श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन च वा वयः ।
दिवा चार्थेहया राजन् कुटुम्बभरणेन वा ॥
(2/1/3)

निद्रया-सो करके; हियते- नष्ट करते हैं; नक्तम्-रात्रि; व्यवायेन-मैथुन में; च-भी; वा-या तो; वयः – जीवन-अवधि, आयु; दिवा-दिन; च-भी; अर्थ- आर्थिक; ईहया- विकास; राजन्- हे राजा; कुटुम्ब – पारिवारिक सदस्यों के; भरणेन – पालन करने में; वा-अथवा ।

ऐसे ईर्ष्यालु गृहस्थ (गृहमेधी) का जीवन रात्रि में या तो सोने या मैथुन में रत रहने तथा दिन में धन कमाने या परिवार के सदस्यों के भरण-पोषण में बीतता है।

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अशितिम् चुतरश्चैव लक्षांस्तन जीव जातिषु
भ्रमद्भिः पुरूषैः प्राप्यं मानुष्यं जन्म पर्ययात् ।
तदप्य अभलतां जातः तेषाम् आत्माभिमानिनाम्
वराकाणाम् अनाश्रित्य गोविन्द चरण द्वयम् ।।

जीव को ८४ लाख योनीयों से यथाक्रम उत्क्रांती करने के बाद मनुष्य जन्म प्राप्त होता है। लेकिन जो श्री गोविन्द के चरणकमलों का आश्रय नही स्विकारता ऐसे दुराभिमानी, मुर्ख के लिये ऐसा महत्त्वपूर्ण मनुष्य जीवन निष्फल होता है।

ब्रह्म वैवर्त पुराण

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श्रीचैतन्य महाप्रभु

राजदण्ड की अवस्था में कृपापात्र – ‘गोपीनाथ’

एक दिन कुछ लोगों ने आकर श्रीमहाप्रभु जी से निवदेन किया “प्रभु! गोपीनाथ (जो राय रामानन्द जी का भाई है और श्री भवानन्दजी का पुत्र है) को राजा प्रतापरुद्र का बड़ा लड़का चाँग पर चढ़ा रहा है और नीचे तलवार पर उसे धक्का देकर मौत के घाट उतारना चाहता है। आप यदि उसकी रक्षा करें, तब उसेका जीवन बच सकता है। श्रीभवानन्द तो अपने वंश सहित आपके सेवक हैं, इसलिए उसका पुत्र गोपीनाथ भी आपका एक सेवक ही है, अतः आपके लिए उसकी रक्षा करना उचित ही है।” श्रीमहाप्रभु जी ने पूछा – ‘राजा उसे क्यों मारना चाहता है?” तब वे लोग’ सब वृतान्त प्रभु को सुनाने लगे ।

उन्होंने कहा- “प्रभु ! गोपीनाथ पट्टनायक रायरामानन्द जी का भाई है। वह राज-कर आदि वसूल करके राजा प्रताप रुद्र को अदा करता है। उस राजा का दो लाख काहण (१ काहण – ६ न०. पै०) बाकी बचता है। जब राजा ने गोपीनाथ से अपने २ लाख काहण माँगे तो गोपीनाथ ने राजा से कहा कि मेरे पास अभी नकद तो हैं नहीं जो तुम्हें अभी गिनकर दे दूँ। धीरे-धीरे वह अपनी सम्पति आदि बेच-बिचाकर सब हिसाब चुका देगा । गोपीनाथ ने राजा से यह भी कहा था कि उसके पास दस-बारह घोड़े हैं, उन्हें राजा खरीद ले। इतना कहकर गोपीनाथ ने वे घोड़े भी लाकर राज द्वार पर बाँध दिये थे। राजा का पुत्र ही अक्सर घोड़ों का लेन-देन करता है। इसलिये राजा ने अपने उच्च कर्मचारी के साथ अपने पुत्र को घोड़ों का मूल्य करने के लिए भेज दिया। उस राजकुमार ने उन घोड़ों का मूल्य बहुत कम बताया जिसे सुनकर गोपीनाथ को अच्छा न लगा।

गोपीनाथ ने राजकुमार से कहा “मेरे घोड़े गर्दन नहीं हिलाते और न ही बार-बार ऊपर की ओर देखते हैं, अतः मेरे घोड़ों का मूल्य घटाना नहीं चाहिए ।” राजकुमार का स्वभाव था कि वह बात-बात में गर्दन हिलाते व ऊपर की ओर देखते, सो राजकुमार गोपीनाथ द्वारा कसे व्यंग को सुनकर क्रोधित हो उठा एवं वह अपने पिता राजा प्रतापरुद्र से आकर गोपीनाथ के विरुद्ध बहुत कुछ बढ़ा चढ़ा कर कहने लगा। उसने कहा कि “यह गोपीनाथ हमें एक कौड़ी भी नहीं देना चाहता, वह रूप बदल कर यहाँ से भाग जायेगा ।” राजकुमार की बात सुनकर राजा प्रतापरुद्र ने कहा “जैसा अच्छा दीखे, वैसे करो, अर्थात् उससे पैसा वसूल हो, वही उपाय करो।” लेकिन राजपुत्र ने आकर उसे सूली पर चढ़ा दिया है और नीचे खड्डे में तलवारें गड़वा दी है। वह उसे उस खड्डे में गिराकर उसके प्राण लेना चाहता है। (प्रभु ! अब आप किसी न किसी प्रकार से उसकी रक्षा कीजिए।)

यह सब वृतान्त सुनकर श्रीमहाप्रभु जी ने कुछ प्रणयरोष प्रकट करते हुए कहा “गोपीनाथ राज-धन नहीं देना चाहता है, फिर इसमें राजा का क्या दोष है? उसने राज-कर प्रजा से वसूल कर लिया और उस धन को स्वयं खा गया, उसे राजा का भय कुछ भी न रहा, वेश्याओं एवं नर्तकियों में उसने सब धन लुटा दिया है (इस प्रकार से क्या राजकार्य किये जाते हैं?) राजकार्य तो वही कर सकता है जो अपनी चतुरता से राजधन को हाथ न लगाए। उसने राजधन को वसूल कर लिया है और उसे खर्च कर दिया है।” इतना अभी श्रीमहाप्रभु जी कह ही रहे थे कि वहाँ और कुछ लोग भागते हुए आए और कहने लगे “प्रभु ! (गोपीनाथ को तो चाँग पर चढ़ा ही रखा है) अब उसके भाई वाणीनाथ को भी परिवार सहित राज कर्मचारी बाँध कर ले गये हैं।” श्रीमहाप्रभु जी ने कहा – “भाई ! राजा तो अपने हिसाब का सब धन वसूल करेगा ही, मैं एक विरक्त सन्यासी हूँ, मैं इसमें क्या कर सकता हूँ?”

जब श्रीस्वरूपादि प्रभु के जो भक्त थे, उन सबने प्रभु के चरणों में निवेदन किया – “प्रभु ! रायरामानन्द का परिवार तो सब का सब आप का दास है। उसकी रक्षा कि लिए आपको इस प्रकार उदासीनता नहीं दिखानी चाहिए।” यह सुनकर श्रीमहाप्रभु क्रोध से कहने लगे – “तो मुझे आप आज्ञा दीजिए कि मैं राजा के पास चला जाऊँ। आपका क्या यही मत है कि मैं राजा के पास जाकर आँचल फैलाऊँ और फिर सन्यासी और ब्राह्मण तो केवल पाँच गण्डा (१० कौड़ी ६ नये पैसे) के पात्र हैं, माँगने पर इन्हें कैसे कोई दो लाख काहण दे देगा ?”

इतने में वहाँ और लोग भागते हुए पहुँचे और कहने लगे – “प्रभु! गोपीनाथ को राज कर्मचारी खड़ग पर डाल रहे हैं।” यह बात सुनकर फिर प्रभु-भक्तों ने प्रभु को उसकी रक्षा के लिए प्रार्थना की। श्रीमहाप्रभु जी ने कहा- “मैं विरक्त हूँ, मुझ से कुछ न होगा।’ ‘यदि आप सब लोग उसकी रक्षा करना चाहते हैं तो सब मिलकर यही प्रार्थना श्रीजगन्नाथ जी के चरणों में जाकर कीजिए। श्रीजगन्नाथ जी ईश्वर हैं, उनके हाथों में सब सिद्धियाँ हैं, वे सब कुछ करने में समर्थ हैं, वे सम्भव को असम्भव और असम्भव को सम्भव कर सकते हैं।” यहाँ जैसे ही प्रभु ने ये क्चन कहे, उसी क्षण उधर हरिचन्दन जो राजा का प्रधान मन्त्री था, राजा प्रताप रुद्र से कहने लगा हरिचन्दन ने राजा से कहा “राजन् ! गोपीनाथ पट्टनायक तो तुम्हारा सेवक है। सेवक के लिए तो प्राणदण्ड देना उचित नहीं है। विशेषतः उस से तो आपको बहुत धन लेना बाकी है, उसके प्राण लेने से क्या लाभहोगा? अपना धन ही नाश हो जाएगा। उचित दामों में उसके घोड़े ले लीजिए और बाकी पैसा वह धीरे-धीरे अदा कर देगा, व्यर्थ में उसके प्राण क्यों ले रहे हैं ? राजा ने विस्मित होकर कहा- “मुझे तो इस बात का पता नहीं है, प्राण क्यों लिए जा रहे हैं! हमें तो उससे पैसा लेना है। हरिचन्दन ! तुम जाकर सब समाधान करो, जैसे धन की वसूली हो और उसके प्राण भी रहें।

तब श्रीहरिचन्दन ने आकर राजा का आदेश राजकुमार को सुनाया और गोपीनाथ को चांग (सूली) पर से शीघ्र नीचे उतार लिया । श्रीहरिचन्दन ने श्रीगोपीनाथ से पूछा कि राजा का धन जो तुम्हारे ऊपर है, तुम उसे कैसे देना चाहते हो ? श्रीगोपीनाथ ने कहा “उचित दामों में मेरे सब घोड़े ले लीजिए और बाकी धन मैं जितना दे सकूँगा, धीरे-धीरे सब चुकता कर दूँगा। राजपुत्र तो अविचार से मेरे प्राण लेना चाहते हैं, इसमें मैं क्या कह सकता हूँ?” श्रीहरिचन्दन ने यथार्थ मूल्य में सब घोड़े ले लिये और शेष धन को चुकाने की अवधि स्थिर करके श्रीगोपीनाथ को उसके घर भेज दिया।

इस ओर श्रीप्रभु ने उन लोगों से पूछा कि वाणीनाथ को जब राज कर्मचारी लोग बान्ध कर ले गए, तब वह क्या कर रहा था ? उन्होने कहा – “प्रभु ! वाणीनाथ तो निर्भय होकर ‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे’ इस महामन्त्र का निरन्तर जप करता हुआ जा रहा था । सँख्या के लिए वह अंगुलियों पर गिनता जाता था, सहस्त्रादि पूर्ण होने पर वह अपने शरीर पर रेखा खींच देता था।” यह बात सुनकर श्रीमहाप्रभु जी को परम आनन्द हुआ । भला, उनकी कृपा की भङ्गियों को कौन जान सकता है? (बाहर में प्रभु ने गोपीनाथ की विपदा में उदासीनता दिखाई है, किन्तु भीतर-भीतर प्रभु ने करुणा कर प्रेरणा द्वारा हरचिन्दन को राजा के पास भेजकर गोपीनाथादि को मुक्त करा दिया है और महाविपद में भी श्रीवाणीनाथ की भजन निष्ठा एवं स्थिरता को प्रकाशित किया है।)

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हे गोपालक ! हे कृपाजलनिधे! हे सिन्धुकन्यापते !
हे कंसान्तक ! हे गजेन्द्र करुणापारीण! हे माधव !।
हे रामानुज ! हे जगत्त्रयगुरो हे पुण्डरीकाक्ष! मां
हे गोपीजननाथ ! पालय परं जानामि न त्वां विना ।।51।।

हे गायों का पालन करने वाले ! हे दया के सागर! हे लक्ष्मीपते, हे कंस – विनाशक, हे गजेन्द्र के प्रति करुणा करने में उतावलापन रखने वाले ! हे माधव, हे बलराजजी के छोटे भाई श्रीकृष्ण, हे त्रिभुवन के गुरु, हे गोपीजन – वल्लभ ! मेरी रक्षा करो, आपको छोड़कर मैं दूसरे किसी को भी नहीं जानता हूँ।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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वर्णाश्रमधर्म और वैधीभक्तिमें सम्बन्ध

यहाँ विवेचनीय विषय यह है कि पहले जिस वर्णाश्रमधर्मका उल्लेख किया गया है, उसके साथ वैधीभक्तिका सम्बन्ध क्या है? प्रश्न यह है कि क्या वर्णाश्रमधर्मको छोड़कर वैधीभक्तिका आश्रय ग्रहण करना पड़ता है अथवा वर्णाश्रमधर्मका पालन करते हुए ही भक्तिका आचरण करनेके लिए वैधीभक्तिमार्ग ग्रहण करना पड़ता है? यह पहले ही कहा जा चुका है कि शुद्धाभक्तिका अच्छी तरहसे साधन करनेके लिए निरोग और बलिष्ट शरीर, उत्तम और सुसंस्कृत मानसवृत्ति, सुन्दर और निर्दोष समाज आदिकी आवश्यकता होती है और इन सबके लिए ही वर्णाश्रमधर्मकी मुख्य रूपसे आवश्यकता है अर्थात् उत्तम रूपसे शरीर पालन, मानसवृत्तिका सुन्दर अनुशीलन और उन्नति साधन, सामाजिक कल्याण-चर्चा और आध्यात्मिक शिक्षा ही वर्णाश्रमधर्मका मुख्य तात्पर्य है। मनुष्य जब तक जड़शरीर में आबद्ध है, तब तक वर्णाश्रमधर्मकी आवश्यकताको कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता। अस्वीकार करनेसे पूर्वोक्त चारों प्रकारकी शिक्षाओंके अभावमें जीव कुपथगामी हो पड़ेगा तथा उसका किसी भी प्रकारसे कल्याण-साधन नहीं हो सकता। इसलिए शरीर, मन, समाज और आध्यात्मिक कल्याण-साधन करनेके लिये वर्णाश्रम-व्यवस्थाको उपयुक्त विधि जानकर उसका पालन करना होगा।

श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर

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अपूर्णवस्तु के संग और सेवा के द्वारा अमंगल होता है और पूर्णवस्तु के संग और सेवा के द्वारा हमारा मंगल होता है। पूर्ण के लिए पूर्णयत्न करना आवश्यक है। अपूर्ण के लिए दिन गंवाने से अपूर्ण वस्तु प्राप्त होगी। इसीलिए इस जगत में रहते समय जगत् के समस्त जीवों का एकमात्र कर्तव्य है – हरिकथा श्रवण करना । श्रवण किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा कीर्तन की अपेक्षा रखता है। सब समय साधुओं के निकट हरिकथा श्रवण का सुयोग न होने पर स्वयं ही अनुकीर्तन करते हुए श्रवण और कीर्तन करना उचित है ।

श्रीलप्रभुपाद

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पृथ्वी के बुद्धिमान व्यक्ति अपना घमण्ड प्रकट करते हुये कह सकते हैं कि जब वे जगत की सभी बातें जानने में समर्थ हैं तो वे भगवान् को भी जान लेंगे। मनुष्य की ससीम बुद्धि की महिमा हम कितनी ही क्यों न कहें परन्तु उसकी दौड़ कहाँ तक हो सकती है? अन्त में बुद्धि अपने ही जाल में उलझ जाती है। प्रकृति के अतीत तत्त्व के विषय में बुद्धि का प्रवेश असम्भव है।

श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी

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श्रील गुरुपादपद्म के पास रहने से ही गुरुसेवक नहीं हुआ जा सकता

महाजनों की शिक्षा ही उनकी जीवनी है। श्रील प्रभुपाद का एक-एक उपदेश, एक-एक वेद के समान है। उनके एक उपदेश की चर्चा करते-करते ही एक लम्बा जीवन समाप्त हो सकता है। उनकी शिक्षा इतनी गहरी और इतनी उच्च-स्तर की है कि, साधारण मनुष्य कभी उसके पास पहुँच ही नहीं सकता है। उनका प्रत्येक वाक्य रूपानुग-भक्तिविनोद-धारा की जीवन्त प्रतिमूर्ति है। अनन्तवासुदेव और सुन्दरानन्द, श्रील प्रभुपाद की बात बिलकुल नहीं समझ सके। वे श्रील प्रभुपाद के पास रहते हुए भी इतने दूर थे कि, उसकी सीमा तय नहीं की जा सकती है। श्रीमन् महाप्रभु के पास रहकर भी काला कृष्णदास की जिस प्रकार की गति हुई, मैं उससे भी हीन, घृणित और नीच इनकी गति देखता हूँ। सच में, गुरुद्रोहिता जैसी सर्वाधिक अधोगति मनुष्य के लिए और क्या हो सकती है? श्रील गुरुपादपद्म के पास रहने से ही गुरुसेवक नहीं हुआ जा सकता है- इसी आदर्श की शिक्षा श्रील प्रभुपाद ने उन दोनों दानवों के चरित्र से हमें दी है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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जब तक मन अतीन्द्रिय अप्राकृत विषय में स्थिर नहीं होगा, तब तक अच्छे-बुरे दोनों विषय ही अनुभव होंगे। जब वास्तव सत्य में वह प्रतिष्ठित होता है, तब सदैव सत्-वस्तु का ही दर्शन और अनुभव होता है।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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तप्त-जीवनम्

आधुनिक सभ्यता का मूल दोष है कि प्रत्येक व्यक्ति इंजीनियर, चिकित्सक, टेक्नोलॉजिस्ट इत्यादि बनना चाहता है। परंतु जीवन की सबसे बड़ी समस्या आत्मा को समझना है। किंतु पूरे विश्व में ऐसी कोई भी शिक्षा प्रणाली नहीं है जो यह ज्ञान दे की आत्मा क्या है, उसकी क्या आवश्यकता है, वह कैसे बनी और कैसे कार्य कर रही है?

श्रील ए सी भक्तिवेदांत स्वामी महाराज

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यदि आप दूसरों की निंदा करते रहते हैं तो आपका मन मलिन हो जाता है। मलिन मन केवल दूसरों में अवगुण ही ढूंढ़ता रहेगा, इससे आपका क्या लाभ होगा? आप अपने आपको नियंत्रित करें, अनुशासित करें, निग्रह करें और संशोधन करें।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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