तुलयाम लवेनापि न स्वर्ग नापुनर्भवम् ।
भगवद्सङ्गिन्सङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिषः ।।

तुलयाम के साथ तुलना करना; लवेन क्षण मात्र से; अपि भी; न कभी नहीं; स्वर्गम् स्वर्गलोक; न न तो; अपुनः भवम् पदार्थ से मोक्ष; भगवत्-सङ्गिः भगवद्भक्तः सङ्गस्य = संगति का; मर्त्यानाम् मरनेवालों का; किम् क्या रखा है; उत कहने में; आशिषः सांसारिक आशीर्वाद, वर।

अनुवाद – भगवद्भक्त के साथ क्षण भर की संगति के महत्व की तुलना न तो स्वर्गलोक की प्राप्ति से, न पदार्थ से मुक्ति की प्राप्ति से की जा सकती है। उन सांसारिक वरदानों के विषय में क्या कहा जाय जो भौतिक सम्पत्ति के रूप में होते हैं और मर्यों के लिए हैं?

तात्पर्य – एक वस्तु की तुलना दूसरे से तभी की जा सकती है जब कुछ समान बातें होती हैं। हम शुद्ध भक्त की संगति की तुलना किसी भौतिक वस्तु से नहीं कर सकते। जो लोग भौतिक सुख के प्रति आसक्त होते हैं वे चन्द्र, शुक्र तथा इन्द्रलोक जैसे स्वर्गों की कामना करते हैं, किन्तु जो भौतिक दार्शनिक चिन्तन में उन्नत होते हैं, वे भवबन्धन से मोक्ष की कामना करते हैं। जब मनुष्य सभी प्रकार की भौतिक उन्नति से उद्विग्न हो उठता है तो वह विपरीत प्रकार के मोक्ष की कामना करता है जो अपुनर्भव या पुनर्जन्म न होना कहलाता है। किन्तु भगवान् के शुद्ध भक्त स्वर्गलोक में मिलनेवाले सुख की कामना नहीं करते, न ही वे भवबन्धन से मोक्ष चाहते हैं। दूसरे शब्दों में, भगवान् के शुद्ध भक्तों के लिए स्वर्गलोक में प्राप्य भौतिक सुख मायाजाल के समान होता है और चूँकि वे सुख-दुख की भौतिक धारणाओं से पहले से मुक्त रहते हैं, अतएव वे भौतिक जगत से भी मुक्त होते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि भगवान् के शुद्ध भक्त इस जगत तथा आध्यात्मिक जगत, दोनों ही में, दिव्य स्थिति में, अर्थात् भगवान् की सेवा में लगे रहते हैं। जिस प्रकार सरकारी नौकर सदा नौकर रहता है, चाहे घर में हो या आफिस में या किसी अन्य स्थान में, उसी प्रकार भक्त को इस संसार से कुछ भी लेना-देना नहीं रहता, क्योंकि वह एकान्त भाव से भगवान् की दिव्य सेवा में लगा रहता है। चूँकि उसे किसी भौतिक वस्तु से कोई सरोकार नहीं रहता, अतएव उसे भौतिक वरदानों से क्या मिलनेवाला है चाहे वह राजपद हो या इससे भी बड़ा कोई अन्य पद, क्योंकि ये शरीर के नष्ट होते ही समाप्त हो जाते हैं। भक्ति शाश्वत है, इसका कोई अन्त नहीं होता, क्योंकि यह आध्यात्मिक होती है। अतएव शुद्ध भक्त की निधियाँ भौतिक निधियों से भिन्न होती हैं, अतएव दोनों की कोई समता नहीं। सूत गोस्वामी भगवान् के शुद्ध भक्त थे, अतएव नैमिषारण्य के ऋषियों के साथ उनकी संगति अद्वितीय है। भौतिक जगत में निपट भौतिकतावादी की संगति गर्हित समझी जाती है। भौतिकतावादी को योषित् सङ्गी भी कहा जाता है, क्योंकि उसकी आसक्ति भौतिक मायाजाल, अर्थात् स्त्रियों तथा अन्य साज-सामान से होती है। ऐसी आसक्ति बद्ध है, क्योंकि इससे जीवन के वरदान तथा सम्पन्नता दोनों दूर चले जाते हैं। इसका बिल्कुल उल्टा है भागवत सङ्गी जो सदैव भगवान् के नाम, यश, गुण आदि की संगति में रहता है। ऐसी संगति वांछनीय है, पूज्य है, प्रशंसनीय है और इसे जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य माना जा सकता है।

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धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष आदि नामके आनुषङ्गिक फल-मुख्य फल एकमात्र कृष्णप्रेम-

भक्तिस्त्वयि स्थिरतरा भगवन् यदि स्या-दैवेन नः फलति दिव्यकिशोर मूर्त्तितः ।
मुक्तिः स्वयं मुकुलिताञ्जलि सेवतेऽस्मान् धर्मार्थकामगतयः समयप्रतीक्षाः ॥

(कृष्णकर्णामृत १०७ श्लोक)

हे भगवन् ! यदि आपके श्रीचरणकमलोंमें दृढ़ भक्ति हो तो आपके परम मनोहर दिव्य किशोरमूर्तिका दर्शनरूपी फल सहज ही प्राप्त हो जाता है। तदनन्तर मुक्ति तो हाथ जोड़कर सामने खड़ी ही रहती है। साथ ही धर्म, अर्थ तथा काम भी भक्तिपूर्ण हृदयवालोंकी सेवाके अवसरकी प्रतीक्षा करते रहते हैं ।

गौड़ीय कण्ठहार

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श्रीगोविन्द – पादाम्भोज – मधुनो महदद्भुतम्।
यत्पायिनो न मुह्यन्ति मुह्यन्ति यद्यायिनः ।।5।।

श्रीगोविन्द जी के मधुर पादपद्मों की ऐसी महिमा है कि जिन्होंने उस रस का पान किया है वे कभी भी संसार के विषयों में मुग्ध नहीं होते। इसके विपरीत जो इस रसास्वादन से विमुख हैं अर्थात् जिन्होंने आज तक भगवान श्रीगोविन्द जी के चरणकमलों की महिमा का रसास्वादन नहीं किया है, वे ही संसार में मत्त रहकर फँसते रहते हैं।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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श्रीराधादास्य प्राप्त रतियुक्त साधकका परिचय श्रीमद्भागवत (११.६.४६) में दिया है-

त्वयोपभुक्तस्त्रग्गन्धवासो ऽलङ्कारचर्चिताः ।
उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव मायां जयेमहि ।।

हे प्रभो! हमने आपकी धारण की हुई माला, चन्दन, वस्त्र एवं आभूषणोंको धारण किया। हम आपकी जूठन खानेवाले सेवक हैं। इसलिए हम आपकी मायापर अवश्य ही विजय प्राप्त कर लेंगे। (अतः प्रभो ! हमें आपकी मायाका डर नहीं है, डर है तो केवल आपके वियोगका) ।

तोमार प्रसाद माला गन्ध अलंकार।
वस्त्रादि परिया दिन यायत आमार ।।
तोमार उच्छिष्टभोजी दास परिचये।
तव माया जय करि अनासक्त हये।।

भजनरहस्यवृत्ति-कृष्ण सेवाविमुख जन निजभोगोंमें तत्पर होकर शयन, आसन, भ्रमण, आवास, क्रीड़ा आदि भोग क्रियाओंका अनुष्ठान करते हैं। यदि इसी क्रियाको भगवत सम्बन्धीय बनाकर अनुष्ठान किया जाय तो जीवका नित्य मंगल होता है। श्रीकृष्णके उपभुक्त अवशेष माल्य, गन्ध, वस्त्र, अलंकारादिके सेवनके प्रति यदि जीवका लोभ हो तो वह भवबन्धनमें नहीं बंधता। उद्धवजी श्रीभगवानसे यही कहते हैं कि आपके उच्छिष्ट प्रसादको प्राप्तकर जीव मायाके दासत्वसे मुक्त हो जाता है। हरिभक्तिविलासमें वर्णित है कि विष्णु नैवेद्य आदिमें संशय करनेवालेको अनन्तकालतक नरक वास मिलता है।

महाप्रसादकी अवज्ञा नहीं करनी चाहिए। कुत्तेके मुखमें गिरा हुआ महाप्रसाद भी परम पवित्र है तथा ब्राह्मणके लिए भी ग्रहणीय है।

प्राचीन विग्रह अथवा महापुरुषों द्वारा प्रतिष्ठित विग्रहोंको निवेदित प्रसाद अत्यन्त पावन है तथा ग्रहणीय है, किन्तु असंयमी व्यक्ति यत्र-तत्र विग्रह-स्थापन करके प्रसाद वितरण करते हैं, वह उचित नहीं है-

श्रुति स्मृति पुराणादि पंचरात्र विधिं बिना।
ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरूत्पातायैव कल्पते ।।

(नारदपंचरात्र)

श्रुति, स्मृति, पुराणादि एवं पंचरात्रकी विधिको छोड़कर ऐकान्तिकी हरिभक्तिका जो आचरण करता है, वह केवल उत्पातको ही उदय करनेवाला होता है। श्रीकृष्णके उच्छिष्टका नाम ‘महाप्रसाद’ है। जब भक्त उस महाप्रसादको पा लें तब उनके उच्छिष्टको महा-महाप्रसाद कहते हैं। श्रीचैतन्य चरितामृतमें श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीपाद कहते हैं-

भक्तपद धूलि आर भक्त पद जल।
भक्त भुक्त अवशेष एइ तिन महाबल ।।

इन तीनोंके सेवनसे श्रीकृष्णकी प्रेमाभक्ति उदय होती है-इन तीनोंमें महान बल है।

साधक भक्तोंके लिए भी सिद्ध भक्तके आचरणका अनुकरण विधेय नहीं है। किसी समय श्रीविनोदबिहारी ब्रह्मचारी एवं नरहरि प्रभु श्रीवंशीदास बाबाजीकी भजन कुटीमें दर्शनके लिए उपस्थित हुए। बाबाजी चायका भोग लगाकर वितरण कर रहे थे। विनोदबिहारीजी तथा नरहरि प्रभुको भी चायका प्रसाद मिला। विनोदबिहारीजीने उसे प्रणाम करके रख दिया, ग्रहण नहीं किया। नरहरि प्रभुके जिज्ञासा करनेपर श्रीविनोदबिहारीजीने दार्शनिक युक्ति देते हुए कहा कि, “महाभागवत द्वारा सेवनीय वस्तु हमारे लिए अनुपयुक्त भी हो सकती है। महादेवजीने कालकूट विषका पान किया, वे समर्थ हैं किन्तु साधारण व्यक्ति यदि विषपान करे तो मृत्यु निश्चित है। साधकके लिए तो केवलमात्र भक्ति शास्त्रोक्त विधिका पालन करना ही उचित है।”

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा

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मनुष्य जन्म के अतिरिक्त अन्य जन्म में हरिभजन का सुयोग नहीं है। अतः श्रेयः प्राप्त करने के लिए जीवन के अन्तिम समय तक जगत की समस्त बातों को छोड़कर हम केवलमात्र भगवद् भजन करेंगे। जगत के सभी लोग मेरा सर्वनाश करने के लिए प्रस्तुत हैं। इस बन्धुविहीन देश में आत्मीय – नामधारी सभी लोग भगवद् भजन के प्रतिकूल हैं। आत्मीय के रूप में एकमात्र वैष्णव के आश्रय के अतिरिक्त हमारा अन्य उपाय नहीं है। किसी मनुष्य के लिए कोई कार्य करने की आवश्यकता नहीं है- सब लोग मिलकर केवल मात्र भगवान के सेवकों की सेवा करें । विद्या, बुद्धि, पाण्डित्य, बल, अर्थ, सामर्थ्य के द्वारा सभी लोग भगवान की सेवा करें। ‘तूर्ण यतेत’ (तुरन्त प्रयास करो) विलम्ब करने से असुविधा में पड़ जाएंगे ।

अवैष्णव – धर्म ग्रहण करनेवाले का मंगल नहीं हो सकता । समस्त प्रकार के मंगल वैष्णव के चरणकमलों के आश्रय लेने वाले के लिए हस्तामलक (हथेली में आँवले) के समान है। अवैष्णव ने ही अपने गले में जन्म – मरण की माला धारण की है। हरिपरायण लोगों का कदापि मातृगर्भ में पुनर्जन्म नहीं होता है । वैष्णव की बात दूर रहे, वैष्णव के अलौकिक असामान्य चरणकमलों के दर्शन का सुयोग जिन्हें प्राप्त हुआ है, उनका भी पुनर्जन्म नहीं है ।

श्रीलप्रभुपाद

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श्रीशंकराचार्य का आनुगत्य करने से व्यासानुगत्य नहीं होगा

अतएव व्यासपूजा के अवसर पर, हमारे आचार्यदेव की आविर्भाव तिथि पर, उनके श्रीचरणों का स्मरण करके विशेष स्पर्धा के साथ कह रहा हूँ आचार्य श्रीपाद शंकर का आनुगत्य करने से कभी भी व्यासजी का आनुगत्य नहीं होगा – होना संभव भी नहीं है। जो लोग भ्रमित होकर श्रीशंकराचार्य जी का आनुगत्य कर रहे हैं, हम उनसे अनुरोध कर रहे हैं कि, वे, शंकरानुगत्य को परित्याग करके व्यासानुगत्य करें। व्यासानुगत्य ही आस्तिकता है। शंकरानुगत्य में आस्तिकता का केवल दिखावा है, वास्तव में वह नास्तिकता है। इसलिए आप नास्तिक मत बनिये। व्यासावतार श्रीव्यास का आदेश और उपदेश सुनकर उनका आनुगत्य करें, जीवन को सफल बनायें – आस्तिकता को पूर्ण रूप से सार्थक बनायें।

हमारा यह उड़ीसा क्षेत्र और बंगाल क्षेत्र अत्यन्त भाग्यहीन है। इन दोनों क्षेत्रों में शंकराचार्य की विचाराधारा का अच्छा-खासा प्रचार देखा जाता है। किन्तु अन्यान्य क्षेत्रों में इस प्रकार की नास्तिकता का प्रचार बहुत कम ही हुआ है। इन सभी प्रदेशों में शंकर के ‘कुदर्शन’ से जीवों की बहुत हानि हुई है। अतएव वर्तमान में, सुदर्शन-रूप भक्तिसिद्धान्त के आविर्भाव की बहुत आवश्यकता आन पड़ी है। इसीलिए भक्तिसिद्धान्त-वाणी उत्कल (पुरी, उड़ीसा) में आविर्भूत होकर, हमें खुलकर, उच्च स्वर से घोषणा कर रही हैं कि, ‘अकल्याणकर शंकराचार्य के आनुगत्य का परित्याग करके तुम व्यासदेवजी का आनुगत्य करो, कुदर्शन का त्याग करके, सुदर्शन की शरण में जाओ।’

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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हरिनाम जप से कीर्त्तन श्रेष्ठ है। होठों को हिलाये बिना हरिनाम जप करने से जप करने वाले का मंगल होता है। किन्तु कीर्त्तन से अपना व दूसरे का या यूँ कहें कि दोनों का मंगल होता है। दृष्टान्त स्वरूप कहा जा सकता है कि जो कमाता है, वह अपने भोजन की व्यवस्था करता है, वह अच्छा है किन्तु उसकी अपेक्षा और भी उत्तम है जो कमा कर अपना और अन्य दसों आदमियों के भोजन की व्यवस्था करता है। उच्चकीर्त्तन द्वारा वृक्ष इत्यादि व पशु-पक्षी आदि जंगम प्राणियों का भी मंगल होता है। इसके इलावा जप से तो चित्त विक्षिप्त भी हो सकता है किन्तु उच्च-संकीर्त्तन में विक्षेप की आशंका नहीं रहती। दरवाज़े खिड़कियाँ बन्द करके जप करने का प्रयत्न करने पर भी पहले हमने जिन जिन विषयों का संग किया है, उन सब का चिन्तन आकर हृगड्डह्यद्र करेगा। मेरी इच्छा के विरुद्ध भी अनजाने में मेरा चित्त कहीं और चला जायेगा। थोड़ी सी आवाज़ होने पर भी मेरा चित्त भटक जायेगा किन्तु उच्च-संकीर्त्तन में ध्येय वस्तु श्रीहरि में आसानी से चित्त लग सकेगा। इसलिये जप की अपेक्षा उच्च कीर्त्तन में अधिक लाभ है। विशेषतः कलियुग में जब जीव अत्यन्त विषयाविष्ट, कामातुर, व्याधिग्रस्त और बड़ी कम उम्र वाला हो गया है – ऐसे समय में हरिसंकीर्त्तन ही मंगल प्राप्ति के एकमात्र उपाय के रूप में निर्दिष्ट हुआ है :-

कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मरवैः ।
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात् ॥
(भा० 12/3/52)

ध्यायन् कृते यजन् यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन् ।
यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवं ॥
(पद्मपुराण उत्तरखण्ड अ. 42, श्लोक 25)

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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प्रतिदिन एक लाख नाम नियम के साथ ग्रहण करने पर भगवान् की सेवा में विशेष अधिकार प्राप्त होता है।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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जब अर्जुन के आश्चर्य की सीमा न रही

यह उन दिनों की बात है जब महाभारत के युद्ध की समाप्ति के बाद श्रीकृष्ण कुछ दिन हस्तिनापुर में रुके हुए थे। एक दिन वे अर्जुन के साथ हस्तिनापुर में भ्रमण करने के लिए निकले। दोनों आपस में बात करते हुए चल रहे थे। अर्जुन कृष्ण से कह रहे थे, “मैं हस्तिनापुर को विश्व का सबसे सुन्दर नगर बनाना चाहता हूँ।”

वे नगर रचना में क्या-क्या परिवर्तन लाना चाहते हैं, उस विषय में श्रीकृष्ण को विस्तार से बताने लगे। श्रीकृष्ण, अर्जुन की योजना की प्रशंसा करते हुए कहने लगे, “यदि बनाई हुई योजना के अनुसार काम होगा तो अच्छा है।” इस प्रकार बातें करते-करते दोनों ने एक वन में प्रवेश किया। कुछ दूर जाने पर उन्हें एक तेजस्वी मुनि के दर्शन हुए। वे खुले आसमान के नीचे अपने सिर पर केवल एक पेड़ का पत्ता रख कर बैठे हुए थे। मुनि को इस अवस्था में बैठे देखकर अर्जुन उनके लिए चिंतित हो उठे। उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा, “केशव ! ये मुनि यहाँ इस वन में एक पत्ता अपने सिर पर लिए बैठे हैं। मैं इनके लिए एक कुटिया का निर्माण करना चाहता हूँ। क्या मैं उनसे पूछकर आऊँ?”

श्रीकृष्ण ने कहा, “हाँ, हाँ, अवश्य ही पूछकर आओ।”

वे लोमश मुनि थे। उनके शरीर पर इतने बाल थे कि उनका पूरा शरीर बालों से ढका हुआ था। अर्जुन ने उनके पास जाकर उन्हें प्रणाम किया। लोमश मुनि ने जान लिया कि उनके पास कौन आया है। उन्होंने अपनी आँखें खोलीं और अर्जुन से पूछा, “क्या बात है? कुछ माँगने के लिए आए हो?”

अर्जुनः “मैं आपसे कुछ माँगने के लिए नहीं आया हूँ। आप वन में खुली जगह पर बैठे हैं, यहाँ आपको धूप और वर्षा से कष्ट होता होगा। क्या मैं आपके लिए एक कुटिया बना दूँ?”

लोमश मुनिः “मैं कितने दिन जीवित रहूँगा? कुटिया बनाने की क्या आवश्यकता है?”

अर्जुनः “क्या आप जानते हैं आप कितने दिन जीवित रहेंगे?”

लोमश मुनिः “मैं चार कल्पों से जीवित हूँ। प्रत्येक कल्प में मेरे शरीर का एक बाल गिरता है। अभी तक मेरे शरीर के चार बाल गिर चुके हैं। जब मेरे शरीर के सभी बाल गिर जाएँगे तब मेरी मृत्यु हो जाएगी। तो इतने से जीवन के लिए कुटिया बनाने की क्या आवश्यकता है?”

अर्जुन आश्चर्य के साथ सोचने लगे, “सारे बाल गिर जाने तक जीवित रहेंगे? कितने युगों तक जीवित रहेंगे! फिर भी वे अपने जीवन को इतना छोटा समझते हैं कि अपने लिए एक कुटिया का निर्माण कराना भी आवश्यक नहीं समझा और मैं छोटे से जीवन के लिए हस्तिनापुर के नव-निर्माण की योजना बना रहा हूँ!”

यहाँ अर्जुन को माध्यम बनाकर कृष्ण हमें शिक्षा दे रहे हैं कि संसार अनित्य है और एक न एक दिन हमें यहाँ से जाना होगा। अपने जीवन के प्रधान उद्देश्य, परमानन्दमय भगवान् की प्राप्ति को छोड़ नाशवान संसार में उन्नति करने की नई-नई योजनाएँ बनाते हुए हम अपने बहुमूल्य मनुष्य जीवन को व्यर्थ ही गंवा देते हैं। एक बार सोचते तक नहीं कि यहाँ से जाना तो हमें खाली हाथ ही है!

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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