
को नाम तृप्येद् रसवित् कथायां
महत्तमैकान्तपरायणस्य
नान्तं गुणानामगुणस्य जग्मु-
योगेश्वरा ये भवपाद्ममुख्याः ।।
कः = कौन है वह; नाम विशेष रूप से; तृप्येत् पूरा सन्तोष प्राप्त कर ले; रस-वित्-अमृत-रस का आस्वाद करने में पटुः कथायाम् कथाओं में; महत्-तम्-जीवों में सबसे महान्; एकान्त एकमात्रः परायणस्य आश्रय का; न कभी नहीं; अन्तम् अन्त; गुणानाम् गुणों का; अगुणस्य ब्रह्मा का; जग्मुः निश्चित कर सके योग ईश्वराः = योग-शक्ति के स्वामी; ये जो; भव शिवजी; पाद्य ब्रह्माजी; मुख्याः = प्रमुख ।
अनुवाद – भगवान् श्रीकृष्ण (गोविन्द) समस्त महान जीवों के एकमात्र आश्रय है और उनके दिव्य गुणों की माप शिव तथा ब्रह्मा जैसे योगेश्वरों द्वारा भी नहीं की जा सकती। तो भला जो रसास्वादन में पटु है वह क्या कभी उनकी कथाओं के श्रवण द्वारा पूरी तरह तृप्त हो सकता है।
तात्पर्य – शिवजी तथा ब्रह्माजी दो प्रमुख देवता हैं। वे योगशक्ति से परिपूर्ण हैं। उदाहरणार्थ, शिवजी ने उस विष का सागर पी लिया जिसकी एक बूँद ही सामान्य जीव को मारने के लिए पर्याप्त है। इसी प्रकार ब्रह्मा ने, शिव समेत, अनेक देवताओं की सृष्टि की। अतएव ये दोनों ईश्वर हैं। किन्तु वे परम शक्तिशाली नहीं हैं। परम शक्तिशाली तो गोविन्द या श्रीकृष्ण हैं। वे ब्रह्म हैं और उनके दिव्य गुणों की माप शिव तथा ब्रह्मा जैसे शक्तिशाली ईश्वरों द्वारा भी नहीं की जा सकती। अतएव भगवान् कृष्ण बड़े से बड़े जीव के एकमात्र आश्रय हैं। ब्रह्मा की गिनती जीवों में की जाती है, किन्तु वे हम सबों से महानतम हैं। तो फिर महानतम जीव भगवान् कृष्ण की दिव्य कथाओं के प्रति इतना आसक्त क्यों है? इसलिए कि वे समस्त भोग के आगार हैं। हर व्यक्ति हर वस्तु का आस्वाद चाहता है, किन्तु जो व्यक्ति भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगा रहता है, वह उसी में असीम आनन्द प्राप्त करता है। भगवान् असीम हैं और उनके नाम, गुण, लीलाएँ, पार्षद, नानारूपता आदि अनन्त हैं और जो इनका आस्वाद करना चाहते हैं, वे असीम रूप से ऐसा करते हुए भी तृप्त नहीं होते। इस तथ्य की पुष्टि पद्मपुराण से होती है-
रमन्ते योगिनोऽनन्ते सत्यानन्दचिदात्मनि ।
इति रामपदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते ।।
“योगीजन परम सत्य से असीम दिव्य आनन्द प्राप्त करते हैं, इसीलिए परम सत्य भगवान् राम भी कहलाते हैं।”
ऐसी दिव्यः वार्ताओं का कोई अन्त नहीं है। संसारी मामलों में तृप्ति का नियम होता है, लेकिन अध्यात्म में ऐसी तृप्ति नहीं है। सूत गोस्वामी नैमिषारण्य के ऋषियों के समक्ष भगवान् कृष्ण की कथा को चालू रखना चाह रहे थे और ऋषियों ने भी उनसे लगातार सुनते रहने की अपनी इच्छा व्यक्त की। चूंकि भगवान् ब्रह्म हैं और उनके गुण दिव्य हैं, अतएव ऐसी वार्ताएँ शुद्ध श्रोताओं के ग्राही भाव को बढ़ाती हैं।
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श्रीकृष्णनाम के अनुशीलनकी प्रणाली-
स्यात् कृष्णनामचरितादिसिताप्यविद्या-पित्तोपतप्तरसनस्य न रोचिका नु।
किन्त्वादरादनुदिनं खलु सैव जुष्टा स्वाद्वी क्रमाद्भवति तद्गदमूलहन्त्री ॥
(उपदेशामृत ७ श्लोक)
अहो! जिनकी रसना अविद्यारूपी पित्तके द्वारा सन्तप्त है- अनादिकालसे कृष्ण-विमुख रहनेसे जो अविद्या द्वारा ग्रस्त हैं, उनको श्रीकृष्णनाम चरितादिरूप अत्यन्त मीठी मिश्री भी रुचिकर नहीं होती, कड़वी लगती है, किन्तु श्रद्धापूर्वक उसी श्रीकृष्णनाम-चरितादिरूप मिश्रीका निरन्तर सेवन करनेपर वह क्रमशः सुस्वादु लगने लगती है तथा कृष्ण-विमुखता-अविद्यारूपी पित्तरोगका समूल विनाशक भी बन जाती है।
गौड़ीय कण्ठहार
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नाहं वन्दे तव चरणयो र्द्वन्द्वयद्वन्द्वहेतोः
कुम्भीपाकं गुरुमपि हरे ! नारकं नापनेतुम।
रम्या रामा मृदुतनुलता नन्दने नापि रन्तुं,
भावे भावे हृदयभवने भावयेयं भवन्तम् ।।6।।
हे भगवान ! सुख-दुःख के द्वन्दों से बचने के लिए मैं आपके चरणों की वन्दना नहीं करता हूँ। न ही कुम्भीपाक आदि भंयकर नरकों की नारकीय यन्त्रणाओं से बचने के लिए मैं आपके चरणों की वन्दना करता हूँ। इसके इलावा स्वर्ग के नन्दनकानन में लताओं की तरह कोमलांगी अप्सराओं के साथ आनन्द लूटने की चाह से भी मैं आपके चरणों की वन्दना नहीं करता हूँ मैं तो इसलिए आपके चरणों मे प्रणाम करता हूँ ताकि आपकी कृपा से मैं अपने हृदय – मन्दिर में आपका ध्यान कर सकें।
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
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कृष्णका माधुर्य सर्वचित्ताकर्षक है, इस रूपमाधुर्यका पान करनेमें बाधक निमेषकारी विधाताके प्रति क्या व्रजजनोंका कोप श्रीमद्भागवत (२.२४.६५) में वर्णित है-
यस्याननं मकरकुण्डलचारुकर्ण भ्राजत्कपोलसुभगं सविलासहासम् ।
नित्योत्सवं न ततृपुर्दृशिभिः पिबन्त्यो नार्यो नराश्च मुदिताः कुपिता निमेश्च ।।
श्रीकृष्णके कर्णद्वयमें दोलायमान मकराकृति कुण्डल, गण्डरूपी सरोवरमें विहार कर रहे हैं। इस आभासे कपोलोंका सौंदर्य और भी खिल उठता है। जब वे विलासके साथ हँस देते हैं, तो उनके मुखपर निरन्तर रहने वाले आनन्दमें मानो बाढ़ सी आ जाती हैं। सभी नर-नारी अपने नेत्रोंके प्यालोंसे उनके मुखारविन्दकी पीयूष माधुरीका निरन्तर पान करते रहते हैं, परन्तु तृप्त नहीं होते। इस रूप माधुरीका पान करनेमें बाधक पलकें गिरनेसे निमेषकारी ब्रह्मापर खीझते हैं।
सुभग कपोल हरि मकर कुण्डल।
सविलास-हास्य मुख चन्द्र निरमल ।।
नरनारीगण नित्य उत्सवे मातिल।
निमेषकारीर प्रति कुपित हइल ।।
भजनरहस्यवृत्ति-श्रील शुकदेव गोस्वामी हर्षोत्फुल्ल हो, श्रीकृष्णके रूप सौन्दर्यकी माधुरीका, महाराज परीक्षितके निकट वर्णन करने लगे। समस्त ब्रजवासीजन श्रीकृष्णकी उस रूपमाधुरीका दर्शनकर प्रेममें अत्यन्त विह्वल हो जाते हैं। ब्रजवासियोंका अनुराग असीम रूपमें परिवर्द्धित हो एक अनिर्वचनीय माधुर्यको प्राप्त होता है। महाभाववती ब्रजसुन्दरियाँ अपने प्रगाढ़ अनुरागके कारण कृष्णके रूपमाधुर्यका पूर्णतमरूपमें रसास्वदन करती हैं। उनके भावसमूह अपनी चरम पराकाष्ठाकी अवस्थामें आगे बढ़नेका स्थान न रहनेपर भी बढ़ते हैं तथा यावदाश्रय वृत्ति लाभ करते हैं। अनुरागकी ऐसी अनिर्वचनीय अवस्था जिसमें वे केवल रसका अनुभव करती हैं तथा स्वसंवेद्य दशाको प्राप्त होती हैं, जो महाभावकी चरम विकास अवस्था है तथा वह केवल ब्रजसुंदरियोंकी ही सम्पत्ति है।
कुंचित अलकावलीसे आवृत्त श्रीकृष्णके गण्डस्थलपर दिव्य कुण्डल शोभायमान हो रहे हैं। ललित हास्ययुक्त वदनकमल अपूर्व शोभासे नित्योत्सवमें परिव्याप्त हो रहा है। नित्योत्सवकी केन्द्रभूमि, मृदु मंद हास्यामृत, सर्व महामाधुर्यकी मधुरिमाके चक्रवर्ती रूपमें विराजमान है। पौगण्ड एवं किशोरकी वयःसंधिके कारण हर्ष, औत्सुक्य, चापल्य आदि श्रीकृष्णके मुखमण्डलपर उदय होकर अस्थिरता दर्शा रहे हैं। ताम्बूल चर्वणके द्वारा रंजित शुभ्र दन्त राशि तथा मंजु हास्य युक्त अधर लालिमा अत्यन्त शोभाको प्राप्त हो रही है।
ऐसा प्रतीत होता है मानो पूर्णमासीकी रात्रिमें उदित चन्द्रमा अपनी किरण प्रभाके द्वारा समस्त जीवोंके ताप, कष्टको दूर कर रहा है तथा भक्तरूपी चकोर-चकोरियोंके हृदयमें लोभ उत्पन्न करा रहा है। श्रीकृष्णकी इस अनुपम सौन्दर्य माधुरीका दर्शनकर ब्रजदेवियोंमें कामाम्बुधि वर्धित होकर उनके कुल, जाति, धर्म, धैर्य आदिका ध्वंसकर मोह उत्पन्न कर रहा है तथा वे आनन्दसमुद्रमें निमज्जित हो रही हैं। श्रीकृष्णके मृदु-मन्द हास्ययुक्त मनोहर कपोलोंपर दोदुल्यमान मकराकृति कुण्डल नृत्य कर रहे हैं तथा कपोलोंका आलिङ्गन, चुम्बन कर रहे हैं। यह देखकर गोपियोंके हृदयमें श्रीकृष्ण धीरललित रूपमें उदित हो रहे हैं। गण्डस्थलका आलिङ्गन स्पर्श करते कुण्डल ब्रजसुंदरियोंके स्तनोंको आलिङ्गन-चुम्बन करनेका अभिप्राय व्यक्त कर रहे हैं।
इस प्रकार श्रीकृष्णके माधुर्योत्सवको निहारकर गोपियाँ परितृप्त नहीं हो रही हैं तथा पलकों द्वारा दर्शनमें व्यवधान पड़नेके कारण कुपित होकर ब्रह्माको अभिसम्पात दे रही हैं, कोस रही हैं कि ब्रह्मा सृष्टि करने योग्य नहीं है। इतने सुन्दर दर्शनके लिए केवल दो ही आँखें दीं और उनपर भी पलक रूपी कपाट लगा दिये हैं। मरकर हम दूसरे जन्में ब्रह्मा बनेंगी तब इसे सृष्टि करना सिखायेंगी। ऐसे सौन्दर्यके दर्शनके लिए केवल दो आँखें पर्याप्त नहीं हैं। समस्त शरीरमें बिना पलकके आँखें-ही आँखें हों जिससे हम अपलक प्रचुर दर्शन कर सकें।
श्लोकमें ‘नार्य्य’ शब्द राधादि गोपियोंके लिए तथा ‘नरा’ शब्द सुबलादि प्रियनर्म सखाओंके लिए व्यवहत हुआ है।
श्रीकृष्णकी प्रेम माधुरी, लीला माधुरी, रूप माधुरी तथा वेणु माधुरी अपने परिपूर्णतम रूपमें केवल ब्रजमें ही विराजमान है। इसी कारण अन्य-अन्य धामोंसे ब्रजधामका, अन्य-अन्य श्रीकृष्ण-स्वरूपों तथा अवतारोंसे ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीराधारमणका तथा ब्रजगोपिकाओंका विशेष महत्व तथा वैशिष्ट्य है।
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
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आमि त वैष्णव, ए बुद्धि हइले, अमानि ना हब आमि ।
प्रतिष्ठाशा आसि, हृदय दूषिबे, हइब निरयगामी ।।
तोमार किंकर, आपने जानिब, गुरु अभिमान त्यजि ।
तोमार उच्छिष्ट, पद-जल रेणु, सदा निष्कपटे भजि ।।
निजे श्रेष्ठ जानि, उच्छिष्टादि दाने, हबे अभिमान भार ।
ताइ शिष्य तव, थाकिया सर्वदा, ना लइब पूजा कार ।।
अर्थात् हे गुरुदेव ! यदि मेरी बुद्धि ऐसी हो गयी कि में वैष्णव हो गया हूँ, तो फिर मैं कभी भी अमानी (अपना मान न चाहने वाला) नहीं हो पाऊँगा । प्रतिष्ठा प्राप्ति की आशा मेरे हृदय में आकर उसे दूषित कर देगी, जिसके फलस्वरूप में नरकगामी हो जाऊँगा। इसलिए में गुरु होने का अभिमान त्यागकर सर्वदा ही अपने को आपका दास मानता रहूँगा और सदा ही आपका उच्छिट प्रसाद, चरणामृत, चरणधूलि को गहण करता रहूँगा। यदि में अपने को श्रेष्ठ मानकर दूसरों को अपना उच्छिष्ट प्रदान करूँगा, तो भयंकर अभिमान के भार से में दब जाऊँगा। इसीलिए मैं सदा ही आपका शिष्य होकर रहूँ तथा किसी की भी पूजा ग्रहण न करूँ ।
महाभागवत ही गुरु होते हैं। जो सर्वत्र ही गुरु दर्शन करते हैं, ऐसे महाभागवत ही गुरु का कार्य कर सकते हैं। वे लघु को गुरु कर सकते हैं तथा सभी को कृष्णभक्त बना सकते हैं। स्वयं भक्त हुए बिना दूसरे को भक्त नहीं बनाया जा सकता । इसलिए गुरु होने का तात्पर्य है-कृष्णभक्त होना । जो गुरु होना चाहता है, उसे सब समय अपनी समस्त इन्द्रियों को कृष्ण की सेवा में नियुक्त करना होगा । गुरुनिष्ठ न होने पर अर्थात् गुरु के प्रति दृढ़निष्ठा न रहने पर गुरु का कार्य करने का अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता ।
महाभागवत तृण से दीन-हीन होते हैं, वे अपने को सबसे छोटा मानते हैं। शिष्य होकर मैंने बहुत दिनों तक दासता की, अब शिष्यगिरि अच्छी नहीं लगती, अतः अब मुझे गुरुगिरि करनी चाहिए वे ऐसा कभी नहीं कहते। वे गुरु का कार्य तो करते हैं, परन्तु उनके हृदय में गुरु होने का अभिमान नहीं होता ।
श्रीलप्रभुपाद
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दया’ शब्द का अर्थ
आज हमारा वक्तव्य-विषय है ‘श्रीचैतन्य की दया’। आप मेरे पूर्ववर्ती महोदय से उसे सुन चुके हैं। ‘दया’ शब्द का शब्दकोशीय अर्थ निकालने पर हम देखते हैं इसमें दूसरों का दुख दूर करने की इच्छा निहित है। ‘दया’ शब्द दय-धातु से उत्पन्न हुआ है। ‘श्रीचैतन्य की दया’ कहने पर हम यही समझेंगे कि, श्रीचैतन्यदेव की दया में दूसरों के दुख को दूर करने की एक किया, उनकी लीला में मौजूद है। ‘दया’ शब्द के भीतर हम एक और विषय लक्षित करते हैं कि, इसमें प्रियता, कमनीयता है। ‘दय’-धातु का अर्थ है कमनीयता, प्रियता जिससे हमने ‘दयित’ शब्द को श्रवण किया है। अतः चैतन्यदेव की दया कहने से यह समझना होगा कि, उनकी उस दया में, यथेष्ट मात्रा में, कमनीयता और प्रियता है। इसलिए उनकी दया, साधारण दया की अपेक्षा, विशिष्टता प्राप्त है। इसीलिए मेरे पूर्ववर्ती वक्ता महोदय ने चैतन्यदेव के परिचय के प्रारम्भ में एवं मंगलाचरण में “नमो महावदान्याय” श्लोकों का पाठ किया है। श्रीचैतन्यदेव महावदान्य थे। चैतन्यदेव का परिचय आपके लिए अज्ञात नहीं है। क्योंकि, उन्होंने संन्यास लीला के बाद, पूरे 18 साल तक, इसी पुरुषोत्तम क्षेत्र में, अवस्थान करते हुए अपनी महावदान्य-लीला का पूर्ण प्रकाश किया था।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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स्वयं आचरण कर शिक्षा प्रदान करना
श्रीश्यामल दास नाम का एक ब्रह्मचारी कोलकाता श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ में रहता था। एक बार वह अस्वस्थ होने के कारण पागलप्राय हो गया। किसी एक वैद्य ने उसका परीक्षण कर उसके सिर पर लगाने के लिए तेल दिया। किन्तु जब भी कोई उसे सिर पर तेल लगाने के लिए कहता अथवा लगाने जाता तो वह ‘क्या मैं पागल हूँ, जो सिर पर तेल लगाऊँ’- यह कहकर चिल्लाने लगता था।
एक दिन गुरु महाराज ने मुझसे कहा, “वह तेल मुझे लाकर दो तथा तत्पश्चात् श्यामल ब्रह्मचारी को भी बुला कर मेरे निकट ले आओ।” यद्यपि गुरु महाराज कभी भी किसी प्रकार का कोई तेल अपने श्रीअङ्ग पर नहीं लगाते थे, हमने कभी भी उनको सम्पूर्ण जीवन ऐसा करते हुए नहीं देखा, तथापि उस दिन श्रीश्यामल ब्रह्मचारी को दिखलाकर उन्होंने अपने हाथ से सिर पर तेल लगाकर उससे कहा, “यह तो बहुत अच्छा तेल है, देखो, मैं भी तो इसे अपने सिर पर लगा रहा हूँ। तुम इसे अपने सिर पर लगाने में सङ्कोच क्यों कर रहे हो?” गुरु महाराज की बात सुनकर तथा उन्हें अपने सिर पर तेल लगाते देखकर श्रीश्यामल ब्रह्मचारी ने भी तेल उठाकर स्वयं ही अपने सिर पर लगा लिया।
वह प्रतिदिन स्वयं तेल लगाते समय कहता, “गुरु महाराज भी इस तेल को लगाते हैं। यह तेल पागल व्यक्ति के लिए नहीं, अपितु सभी के लिए अच्छा है।” इस प्रकार उस तेल का प्रयोग करने से श्रीश्यामल ब्रह्मचारी कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो गया।
गुरु महाराज कभी किसी पर शासन करके उसे कोई शिक्षा प्रदान नहीं करते थे अपितु स्वयं के आचरण के द्वारा शिक्षा प्रदान करते थे। इस उपरोक्त प्रसङ्ग के माध्यम से उनका भक्तवात्सल्य रूपी गुण भी प्रकाशित हुआ।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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भगवान् का ही अवतार, मनुष्य का नहीं
प्रत्येक भजन-पिपासु व्यक्ति ने ही सर्वप्रमाण-शिरोमणि (सभी प्रमाणों में श्रेष्ठ प्रमाण) श्रीमद्भागवत को ही “श्रेष्ठशब्द-प्रमाण” के रूप में स्वीकार कर लिया है। श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु और उनके अनुगत गौड़ीय गोस्वामी गुरुवर्ग ने अमल-शब्द-प्रमाण श्रीमद्भागवत में वर्णित, श्रीभगवान् के चौबीस अवतारों को स्वीकार कर लिया है। अप्राकृत-स्वभाव-विशिष्ट वैष्णव-कवि श्रीजयदेव गोस्वामी ने इन्हीं में से सर्वावतारी श्रीकृष्णचन्द्र के दशावतार को लेकर “श्रीदशावतार-स्तोत्रम्” रचित किया है। इसलिए देखा जाता है कि, शास्त्र आदि में श्रीभगवान् के ही अवतारों का वर्णन किया गया है। उनका महिमा-माहात्म्य पुराणों में भी वर्णित और प्रकाशित है। यहाँ जागतिक विचारों को मान्यता नहीं दी गयी है। एक गौड़ीय सम्प्रदाय के अलावा अन्य सभी ऐसा कहकर गलत विचार कर रहे हैं कि, “मनुष्य का अवतार होता है”। इस प्रकार के विचारों को मानने वालों में विशेष रूप से श्रीरामकृष्ण-मिशन, भारत-सेवाश्रम हैं; इन लोगों ने ही सबसे पहले मनुष्य को भगवान् बनाने का अपप्रयास किया है। हालांकि इनके पहले उन्होंने श्रीशंकराचार्य को अपने पूर्व-अधिकारी के रूप में प्राप्त किया था। उन्होंने भगवान् की आज्ञा से, जीवों के कल्याण के लिए, भक्तों के साधन-भजन का मार्ग निर्विघ्न और निरुपद्रव (अशान्ति रहित) करने के लिए, नास्तिक असुरों का मोहन करने के लिए “चित्जड़-समन्वयवाद” (चेतन और जड़ को समान करने वाला मतवाद), “जीव-ब्रह्मकवाद” (जीव और ब्रह्म को समान करने वाला मतवाद) निर्विशेष मायावाद (निराकार ब्रह्म को मायाधीन करने वाला मतवाद) आदि का प्रचार किया। सुविधावादी नास्तिकों ने बाद में सस्ता ‘ब्रह्मवादी’ होकर श्रीभगवान् के द्वारा उपदिष्ट मूल तत्त्व-सिद्धान्त की उपेक्षा और अवज्ञा करना शुरु कर दिया था। किन्तु तत्त्व-सिद्धान्तविद्, शास्त्र-दर्शीगण ने आस्तिक्य-दर्शन को ही बहुमूल्यवान् मानकर साधु-शास्त्र-गुरुवाक्य की मर्यादा संरक्षण के लिए दृढ़ संकल्प लिया था।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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प्रीति-युक्त सेवा कष्ट दायक नहीं
यह घटना द्वितीय विश्वयुद्ध अंतर्गत जापान और चीन के बीच हुए युद्ध के समय की है। उस समय जापान की सहायता प्राप्त, सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाली ‘आज़ाद हिन्द फौज’ (Indian National Army) का बर्मा में आगमन हुआ। बर्मा की उस समय की राजधानी रंगून पर बमों से हमले होने लगे। इस युद्ध से उत्पन्न कठिन परिस्थिति के कारण, रंगून में रह रहे अनेक भारतीय अपने देश वापस जाने लगे। भारत आते समय कई लोग भूख से रास्ते में ही मर रहे थे।
भारत लौट रहे लोगों में एक व्यक्ति था, जो अपना घर और संपत्ति छोड़कर पत्नी और नवजात पुत्र के साथ भारत आ रहा था। मणिपुर तक आते-आते दंपत्ति की भूख-प्यास के कारण शारीरिक स्थिति इतनी ख़राब हो चुकी थी कि वे अपने पुत्र को उठाकर चलने में असमर्थ हो रहे थे। पुत्र के प्रति उनकी बहुत आसक्ति थी। उन्होंने सोचा, “यदि हम पुत्र को अपने साथ लेकर आगे बढ़े और रास्ते में हमें कुछ हो गया तो उसे देखनेवाला कोई नहीं रहेगा, पुत्र भी बच नहीं पाएगा। किन्तु यदि हम इसे मणिपुर शहर में ही कहीं छोड़कर जाएँ तो कोई न कोई उसका लालन-पालन कर लेगा और वह बच जाएगा। इस आशा से पति-पत्नी अत्यंत दुःखी मन से, पुत्र को मणिपुर में ही एक स्थान पर छोड़कर आगे चले गए।
भारतवर्ष के अनेकों स्थानों से होते हुए अंत में वे दोनों मद्रास पहुँचे और वहाँ रहने लगे। भारत सरकार द्वारा मिली आर्थिक सहायता से उन्होंने वहाँ एक व्यवसाय शुरू किया जिसमें उन्हें सफलता मिली और वे फिर धन सम्पन्न हो गए। उन्होंने मद्रास में अपना एक घर बनाया और यात्रियों के रहने के लिए एक धर्मशाला भी बनवाई।
दूसरी ओर, मणिपुर में वे जिस पुत्र को छोड़ आए थे, उसे वहाँ के एक स्थानीय व्यक्ति ने देखा। बच्चे को रोते हुए देख उसे उस पर दया आई। वह उसे अपने घर ले गया और उसका पालन-पोषण करने लगा। बच्चा अब उसी व्यक्ति को अपना पिता और उसकी पत्नी को अपनी माता समझने लगा। समय बीतता गया। बच्चा अब बड़ा हो गया और एक दुकान में काम करने लगा। उसका विवाह हुआ और उसे एक पुत्र प्राप्त हुआ।
लालन-पालन करनेवाले माता-पिता ने एक दिन उसे बता दिया, “हम दोनों तुम्हारे माता-पिता नहीं हैं। तुम हमें रास्ते में मिले थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जब रंगून पर हमला हुआ था, तब वहाँ से अनेक भारतीय अपने देश वापस आ रहे थे। उसी समय कोई तुम्हें यहाँ छोड़ गया था।”
यह बात सुनकर वह व्यक्ति आश्चर्यचकित हो गया। उसे अब अपने जन्म देनेवाले माता-पिता से मिलने की तीव्र इच्छा होने लगी। वह उन्हें ढूँढ़ने के लिए अपने पालक माता-पिता से आज्ञा लेकर, पत्नी और पुत्र के साथ घर से निकल पड़ा। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वह मद्रास आया। भाग्यक्रम से मद्रास में वह उसी धर्मशाला में रुका जो उसके पिता ने बनवाई थी। कमरे का किराया देने में असमर्थ होने के कारण धर्मशाला के मैनेजर ने उसे बरामदे में रहने के लिए स्थान दिया।
वह व्यक्ति मद्रास के विभिन्न स्थानों पर अपने माता-पिता को ढूँढ़ने लगा। इसी बीच उसे हैजा हो गया। बीमारी के संक्रमण के भय से धर्मशाला के मैनेजर ने उसकी पत्नी से कहा कि अपने पति को लेकर कहीं और चली जाए। पत्नी निवेदन करने लगी, “इस स्थिति में हम कहाँ जाएँगे? कौन हमें आश्रय देगा?”
मैनेजर के बार-बार कहने पर भी जब वे नहीं गए तो धर्मशाला का मालिक स्वयं वहाँ आया। हैजे से पीड़ित व्यक्ति और उसके परिवार को बरामदे में देखकर मालिक ने मैनेजर को डाँटते हुए कहा, “उन्हें यहाँ क्यों रहने दिया? ऐसा किससे पूछ कर किया? उन्हें अभी यहाँ से निकाल दो।”
मालिक की बात सुनकर पति-पत्नी रोने लगे। मालिक ने बहुत गुस्से से उस व्यक्ति से कहा, “तुम्हें हैजा हुआ है। अपने परिवार को लेकर इसी वक्त यहाँ से चले जाओ।”
वह व्यक्ति रोते-रोते अपनी स्थिति बताते हुए कहने लगा, “मैं मणिपुर से अपने माता-पिता को ढूँढ़ने के लिए यहाँ आया हूँ। बचपन में मेरे माता-पिता मुझे मणिपुर में छोड़कर कहीं चले गए थे। ऐसी बीमारीवाली स्थिति में अब हमें कौन आश्रय देगा? कृपया और कुछ दिन हमें यहाँ रहने दीजिए।”
उस व्यक्ति की बात सुनकर धर्मशाला के मालिक को अपने पुत्र का स्मरण हुआ। वह सोचने लगा, “अरे कौन हैं ये लोग? कहीं यह मेरा पुत्र तो नहीं है? शायद मेरी पत्नी पहचान ले!”
उसने अपनी पत्नी को पूरी बात बताई और उसे धर्मशाला ले आया। माता ने पुत्र को पहचान लिया और रोते-रोते कहने लगी, “अरे! यह तो हमारा पुत्र है।”
जैसे ही पति-पत्नी को उस व्यक्ति के साथ अपने सम्बन्ध का पता चला उन्होंने उसे गले लगा लिया। तब वे यह भी भूल गए कि उसे हैजा हुआ है। पहले जो उसे धर्मशाला से जाने के लिए कह रहे थे, वे ही अब उसे अस्पताल ले जाकर उसकी देखभाल करने लगे! अब उन्हें हैजे से संक्रमित होने का डर नहीं था, क्योंकि जहाँ सम्बन्ध है वहाँ प्रीति और सेवा स्वाभाविक है।
व्यक्ति जहाँ अपना सम्बन्ध मानता है, वहाँ सेवा करने के लिए दिन-रात एक कर देता है। ऐसा करने में उसे कितना भी कष्ट हो, उसे कष्ट का अनुभव नहीं होता।
मठ में एक व्यक्ति था जो भगवान् के लिए एक समय की रसोई करने में भी बहुत कष्ट अनुभव करता था, किन्तु विवाह के बाद वही व्यक्ति परिवार के सभी कार्य करने लगा, जैसे बीमार पत्नी की सेवा, खरीदारी, रसोई, यहाँ तक कि बच्चों के मल-मूत्र की सफाई भी। भगवान् की सेवा करने में उसे कष्ट होता था, किन्तु परिवार की सेवा करने में उसे कोई कष्ट नहीं होता था, ऐसा क्यों?
भगवान् के साथ हमारे सम्बन्ध को न जानना ही इसका मूल कारण है। जिनके साथ हम अपना सम्बन्ध नहीं मानते, उनके साथ हमारी प्रीति भी नहीं होती और जहाँ प्रीति नहीं है, वहाँ थोड़ा कुछ कर लेने से ही लगता है जैसे बहुत कुछ कर लिया!
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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