
आगे . . . . यह स्वाभाविक है कि चिन्तनशील मनुष्य सृष्टि का उद्गम जानना चाहता है। रात्रि में वह आकाश में तारों को देखता है और स्वाभाविक है कि वह उनके निवासियों के विषय में कल्पनाएँ करता है। ऐसी जिज्ञासा मनुष्य के लिए स्वाभाविक है, क्योंकि उसकी चेतना विकसित है जो पशुओं की तुलना में उच्च है। श्रीमद्भागवतकार ऐसी जिज्ञासाओं का सीधा उत्तर देते हैं। वे कहते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण समस्त सृष्टियों के उद्गम हैं। वे ब्रह्माण्ड के स्रष्टा होने के साथ ही उसके संहर्ता भी हैं। इस दृश्य जगत की उत्पत्ति भगवान् की इच्छा से किसी काल में होती है, कुछ काल तक इसका धारण होता है और तब उनकी इच्छा से इसका संहार हो जाता है। अतएव समस्त जागतिक कार्यों के पीछे उनकी इच्छा रहती है। निस्सन्देह ऐसे अनेक नास्तिक हैं जो स्रष्टा पर विश्वास नहीं करते, किन्तु वे अल्पज्ञान के कारण ऐसा करते हैं। उदाहरणार्थ, आधुनिक विज्ञानी ने अन्तरिक्ष उपग्रह बनाये हैं जिन्हें वह किसी-न-किसी युक्ति से बाह्य आकाश में प्रक्षिप्त करता है और दूर बैठे विज्ञानी के निर्देश से ये कुछ काल तक आकाश में उड़ते रहते हैं। इसी प्रकार असंख्य तारों तथा ग्रहों से युक्त सारे ब्रह्माण्ड भगवान् की बुद्धि द्वारा नियन्त्रित होते हैं।
वैदिक साहित्य में यह कहा गया है कि परम सत्य भगवान् समस्त पुरुषों में प्रधान हैं। आदिजन्मा ब्रह्मा से लेकर एक छोटी-से-छोटी चींटी तक सारे जीव ही जीव हैं। ब्रह्मा से ऊपर भी अपनी अपनी क्षमता वाले अन्य जीव हैं और भगवान भी ऐसे ही जीव हैं। अन्य प्राणियों की भाँति वे भी एक प्राणी हैं। किन्तु परमेश्वर या परम जीव में सर्वाधिक बुद्धि होती है और उनमें विभिन्न प्रकार की श्रेष्ठतम अचिन्त्य शक्तियाँ होती हैं। यदि मनुष्य का मस्तिष्क अन्तरिक्ष-उपग्रह बना सकता है तब तो यह सरलता से कल्पना की जा सकती है कि मनुष्य से बढ़कर मस्तिष्क ऐसी आश्चर्यजनक वस्तुएँ बना सकता है जो कहीं अधिक श्रेष्ठ हों। विचारवान व्यक्ति इस तर्क को आसानी से स्वीकार कर लेगा, किन्तु ऐसे कट्टर नास्तिक भी हैं जो इससे कभी सहमत नहीं होंगे। श्रील व्यासदेव परम बुद्धिमान को परमेश्वर रूप में पूरी तरह स्वीकार करते हैं और इस परम बुद्धिमान को पर, परमेश्वर या भगवान् के रूप में सम्बोधित करते हुए नमस्कार करते हैं। यह परमेश्वर श्रीकृष्ण ही हैं जैसा कि व्यासदेव ने भगवद्गीता में तथा अपने अन्य शास्त्रों में और विशेष रूप से श्रीमद्भागवत में स्वीकार किया है। भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि उनसे बढ़कर कोई परत्तत्त्व नहीं है। इसीलिए श्रीव्यासदेव तुरन्त उन परतत्त्व श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं जिनकी दिव्य लीलाओं का वर्णन दशम स्कंध में हुआ है।
अनैतिक व्यक्ति सीधे दशम स्कंध में और विशेषकर उन पाँच अध्यायों में जिनमें भगवान् की रासलीला का वर्णन है, पहुँच जाते हैं। श्रीमद्भागवत
का यह अंश इस महान् ग्रन्थ का गुह्यतम अंश है। जब तक किसी को भगवान् का पूरा-पूरा दिव्य ज्ञान प्राप्त न हो ले, तब तक वह भगवान् की पूज्य दिव्य लीलाओं को, जिन्हें रास-नृत्य कहा जाता है, तथा गोपियों के साथ उनके प्रेम व्यवहार को, ठीक से समझ नहीं सकता। यह विषय अत्यन्त आध्यात्मिक है। केवल ऐसे मुक्त पुरुष, जिन्होंने क्रमशः परमहंस अवस्था प्राप्त कर ली है, इस रास-नृत्य का दिव्य आस्वादन कर सकते हैं। अतः श्रील व्यासदेव पाठकों को अवसर प्रदान करते हैं कि भगवान् की लीलाओं के सार का आस्वादन करने के पूर्व वे धीरे-धीरे आत्म-साक्षात्कार का विकास करें। इसीलिए वे जान बूझकर गायत्री मन्त्र धीमहि का आवाहन करते हैं। यह गायत्री मन्त्र अध्यात्म में बढ़े-चढ़े व्यक्तियों के निमित्त है। जब कोई गायत्री मन्त्र का उच्चारण करने में सफल हो जाता है तो वह भगवान् की दिव्य स्थिति को प्राप्त कर सकता है। अतः गायत्री मन्त्र के सफल जाप के लिए मनुष्य में ब्रहा-जैसे गुणों का समावेश होना चाहिए या फिर उसे पूर्णतया सतोगुणी होना चाहिए। तभी वह भगवान् के नाम, यश, गुणों आदि की दिव्य अनुभूति प्राप्त कर सकता है। आगे . . . .
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कृष्णस्य नानाविधकीर्त्तनेषु तन्नामसंकीर्त्तनमेव मुख्यम् ।
तत्प्रेमसम्पज्जनने स्वयं द्राक् शक्तं ततः श्रेष्ठतमं मतं तत् ॥
(बृहद्भागवतामृतम् २/३/१५८)
यद्यपि श्रीकृष्णके नानाप्रकारके कीर्त्तन हैं, तो भी उनमें प्रभुके नामोंका कीर्तन करना ही मुख्य है। क्योंकि नाम कीर्त्तनमें प्रेम सम्पत्ति जल्दी ही प्रकट करानेकी सामर्थ्य है, इसलिए हमारे मतमें कीर्त्तन ही सर्वश्रेष्ठ है ।
गौड़ीय कण्ठहार
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भक्त श्रेष्ठ श्रीरूप गोस्वामी पाद जी का आशीर्वाद
अनर्पितचरीं चिरात् करुणयावतीर्णः कलौ
समर्पयितुमुन्नतोज्ज्वलरसां स्वभक्तिश्रियम् ।
हरिः पुरट सुन्दरद्युतिकदम्ब संदीपितः सदा
हृदयकन्दरे स्फुरतु वः शचीनन्दनः ।।
(विदग्ध माधव)
श्रीरूप गोस्वामी जगत् जीवों की दयनीय हालत देख कर आशीर्वाद देते हुए कहते हैं कि वे श्रीशचीनन्दन गौरहरि आप सब के हृदय में स्फुरित हों, जो कि अपनी करुणा से अपनी ही उस परम उज्ज्वल रसमयी भक्ति सम्पत्ति को प्रदान करने के लिए इस कलियुग में अवतीर्ण हुए जिस को कि अनन्त काल से प्रदान नहीं किया गया था और जिनकी सुन्दरता अति सुन्दर स्वर्ण कान्ति राशि से भी अधिक देदीप्यमान है।
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करचरण – सरोजे कान्तिमन्नेत्रमीने,
श्रममुषि भुजवीचि – व्याकुलेऽगाधमार्गे।
हरिसरसि विगाह्यापीय तेजोजलौघं,
भवमरुपरिरिखन्नः क्लेशमद्द्य त्यजामि ।। 11 ।।
संसार रूपी इस मरुभूमि में, मैं सभी प्रकार के दुःखों से दुःखित हो रहा हूँ। जिनके श्रीहस्त व श्रीचरण अति सुन्दर दिव्य कमल के समान हैं, जिनके नेत्र मछलियों की सी आकृति के हैं, जो सभी प्रकार के क्लेशों को शान्त करने वाले हैं, अपनी तरंगों रूपी भुजाओं से जो हमें अपनाने के लिए व्याकुल हैं, जिनके पास पहुँचने का रास्ता बड़ा कठिन है, ऐसे भगवान श्रीहरि रूपी सरोवर में डुबकी लगाकर व भगवान श्रीहरि की तेजस्वी महिमा का जल पान करके मैं अपने सारे क्लेशों को दूर करूँगा।
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
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यशः श्री ऐश्वर्य धाम दुर्लभ एकान्त।
अतीव लावण्यसार स्वतःसिद्ध कान्त ।।
कि तप करिल गोपी याहे अनुक्षण।
नयनेते श्याम रस करे आस्वादन ।।
भजनरहस्यवृत्ति-कंसके रंगस्थलमें श्रीकृष्णके अपूर्व रूपलावण्यका दर्शनकर विस्मित होकर एवं उसके आस्वादन करनेमें लालायित होकर मथुराकी रमणियाँ उक्त श्लोक कहती हैं। वे कहती हैं- हे सखि ! गोपियोंने कौन-सी तपस्या की है? कि जिसके फलस्वरूप वे श्रीकृष्ण रूपमाधुरीको नेत्र भर-भर कर पान करती हैं। उन्होंने अपने जन्म, तन एवं मनको सफल कर लिया है। वह मधुरिमा कैसी है? जिससे बढ़कर और जिसके समान और कोई रूपमाधुरी नहीं है। परव्योममें जितने भगवत्स्वरूप हैं, यहाँ तक कि श्रीकृष्णके विलास मूर्ति स्वरूप-नारायणमें भी ऐसी रूपमाधुरी नहीं है-औरोंकी तो बात ही क्या है?
श्रीकृष्णका माधुर्य ही सर्वश्रेष्ठ है, वह अनन्यसिद्ध तथा स्वाभाविक है, किसी अन्य अलंकारादि वस्तुओंसे साधित नहीं है। अतः वह समस्त सौन्दर्य माधुर्यादि गुणोंका उद्गमस्थान है-या खान है। ऐसा सर्वोपरि माधुर्यमय श्रीकृष्ण स्वरूप केवल वृन्दावनमें ही विराजमान है। व्रजभूमि धन्य है जिसमें पुराण पुरुष निगूढ़ वेषमें लीला करते हैं। उस व्रजभूमिकी व्रजदेवियाँ भी धन्य हैं जो सर्वमाधुर्य मण्डित धीर-ललित नायक श्रीकृष्णका दर्शन व्रजमें करती हैं। ‘अमुष्य’ शब्दसे अंगुलि द्वारा निर्देश करके माथुर रमणियाँ कहने लगीं कि, “हमारे अल्प पुण्योंसे आज हम इस रंगभूमिमें श्रीकृष्णका दर्शन कर रही हैं, किन्तु गोपियोंका पुण्य पूर्णतम है।
अहो सर्वज्ञ मुनिजन! हमें निर्देश करें कि हम गोपियोंकी भाँति किस प्रकार तपस्या करें, कि हम भी श्रीकृष्णके व्रज-माधुर्य-रूपको निहार सकें।
कोई माथुर रमणी विस्मयके साथ कहने लगी, “अरी सखि ! ब्रजदेवियोंका सौभाग्य किसी तपस्याका फल नहीं। उनका प्रेम निर्हेतुक एवं निर्वाच्य है। यदि कहो हम भी व्रजमें चलकर गोपियोंकी भाँति कृष्णकी रूपसुधाका पान करें” तो दूसरी बोली- ‘दुरापं’ यह तो हमारे लिए अत्यन्त दुर्लभ है। परम प्रेमी गोपियोंकी कृपा द्वारा ही वह सुधापान सम्भव है। अन्य कोई कहने लगी, “अरी! व्रजगोपियोंके आगे श्रीकृष्णका माधुर्य क्षण-प्रतिक्षण नव-नवायमान रूपमें प्रकाशित होता है।”
मथुराकी नागरियाँ व्रजदेवियोंके सौभाग्यकी महिमाका वर्णनकर उन जैसी सेवाकी लालसा करती हैं। श्रीकृष्णके साथ व्रजदेवियोंका प्रेम-विलास, लीलामाधुर्य आदि व्रजसे आनेवाली फल-विक्रयिणी आदिसे श्रवण करती हैं। इस श्रवणसे उनके हृदयमें भी गोपियों जैसी सेवाका लोभ उत्पन्न हुआ।
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
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अवैष्णव कौन हैं ?
जो नित्यकाल भगवान की सेवा करते हैं, वे वैष्णव हैं। जो विष्णु की सेवा नहीं करते, वे ही अवैष्णव हैं। उनके लिए भी विष्णु की सेवा करना उचित है ।
जो विष्णु की कथाओं के अतिरिक्त अन्य कथाओं का श्रवण करते हैं एवं विष्णु के चिन्तन के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं का चिन्तन करते हैं, जगत में खाने-पीने रहने को ही जो धर्म मानते हैं, वे ही अवैष्णव हैं।
विष्णु की कथाओं का कीर्तन एवं श्रवण करना ही हमारा एकमात्र नित्य कृत्य है। गुरु – वैष्णवों के अनुगत रहना ही हमारे लिए उचित है। विष्णु का प्रसाद ही हमारे लिए नित्य ग्रहणीय वस्तु है। इन सब सेवाओं से वञ्चित होकर यदि हम अन्य कार्यों में व्यस्त रहे, तो तब समझ लेना चाहिए कि हम लोग अवैष्णव हो गये हैं। और यदि हम लोग अवैष्णव हो गये हैं। और यदि हम लोग अवैष्णव हो गये तो हमारे सामने नाना प्रकार की विपत्तियाँ एवं नाना प्रकार के क्लेश उपस्थित हो जायेंगे । भगवान से विमुखता ही समस्त क्लेशों का एकमात्र मूल कारण है। भगवान की सेवा छोड़कर अन्यान्य कार्य करने के कारण ही हम कष्ट पा रहे हैं। स्वतन्त्रतावशतः भगवान की सेवा छोड़कर जिससे लोग मेरी सेवा करें, इस विषय में ही हम लोग चेष्टाशील हैं। ऐसी चेष्टा करते हुए हम कर्ता सज रहे हैं। मैं भगवान का सेवक हूँ, इस स्वरूप की उपलब्धि के अभाव के कारण ही ये सब विचार आते हैं-मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ, मैं द्रष्टा हूँ, मैं चालक हूँ। ये सब कुविचार ही हमें ग्रास कर रहे हैं। साधुओं के निकट जाकर ही समझा जा सकता है कि मैं कर्ता नहीं हूँ, किसी का सेव्य नहीं हूँ, बल्कि भगवान का सेवक हूँ। भगवान ही मेरे एकमात्र सेव्य हैं। कर्ममार्ग में विचरण करने वाला व्यक्ति ही कर्ता है। हम सत्कर्म के द्वारा जगत में सबके प्रिय होना चाहते हैं। सांसारिक कर्तव्यों का यथासाध्य पालनकर आत्मीय स्वजनों की प्रीति को आकर्षित करने के लिए ही हम व्यस्त हैं। इससे हमारा मंगल नहीं होगा या हमें शान्ति प्राप्त नहीं होगी, संसार से मुक्ति नहीं होगी। इसीलिए भगवान के भक्त हमें कृपा पूर्वक बताते हैं कि भगवान की सेवा ही हमारा एकमात्र कर्तव्य है। हमारा ही नहीं अपितु देवता, पशु-पक्षी एवं मनुष्य आदि सभी का एकमात्र कर्तव्य है भगवान की सेवा । किन्तु भक्तों की बातों पर ध्यान न देकर हम लोग सोच रहे हैं- हम पत्थर हुए हैं, तो पत्थर का कार्य ही हमारा है। पेड़ हुए हैं, तो पेड़ का कार्य फल देना है। पिता हुए हैं, तो पुत्र-कन्याओं का पालन करना, उनकी पढ़ाई-लिखाई की व्यवस्था करना ही हमारा कर्तव्य है। जब हम मनुष्य हुए हैं, तो शिक्षित होना सभ्य होना, समाज का संस्कार करना तथा देश की उन्नति करना आदि हमारे बहुत से कार्य हैं। हम घर में रहेंगे, कर्ता सजेंगे, लोग हमारा सम्मान करेंगे, हम मोटर में चढ़ेंगे, पुत्र-पुत्रियों का विवाह करेंगे इत्यादि असंख्य संकल्प हमारे हृदय में विद्यमान हैं। इसी का नाम ही अवैष्णवता भगवद्विमुखता या माया की दासता है ।
श्रीलप्रभुपाद
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“हम जगत में कोई लकड़ी-पत्थर का मिस्त्री बनने नहीं आये हैं”
श्रील प्रभुपाद ने अपने प्रकट काल में, भगवान की प्रीति के लिए जिन प्रतिष्ठानों और अनुष्ठानों की सृष्टि की है, उसके बाहरी रूप को देखकर जगत के लोग आकृष्ट हुए हैं। हम लेकिन इस बाहरी स्वरूप के प्रति भक्ति करने के लिए तैयार नहीं हैं। श्रील प्रभुपाद के “वाणी और वपु” (अर्थात् वाणी और शरीर) नामक प्रबंध ने साप्ताहिक ‘गौड़ीय’ पत्रिका में प्रकाशित होकर, हमें इसके अन्दर छिपी शिक्षा को प्रदान किया है। आजकल प्रतिष्ठान के गठन और अनुष्ठान की होड़ लग गयी है। अनुकरण (नकल) करने वाला सम्प्रदाय, प्रभुपाद का अनुकरण करके ही अपने आपको कृतार्थ समझने लगा है। आप लोगों ने आज प्रभुपाद की शिक्षा की चर्चा करते हुए सुना है, – “आमरा किछु जगते काठ-पाथरेर मिस्त्री हते आसिनी, आमरा श्रीचैतन्यदेवेर वाणीर पियन मात्र।” (अर्थात् हम जगत में कोई लकड़ी-पत्थर के मिस्त्री बनने नहीं आये हैं, हम श्रीचैतन्यदेव की वाणी के पियन मात्र हैं।) श्रीसखीचरण राय भक्तिविजय प्रभु की दानशीलता के फलस्वरूप श्रीधाम मायापुर में श्रीमन् महाप्रभु के विराट् मन्दिर का निर्माण हुआ है। इसके अलावा भी उन्होंने कई जगह बहुत दान दिया है। इस दान में श्रील प्रभुपाद
ने हरि-गुरु-वैष्णव-सेवामय कृष्णप्रीति न देखकर, बड़े दुख के साथ कहा था, “हम जगत में कोई लकड़ी-पत्थर का मिस्त्री बनने नहीं आये हैं।”
लाखों रुपयों का दान ग्रहण करने के बावजूद श्रील प्रभुपाद ने स्पष्ट रूप से निरपेक्ष सत्य बोलने में तनिक भी हिचकिचाहट अनुभव नहीं की। यह एक ओर जैसे उनकी निरपेक्षता है, ठीक दूसरी ओर उनकी दया का परिचायक भी है। “वज्रादपि कठोराणि मृदुनि कुसुमादपि” (अर्थात् वज्र से भी कठोर और कुसुम से भी कोमल) – वाक्य के साक्षात आदर्श थे, वे। इसी वाक्य के द्वारा उन्होंने भक्तिविजय प्रभु के प्रति दया करते हुए, उन्हें सावधान कर दिया था।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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गुण और संख्या कभी भी एक साथ नहीं मिलते। गुणों की अधिकता में संख्या एवं संख्या के अधिक होने पर गुणों का कम होना अवश्यम्भावी है। सर्वोत्तम आध्यात्मिक उन्नति के शिखर पर पहुँचे व्यक्ति संख्या में कम भी हों तो भी उन्हीं के द्वारा जगत् के लोगों का कल्याण होता है किन्तु गुणहीन, चरित्रहीन व्यक्ति संख्या में अधिक होने पर भी उनसे किसी का कल्याण नहीं होता।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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भजन-पथ पर अग्रसर होने के लिए “साधनपथ” अर्थात् श्रीशिक्षाष्टक, श्रीकृष्णनामाष्टक, श्रीउपदेशामृत, श्रीमनःशिक्षा, श्रीहरिनाम-चिन्तामणि, स्वनियम-द्वादशकम्, श्रीमन्महाप्रभु की शिक्षा, दशमूल-निर्यास, श्रीजैवधर्म, श्रीचैतन्यचरितामृत, श्रीमद्भगवद्गीता (श्रीबलदेव व चक्रवर्ती-टीका), श्रीमद्भागवत (चक्रवर्ती टीका व श्रीधरस्वामी टीका), षट्संदर्भ, भक्ति रसामृतसिन्धु व अन्यान्य प्रामाणिक व्याख्याओं सहित ग्रंथों की चर्चा करना आवश्यक है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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हमारा स्थूल एवं सूक्ष्म शरीर भगवान श्रीकृष्ण की मायाशक्ति द्वारा उत्पन्न व हमारा वास्तव स्वरूप (आत्मा) भगवान की चिद्-शक्ति से निःसृत होने के कारण, ये दोनों श्रीकृष्ण की ही संपत्ति हैं। जिस प्रकार मेरी शक्ति मेरे लिए कार्य करती है, भगवान् की शक्ति भी भगवान् के लिए ही कार्य करेगी।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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