श्रृण्वतां स्वकथाः कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्त्तनः ।
हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहत् सताम् ॥
(श्रीमद्भागवत १/२/१७)
भगवान् श्रीकृष्णके यशका श्रवण और कीर्त्तन दोनों पवित्र करनेवाले हैं। वे अपनी कथा सुननेवालों के हृदयमें आकर स्थित हो जाते हैं और उनकी अशुभ कामादि वासनाओंको नष्ट कर देते हैं, क्योंकि वे सन्तोंके नित्य सुहृद हैं।
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कभी-कभी शुद्ध भक्त अभिमानशून्य होकर जगतमें कीर्त्तन द्वारा नाम-प्रेमका प्रचार करते हैं, यथा भागवत (१.६.२७)-
नामान्यनन्तस्य हतत्रपः पठन् गुह्यानि भद्राणि कृतानि च स्मरन् ।
गां पर्यटंस्तुष्टमना गतस्पृहः कालं प्रतीक्षन् विमदो विमत्सरः ।।
श्रीनारदजी आत्म चरित वर्णन प्रसंगमें कहते हैं- “लज्जा और संकोचका परित्याग करके मैं भगवानके अत्यन्त रहस्यमय और मंगलमय मधुर नामों एवं लीलाओंका कीर्त्तन और स्मरण करने लगा। स्पृहा और मद-मत्सर मेरे हृदयसे पहले ही निवृत्त हो चुके थे, अब मैं आनन्दसे कालकी प्रतीक्षा करता हुआ पृथ्वीपर विचरने लगा” ।
लज्जा छाड़ि कृष्णनाम सदा पाठ करे।
कृष्णेर मधुर लीला सदा चित्ते स्मरे ।।
तुष्टमन स्पृहा-मदशून्य-विमत्सर।
जीवन यापन करे कृष्णेच्छातत्पर ।।
भजनरहस्यवृत्ति- श्रीनारदजी भगवानके नाम संकीर्तन एवं रहस्यमयी लीलाओंके स्मरण कार्यमें व्रती होकर वस्तु सिद्धिकी अपेक्षा कर रहे हैं। शुद्ध भक्त निष्कपट रूपसे तन्मय होकर हरिनाम संकीर्तन करते हैं तथा अनेकानेक समालोचकोंकी बातें कर्णप्रवेश नहीं होने देते। स्वजातीय स्निग्ध भक्तोंके निकट रहस्यमय तथा अत्यन्त गूढ़ प्रेम विलासमय लीलाओंको प्रकाश करते हैं। श्रीराधागोविन्दकी परम रहस्यमयी लीला कथाका कीर्त्तन वे अधिकारीजनोंके निकट ही करते हैं।
कीर्त्तन प्रभावे स्मरण हइबे।
सेई काले निर्जन भजन सम्भव ।।
(श्रील प्रभुपाद)
नाम तथा नामी अभिन्न हैं भावकी उपलब्धि होनेपर प्राकृत भाव नष्ट हो जाते हैं। उस समय भक्त अमानी मानद होकर, लज्जा त्यागकर नाम संकीर्तन करते हैं। श्रीनारदजी इसी स्थितिका वर्णन प्रस्तुत श्लोकमें कर रहे हैं। समस्त अहंकार, लज्जा परित्यागकर वे सर्वत्र हरिनाम संकीर्त्तनका प्रचार करते थे। परम भागवतजन लोक कल्याणके लिए सर्वत्र हरिनाम प्रचार करते हैं-प्राण आछे जार से हेतु प्रचार। (श्रील प्रभुपाद)
स्मंरणांगभक्ति श्रवण कीर्त्तन के अधीन है। श्रील जीवगोस्वामीपादके अनुसार-
भगवानकी सर्वोत्तम रहस्यमयी गूढ़ क्रिया अर्थात् निज प्रेयसियोंके साथ प्रेमविलास लीला साधारण जनोंके समक्ष प्रकाश न करके अपने अधिकारानुसार ही स्मरण एवं कीर्त्तन करना चाहिए।
मने मने सिद्ध देह करिया भावन।
रात्रि दिने करे ब्रजे कृष्णेर सेवन ।।
निजाभीष्ठ कृष्णप्रेष्ठ पाछे लागिया।
निरन्तर सेवा करे अंतर्मनः हइया।।
(चै. च. म. २३)
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
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ऐकान्तिकरूप से श्रीगुरुदेव के चरणकमलों का आश्रय ग्रहण करने पर ही गुरु की कृपा से जीव के हृदय में कृष्ण की शक्ति सञ्चरित होती है। वही कृपाशक्ति सेवा के द्वारा पुष्ट होकर क्रमशः अनर्थों को ध्वंस करती रहती है। किन्तु सेवा बन्दकर देने पर या सेवा के प्रति उदासीन होने पर पुनः अनर्थ बढ़ने लगते हैं, जिसके फलस्वरूप कृष्ण की शक्ति क्रमशः दूर होने लगती है। जैसे किसी बीज को भूमि में रोपणकर अच्छी प्रकार से जल से सिंचाई करने पर उससे अंकुर फूटता है। जब तक वह अंकुर मजबूत होकर वृक्ष नहीं बन जाता, तब तक उसकी बाहरी किसी भी प्रकार के आक्रमण से रक्षा की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार गुरुदेव से प्राप्त कृष्णशक्ति को भजन के द्वारा क्रमशः बढ़ाने की आवश्यकता होती है।
श्रीलप्रभुपाद
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कर्म मार्ग में जीवों की विपरीत फल प्राप्ति
अज्ञानी जीव जन्म-जन्मान्तर से कर्म मार्ग पर ही विचरण करता आ रहा है। लेकिन उस मार्ग पर वह कभी सुख प्राप्त नहीं कर सका बल्कि उसके भाग्य में विपरीत फल ही प्राप्त होता है। वेदान्त सूत्र में कहा गया है, – “कृतात्ययेऽनुशयवान् दृष्ट-स्मृतिभ्याम् ।” श्रीमद्भागवत में भी यही बात कही गयी है-“कर्माण्यरभमानानां दुःखहत्यै सुखाय च। पश्येत् पाक-विपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम्।।” जगत में मनुष्य का एक ही लक्ष्य है- दुःख का नाश और सुख की प्राप्ति। इसीलिए उन्होंने कर्ममार्ग का चयन किया है। किन्तु परिणाम देखते हैं- उल्टा। शास्त्रकारों ने इसीलिए कर्ममार्ग को निरर्थक बताया है और उस मार्ग में विचरण करने से मना किया है। क्योंकि, बीमारी का diagnosis ना कर, दवा खाने से, कोई भी दवा काम नहीं करती है।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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एक अपराधी चाहे कितना ही भजन-साधन क्यों न करे, वह केवल उसका अभिनय मात्र है। करोड़ों वर्षों तक भी उसके ऐसे साधन भजन का कोई फल नहीं मिलेगा। ऐसे साधन-भजन का लाभ ही क्या? जब उसी माध्यम को ही अस्वीकार कर दिया, जिससे भगवान् की कृपा की प्राप्ति होती है। गुरु और वैष्णवों की कृपा के बिना भगवान् कृष्ण की कृपा प्राप्त करना असम्भव है।
श्री भक्ति प्रमोद पूरी गोस्वामी महाराज
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केवल मात्र सेवा-वृत्ति का ही सम्मान
श्रीप्रभुपाद के आश्रित श्रीकृष्णप्रेम दास बाबाजी महाराज, मयमनसिंह मठ (वर्तमान बाङ्गलादेश) के मठरक्षक थे। परवर्ती काल में उन्होंने श्रीधाम मायापुर में भी एक आश्रम बनाया। एक बार जब वे मेदनीपुर में प्रचार करने के उद्देश्य से गए थे तब कहीं पर फिसल कर गिर पड़ने से उनकी कमर की हड्डी टूट गई।
चोट लगने के पश्चात् वे सहायता की अपेक्षा से रासबिहारी एवेन्यू, कोलकाता स्थित गुरु महाराज द्वारा किराए के स्थान पर प्रारम्भ किए गए श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ पहुँचे। मैंने उन्हें शम्भूनाथ पण्डित अस्पताल में भर्ती कराया। वहाँ के एक चिकित्सक डॉ. ब्रह्म से मेरी अच्छी जान पहचान थी। मैंने उन के माध्यम से बाबाजी महाराज का एक्स-रे आदि भी करवाया। बाद में, उस अस्पताल से छुट्टी मिलने के पश्चात् वे कुछ दिनों तक आयुर्वेदिक अष्टाङ्ग अस्पताल में भी रहे तथा उसके पश्चात् मायापुर स्थित अपने आश्रम में चले गए। जब तक वे हमारे पास थे, हमने यथासम्भव उनकी भलीभाँति सेवा ही की।
मायापुर आश्रम में वास के समय अत्यन्त गर्वपूर्वक वे सर्वदा कहते थे, “हम सिंह (श्रीभक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर) की सन्तान हैं। हम किसी से भय नहीं करते।” मुझे यह भी ज्ञात हुआ कि उन्होंने गुरु महाराज के प्रति भी आलोचनापूर्वक टिप्पणियाँ की थी।
बाबाजी महाराज ने अपने मायापुर आश्रम स्थित खजूर के पेड़ों से रस निकालने के लिए एक श्रमिक को नियुक्त किया था। यह निश्चित हुआ था कि पारिश्रमिक के रूप में वह एकत्रित रस का आधा रस ले लेगा तथा बाकि आधा बाबाजी को देगा। किन्तु वह व्यक्ति दृष्ट प्रवृत्ति का था तथा सारा रस स्वयं ही रख लेना चाहता था। वह बाबाजी से कहने लगा, “तुम बाबाजी हो, तुम्हें रस की क्या आवश्यकता है?” जब पुनः पुनः कहने पर भी उसने रस देने से मना कर दिया तो उन दोनों में झगड़ा हो गया तथा उस दृष्ट व्यक्ति ने श्रीकृष्णप्रेम बाबाजी महाराज पर लाठियों से प्रहार किया। बाबाजी महाराज को बहुत चोट आई। श्रीभक्तिसारङ्ग गोस्वामी महाराज के आश्रित, श्रीगौरदास प्रभु ने मेरे पास सम्वाद पहुँचाया, “सिंह के बच्चे को सियाल ने मारा है। आप जाकर उनसे मिलो एवं यदि कोई सहायता कर सकते हो तो करो।”
मैं श्रीकृष्णप्रेम दास बाबाजी महाराज से जाकर मिला। सारा सम्वाद लिया। श्रीगौरदास प्रभु को साथ लेकर थानेदार के पास गया तथा समाधान हेतु उन्हें बाबाजी के पास ले कर आया। बाद में मैंने उक्त घटना के विषय में पत्र के माध्यम से गुरु महाराज को भी अवगत कराया। गुरु महाराज ने मुझे पत्र लिखकर कहा, “तुम श्रीकृष्णप्रेम दास बाबाजी महाराज की सेवा करना। उनकी जो भी आवश्यकता हो, उसे मठ से लेकर पूर्ण कर देना।”
मैंने पुनः लिखकर भेजा, “बाबाजी महाराज की कोलकाता में समस्त सेवा करने पर भी वे मायापुर में पहुँचते ही आपके प्रति बहुत अपशब्द व्यवहार करते हैं, खरी-खोटी कहते हैं, कटु भाषा भी बोलते हैं। वास्तव में मेरी उन के प्रति श्रद्धा नहीं होने के कारण उनकी सेवा करने में कोई रुचि नहीं है।”
गुरु महाराज ने मुझे पुनः लिखकर भेजा, “तुम श्रीकृष्णप्रेम बाबाजी महाराज की सेवा में कोई भूल मत करना। उनकी सेवा होने से मुझे प्रसन्नता होगी।” मैंने लिख कर भेजा, “आपकी प्रसन्नता के लिए मैं यथासम्भव उनकी सेवा करूँगा एवं कोई भूल नहीं करूँगा। किन्तु श्रद्धापूर्वक उनकी सेवा कर पाना भी मेरे लिए सम्भवपर नहीं होगा।” गुरु महाराज के आदेशानुसार, बाबाजी महाराज की मैंने बहुत सेवा की तथा अन्ततः वे स्वस्थ हो गए।
कुछ समय के पश्चात् उन्होंने गुरु महाराज को एक पत्र लिखकर कहा, “यद्यपि में कटुभाषी हूँ तथा मैंने आपके शिष्यों को बहुत भला-बुरा कहा। तब भी उन्होंने बहुत ही यत्नपूर्वक मेरी सेवा की। मैं अपने मायापुर स्थित आश्रम को आपको देना चाहता है। आप कृपया उसे स्वीकार करें।”
उनके पत्र को मैंने गुरु महाराज को पढ़कर सुनाया तथा गुरु महाराज ने मुझसे उसका उत्तर लिखवाया, “आपने अपने मायापुर स्थित आश्रम को मुझे देने के विषय में कहा है। किन्तु मायापुर में तो हमारा पहले से ही अपना मठ है। मैं एक स्थान पर दो संस्थान नहीं चाहता। हमारे जिस गुरुभ्राता का मायापुर में स्थान नहीं है, आप अपना आश्रम उन्हें दे सकते हैं। दूसरा, आपकी सेवा हमने आपका आश्रम प्राप्त करने की इच्छा से नहीं की। वास्तव में, आपके आश्रम के प्रति मेरा कोई आकर्षण नहीं है। आप श्रील प्रभुपाद के प्रति श्रद्धाविशिष्ट हैं, अपने इस गुण के कारण ही आप हमारे सेव्य हैं।”
पत्र लिखते-लिखते मेरा हाथ रुक गया। मेरी आँखों में अश्रु भर आए। मेरे मन में श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा लिखित शब्दों का स्मरण हो आया-
प्रभु कहे भट्टाचार्य, करह विचार।
गुरुर किङ्कर हय मान्य आपनार ॥
च च (मध्यलीला १०.१४२)
[श्रीचैतन्य महाप्रभु ने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य से कहा, “भट्टाचार्य! कृपया इस बात पर विचार कीजिए। गुरु का सेवक तो सदैव पूजनीय होता है।”]
अपने परमाराध्यतम गुरु महाराज के मुख से उस गुरुभ्राता की स्तुति सुन कर, जिसने पूर्व में उनकी निन्दा की थी, मुझे श्रीकविराज गोस्वामी के उपरोक्त कथनों का यथार्थ अर्थ समझ में आया। उन वचनों का यथार्थ तात्पर्य स्फुरित हुआ। मुझे प्रतीत हुआ कि इससे पूर्व उसे पढ़ने पर भी मैंने उसके अर्थ को इस क्षण पर्यन्त वास्तव में अनुभव नहीं किया था।
यह वृत्तान्त स्मरण कर एक अन्य बात मन में आती है कि गुरु महाराज का आदर्श कितना उन्नत था, कि कोई व्यक्ति उनके साथ कैसा भी प्रतिकूल व्यवहार क्यों ना करे, वह उसके अनुरूप प्रतिक्रिया करने की आवश्यकता नहीं समझते थे। बल्कि श्रील प्रभुपाद के प्रति जो व्यक्ति श्रद्धाविशिष्ट होते थे वह उन्हें आदरणीय एवं अपना परम-सेव्य मानते थे।
किन्तु आजकल के वैष्णव समाज में प्रायः इसका विपरीत आदर्श ही लक्षित होता है, यथा किसी ने गुरुदेव की अथवा गुरुवर्ग की कितनी भी सेवा क्यों न की हो, किन्तु वर्तमान में यदि वह व्यक्ति, मुझ में असंख्य कमियाँ होने पर भी, मेरे प्रति कोई अनुकूल भाव पोषण नहीं करता, तो मैं उसकी सहायता क्यों करूँ? उससे मेरा क्या सम्बन्ध है? वह तो अपराधी है। वह तो सेवा करने के योग्य ही नहीं है इत्यादि।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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अन्तर्यामी श्रीगुरु-भगवान् साधक की सभी प्रार्थनाओं से अवगत
भक्तों के द्वारा स्वयं को ‘पाषाण हृदय’ (पत्थर दिल) कहने पर भी उन पर श्रीगुरु-भगवान् की असीम कृपा होती है। उनकी इस अपार्थिव दया और स्नेह-ममता की काई तुलना नहीं है। उनकी अहैतुकी कृपा की बात को स्मरण कर भक्तगण एकान्त में मौन होकर व्याकुल क्रन्दन करते रहते हैं। वे अन्तर्यामी होने के कारण ही साधक साधिका की सम्पूर्ण दीनता और प्रार्थना से अवगत होते हैं एवं साक्षात् रूप से और परोक्ष रूप से (directly and indirectly) उन्हें पूरा करते हैं। अनुगत व्यक्तियों के प्रति भक्त और भगवान् की असीम कृपा है; उनकी कृपादृष्टि से ही साधन-भजन में सिद्धिलाभ और श्रीनाम के प्रति निष्ठा प्राप्त होती है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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इस जगत के हमारे सम्बन्ध अत्यंत अस्थायी हैं। किसी भी क्षण ये नाश हो सकते हैं। इस शरीर का जन्म हुआ है, अत: इसकी मृत्यु निश्चित है। विच्छेद होना भी निश्चित है, कोई इसे टाल नहीं सकता।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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