कीर्त्तन’ शब्दका अर्थ
नाम-लीला-गुणादीनामुच्चैर्भाषा तु कीर्त्तनम् ॥
(भ. र. सि. पू. वि. २/६३)
नाम, गुण और लीलादिके उच्च स्वरसे कथनको ही कीर्त्तन कहते हैं।
कृष्ण विषयक श्रवणकीर्त्तनादि प्राकृत श्रोत्रवागादि इन्द्रियों द्वारा ग्राह्य नहीं है
निजेन्द्रियमनः कायचेष्टारूपां न विद्धि ताम्।
नित्यसत्यघनानन्दरूपा सा हि गुणातिगा ॥
(बृहद्भागवतामृत पू. वि. २/३/१३३)
श्रवण, कीर्त्तन, स्मरण, वन्दन आदि भक्ति श्रौत्र, वाक्, मन और देहका व्यापार नहीं है। इस भक्तिको नित्या, सत्या, घनानन्दरूपा, गुणातीता एवं प्राकृत इन्द्रियोंके द्वारा अगोचर समझो।
अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद् ग्राह्यमिन्द्रियैः।
सेवोन्मुखे हि जिहादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः ॥
(भ. र. सि. पू. वि. २/१०९)
इसलिए श्रीकृष्ण नामादि प्राकृत इन्द्रियोंकी ग्राह्य वस्तु नहीं हो सकती। सेवोन्मुख अवस्थामें उसके नाम-रूप-गुण-लीलादि भक्तकी अप्राकृत जिह्ना, चक्षु आदि इन्द्रियोंमें स्वयं प्रकाशित होती हैं ।
कीर्त्तन
कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः।
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्त्तनात् ॥
(श्रीमद्भागवत १२/३/५२)
सत्ययुगमें भगवान्का ध्यान करनेसे, त्रेतामें बड़े-बड़े यज्ञोंके द्वारा उनकी आराधना करनेसे और द्वापरमें विधिपूर्वक उनका अर्चन करनेसे जो फल मिलता है, वह कलियुगमें केवल भगवन्नामका कीर्त्तन करनेसे ही प्राप्त हो जाता है ।
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शास्त्रोंके अनुसार कृष्णप्रेम ही साध्य और भक्ति ही एकमात्र साधन है। किन्तु बद्धजीव भोग मोक्ष और कृष्णप्रेममेंसे हमारा क्या साध्य है तथा कर्म, ज्ञान और भक्तिमें क्या साधन है इसका निर्णय नहीं कर पाता; यही साध्य साधनका भ्रम है। साध्य निर्णय नहीं होनेसे साधनका भी निर्णय सम्भव नहीं तथा साधन बिना साध्यकी प्राप्ति भी नहीं होती। वैष्णव कृपासे ही भक्तिको श्रेयके रूपमें जाननेका सौभाग्य प्राप्त होता है। प्रेम भी दो प्रकारका होता है-ऐश्वर्यपर तथा माधुर्यपर। व्रजदेवियोंके आनुगत्यमें राधाकृष्णकी प्रेममयी मधुर सेवा ही सर्वोत्तम साध्य वस्तु है, ऐसा आचार्यगण निर्णय करते हैं।
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
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दुर्बलचित्त एवं अपराधी एक ही श्रेणी में नहीं आते । यद्यपि चित्त की दुर्बलता ही कुछ समय पश्चात् अपराध में बदल सकती है, तथापि हृदय की दुर्बलता की अवस्था में कामनारूप पाप एवं अपराधों के प्रति घृणा रहती है। परन्तु दुर्बलचित्त व्यक्ति पाप एवं अपराध को अत्यन्त अन्यायपूर्ण जानकर भी उसको परित्याग करने में असमर्थ होता है, जबकि अपराधी व्यक्ति इन सबको हानिकारक या अन्यायपूर्ण मानता ही नहीं है। वह सोचता है कि वह जो कुछ करता है या जो समझता है वही ठीक है, बल्कि साधुओं से ही समझने में भूल हुई है ।
यदि दुर्बलचित्त व्यक्ति कामनाओं को आदर एवं रुचिपूर्वक ग्रहण नहीं करके उनसे घृणा करते-करते उनका परित्याग कर देते हैं, तो समझना चाहिए कि उन पर कृष्ण की कृपा हो रही है। नहीं तो कृष्ण की कृपा से वञ्चित होना पड़ेगा ।
श्रीलप्रभुपाद
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हरिभजन से जीवों को सभी प्रकार का लाभ
हरिभजन ही जीवों की समस्त प्रकार की समस्याओं का समाधान है। अन्य समस्त उपायों की क्या आवश्यकता है? हरिभजन से जीवों को क्या नहीं प्राप्त होता है-“अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः। तीव्रण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ।।” (भाः 2/3/10)। इस श्लोक पर विचार करने से देखा जाता है कि, हरिभजन जीवों के लिए सब समय ही हर. प्रकार की कामना को पूरा करने में समर्थ है अकामी, सर्वकामी, मोक्षकामी-सभी हरिभजन से ही संतुष्ट होते हैं। उपनिषद् में यही बात कही गयी है-“एको बहुनां यो विदधाति कामान्।” श्रीमद् भगवद्गीता में देखते हैं-“यावानार्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके”, अर्थात् “जैसे कोई बड़ा जलाशय होने पर उससे छोटे-छोटे कई कुओं का प्रयोजन सिद्ध होता है, उसी प्रकार एकमात्र हरिभजन से ही जीव नित्य-अनित्य समस्त प्रकार के मंगल लाभकर सकता है।”
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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घषिते-घषिते यैछे मलयज-सार।
गन्ध बाड़े तैछे एइ श्लोकेर विचार।।
(चै.च. मध्य 4.192)
जिस प्रकार निरन्तर घिसने से मलय चन्दन की सुगन्ध बढ़ती है, उसी प्रकार इस श्लोक की जितनी व्याख्या की जाये, उतने ही गूढ़ से गूढ़ अर्थ निकलते हैं। जैसे रत्नों में कौस्तुभ मणि हैं, वैसे ही रसकाव्य में यह श्लोक है।
श्रीमद्भावगत के द्वादश स्कन्ध के द्वादश अध्याय के पचपन संख्यक श्लोक में पाते हैं कि कृष्ण के चरणविन्द की स्मृति जीव के सभी अमंगलों को दूर करती है। जीव रजोगुण एवं तमोगुण से निवृत्त होकर विशुद्ध सत्वत्व को प्राप्त करता है। तीनों गुणों से ऊपर उठे हुए जीव में ही भगवान् के प्रति शुद्ध सेवा की प्रवृत्ति उदय होती है। तब आत्मज्ञान के सम्बन्ध से जीव वास्तविक मंगल को प्राप्त करता है। किन्तु गुरु की अवज्ञा और वैष्णव के चरणों मे अपराध होने से जीव के सभी मंगल नष्ट हो जाते हैं।
श्री भक्ति प्रमोद पूरी गोस्वामी महाराज
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प्राचीन वैष्णवजन धीरे-धीरे इस लोक को छोड़कर हम लोगों को परमार्थ की ओर अधिक ध्यान देने का संकेत दे रहे हैं। हम लोगों की आयु बहुत ही कम है। फिर भी श्रीकृष्णपादपद्म प्राप्ति का अवसर, उसके अनुरुप सुविधा और पथ के विषय में जानते हुये भी हम तीव्रता से भजन करने का कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं। जन्म-जन्मान्तरों के संस्कारों के कारण हम अपने वास्तविक स्वरूप को भूल गये हैं। जिस कारण हम देह-गेह (शरीर और घर) या उससे सम्बन्धित मायिक वस्तुओं को ही अपना धन और सर्वस्व समझ बैठे हैं। इसीलिये हम अपने वास्तविक सर्वस्व- अखिल रसामृत मूर्त्ति – श्रीकृष्ण की प्राप्ति से वन्चित हो गये हैं। जब तक हमारा अहंकार नहीं बदलेगा तब तक श्रीकृष्ण का वास्तविक अनुशीलन सम्भव नहीं है। सांसारिक अभिमान से जो भी साधन किया जाता है, वह अध्यात्म मार्ग में आगे नहीं ले जा सकता। जब तक इस मायिक barrier को transcend (अतिक्रमण) नहीं किया जायेगा तब तक परमात्मा का अनुशीलन नहीं हो सकता।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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जागतिक जड़-बुद्धि सम्पन्न आत्मीय-स्वजन (अर्थात् विषयी बुद्धि वाले मित्र-रिश्तेदार) आदि यदि तुम्हारा आत्मकल्याण नहीं चाहते हैं तो उनके संग को मन ही मन दूर कर देना होगा
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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Even if we, by previous eternal good deeds, come in contact with a true devotee, we can not submit to him sincerely and whole heartedly. It is very difficult to give up our mundane egotism which we have acquired by cycles of births and deaths after being averse to Sri Krishna.
Srila Bhakti Ballabh Tirtha Goswami Maharaj
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