महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना

अथ विश्वेश विश्वात्मन् विश्वमूर्ते स्वकेषु मे ।
स्नेहपाशमिमं छिन्धि दृढं पाण्डुषु वृष्णिषु ।।

अनुवाद – अतः हे ब्रह्माण्ड के स्वामी, ब्रह्माण्ड की आत्मा, विश्व-रूप ! कृपा करके मेरे स्वजनों, पाण्डवों तथा वृष्णियों के प्रति मेरे स्नेह-बन्धन को काट डालें।

तात्पर्य – भगवान् का शुद्ध भक्त भगवान् से अपने लिए कुछ भी माँगने में शरमाता है। लेकिन गृहस्थों को कभी-कभी बाध्य होकर भगवान् से कुछ वर माँगने पड़ते हैं, क्योंकि वे पारिवारिक स्नेह की ग्रंथि से बँध होते हैं। श्रीमती कुन्ती देवी इस तथ्य से सचेत थीं, अतएव उन्होंने भगवान् से प्रार्थना की कि वे उनके स्वजनों, पाण्डवों तथा वृष्णियों के प्रेमपाश को काट दें। पाण्डव उनके निजी पुत्र हैं और वृष्णि उनके पितृ-कुल के सदस्य थे। कृष्ण इन दोनों परिवारों से समान रूप से सम्बन्धित थे। दोनों ही परिवारों को भगवान् की सहायता की आवश्यकता थी, क्योंकि दोनों ही भगवान् के आश्रित भक्त थे। श्रीमती कुन्ती की इच्छा थी कि श्रीकृष्ण उनके पुत्रों, अर्थात् पाण्डवों के साथ रहें, लेकिन कृष्ण के ऐसा करने से, कुन्ती के पितृ-कुल के लोग लाभ से वंचित रह जाते। यह पक्षपात कुन्ती के मन को दुख देनेवाला था, अतएव उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि यह स्नेह बन्धन छिन्न हो जाय।

शुद्ध भक्त अपने परिवार के सीमित स्नेह-बन्धन को छिन्न करके, समस्त विस्मृत आत्माओं के लिए, अपने भक्ति-कार्यों का विस्तार करता है। इसके जीवन्त उदाहरण षड् गोस्वामी हैं, जिन्होंने भगवान् चैतन्य के पथ का अनुसरण किया। वे सभी अत्यन्त प्रबुद्ध एवं संस्कृत धनी, सवर्ण जातियों के थे, लेकिन जनता के कल्याण के लिए, वे अपने-अपने सुखद घरों को त्याग कर संन्यासी बन गये। समस्त पारिवारिक स्नेह को छिन्न करने का अर्थ है कार्य-क्षेत्र को विस्तृत करना। ऐसा किये बिना कोई, न तो ब्राह्मण बनने के योग्य हो सकता है, न राजा, न जनता का नेता, न भगवद्भक्त। भगवान् ने, आदर्श राजा के रूप में, यह दृष्टान्त प्रस्तुत किया। श्री रामचन्द्र ने, आदर्श राजा के गुणों को प्रकट करने के लिए, अपनी प्रियतमा से स्नेह बन्धन छिन्न कर लिया था। किन ब्राह्मण, भक्त, राजा या जन-नेता को अपने-अपने कर्तव्य पालन में उदारचेता होना चाहिए। श्रीमती कुन्ती देवी इस तथ्य से अवगत थीं और अबला होने के कारण, उन्होंने पारिवारिक स्नेह के बन्धन को छिन्न करने के लिए प्रार्थना की। भगवान् को विश्वेश या विश्वात्मा कहकर सम्बोधित किया गया है, जो पारिवारिक प्रेम की कठिन ग्रंथि को काटने में उनकी शक्तिमयी क्षमता को बतानेवाला है। इसीलिए कभी-कभी अनुभव किया जाता है कि निर्बल भक्त के प्रति विशेष आकर्षण के कारण, भगवान् अपनी अपार शक्ति द्वारा नियोजित परिस्थितियों द्वारा, पारिवारिक स्नेह को छिन्न करते हैं। ऐसा करके वे भक्त को अपने ऊपर पूर्णतया आश्रित बनाकर उसके भगवद्धाम वापस जाने का मार्ग साफ कर देते हैं।

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श्रवण, कीर्त्तन और स्मरण में कीर्त्तनकी श्रेष्ठता

यद्यप्यन्या भक्तिः कलौ कर्त्तव्या तदा
कीर्त्तनाख्या भक्तिसंयोगेनैव इत्युक्तम्।
यज्ञैः सङ्कीर्त्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधस इति ।
तत्र च स्वतन्त्रमेव नामकीर्त्तनमत्यन्त प्रशस्तम् ॥

(श्रीमद्भा. ७/५/२३-२४ की क्रमसन्दर्भ टीका)

यद्यपि कलियुगमें उपरोक्त आठ प्रकारके भक्तिके अङ्गोंका पालन करना कर्त्तव्य है, फिर भी उन सबका कीर्त्तनरूपी भक्तिके संयोगसे ही साधन करना होगा। श्रीमद्भागवतमें उल्लेख है- “बुद्धिमान लोग सङ्कीर्त्तन-प्रधान यज्ञके द्वारा भगवान्‌की पूजा करते हैं।” इस प्रकार स्वतन्त्र भावसे नामसङ्कीर्त्तनकी श्रेष्ठता भी वर्णित हुई है ।

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चतुःश्लोकी भागवतमें चतुर्थ श्लोक (२.९.३५)-

एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽ ऽत्मनः ।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा ।।

– जो आत्मतत्त्व जिज्ञासु हैं, वे अन्वय व्यतिरेक भावके द्वारा विचार करते हुए जो वस्तु सदासर्वदा नित्य है, उसीका अनुसन्धान करते हैं।

अनर्थनाशेर यत्न दुइत प्रकार।
अन्वयमुखेते व्यतिरेकमुखे आर।।
अन्वयमुखेते विधि भजनविषये।
व्यतिरेकमुखेते निषेध नानाश्रये ।।

भजनरहस्यवृत्ति – ब्रह्माजीने जन्म लेनेके पश्चात् श्रीभगवान्से चार प्रश्न पूछे, जिनका उत्तर भगवानने चतुःश्लोकीके द्वारा दिया। यही चतुःश्लोकी भागवतके नामसे प्रसिद्ध है; क्योंकि यह श्रीमद्भागवतका बीजस्वरूप है, इन चार श्लोकोंमें वेद-वेदान्तादिका मर्म निहित है। प्रथम श्लोकमें भगवत् तत्त्व, भगवत् स्वरूप व उनके गुण, लीला आदि सूत्ररूपमें वर्णित हैं। द्वितीय श्लोकमें भगवत् स्वरूपसे पृथक् मायातत्त्व तथा जड़ जगतका विचार हुआ है, इन दो श्लोकोंमें सम्बन्धज्ञानको जानना चाहिए। तृतीय श्लोकमें जीव और जड़से भगवानका अचिन्त्य भेदाभेद सम्बन्ध रहनेपर भी उनके नित्य स्वरूपका अवस्थान तथा जीवोंको उनका चरणाश्रय कर महाप्रेम सम्पत्ति लाभ करनेके विषयमें कहा गया है। प्रस्तुत चतुर्थ श्लोकमें उक्त परम प्रयोजन प्राप्तिके उपाय स्वरूप साधन भक्तिका वर्णन हुआ है। साधन भक्तिके अन्तर्गत विधियोंको आनुकूल्य भावसे ग्रहण करना अन्वय कहा जाता है। उसकी प्राप्तिके बाधक प्रातिकूल्य जनक क्रियाओंको निषेध रूपमें परिगणित करके व्यतिरेक शब्दका व्यवहार हुआ है। साधनतत्त्वको अभिधेय कहा जाता है अर्थात् शास्त्रकी अभिधा वृत्तिसे जो उपदेश प्राप्त होता है उसे अभिधेय जाना जाता है, यही इस चतुर्थ श्लोकमें वर्णित है। अभिधेय रूप साधन-भक्तिमें देश, काल, पात्र तथा अवस्थाका विचार नहीं है। सभी स्थानोंपर, सभी कालमें तथा सभी अवस्थाओंमें साधन भक्ति करना जीव मात्रका कर्तव्य है। साधन भक्तिके विषयमें साधकको श्रीगुरुदेवसे जिज्ञासा करनी चाहिए तथा उनके उपदेश श्रवण करने चाहिए।

प्रस्तुत श्लोकमें अन्वय व्यतिरेकके गूढ़ार्थमें परम प्रेयसी व्रजसुन्दरियोंके साथ व्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरके संयोग-विप्रलम्भ तथा श्रृंगारजनित लीलाएँ सूचित हो रही हैं। बहिरंग जीवोंकी वंचना करनेके लिए ये समस्त अमूल्य रत्न एक मंजूषामें सुरक्षित रखे गये हैं, जिनका उद्घाटन करनेमें ज्ञानी व ऐश्वर्य भक्त असमर्थ हैं। इनका प्रकाश ब्रजरसरसिक श्रीगुरुदेव अपने योग्य अधिकारी शिष्योंके निकट ही करते हैं।

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा

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गृहस्थ भक्त को याद रखना चाहिए कि जिस घर में वह रहता है, वह उसका नहीं, बल्कि कृष्ण का है। वह तो उस घर में एक पालतू कुत्ते की तरह ही है “भाल मन्द नाहि जानि सेवामात्र करि । तोमार संसारे आमि विषय प्रहरी ।” अर्थात् ‘हे प्रभो! अच्छा बुरा क्या है, मैं कुछ नहीं जानता । मैं तो केवल सेवा करता हूँ। मैं तो आपके संसार में आपकी सम्पत्ति का प्रहरी मात्र हूँ।’ श्रीकृष्ण को ही घर का मालिक जानकर सब प्रकार से उनकी सेवा करनी चाहिए । गृहव्रत लोगों की (जिन्होंने अपने घर को ही अपनी धुरी बना रखा है अर्थात् जो कुछ भी करते हैं अपने घर और पत्नी पुत्र कन्या आदि के लिए करते हैं।) श्रीभगवान एवं श्रीगुरु के प्रति पूज्य बुद्धि नहीं होती । वे श्रीगुरुदेव एवं श्रीविग्रह को अन्य जड़ वस्तुओं की भाँति सामान्य ही मानते हैं। जो गृहव्रत का त्यागकर अपना सर्वस्व कृष्ण की सेवा में अर्पण कर देते हैं, वे ही कृष्णनाम कर सकते हैं। गृह के प्रति आसक्ति छोड़े बिना, सर्वस्व कृष्ण की सेवा में अर्पण किये बिना तथा गुरु एवं कृष्ण का दास बने बिना कृष्णनाम नहीं हो सकता ।

श्रीलप्रभुपाद

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गांधी जी का अहिंसा-आंदोलन “तृणादपि सुनिचेन” श्लोक का ही आभास

बहुत से लोगों का ऐसा मानना है कि, ‘तृणादपि सुनीच’-भाव से समाज में दुर्बलता पैदा होती है। लेकिन ऐसी बात नहीं है, बल्कि इससे सर्वोत्तम शक्ति ही प्राप्त होती है। महात्मा गांधीजी ने इस ‘तृणादपि सुनीचेन’ शिक्षा के मात्र एक कण को आश्रय बनाकर ही समूचे भारत को आज़ाद कराया था। इस प्रकार का साक्षात उदाहरण रहने के बावजूद कुछ धर्म-विरोधी पाखण्डी कहते हैं कि, महाप्रभु की इस ‘तृणादपि सुनीचेन’ शिक्षा के फलस्वरूप ही भारत पराधीन हुआ था ! यह सम्पूर्ण रूप से युक्तिहीन और विद्वेषमूलक बात है। महाप्रभु के अनुगत गौड़ीय वैष्णवों की संख्या समस्त भारतवासियों की तुलना में मुट्ठीभर ही है। बल्कि जिन्होंने महाप्रभु की शिक्षा ग्रहण नहीं की है, उनकी संख्या ही ज़्यादा है। इसलिए वे लोग ही भारत की पराधीनता का कारण हैं। महाप्रभु की यह शिक्षा यदि सभी ने पहले ग्रहण की होती तो देश पहले ही स्वाधीन हो जाता। गांधीजी का ‘Non-violence’ (अहिंसा) आंदोलन, महाप्रभु के ‘तृणादपि सुनीचेन’ का ही प्रतिबिम्ब है-जिससे कि भारत आज स्वतंत्र हुआ है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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श्रीहरि-भजन आरम्भ करते ही माया के सभी अनुचर थोड़ी-बहुत बाधायें उत्पन्न करने की चेष्टा करेंगे। किन्तु हरिभक्तों का उनसे तनिकमात्र भी अनिष्ट नहीं होगा वरन् उससे भक्ति और यश में वृद्धि ही होगी। एक वस्तु ही समस्त शक्तियों का मूल है और वही सत्य है।  इसलिये जो लोग सत्य-परमेश्वर के साथ अपने स्वार्थ को मिला लेते हैं, परमेश्वर की माया द्वारा उनका अनिष्ट भला किस प्रकार सम्भव हो सकता है? ज्ञानहीन मनुष्य, नाशवान प्राकृत, वस्तुओं में मग्न रहने के कारण सर्वदा ही भय से ग्रस्त रहते हैं। किन्तु शुद्ध भक्त और विवेकी मनुष्य ये समझते हैं कि समस्त वस्तुओं के नियन्ता श्रीकृष्ण हैं। इसलिये श्रीकृष्ण के शरणागत भक्तों को किसी प्रकार का भी भय नहीं होता। जीवों में जितनी श्रीकृष्ण से दूर रहने की प्रवृत्ति होती है, उतनी ही माया उनमें प्रवेश कर उनको अज्ञान से उत्पन्न दुःख, भय और शोकादि को प्रदान करती है। लोगों को दिखाने के लिये अथवा अपने मन को छलने के लिये पालन किया गया धर्म और वास्तविक श्रीकृष्ण-भक्ति-दोनों सम्पूर्णतः अलग-अलग हैं। श्रीकृष्ण की इच्छा में अपनी इच्छा को पूर्णतः समर्पित करना ही शुद्ध-भक्ति है और उसके लिये ही हम चेष्टा करते हैं।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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श्रीराधाराणी-सेवाराणी हैं, ‘युगलप्रेम की गुरु’ हैं; उनकी अनुगत सखी-मंजरीगण के आनुगत्य में ही श्रीकृष्णसेवा प्राप्त करने की योग्यता और अधिकार प्राप्त किया जा सकता है।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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We should take absolute shelter at the Lotus Feet of Gurudeva who will be indicated by the attributes of being well-versed in the Vedas and equivalent scriptures, receiving transcendental Divine message through preceptorial line, as well as having realisation of the Divinity.

Srila Bhakti Ballabh Tirtha Goswami Maharaj
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