़ीसा वासी नाविक ने उस कुत्ते को अपनी नाव में बैठाकर पार करने से इन्कार कर दिया। कुत्ता पार नहीं होगा • यह देखकर श्रीशिवानन्द जी को बहुत दुःख हुआ। उन्होने नाविक को आठ सौ कौड़ी भाड़ा दे दिया और उस कुत्ते को पार ले ही गये ।
एक दिन शिवानन्द किसी कारणवश कर वसूल करने वालों के पास रुक गए । दैवयोग से उसी दिन सेवक कुत्ते को भोजन देना भूल गया। रात के समय जब शिवानन्द जी शिविर पर लौटे तो उन्होंने सेवक से – “क्यों भाई ! कुत्ते को भोजन दे दिया ?” उसने जब बताया कि मैं भूल गया तो शिवानन्द जी को बहुत दुःख हुआ। उन्होंने उसी समय लगभग १० आदमियों को कुत्ते की तलाश में इधर-उधर भेजा। वे थक गए लेकिन कुत्ता कहीं न मिला । शिवानन्द जी ने भी भोजन छोड़ दिया और दुःखी होकर उस रात भूखे ही सो गए। सभी वैष्णव हैरान रह गये कि कुत्ता गया तो गया कहाँ ?
अन्ततः उस कुत्ते का विचार छोड़ सभी श्रीमन् महाप्रभु के दर्शन की उत्कण्ठा में नीलाचल की ओर चल पड़े एवं पूर्व वर्षों की भाँति श्रीमहाप्रभु जी से मिले । श्रीमन् महाप्रभु जी ने सभी भक्तों को लेकर जगन्नाथ जी के दर्शन किये और सबके साथ महाप्रसाद आस्वादन किया। फिर सबको उनके वासस्थान पर भेज दिया। दूसरे दिन प्रातः काल जब सब लोग महाप्रभु जी के दर्शन के लिए आए तो क्या देखते हैं कि वही कुत्ता, जो खो गया था, महाप्रभु जी से कुछ दूरी पर बैठा है। प्रभु उसे नारियल का प्रसाद डाल रहे हैं और मन्द – मन्द मुस्कराते हुए उसे ‘श्रीकृष्ण – राम – हरि बोल’ कह रहे हैं। वह कुत्ता नारियल का प्रसाद खाता जा रहा था और बार-बार कृष्ण-कृष्ण कहता जा रहा था सब लोग उस दृश्य को देखकर आश्चर्य चकित रह गयेः ऐसा
श्रीशिवानन्द जी ने जब उस कुत्ते को देखा तो दण्डवत् प्रणाम की और दीनता पूर्वक अपने अपराध की क्षमा याचना की। अगले दिन वह भाग्यवान कुत्ता सबके समाने महाप्रभु जी के दर्शन कर व कृष्ण-कृष्ण कहता हुआ अन्तर्धान हो गया ।
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श्रीमन्नाम प्रोच्य नारायणाख्यं, के न प्रापु – वीञ्छितं पापिनोऽपि
हा नः पूर्वं वाक् प्रवृत्ता न तस्मिन्, तेन प्राप्तं गर्भवासादि – दुःखम् ।।54।।
श्रीनारायण का नाम उच्चारण करने से ऐसा कौन-सा पापी है, जिसने अपनी इच्छित वस्तु प्राप्त न की हो? हाय! मेरे वाक्य पहले से उन्हीं श्रीनारायण का नाम लेने में प्रवृत्त क्यों नहीं हुये, जिस कारण मैं जन्म-मरणादि के दुःखों को भोग रहा हूँ।
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
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शुद्ध अहंकार
“मैं नित्य कृष्णदास हूँ”- अपनेको ऐसा जानना ही शुद्ध अहङ्कार है। वहाँपर आनन्द सर्वदा नित्य नूतन और अधिकतर घनीभूत होकर प्रकाशित रहता है। वहाँ तृप्ति नामक कोई अवस्था नहीं होती। लोभऔर आनन्द निर्बाध और प्रचुर रूपमें परिलक्षित होता है। भगवत्-सेवोपयोगी रसके अनुसार वहाँपर अनन्त प्रकोष्ठ नित्य विद्यमान हैं। रसोंमें शृङ्गाररस ही सर्वप्रधान है। उसमें भी सम्बन्धरूप शृङ्गारकी अपेक्षा कामरूप शृङ्गार अधिक बलवान होता है। उसी कामरूप शृङ्गाररसके पीठस्वरूप नित्य वृन्दावन उन अनन्त प्रकोष्टोंमें सबसे ऊपर विराजमान है। सभी रसोंमें भगवान् स्वयं सेव्य होकर एक भाग और सेवक रूपमें दूसरा भाग ग्रहणकर उस दूसरे भागवाले स्वरूपको उन-उन रस-सेवियोंके लिए आदर्शस्थल बनाकर अचिन्त्य लीलाका विस्तार करते हैं। शृङ्गारमें श्रीमती राधिका, वात्सल्यमें श्रीनन्द-यशोदा, सख्यमें सुबल और दास्यमें रक्तक, उस-उस रसमें भगवान्के सेवकभाव विशेष हैं। इनमें केवलमात्र यह भेद है कि शृङ्गाररसमें जिस प्रकार श्रीमती राधिका साक्षात् भगवत्-विभागविशेष हैं, वहाँ दूसरे रसोंमें बलदेव ही एकमात्र साक्षात् विभाग हैं। श्रीनन्द-यशोदा, सुबल और रक्तकको उन्हीं (श्रीबलदेव) का अङ्गव्यूहस्वरूप समझना चाहिए। प्रकट समयमें अचिन्त्यशक्तिके द्वारा प्रपञ्चमें अपने पीठ और अनुचरोंके साथ श्रीकृष्णचन्द्र विहार करते हैं। उन सब विहार कार्योंमें भगवान्, उनके अनुचर वर्ग, उनके रसोपकरणसमूह और उनका रसपीठ आदि जो प्रापञ्चिक नेत्रोंसे दिखलाई पड़ते हैं, वे किसी भी सांसारिक विधिके अधीन नहीं हैं, प्रत्युत् वे भगवान्की अचिन्त्य-शक्तिके स्वाधीन कार्य-विशेष हैं।
श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर
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कः पण्डितस्त्वदपरं शरणं समीयद् भक्तप्रियादृतगिरः सुहृदः कृतज्ञात्।
सर्वान् ददाति सुहृदो भजतोऽभिकामा-नात्मानमप्युपचयापचयो न यस्य ।।
(चै.च. मध्य 22.96)
हे प्रभु! आप अपने भक्तों के प्रति अत्यन्त वत्सल हैं। आप सत्यनिष्ठ तथा कृतज्ञ मित्र भी हैं। भला ऐसा कौन व्यक्ति होगा जो आपको त्यागकर किसी और की शरण ग्रहण करेगा? आप अपने शरणागत् भक्तों की सभी इच्छायें पूर्ण करते हैं, यहाँ तक कि उनके ऋण से उऋण होने के लिए आप अपने आपको भी दे डालते हैं। फिर भी ऐसे कार्य से आप में ना तो वृद्धि होती है और ना ही कमी आती है। परमआराध्य श्रील प्रभुपाद अपने अनुभाष्य में लिखते हैं कि दीक्षा के समय में भक्त अपने प्राकृत अनुभूति समूहों को समर्पण करके अप्राकृत सम्बन्ध ज्ञान में स्थित होता है। अप्राकृत दिव्य ज्ञान को प्राप्त करके वो अप्राकृत शरीर में कृष्ण की सेवा अधिकार को प्राप्त करता है। भक्त किसी व्यक्ति को माया से छुड़ाकर एवं उसको कृष्ण के शरणागत बनाकर आत्मसात करते हैं। तब उसका भोग राज्य में भोक्ता अभिमान दूर हो जाता है और वह अपने अस्तित्व में नित्य कृष्ण दासत्व प्राप्त कर लेता है। तब वह सच्चिदानन्दमय स्वरूप में नित्य सेवक भाव को प्राप्त करके अप्राकृत देह में श्री कृष्ण चन्द्र की सेवा का अधिकारी होता है। भक्त के उसी समय के अप्राकृत देह के द्वारा अप्राकृत भावमय-सेवा को जो कर्मी लोग प्राकृत बुद्धि द्वारा प्राकृत मान लेते हैं, वह अपने गुरु की कृपा से वंचित हो जाते हैं। श्रीमन् महाप्रभु ने अपनी शिक्षाओं के द्वारा सदैव यही दर्शाया है कि वैष्णव की देह दिव्य है। श्रीमन् महाप्रभु ने यवन कुल में जन्मे श्रील हरिदास ठाकुर, खुजली रस से पीड़ित सनातन गोस्वामी एवं कुष्ठ रोग से पीड़ित वासुदेव घोष की देह को प्राकृत न समझकर उन्हें आलिंगन का सुख प्रदान किया था। इसी से वह (महाप्रभु) शिक्षा देते हैं कि भोगमय जड़ानन्द में स्थित प्राकृत जीव की देह कभी भी वैष्णव की देह के समान नही हो सकती। भक्त की देह चिदानन्दमय अर्थात् कृष्ण सेवा के उपयोगी और प्रकृति से अतीत भावमय और सच्चिदानन्दमय है। आत्मा के समान “आत्मसम” इत्यादि वाक्यों के द्वारा षड़ऐश्वर्य पूर्ण ईश्वर के साथ जीव की कभी भी समानता नहीं करनी चाहिये।
श्रीलप्रभुपाद
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स्वयं आचरण कर शिक्षा प्रदान करना
श्रीश्यामल दास नाम का एक ब्रह्मचारी कोलकाता श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ में रहता था। एक बार वह अस्वस्थ होने के कारण पागलप्राय हो गया। किसी एक वैद्य ने उसका परीक्षण कर उसके सिर पर लगाने के लिए तेल दिया। किन्तु जब भी कोई उसे सिर पर तेल लगाने के लिए कहता अथवा लगाने जाता तो वह- ‘क्या मैं पागल हूँ, जो सिर पर तेल लगाऊँ’- यह कहकर चिल्लाने लगता था।
एक दिन गुरु महाराज ने मुझसे कहा, “वह तेल मुझे लाकर दो तथा तत्पश्चात् श्यामल ब्रह्मचारी को भी बुला कर मेरे निकट ले आओ।” यद्यपि गुरु महाराज कभी भी किसी प्रकार का कोई तेल अपने श्रीअङ्ग पर नहीं लगाते थे, हमने कभी भी उनको सम्पूर्ण जीवन ऐसा करते हुए नहीं देखा, तथापि उस दिन श्रीश्यामल ब्रह्मचारी को दिखलाकर उन्होंने अपने हाथ से सिर पर तेल लगाकर उससे कहा, “यह तो बहुत अच्छा तेल है, देखो, मैं भी तो इसे अपने सिर पर लगा रहा हूँ। तुम इसे अपने सिर पर लगाने में सङ्कोच क्यों कर रहे हो?” गुरु महाराज की बात सुनकर तथा उन्हें अपने सिर पर तेल लगाते देखकर श्रीश्यामल ब्रह्मचारी ने भी तेल उठाकर स्वयं ही अपने सिर पर लगा लिया।
वह प्रतिदिन स्वयं तेल लगाते समय कहता, “गुरु महाराज भी इस तेल को लगाते हैं। यह तेल पागल व्यक्ति के लिए नहीं, अपितु सभी के लिए अच्छा है।” इस प्रकार उस तेल का प्रयोग करने से श्रीश्यामल ब्रह्मचारी कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो गया।
गुरु महाराज कभी किसी पर शासन करके उसे कोई शिक्षा प्रदान नहीं करते थे अपितु स्वयं के आचरण के द्वारा शिक्षा प्रदान करते थे। इस उपरोक्त प्रसङ्ग के माध्यम से उनका भक्तवात्सल्य रूपी गुण भी प्रकाशित हुआ।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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मुक्ति नहीं, कृष्णप्रेम ही जीवों के लिए एकमात्र प्रयोजन
उपास्य, उपासक और उपासना के तत्त्व का निरूपण करना ही शास्त्रों का उद्देश्य है। सुख लाभ करना और दुःख से मुक्ति पाना ही सभी का उद्देश्य है। भगवत् प्रेम से जीवों को जो असीम और अशेष सुख प्राप्त होता है, वह बद्ध जीवों की समझ से परे है। उस सुख की क्या बात, जब उसका आभास जीव को प्राप्त होता है, तो उसी समय दुख, मूल सहित दूर हो जाते हैं। किन्तु और किसी उपाय से सुख प्राप्त होने पर वह सुख निरन्तर नहीं रहता दुःख की निवृत्ति होने पर भी वह जड़ से नष्ट नहीं होता, दोबारा दुख भोगने की संभावना रह जाती है। इसीलिए देखा गया है कि, भगवद् प्रेम में ही जीवों के सभी प्रयोजन पूर्ण रूप से प्राप्त हो जाते हैं। इसीलिए श्रीचैतन्य महाप्रभु ने मुक्ति नहीं, कृष्णप्रेम को ही ‘प्रयोजन’ के रूप में निर्धारित किया है।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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शुद्ध-नाम ग्रहण-साधन और कृपा पर निर्भर “निरपराधे नाम लइले पाय प्रेमधन” (निरपराध होकर नाम लेने से प्रेमधन मिलता है) यह वास्तव सत्य है। शुद्धभाव से श्रीनाम ग्रहण एक दिन में ही नहीं होता है; यह साधन की वस्तु है; फिर कृपा पर भी निर्भर है। दृढ़चित्त होकर निष्ठा के साथ आगे बढ़ने से वांछित फल अवश्य ही लाभहोगा। इसे लेकर मन में किसी प्रकार का संदेह या संशय मत रखना। जन्म (कुल), ऐश्वर्य, श्रुत (विद्या) और श्री (रूप) भजन-साधन के क्षेत्र में प्रतिकूलता लाते हैं और बहुत बाधा-विघ्न उत्पन्न करते हैं; किन्तु निष्कपट, सरल होने पर अतिशीघ्र सुफल मिलता है। संसार में व्यक्तिगत स्वार्थ का संघर्ष रहेगा ही। इसी में रहकर जो अपने अभीष्ट पथ पर चलने का संकल्प ग्रहण करता है, उसकी किसी प्रकार की क्षति की संभावना नहीं है। धैर्य स्थैर्य-सहनशीलता ही जीवन-पथ का श्रेष्ठ ‘पाथेय’ और संबल है। उसके साथ उत्साह, अनुप्रेरणा, विश्वास, आत्म-निर्भरता को अवश्य ही जोड़ना होगा। श्रीभगवान् निश्चय ही प्ररेणा प्रदान करते हैं, उसके द्वारा ही जीव अपने साधन-पथ का निर्णय करता है और जीवन के पथ पर अग्रसर होता है तथा चरम फल प्राप्त करता है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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भारतीय शास्त्रों में दो मार्ग बताएँ गए हैं—प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला—प्रवृत्ति मार्ग (प्रापंचिक विषयों में प्रवृत्त) व निवृत्ति मार्ग (विषय विरक्त)। बद्ध जीव साधारणतः प्रवृत्ति मार्ग के योग्य हैं। निवृत्ति मार्ग के अधिकारी जीव अत्यन्त दुर्लभ हैं।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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