श्रीविष्णोः श्रवणे परीक्षिदभवद्वैयासकिः कीर्त्तने प्रह्लादः स्मरणे तदङ्घ्रिभजने लक्ष्मीः पृथुः पूजने ।
अक्रूरस्त्वभिवन्दने कपिपतिर्दास्येऽथ सख्येऽर्जुनः सर्वस्वात्मनिवेदने बलिरभूत् कृष्णाप्तिरेषां परम् ॥
(भ. र. सि. पू. वि. २/१२९)
राजा परीक्षित श्रीविष्णुकी कथा श्रवणसे, शुकदेव उनके कीर्त्तनसे, प्रह्लाद उनके स्मरणसे, लक्ष्मी पादसेवनसे, पृथु महाराज उनके पूजनसे, अक्रूर वन्दनासे, कपिपति हनुमान दास्यसे, अर्जुन उनके साथ सखा भावसे एवं बलिने उनके चरणोंमें सर्वस्व दान और आत्मनिवेदन द्वारा भगवान्को प्राप्त किया है।
* * * * * * * * * * * * * * * *
रतिलक्षणा भक्तिसे शुद्ध भक्त के संग में नामानुशीलन, यथा श्रीभागवत-
परस्परानुकथनं पावनं भगवद्यशः ।
मिथो रतिमिथस्तुष्टिर्निवृत्तिर्मिथ आत्मनः ।।
स्मरन्तः स्मारयन्तश्च मिथोऽघौघहरं हरिम्।
भक्त्या सञ्जातया भक्त्या बिभ्रत्युत्पुलकां तनुम् ।।
(श्रीमद्भा. ११.३.३०-३१)
भगवानका यश परम पावन है। भक्तजन परस्पर भगवानके उसी परमपावन यशका गुणगान करते हैं, जिससे भक्तोंको परस्पर प्रीति, सन्तुष्टि तथा संसारसे निवृत्ति हो जाती है। अघासुरका वध करनेवाले श्रीहरिका स्मरण करते हुए तथा स्मरण कराते हुए साधन भक्तिका आचरण करनेसे उनके हृदयमें पराभक्ति (प्रेमाभक्ति) का उदय होता है, जिससे वे पुलकित हो जाते हैं।
भक्तगण परस्पर कृष्ण कथा गाय।
ताहे रति तुष्टि सुख परस्पर पाय।।
हरिस्मृति निजे करे, अन्येरे कराय।
साधने उदित भावे पुलकाश्रु पाय।।
भजनरहस्यवृत्ति-श्रीकृष्ण पापराशिको एकक्षणमें भस्म कर देते हैं। सभी उन्हींका स्मरण करें और एक दूसरेको स्मरण करावें। इस प्रकार साधन भक्तिका अनुष्ठान करते-करते प्रेमा भक्तिका उदय हो जाता है और वे प्रेमोद्रेकसे पुलकित शरीर धारण करते हैं।
स्वजातीय भगवद्भक्तोंके साथ प्रणयवर्धन, उनका सुख विधान, भक्ति प्रतिकूल विषय त्याग आदि साधकके कर्त्तव्य हैं। स्वजातीय निर्मल हृदय सम्पन्न भक्त श्रीकृष्णके गुणोंका कीर्त्तन करके आत्म पवित्रता प्रदान करते हैं। इसी प्रकार कृष्णकथा आदि द्वारा भक्ति अनुशीलन करते-करते हृदयमें भाव उदय होते हैं तथा समस्त प्रकारके अमंगल विनाशकारी हरिकथाका स्मरण कीर्त्तन करते-करते साधक सिद्धावस्थामें प्रवेश करता है।
श्लोकका विशेष तात्पर्य है कि स्वजातीय अर्थात् समान भावना विशिष्ट व्रजरसिक भक्तोंके संगके प्रभावसे भक्तिदेवी हृदयमें संक्रमित होती हैं। नवीन साधक निर्मल चित्तमें हरिकथा श्रवणसे अपने संस्कारोंको परिपक्व करते हैं।
साधने भाविवे जहाँ, सिद्धिते पाइवे ताहाँ।
केवल पक्व अपक्व विचार।
सद्गुरुकी कृपासे अपना सिद्ध स्वरूप जानकर साधक भजन-प्रणालीकी शिक्षा ग्रहण करते हैं।
स्वजातीय शुद्धभक्त परस्पर मिलनेपर केवल कृष्णकथा ही कहते हैं तथा कृष्णके रूप गुणादिके वर्णनमें विभोर हो जाते हैं। कृष्णचर्चाके अतिरिक्त उनका कोई अन्य वार्तालाप नहीं होता। श्रीरूप गोस्वामी तथा श्रीसनातन गोस्वामी टेर कदम्ब स्थली आदि स्थानोंमें अपने-अपने भजनका अनुभव परस्पर वर्णनकर अष्टसात्त्विक भावोंमें निमज्जित हो जाते थे।
भगवद् कथाके छलसे इन्द्रिय तर्पणमूलक भोग विषय आदि न आ जायें, इसके लिए सावधान रहना चाहिए अर्थात् योषित्संग या लाभ पूजा प्रतिष्ठा आदि साधकको प्रभावित न करें। साधक अत्यन्त सतर्कतापूर्वक कृष्णानुशीलन करें अन्यथा पथभ्रष्ट होकर श्रीमन्महाप्रभुके प्रेम-धनसे वंचित हो जायेंगे।
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
* * * * * * * * * * * * * * * *
जो हरिनाम के द्वारा जीव को आकर्षण करते हैं, उनके समान वास्तविक बन्धु एवं उपकारी जगत में कोई नहीं है। यदि कर्ण जैसे करोड़ों दाता भी मिलकर दान करें, तो भी उनका दान हरिनाम का प्रचार करने वाले वैष्णवों की दयालुता के सामने बहुत ही सामान्य एवं तिरस्कृत है।
श्रीलप्रभुपाद
* * * * * * * * * * * * * * * *
परम मंगल की खोज केवल पारमार्थिक गुरु के पास
मनुष्य जन्म में जीव का एकमात्र कर्त्तव्य है- परम मंगल प्राप्त करना। किन्तु वह मंगल कैसे होगा, वह यथार्थ पथ क्या है, उसका निर्धारण करना आजकल बहुत मुश्किल हो गया है। इसीलिए सोचने-समझने और विचार करने की आवश्यकता है। बिना सोचे-विचारे किसी भी पथ को मंगल का मार्ग नहीं माना जा सकता है। अज्ञानी जीव अमंगल को मंगल और मंगल को ही अमंगल समझ बैठते हैं। गिल्टी सोना वास्तविक सोना नहीं है। असली सोना पाने के लिए जिस प्रकार से सोने के विषय में विशेषज्ञ की सहायता और परामर्श लेना पड़ता है- वैसे ही यथार्थ मंगल प्राप्ति करना जिनका उद्देश्य है, वे गुरु-चरणाश्रय करेंगे। गुरु-चरण ही एकमात्र मंगल है-इसके अलावा कहीं भी मंगल नहीं है। हम पाठशालाओं में, हाईस्कूलों में, कालेजों में, समाज में एवं रास्ते सड़क पर कईयों को गुरु बनाते हैं-परन्तु यहाँ उन गुरुओं की बात नहीं कही जा रही है। भौतिक वस्तुओं के लिए भौतिक गुरु की आवश्यकता है- किन्तु भौतिक वस्तु प्राप्त करके जीव का कोई मंगल नहीं हो सकता है- “भाल क’रे देख भाई, अमिश्र आनन्द नाई, जे आछे से दुःखेर कारण।। से-सुखेर तरे तबे, केन माया-दास हबे, हाराइबे परमार्थ-धन।।” (ठीक से देखो भाई, कहीं भी अमिश्र (शुद्ध) आनन्द नहीं है, जो है वह दुख का कारण है। उस सुख के लिए फिर क्यों माया का दास बनकर परमार्थ धन से वंचित होना चाहते हो।) इसीलिए उस अमंगल के रास्ते पर नहीं जाकर, परमार्थ-धन प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए। वह धन प्राप्त करने के लिए पारमार्थिक गुरु के पास जाने की आवश्यकता है।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *
गुरु अवज्ञा तथा वैष्णव- अपराध – ये सभी अपराधों से बड़े तथा भयानक अपराध हैं। शुद्ध भक्त के आश्रय में रह के इन दोनों से बचने का अत्यधिक प्रयत्न करना चाहिये।
श्री भक्ति प्रमोद पूरी गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * *
प्राचीन वैष्णवजन धीरे-धीरे इस लोक को छोड़कर हम लोगों को परमार्थ की ओर अधिक ध्यान देने का संकेत दे रहे हैं। हम लोगों की आयु बहुत ही कम है। फिर भी श्रीकृष्णपादपद्म प्राप्ति का अवसर, उसके अनुरुप सुविधा और पथ के विषय में जानते हुये भी हम तीव्रता से भजन करने का कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं। जन्म-जन्मान्तरों के संस्कारों के कारण हम अपने वास्तविक स्वरूप को भूल गये हैं। जिस कारण हम देह-गेह (शरीर और घर) या उससे सम्बन्धित मायिक वस्तुओं को ही अपना धन और सर्वस्व समझ बैठे हैं। इसीलिये हम अपने वास्तविक सर्वस्व- अखिल रसामृत मूर्त्ति – श्रीकृष्ण की प्राप्ति से वन्चित हो गये हैं। जब तक हमारा अहंकार नहीं बदलेगा तब तक श्रीकृष्ण का वास्तविक अनुशीलन सम्भव नहीं है। सांसारिक अभिमान से जो भी साधन किया जाता है, वह अध्यात्म मार्ग में आगे नहीं ले जा सकता। जब तक इस मायिक barrier को transcend (अतिक्रमण) नहीं किया जायेगा तब तक परमात्मा का अनुशीलन नहीं हो सकता।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *
गुरु-वैष्णवों का आह्वान (स्वागत) किया जा सकता है, स्वागत संभाषण किया जा सकता है, किन्तु विदाई या विसर्जन नहीं किया जाता है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *
श्रीभगवान् पूर्ण-आनंद हैं। श्रीकृष्ण नाम का आभास मात्र कोटि जन्मों के पाप क्षय कर देता है एवं इससे भी अधिक, मुक्ति प्रदान करने में सक्षम है।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *