श्रीमद् भागवतम् श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

तस्माद्भारत सर्वात्मा भगवानीश्वरो हरिः ।
श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यश्चेच्छताभयम् ॥
(2.1.5)
तस्मात् – अतएव; भारत – हे भरतवंशी; सर्वात्मा -परमात्मा; भगवान् – भगवान्; ईश्वरः – नियामक; हरिः – भगवान्, जो सारे कष्टों को हरनेवाले हैं; श्रोतव्यः – श्रवणीय हैं; कीर्तितव्यः – महिमागायन के योग्य; च-भी; स्मर्तव्यः – स्मरणीय; च-तथा; इच्छता – इच्छा करनेवाले की; अभयम् – स्वतन्त्रता ।
हे भरतवंशी, जो समस्त कष्टों से मुक्त होने का इच्छुक है, उसे उन भगवान् का श्रवण, महिमा-गायन तथा स्मरण करना चाहिए जो परमात्मा, नियंता तथा समस्त कष्टों से रक्षा करने वाले हैं।
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देवी कृष्णमयी प्रोक्ता राधिका परदेवता ।
सर्वलक्ष्मीमयी सर्वकान्तिः सम्मोहिनी परा ।।
दिव्य देवी श्रीमती राधाराणी भगवान् श्रीकृष्ण की प्रत्यक्ष अर्धांगिनी है। वे समस्त लक्ष्मीयों में प्रधान हैं। वे सर्वआकर्षक भगवान् को आकृष्ट करने के लिए समस्त आकर्षण-युक्त हैं। वे भगवान् की आदि अन्तरंगा शक्ती है।
बृहद् गौतमीय तन्त्र
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श्रीचैतन्य महाप्रभु

बीमारी अवस्था में कृपापात्र – ‘वासुदेव विप्र’
श्रीमन् महाप्रभु दक्षिण की यात्रा के समय जब कूर्म क्षेत्र में थे तो वहाँ वासुदेव नाम का एक ब्राह्मण रहता था जिसके शरीर में कुष्ट रोग था, उसके सारे शरीर में कीड़े पड़ गये थे। उसके अंग से जब कोई कीड़ा गिर जाता तो वह उसे उठाकर फिर उसी अंग में रख देता। उसे श्रीमन् महाप्रभु जी के आगमन का समाचार रात को मिला। अतः वह भी कूर्म ब्राह्मण (जिसके घर महाप्रभु ठहरे थे) के घर प्रभु के दर्शन करने के लिए आया परन्तु कूर्म ब्राह्मण ने उसे महाप्रभु जी के चले जाने की सूचना दी। तब वह दुःखी होकर मूर्च्छित दशा में पृथ्वी पर गिर पड़ा ।
होश में आने पर वासुदेव अनेक प्रकार के विलाप करने लगा । इतने में महाप्रभु जी वहाँ पर प्रकट हो गये और उसे आलिंगन कर लिया। महाप्रभु जी के स्पर्श मात्र से उसका विरह दुःख तथा कुष्ठ रोग दोनों नाश हो गये एवं उसका शरीर अति सुन्दर हो गया। आर्त बन्धु श्रीचैतन्य देव की कृपा देख कर वासुदेव जी का हृदय अति विस्मय एवं आनन्द से भर गया ।
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प्रमणाममीशस्य शिरः फलं
विदुस्तदर्चनं पाणिफलं दिवौकसः ।
मनः फलं तद्गुणतत्त्व – चिन्तनं,
वाचः फलं तद्गुण – कीर्तनं बुधाः ।।53 ।।
देवलोक में रहने वाले बुद्धिमान देवताओं का तो मानना यह है कि ईश्वर श्रीनारायण को प्रणाम करना मस्तक धारण करने का फल है, उसी प्रकार उनकी पूजा करना हाथ प्राप्त करने का फल है, मन उनके गुणों का चिन्तन मन का फल है तथा उनका गुण-कीर्तन करना वाक्य का फल है।
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
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सिद्धदेह द्वारा भजन
किसी व्रजवासी भक्तके भावके प्रति लोभ पैदा होनेपर रागानुगाभक्ति-साधक अपनेको उनका अनुचर मानकर उनके आनुगत्यमें, उनके भावमें भावित अपने सिद्धशरीरसे अन्तरङ्ग भगवद्भजन करेंगे। जब तक उनके हृदयमें प्रेमकी प्रागवस्थारूप भावका उदय न हो जाए, तब तक अपने भजनके अनुकूल बहिरङ्ग साधनके रूपमें वैधीभक्तिके अङ्गोंका आचरण करते रहना चाहिए। शास्त्र और युक्ति अपने भावके अनुकूल होनेपर उनका अनुशीलन करेंगे, कृष्ण और कृष्णभक्तोंकी श्रद्धापूर्वक सेवा करेंगे तथा उनकी लीलाकथा अनुशीलनके पीठस्वरूप व्रजमें वास करेंगे। शरीरके द्वारा व्रजवास किसी कारणसे सम्भवपर न होनेपर मनसे ही सदा-सर्वदा व्रजमें वास करेंगे।
वैधीभक्तिमें शास्त्र और युक्तिगत विधि ही एकमात्र कारण है। रागानुगाभक्तिमें श्रीकृष्ण या कृष्णभक्तोंकी कृपा ही एकमात्र कारण है।
कोई-कोई वैधीभक्तिको प्रेमभक्तिकी मर्यादास्वरूप होनेके कारण मर्यादा-मार्ग भी कहते हैं तथा रागानुगाभक्तिको प्रेमभक्तिकी पुष्टिकारिणी होनेके कारण पुष्टिमार्ग भी कहते हैं। वैधीभक्ति सदैव ऐश्य-ज्ञानयुक्त होती है, परन्तु रागानुगाभक्ति सर्वदा ऐश्य-ज्ञानरहित होती है। कहीं-कहीं वैधभक्तगण वैधी-प्रवृत्तिका अवलम्बन करते हैं।
श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर
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जिनकी कृपा से कर्त्तापन का अभिमान दूर होता है, वे ही श्रीगुरुपादपद्म हैं। जो हमारी कानों में श्रौतवाणी प्रदान करते हैं, जो निरन्तर हमारे कानों में श्रौतवाणी का अभिषेक करके हमको तृण से भी सुनीच, वृक्ष की भाँति सहिष्णु, अमानी, मानद कर रहे हैं एवं सर्वदा हमारे मुख में वैकुण्ठकीर्तन प्रकाशित होने की शक्ति सञ्चार करते हैं, वे कृष्णशक्ति ही श्रीगुरुपादपद्म हैं। श्रीगुरुपादपद्म ही हमें मायाशक्ति के चंगुल से मुक्त कर देते हैं ।
श्रीलप्रभुपाद
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छाड़िया वैष्णव सेवा उद्धार पेयेछे केवा’
वैष्णव कभी भी अपने को वैष्णव नहीं समझता और वह किसी दूसरे वैष्णव से सेवा लेने में संकोच समझता है, किन्तु वैष्णव सेवा को छोड़कर जीव की गति नहीं है, इसलिए करुणामय श्रीहरि की इच्छा से जीवों का उद्धार करने के लिए वैष्णवों में व्याधि देखी जाती है। व्याधिग्रस्त अवस्था में वैष्णव कुछ करने में असमर्थ होता है तो भाग्यवान जीव को सेवा का सुअवसर मिलता है। मन्दबुद्धि एवं दुर्भाग्यशाली जीवों की वैष्णव सेवा में रुचि नहीं होती। वह अज्ञानतावश वैष्णव को कर्मफल में बन्धे जीव की तरह समझ उन पर अश्रद्धा करते हैं।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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जिन्हें तत्त्व ज्ञान नहीं है, वे ही भगवान् के जन्म-कर्म के जागतिक होने की धारणा करते हैं उनके श्रीअंग को पांचभौतिक (साधारण) मानते हैं, उन्हें जन्म-मृत्यु के अधीन समझते हैं। इस प्रकार की जागतिक बुद्धि या दुर्बुद्धि के कारण ही उनकी संसार दशा दूर नहीं होती वे पुनः पुनः जन्म एवं मृत्यु को वरण (धारण) करने के लिए मजबूर होते हैं।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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निश्चिन्त जीवन-भजन के प्रतिकूल
बहुत बाधा-विपत्तियों के बीच ही हमारा जीवन गठित है। निश्चिन्त जीवन आलस्यमय है, पारमार्थिकजन ऐसे जीवन की कभी भी कामना नहीं करते हैं। वे जानते हैं कि, “An idle brain is the devil’s work-shop” (खाली दिमाग शैतान का घर है)। अतः सेवामय-प्रगतिपूर्ण जीवन ही आदर्श है। ऐसा कुछ नहीं है जो चेष्टा के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। “सबुरे मेउया फले” – (अर्थात् धैर्य का फल मीठा होता है) यह सत्य है। किसी के जीवन में पूर्ण विराम लग गया है-यह कोई दावे के साथ नहीं कह सकता है या ऐसा संभव भी नहीं है। लेकिन (साधन-भजन में) उन्नति का प्रयास सब समय जारी रखना होगा। कम से कम यथास्थिति (वर्तमान स्थिति) को बनाए रखने का प्रयास करते रहना चाहिए।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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शुकदेव गोस्वामी जी ने दुर्वासा के दृष्टान्त के द्वारा हमें भक्तों के चरण में अपराध करने के विषय में विशेषरूप से सावधान किया है। दुर्वासा जैसे महातपस्वी ने जब तक महाराज अम्बरीष की निष्कपट भाव से स्तव-स्तुति नहीं की, तब तक सुदर्शन प्रसन्न नहीं हुए। परन्तु महाराज अम्बरीष की स्तुति सुनकर भक्त वस्तल भगवान् के सेवक सुदर्शन शान्त हो गये और उन्होंने दुर्वासा जी के कुदर्शन को दूर कर दिया। जब तक सुदर्शन की प्रसन्नता नहीं होती है, तब तक कुदर्शन नहीं हटता है अर्थात् जब तक भक्त की कृपा प्राप्त नहीं होती, तब तक विष्णु और वैष्णवतत्व के दर्शन की योग्यता प्राप्त नहीं होती।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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