श्रृण्वतः श्रद्धया नित्यं गृणतश्च स्वचेष्टितम्।
कालेन नातिदीर्घेण भगवान् विशते हृदि ॥
(श्रीमद्भागवत २/८/४)
जो श्रीहरिकी सुमङ्गल कथाओंका श्रद्धापूर्वक नित्य श्रवण अथवा स्वयं कीर्त्तन करते हैं, भगवान् उनके हृदयमें थोड़े ही समयमें प्रकट हो जाते हैं। उस विषयमें श्रवण-कीर्त्तनकारी भक्तका कृत्रिमभावसे लीलास्मरण आदिका प्रयोजन नहीं होता। इसके द्वारा ज्ञात होता है कि स्मरण श्रवण-कीर्त्तनके ही अधीन है- “श्रवण-कीर्त्तनाधीनमेव स्मरणमिति ज्ञापितम्- श्रीचक्रवर्ती ठाकुर ।
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श्रीमद्भागवत (११.३.३२)-
क्वचिद् रुदन्त्यच्युतचिन्तया क्वचिद्धसन्ति नन्दन्ति वदन्त्यलौकिकाः ।
नृत्यन्ति गायन्त्यनुशीलयन्त्यजं भवन्ति तूष्णीं परमेत्य निर्वृताः ।।
लोकातीत महाभागवतोंकी विलक्षण स्थिति होती है। कभी-कभी वे इस प्रकार चिन्ता करने लगते हैं कि अब तक भगवान नहीं मिले, क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, किससे पूछें, कौन मुझे उनकी प्राप्ति करा सकते हैं?
इस तरह सोचते-सोचत वे रोने लगते हैं, तो कभी भगवानकी माधुर्यमयी लीलाओंकी स्फूर्ति हो जानेसे ऐसा देखकर कि परमैश्वर्यशाली भगवान गोपियोंके डरसे छिपे हुए हैं, खिलखिलाकर हँसने लगते हैं। कभी-कभी उनके प्रेम और दर्शनकी अनुभूतिसे आनन्द मग्न हो जाते हैं तो कभी सिद्ध देहमें स्थित होकर भगवानके साथ बातचीत करने लगते हैं, ‘हे प्रभो! मैंने आपको इतने दिन बाद प्राप्त किया है। प्रभुके गुणों का गान करने लगते हैं। कभी उनके स्नेहको प्राप्तकर नृत्य करने लगते हैं और कभी परम पुरुषको प्राप्तकर परम शान्तिका अनुभव करते हैं और चुप हो जाते हैं।
भावोदये कभु कांदे कृष्णचिन्ता फले।
हासे आनन्दित हय, अलौकिक बले।।
नाचे गाय कृष्ण आलोचने सुख पाय।
लीला अनुभवे हय, तूष्णीम्भूत प्राय ।।
भजनरहस्यवृत्ति-भावोदय होनेपर साधककी बाह्य एवं आन्तरिक चेष्टायें अलौकिक रूपमें प्रकाशित होती हैं। भगवत् कथा स्मरणके प्रभावसे कभी वे रोते हैं, कभी हंसते हैं, कभी नृत्य करते हैं, कभी हर्ष प्रकाश करते हैं, कभी गम्भीर होकर मौन धारण करते हैं और कभी अपने लोकातीत प्रेमपूर्ण अनुभवोंका स्वजातीय भक्तोंके समीप वर्णन करते हैं। गम्भीरामें श्रीमन्महाप्रभु अनेक भावोंमें निमग्न होकर स्वरूप दामोदर तथा राय रामानन्द के निकट अपने भाव प्रकाश करते थे। प्रभुका मन श्रीराधाके भावरूपी समुद्रमें निमग्न होकर उन्मत्त हो जाता था। कभी भाव समुद्रकी तरंगोंमें डूबकर वे बाह्यज्ञान खो बैठते तो कभी अर्धबाह्य दशामें मनके किञ्चित् भावोंको व्यक्त करते। स्वप्नावेशमें गर-गर मौनावस्था अर्थात् अर्थबाह्य दशामें अभी कृष्णको देखा और अभी खो बैठे। बाह्य दशामें विरहदुःख रूपी प्राप्त रत्नको खो दिया। कभी उन्मत्तकी भाँति पशु-पक्षी, लोगोंसे कृष्णका पता पूछते, कहीं देखा कृष्णको? रात्रिमें धैर्य नहीं बँधता, शांत वातावरण तथा अभिसारका समय, स्मृतिसे रासका स्मरण होता तब भावाविष्ट होकर गान-नृत्य करते।
अंतर्दशामें मिलन ही मिलन, आनन्द ही आनन्द है। पुनः बाह्यदशा प्राप्त होनेपर प्रभु संतापयुक्त विरह वेदनासे विलाप करते, कृष्णके गुणोंका स्मरणकर राय रामानन्द तथा स्वरूप दामोदरके गलेमें हाथ डालकर अधीर होकर रोदन करते थे। ऐसा प्रतिदिन होता था। कभी आवेशमें कहते ‘आज कृष्ण-सखियोंसे परिवेष्टित होकर राधाकुण्डमें विलास कर रहे थे, किसी सखीने मुझे दूरसे इस विलास माधुरीका दर्शन कराया।’ कभी कहते, ‘स्वरूप ! मैंने आपसे कुछ कहा? क्या? मैं ही चैतन्य हूँ।’
भावदशामें साधक कभी क्रन्दन करता है, ‘हाय! हाय! मैंने व्यर्थ ही इन प्राणोंको धारण कर रखा है, कृष्ण प्रेम प्राप्त करना मेरे लिए सम्भव नहीं।’ कभी किसी लीलाका स्मरण कर हँसता है, ‘गोप वधू चोर श्रीकृष्णने सारी रात्रि प्रांगणमें वृक्षके नीचे बिताई, नानाविध स्वरभंगी आदिके द्वारा भी गोपियोंका संग प्राप्त नहीं कर सका। जटिला कुटिलाकी चौकीदारी तथा प्रश्नोत्तरोंके द्वारा वे पराजित हो गये।’ कभी कभी साधक परम प्रेम-धनको हृदयमें गोपन कर मौन धारणकर शान्त हो जाते हैं। कभी हरिलीलाका अनुकरण करते हुए नृत्य करते हैं। कभी अलौकिक वाक्यालाप करते हैं।
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
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इन्द्रियज्ञान को त्याग न करने का नाम ही अभक्ति है। यह तीन-तीन धाराओं में प्रवाहित होती है-अन्याभिलाष, कर्म एवं ज्ञान । अपनी सुविधा एवं दूसरे की सुविधा (इन्द्रियतर्पण) करने का नाम कर्म है। सुविधा भी नहीं करूँगा तथा असुविधा भी नहीं करूँगा, निरपेक्ष रहूँगा, इसी का नाम जान है। इन्द्रियज्ञान तथा निर्विशेष ज्ञान, दोनों का परित्यागकर अधोक्षज वस्तु श्रीहरि का इन्द्रियतोषण ही भक्ति है। जब तक भोग एवं मोक्ष के हाथ से मुक्त नहीं हो जाते, तब तक भक्ति की भूमिका भी आरम्भ नहीं हो सकती ।
श्रीलप्रभुपाद
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मनुष्य जीवन में धर्म का स्थान सबसे ऊपर
माननीय प्रधान अतिथि-श्रीयुत् रामकृष्ण घोष महाशय की बात से मुझे विशेष आनन्द प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा है कि, ‘मनुष्य के जीवन में धर्म का स्थान सबसे ऊपर है; धर्म का पालन करना सभी के लिए, सब समय बहुत ज़रूरी है।’ यह एकदम सत्य बात है। धर्म को छोड़कर हमारी सभी क्रियाएँ-निष्फल हैं, बल्कि वे कुफल ही प्रदान करती हैं। धर्म ही समस्त कार्यों में सुफल प्रदान करता है।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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श्रीमन् महाप्रभु द्वारा दी गई सनातन शिक्षा में भी हम पाते हैं कि-
भवद्विधा भागवतास्तीर्थभृताः स्वयं प्रभो।
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तः स्थेन गदाभृता ।।
(श्रीमद्भागवत 1.13.10)
भक्त तो स्वयं ही तीर्थस्थल होते हैं। अपनी प्रीति के कारण वे भगवान् के नित्य संगी बने रहते हैं, अतः वे तीर्थस्थलों को भी पवित्र करने वाले हैं। श्रीभगवान स्वयं कहते हैं
न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः श्वपचः प्रियः।
तस्यै देयं तते ग्राह्यं स च पूज्यो यथा ह्महम् ।।
(हरिभक्तिविलास 10.127)
भले ही कोई व्यक्ति चारों वेदों का कितना ही बड़ा पण्डित क्यों न हो, उसे मैं तब तक अपना नहीं बनाता, जब तक वह पूरी तरह से मुझे शरणागत नहीं होता। किन्तु यदि कोई भक्त सकाम कर्म या ज्ञान का भोग करने का इच्छुक नहीं होता तो चण्डाल कुल में उत्पन्न होने पर भी वह मेरा अत्यन्त प्रिय बन जाता हे। मेरे ऐसे भक्त का सभी को आदर करना चाहिये और उसके द्वारा दी गई भेंट को सहर्ष स्वीकार करना चाहिये।
भगवान् के इन्हीं वाक्यों से यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि ब्राह्मण कुल में जन्म ग्रहण करने पर भी कोई ब्राह्मणों के गुणों से रहित है, तो वह शूद्र है। और शूद्र कुल में जन्म ग्रहण करने पर भी यदि कोई भगवान् का भजन करता है तो वह सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण है।
श्री भक्ति प्रमोद पूरी गोस्वामी महाराज
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स्नेहपूर्वक शिष्यों की भूल को संशोधित करना
गुरु महाराज की हरिकथा श्रवण करने में अत्यधिक रुचि थी। वे सभी स्थानों पर अपने अनेक गुरुभ्राताओं को निमन्त्रण करते थे तथा कथा का आयोजन करके स्वयं कथा श्रवण करने के साथ ही अनेक व्यक्तियों को ऐसे सुवर्ण अवसर का लाभ उठाने हेतु प्रेरित करते थे।
जब गुरु महाराज के आश्रित जन कथा-कीर्तन करते थे तब भी वे अत्यधिक सतर्कतापूर्वक उनकी कथा श्रवण करते थे एवं उनके द्वारा किसी सिद्धान्त की सुष्ठु व्याख्या करने पर उनकी प्रशंसा तथा किसी भूल सिद्धान्त को बोलने पर उन्हें बुलाकर अत्यन्त स्नेहपूर्वक उसका संशोधन करते थे।
एक समय मेरे गुरुभ्राता श्रीगौराङ्गप्रसाद ब्रह्मचारी (श्रीभक्तिसौरभ आचार्य महाराज) ने निम्नलिखित श्लोक का हरि कथा में उल्लेख किया-
भक्तिस्तु भगवद्भक्त सङ्गेन परिजायते।
सत्सङ्गः प्राप्यते पुंभि सुकृतैर्पूर्व सञ्चितैः ॥
बृहद् नारदीय पुराण (४.३३)
[भक्तों के सङ्ग से ही भक्ति प्राप्त होती है। शुद्ध भगवद्भक्तों का सङ्ग पूर्व सञ्चित सुकृति से ही प्राप्त होता है।]
उन्होंने उक्त ‘सुकृतैर्पूर्व सञ्चितैः’ का अर्थ पूर्व-पूर्व जन्मों में सञ्चित सुकृति किया। गुरु महाराज ने अपने बरामदे में खड़े होकर उनके द्वारा की गई इस व्याख्या को श्रवण किया। बाद में श्रीगौराङ्गप्रसाद को अपने निकट बुलाकर उन्होंने पूछा, “क्या इस जन्म में सञ्चित की गई सुकृति के प्रभाव से कोई साधुसङ्ग प्राप्त नहीं कर सकता? कर सकता है। अतएव उक्त श्लोक में ‘सुकृतैर्पूर्व सञ्चितैः’ का अर्थ पूर्व में सञ्चित सुकृति है, पूर्व-पूर्व जन्मों में सञ्चित सुकृति नहीं।”
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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अंतिम श्वास तक हमें सेवामय जीवन यापन करना चाहिए।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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हमारे लिए क्या करणीय है और क्या अकरणीय, इसको भली भांति समझने के लिए मापदंड स्वयं वेद व्यास मुनि ने पद्म पुराण में दिया है—“हमें सदैव श्रीकृष्ण का स्मरण करना है व उन्हें कभी भूलना नहीं है।” निरन्तर श्रीकृष्ण स्मरण उपयोगी भक्ति अंगों के पालन के विषय में व श्रीकृष्ण विस्मृति कारक कर्मों के निषेध के विषय में शास्त्रों में बताया गया है। इन शास्त्र-विधान के अतिरिक्त यदि कोई क्रिया कृष्ण का स्मरण कराए तो वह स्वीकार्य व श्रीकृष्ण का विस्मरण कराए तो वह परित्यज्य है।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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