श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

देहापत्यकलत्रादिषु आत्मसैन्येष्वसत्स्वपि ।
तेषां प्रमत्तो निधनं पश्यन्नपि न पश्यति ॥
(2/1/4)
देह-शरीर; अपत्य- बच्चे; कलत्र-पत्नी; आदिषु -तथा अन्य सारे सम्बन्धों में; आत्म-निजी; सैन्येषु -सिपाहियों में; असत्सु – पतनशील; अपि – के बावजूद; तेषाम्-उन सबों का; प्रमत्तः – अत्यधिक आसक्त; निधनम् – विनाश; पश्यन्-अनुभव करके; अपि-यद्यपि; न-नहीं; पश्यति – देखते हैं।
आत्मतत्त्व से विहीन व्यक्ति जीवन की समस्याओं के विषय में जिज्ञासा नहीं करते, क्योंकि वे शरीर, बच्चे तथा पत्नी रूपी विनाशोन्मुख सैनिकों के प्रति अत्यधिक आसक्त रहते हैं। पर्याप्त अनुभवी होने के बावजूद भी वे अपने अवश्यंभावी विनाश (मृत्यु) को नहीं देख पाते।
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कलौ कृतयुंग तस्य कलिस्तस्य कृते युगे ।
यस्य चेतसि गोविन्दो हृदये यस्य नाच्युतः ।।
जिसके हृदय में भगवान् गोविन्द होते हैं, उसके लिए कलियुग में सतयुग प्रकट होता है, किन्तु जिसके हृदय में अच्युत भगवान् नहीं होते उसके लिए सतयुग भी कलियुग बन जाता है।
विष्णु धर्म
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श्रीचैतन्य महाप्रभु

बीमारी अवस्था में कृपापात्र – ‘अमोघ’
श्रीजगन्नाथ देव जी की रथयात्रा के बाद एवं श्रीमहाप्रभु जी की वृन्दावन यात्रा से पूर्व श्रीमन् महाप्रभु जी ने श्रीसार्वभौम भटट्टाचार्य जी के विशेष अनुरोध पर उनके घर पाँच दिन भिक्षा करनी स्वीकार की। एक दिन सार्वभौम जी की पत्नी ने बहुत प्रकार के व्यंजन इत्यादि महाप्रभु को परोसे, उसी समय उनके दामाद अमोघ ने वे सारे नैवेद्य जो महाप्रभु को परोसे गये थे, देख लिये। इस पर वह ‘प्रेम- भिखारी’ श्रीमन् महाप्रभु को भोगी – सन्यासी बोलकर निन्दा करने लगा। श्रीमन् महाप्रभु जी की निन्दा सुनकर सार्वभौम भट्टाचार्य अपने दामाद को मारने के लिए हाथ में लाठी लिए दौड़ने लगे किन्तु वह भाग निकला। सार्वभौम जी की पत्नी भी उसे मर जाने का शाप देने लगी । अपनी ही कन्या का पति होने पर भी उन्होंने महाप्रभु की निन्दा करने वाले को क्षमा नहीं किया और निन्दक दामाद का कभी भी मुँह न देखने की ठान ली। अन्त में दोनों सार्वभौम और उनकी पत्नी ने श्रीमहाप्रभु से क्षमा माँगी और उन्हें अपने वास स्थान पर भेज दिया ।
उस रात्रि को ही महाप्रभु जी की निन्दा करने वाले अमोघ को हैज़ा हो गया और सुबह तक उसकी मरने जैसी हालत हो गई। किन्तु इधर जब श्रीमन् महाप्रभु जी ने गोपीनाथ आचार्य से सुना कि भट्टाचार्य के दामाद ‘अमोघ’ को भयानक रोग हो गया है तो दीन वत्सल श्रीमन् चैतन्य महाप्रभु तुरन्त दौड़े-दौड़े आ गये अमोघ के पास। उन्होने उसकी छाती पर हाथ रखा और उससे कहा “अमोघ ! भगवान के रहने के स्थान अपने हृदय में तूने मात्सर्य को क्यों बिठा रखा है”। महाप्रभु जी ने उसकी छाती पर हाथ रख कर उसे कृष्ण नाम का अधिकार प्रदान कर दिया । महाप्रभु जी के कोमल वचनों को सुनकर व उनके स्पर्श को पाकर अमोघ कृष्ण-कृष्ण कहता उठ बैठा और प्रेमोन्मत होकर नृत्य करने लगा । स्वयं कृपा करने के बाद महाप्रभु जी स्वयं ही अमोघ के शरीर में उदित प्रेम के कम्प, अश्रु, पुलक आदि अष्ट सात्विक विकार देखकर हँसने लगे। देखते ही देखते अमोघ पूर्ण स्वस्थ होने के साथ-साथ भक्त भी बन गया ।
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दारा वाराकर – वरसुता ते तनूजो विरिन्चिः,
स्तोता वेदस्तव सुरगणो भृत्यवर्गः प्रसादः ।
मुक्ति – र्माया जगदविकलं तावकी देवकी ते,
माता – मित्रं बलरिपुसुत -स्तत् त्वदन्यं न जाने ।।52।।
हे भगवन्! लक्ष्मीदेवी आपकी पत्नी हैं, ब्रह्माजी आपके पुत्र हैं सभी वेद आपकी महिमा बोलने वाले, स्तव करने वाले हैं, देवता आपके दास हैं, मुक्ति ही आपकी कृपा है, यह नश्वर जगत् आपकी माया है, श्रीदेवकी देवी जी आपकी माता हैं, अर्जुन आपके सरखा हैं, अतएव आपको छोड़कर दूसरे किसी को भी मैं नहीं जानता हूँ।
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
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मनुष्यमात्र ही भक्ति के अधिकारी हैं

शास्त्रोंके अनुसार मानवमात्र ही भक्तिके अधिकारी हैं। भक्ति ही जीवका सहजधर्म है। इसलिए प्रत्येक जीवको ही भक्ति पानेके लिए प्रयत्न करना चाहिए। इसके द्वारा यह भी स्वीकृत हुआ कि चारों वर्णों और चारों आश्रमोंमें स्थित सभी लोगोंका भक्तिमें अधिकार है। इतना ही नहीं, चारों आश्रमों और वर्णोंके बहिर्भूत अन्त्यज भी मनुष्यकी श्रेणीमें होनेके कारण भक्तिके अधिकारी हैं। अन्त्यजगण भक्तिके अधिकारी हैं- यह सत्य है, परन्तु उन्हें भक्ति प्राप्त करनेके लिए उतनी सुविधा और सुयोग नहीं है, जितना वर्णाश्रमीको प्राप्त है। उनका जन्म, सङ्ग, कर्म और स्वभाव- यह सब इतना अवैध होता है कि उनका जीवन सदा जड़ासक्त पशुजीवनके समान ही है। उदरपूत्तिके विषयमें वे नितान्त स्वार्थी, परद्रोही और निर्दयी होते हैं। इसलिए उनके लिए भक्तिपथ थोड़ा यत्नसाध्य है। उनका भी भक्तितत्त्वमें अधिकार है- यह श्रीहरिदास ठाकुर, नारदके शिष्य व्याध, यीशु, पल आदि भक्तोंके चरित्रकी आलोचनासे स्पष्ट होता है; परन्तु उनके जीवनमें यह भी लक्षित होता है कि उन्होंने बड़े कष्ट और विघ्न-बाधाओंको सहकर भक्ति पथको ग्रहण किया था। यहाँ तक कि वे अधिक दिनों तक भक्तजीवनकी रक्षा करनेकी सुविधा भी प्राप्त न कर सके।
श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर
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दाम्भिक – व्यक्ति कभी भी प्रचार कार्य नहीं कर सकता। अहंकारी व्यक्ति प्रचारक का वेश ग्रहण करके ‘मैं ही प्रचारक हूँ’- ऐसा अभिमान करता है, इसीलिए असल सत्य उसके निकट आत्मप्रकाश नहीं करता है। अतएव उसके द्वारा जगत का कोई यथार्थ मंगल नहीं हो सकता है ।
श्रीलप्रभुपाद
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जिस प्रकार, वृक्ष की जड़ में पानी देने से वृक्ष की टहनी, फूल पत्ता व तना इत्यादि सब तृप्त हो जाते हैं; जिस प्रकार पेट में खाना देने से पूरा शरीर व सब इन्द्रियाँ तृप्त हो जाती हैं, उसी प्रकार सब कारणों के कारण, सभी प्राणियों के साथ सम्बन्धयुक्त अद्धयज्ञानतत्व, सर्वव्यापक, अच्युत, श्रीहरि की सेवा के द्वारा सभी प्राणियों की सेवा या तृप्ति हो जाती है।
श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी
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शिष्य उसे ही कहा जाता है, जो शासन वाक्य सुनने को तैयार हो

भजन की शिक्षा ही श्रील गुरुदेव की वास्तविक कृपा है। जहाँ भजन में त्रुटि है अथवा अपने भौतिक स्वार्थ को पूरा करने का उद्देश्य है, उसे किस तरह से दूर करके भजन में प्रतिष्ठित किया जाय, उस संबंध में कठोर यहाँ तक कि, निर्मम वाक्य ही गुरुदेव की वास्तविक कृपा है। गुरुदेव के उन वाक्यों को जो लोग सुनना नहीं चाहते हैं, उनका मंगल कैसे होगा? शिष्य उसे ही कहा जाता है, जो शासन-वाक्य सुनने को तैयार हो। प्यार-दुलार के वाक्यों से हमें इन्द्रिय सुख मिलता है, किन्तु उसकी अपेक्षा कठोर वाक्य श्रवण करने का अभ्यास बनाना ही शिष्य का प्रधान कर्त्तव्य है। हम सबने मठ में आकर सबसे पहले इस Principle (नीति) को ही ग्रहण किया है। मेरा व्यक्तिगत जीवन श्रील प्रभुपाद की गालियों से ही प्रस्तुत हुआ है। मेरी त्रुटि देखते ही वे कठोर शब्दों में शासन किया करते थे। अक्रोध परमानन्द अभिन्न नित्यानन्द श्रील प्रभुपाद का शासन प्राप्त करके ही, अपने को शिष्य समझकर अभिमान करने की कोशिश करता था। उन सब उपदेश-वाक्यों को सुनकर कितना आनन्दित होता था, उसे मैं भाषा में व्यक्त नहीं कर पा रहा हूँ। भले ही गुरुपादपद्म के मधुर वाक्यों से शिष्य को सेवा करने में बहुत अधिक उत्साह मिलता है, फिर भी उसे याद रखना चाहिए कि, साधन अवस्था में, शिष्य को, श्रीगुरुदेव के मुखारविन्द से अपनी प्रशंसा श्रवण करना भी सम्पूर्ण रूप से निषिद्ध है। गुरु के पास अपनी प्रशंसा करना जिस प्रकार निषेध है, उसी प्रकार गुरुदेव के मुख से अपनी प्रशंसा सुनना भी निषेध है।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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गुरु-वैष्णवों का अन्तःकरण समझने पर उनके विचारों को जाना जा सकता है

गुरु-वैष्णवों को प्रीति करने के लिए उनके अन्य सतीर्थ और अपने गुरु-भाईयों के प्रति भी समान रूप से ही श्रद्धा-भक्ति रखनी चाहिए। ऐसा नहीं होने पर, “एके निन्दे, आरे बन्दे, एई मत भण्ड” (एक की निन्दा, दूसरे की स्तुति, इस प्रकार की कपटता है) इस विचार में आबद्ध होना पड़ता है। गुरु-वैष्णवों का विचार समझने के लिए उनके अभिप्राय (हृदय के भाव) को अनुभव करने की चेष्टा करनी चाहिए। उनके मूल वक्तव्य-विषय (विचारों) को जानकर उसे वास्तव में रूपान्तरित करने का नाम ही गुरु-सेवा या वैष्णक् सेवा है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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वैष्णव अपराध

अपराध” शब्द की व्युत्पत्ति करने से “राधात् अर्थात् अराधनाम् अपगतः” अर्थात् आराधना से हटना है। वैष्णव के चरण में अपराध होने से भगवत् आराधना से हटना पड़ता है। भक्त वत्सल भगवान् अपने भक्तों के प्रति किसी भी अपराध को सहन नहीं करते है। वैष्णव की कृपा नहीं होने से गौराङ्ग महाप्रभु की कृपा नहीं होती है। भक्त की कृपा से भक्ति की प्राप्ति होती है। और वही भक्ति जो वैष्णव से प्राप्त होती है, भक्ति से वशीभूत कृष्ण की कृपा को प्राप्त कराती है। श्रील वृन्दावन दास ठाकुर इसी तत्व का निरूपण करते हुए श्री चैतन्य भागवत में लिखते हैं वैष्णवेर कृपाय सेई पाई विश्वम्भर। भक्ति बिना जप तप अकिंचितकर ।। (चै.भा. मध्य 21.7) वैष्णव की कृपा से ही भगवान् विश्वम्भर को प्राप्त किया जा सकता है। भक्ति के बिना जप, तप इत्यादि जितने भी साधन हैं, भगवान को प्राप्त करने में नगण्य हैं। परम आराध्य “श्रील प्रभुपाद” अपने भाष्य में लिखते हैं कि सेवान्मुख न हो के भगवन् नाम-जप और नाना प्रकार की तपस्या आदि सब व्यर्थ है। भगवान् के सेवकों की कृपा के बिना किसी के हृदय में सेवान्मुखता धर्म उन्मेषित नहीं हो सकता। यहाँ सेवान्मुखता धर्म को ही भक्ति कहा गया है।
श्रीश्रीमद् भक्ति प्रमोद पुरी गोस्वामी महाराज जी
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जब तक मन अतीन्द्रिय अप्राकृत विषय में स्थिर नहीं होगा, तब तक अच्छे-बुरे दोनों विषय ही अनुभव होंगे। जब वास्तव सत्य में वह प्रतिष्ठित होता है, तब सदैव सत्-वस्तु का ही दर्शन और अनुभव होता है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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तप्त-जीवनम्
अर्जुन द्वारा कृष्ण को गुरु स्वीकार करने की क्या आवश्यकता थी? इसका अर्थ यह हुआ कि गुरु स्वीकार करने के बाद अर्जुन कृष्ण से तर्क नहीं कर सकते, और कृष्ण जो भी कहेंगे वह उन्हें पूर्णतः स्वीकार करना होगा। गुरु स्वीकार करने से पूर्व जब वे दोनों मित्रता के स्तर पर वार्तालाप करते थे, तो उसमें तर्क-वितर्क का न ही अंत होता था और न ही कोई परिणाम निकलता था। किंतु गुरु स्वीकार करने के उपरांत कोई तर्क नहीं चलेगा। उन्हें कृष्ण के प्रत्येक वाक्य को यथारूप स्वीकार करना ही होगा। इसी कारण से अर्जुन ने कृष्ण को गुरु रूप में स्वीकार किया।
श्रील ए सी भक्तिवेदांत स्वामी महाराज
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भगवान् की कृपा से यह दुर्लभ मनुष्य जन्म हमें केवल श्रीकृष्ण-भजन के लिए मिला है, न कि अनित्य सांसारिक विषय-भोग के लिए। किसी भी क्षण हमें इस अवसर से वंचित होना पड़ सकता है। अत: हमें अपने बहुमूल्य समय को केवल श्रीकृष्ण-सेवा में ही नियोजित करना है, कहीं और नहीं।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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