इमे जनपदाः स्वृद्धाः सुपक्वौषधिवीरुधः ।
वनाद्रिनद्युदन्वन्तो ह्येधन्ते तव वीक्षितैः ॥

इमे ये सब; जन-पदाः नगर तथा शहर; स्वृद्धाः समृद्ध; सुपक्व पूर्णतया पक्क; औषधि जड़ी-बूटी; वीरुधः वनस्पतियाँ; वन जंगल; अद्रि पहाड़ियाँ; नदी नदियाँ; उदन्वन्तः समुद्र; हि-निश्चय ही; एधन्ते वृद्धि करते हुए; तव तुम्हारे; वीक्षितैः = देखने से।

अनुवाद – ये सारे नगर तथा ग्राम सब प्रकार से समृद्ध हो रहे हैं, क्योंकि जड़ी-बूटियों तथा अन्नों की प्रचुरता है, वृक्ष फलों से लदे हैं, नदियाँ बह रही हैं, पर्वत खनिजों से तथा समुद्र सम्पत्ति से पूर्ण हैं। यह सब आपकी कृपा-दृष्टि से ही है।

तात्पर्य – मानव-सम्पन्नता प्राकृतिक वरदान से बढ़ती है, न कि विशाल औद्योगिक उद्यमों से। ये विशाल औद्योगिक उद्योग ईश्वरविहीन सभ्यता के प्रतिफल हैं और वे मानव जीवन के उद्देश्यों का विनाश करनेवाले हैं। मनुष्य की प्राण-शक्ति को निचोड़ने वाले इन कष्टप्रद उद्योगों को जितना ही अधिक बढ़ाया जायेगा, लोगों में उतना ही असन्तोष फैलेगा, भले ही कुछ लोग इस शोषण द्वारा ठाठ-बाट से रह लें। अन्न, वनस्पतियाँ, फल, नदियाँ, रत्नों तथा खनिजों से पूर्ण पर्वत तथा मुक्ताओं से पूरित समुद्रये सब प्राकृतिक वरदान हैं, जिनकी पूर्ति परमेश्वर के आदेश से होती है और उनकी इच्छानुसार, प्रकृति उन्हें प्रचुर मात्रा में उत्पन्न करती है या उनका अभाव ला देती है। यह प्राकृतिक नियम है कि मनुष्य इन दैवी वरदानों का लाभ उठाये तथा प्रकृति पर प्रभुत्व जताने के उद्देश्य से शोषण की प्रवृत्ति छोड़कर, सन्तोष धारण करके समृद्ध बने। अपनी भोग की लालसा से हम प्रकृति का जितना ही शोषण करने का प्रयास करेंगे, ऐसी शोषणकारी प्रवृत्तियों की प्रतिक्रिया द्वारा उतना ही फँसते जायेंगे। यदि हमारे पास प्रचुर अन्न, फल, वनस्पति तथा औषधियाँ हों, तो फिर कसाई-घर चलाने एवं दीन पशुओं का वध करने से हमें क्या मिलेगा ? मनुष्य को पशु-वध करने की आवश्यकता नहीं है, यदि उसके पास खाने के लिए प्रचुर अन्न तथा शाक है। नदियों का बहता जल खेतों को उर्वर बनाता है और हमारी आवश्यकता से अधिक जल उपलब्ध है। पर्वतों से खनिज तथा समुद्रों से रत्न प्राप्त होते हैं। यदि मानव सभ्यता के पास प्रचुर अन्न, खनिज, रत्न, जल, दुग्ध आदि हो, तो फिर उसे क्या आवश्यकता है कि वह बेचारे मनुष्यों के श्रम पर भयंकर औद्योगिक जोखिमों के पीछे भागती फिरे ? लेकिन ये सारे प्राकृतिक वरदान भगवत्कृपा पर निर्भर हैं। अतएव आवश्यकता इस बात की है कि भगवान् के नियमों के प्रति आज्ञाकारी बनकर, भक्ति द्वारा मनुष्य जीवन की पूर्णता प्राप्त की जाय। कुन्ती देवी के द्वारा किये गये संकेत बिल्कुल सटीक हैं। वे चाहती हैं कि उन पर भगवान् की कृपा दृष्टि बनी रहे, जिससे प्राकृतिक सम्पन्नता स्थापित रहे।

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येन जन्मशतैः पूर्वं वासुदेवः समर्चितः ।
तन्मुखे हरिनामानि सदा तिष्ठन्ति भारत ॥

(ह. भ. वि. ११/२३७ शास्त्रवाक्य)

हे भरतवंश श्रेष्ठ ! जिन्होंने शत-शत वर्ष पूर्व जन्मोंमें उचित (सम्यग्) रूपसे वासुदेवका अर्चन किया है, उनके मुखमें ही श्रीहरिका नाम नित्यकाल विराजमान् रहता है ।

नाममें देशकाल आदिका नियम नहीं है-

न देशनियमो राजन न कालनियमस्तथा।
विद्यते नात्र सन्देहो विष्णोर्नामानुकीर्त्तने ॥
कालोऽस्ति दाने यज्ञे च स्नाने कालोऽस्ति सज्जपे ।
विष्णुः संकीर्त्तने कालो नास्त्यत्र पृथिवीतले ॥

(ह. भ. वि. ११ वि. २०६ संख्याधृत वैष्णव चिन्तामणि वाक्य)

हे राजन् ! विष्णुके नाम कीर्त्तनके विषयमें कोई देश अथवा कालका नियम नहीं है, यह निसंदेहपूर्वक कहा जाता है। दान, यज्ञ और अन्यान्य जपमें काल नियमका विचार है, किन्तु इस पृथ्वीपर विष्णु नामके सङ्कीर्त्तनमें किसी भी काल और नियमका विधान नहीं है।

गौड़ीय कण्ठहार

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श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

श्री बल्लभेति वरदेति दयापरेति
भक्तप्रियेति भवलुन्ठन – कोवेदेति ।
नाथेति नागशयनेति जगन्निवासे –
त्यालापिनं प्रतिपदं कुरु मां मुकुन्द ।।2।।

हे मुकुन्द ! लक्ष्मीपति, वरदान देने वाले, दयाशील, भक्तों के अति प्रिय, जीवों के जन्म-मरण के प्रवाह को खत्म करने वाले, सबके स्वामी, शेष नाग पर शयन करने वाले हे जगन्निवास ! आप मुझ पर ऐसी कृपा करें जैसे मैं हरेक बात में आपके नाम की ही महिमा बोल सकूँ।

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शुद्ध अहेतुकी भक्तिके लिए यत्नः यथा श्रीमद्भागवत (१.५.१८)

तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदो न लभ्यते यदभ्रमतामुपर्यधः ।
तल्लभ्यते दुखःवदन्यतः सुखं कालेन सर्वत्र गभीररंहसा ।।

– ऊर्द्ध सप्तलोक एवं अधःस्थित सुतलादि सप्त लोकोंमें कालक्रमसे भ्रमण कर रहा हूँ, किन्तु अभी तक नित्य चिसुख प्राप्त नहीं हुआ। इसी नित्य चिसुखको पानेके लिए विवेकीजन यत्न करते हैं। गंभीर वेगशाली कालके प्रभावसे जिस प्रकार दुःख आता है उसी प्रकार बिना प्रयत्नके सुख भी प्राप्त हो जाता है। इसलिए इस भौतिक सुखके लिए प्रयत्न करनेका क्या प्रयोजन? ।

विना यत्ने दुःखेर घटना येन हय।
सेइरूपे कालक्रमे सुखेर उदय ।।
अतएव चौदहलोके दुर्लभ ये धन।
सेइ भक्तिजन्य यत्न करे बुधगण।।

भजनरहस्यवृत्ति – भगवानके चरणकमलोंके मकरन्द एवं सुगन्धका सामान्य-सा भी अनुभव होनेपर भक्त ब्रह्माण्डके अन्तर्गत उपलब्ध समस्त सुखोंको तुच्छ समझने लगते हैं। जैसे किसी व्यक्तिने गुड़का ही आस्वादन किया हो, किन्तु सुगन्ध युक्त सीतोपल चख लेनेके बाद वह गुड़को त्याग देगा। इसी प्रकार यथार्थ शुद्ध भक्तोंके संगसे भगवद्भक्ति अनुशीलन करनेसे पूर्व, जीव वेदके मधुपुष्पित वाक्योंमें ही लुब्ध रहते हैं और स्वर्गके सोमरस पान, अमृत भोजन तथा अन्य-अन्य स्वर्गीय सुखोंकी कामना करते हैं अथवा ज्ञानियोंके संग-प्रभावसे मोक्षकी कामना करते हैं- यह शुद्ध भक्तोंको ग्रहणीय नहीं है। वे तो भक्तिद्वारा भगवानके प्रेम सेवा-सुखके आकांक्षी हैं। इस श्लोकमें यही उपदेश है कि यथार्थ विवेकीजन नित्य, चिरस्थायी, चिदानन्द वस्तुका ही अनुसंधान करते हैं। उसकी उपलब्धि केवल हरिधाममें ही सम्भव है। समस्त चौदह भुवनोंमें स्थावर योनिमें भ्रमणकारी किसी भी जीवको यह अप्राकृत सुख लभ्य नहीं है। यह जड़ विषयसुख तो शूकर योनिमें भी उपलब्ध है। जीव अपने कर्मफलानुसार बिना प्रयत्नके कभी दुःख व कष्ट भोगता है तथा कभी सुख प्राप्त करता है। इसी कारण शास्त्रोंका एकमात्र उपदेश है कि इन प्राकृत नश्वर वस्तुओंकी प्राप्तिकी चेष्टा मत करो। पार्थिव दुःख निवारण और सुख-चेष्टा जीवका साध्य नहीं है, उसके लिए यत्न करना बाल चापल्य मात्र है। बुद्धिमान जन इन अस्थाई वस्तुओंका अन्वेषण छोड़कर आत्माके नित्यधर्म श्रीहरिकी सेवा प्राप्तिका प्रयत्न करते हैं।

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा

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प्रत्येक जीव का हृदय तथ प्रत्येक परमाणु ही श्रीविष्णु का अधिष्ठान क्षेत्र या वासस्थान है। अतः सर्वत्र ही श्रीधाम है। जिस दिन गुरुदेव की कृपा से हृदय में स्फूर्ति होती है, उसी दिन ऐसा दर्शन होता है। तब और विश्वदर्शन नहीं होता है ।

श्रीलप्रभुपाद

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कर्म के द्वारा कभी मुक्ति नहीं मिल सकती

आप लोगों को श्रील ठाकुर की इस जीवनी अर्थात् ग्रन्थ से शब्दतत्त्व पर जो जानकारी मिली है, वही श्रील ठाकुर की आविर्भाव तिथि पर चर्चा का विषय हो गई है। ठाकुर के इन वचनों में वेदान्त के निष्कपट (विशुद्ध) सिद्धान्त की ही जानकारी मिलती है। इस कविता के शुरु में ही देखते हैं ‘पृथक् उपाय’; इसका अर्थ है- श्रीनामग्रहण के अलावा अन्य सभी उपाय जैसे कर्म इत्यादि; इसे साधन के रूप में ग्रहण करने पर अणु शब्द-स्वरूप जीव के जीवन में कई प्रकार की कठिनाइयाँ आती हैं। अर्थात्, जन्म-मरण माला से जीव को निष्कृति (छुटकारा) मिलती है। इस सम्बन्ध में श्रीव्यासदेव ने साधनाध्याय में एक ‘सूत्र’ तैयार किया है-“कृतात्यये अनुशयवान् दृष्टस्मृतिभ्याम्”; इससे ज्ञात होता है कि, नामाश्रय का छोड़कर कर्म को आश्रय करने पर जीव को कभी भी मुक्ति नहीं मिल सकती। इस जगत में बहुत सारे सत्कर्मी विचरण कर रहे हैं- उनकी कर्मकुशलता से प्रेरित होकर हममें से अनेक लोग उनके मार्ग का अनुसरण करते हैं। मैं, बहुत ही स्पर्धा के साथ कह सकता हूँ कि, उनकी मुक्ति की कहीं भी सम्भावना नहीं है।

वेद को यदि सत्य मानते हैं, उपनिषदों को यदि नित्य कहकर स्वीकार करते हैं, वेदान्त को यदि नित्य-मंगल पथ-प्रदर्शक के रूप में स्वीकार करते हैं तो कर्मियों का पुनर्जन्म निश्चित है- इसे स्वीकार करने के लिए हम बाध्य हैं। इस संबंध में गीता ने भी कहा है-“क्षीणे पुण्ये मत्र्यलोकं विशन्ति”। अर्थात् पुण्य या सत्कर्म का क्षय निश्चित है; इसलिए वह सत्कर्म क्षीण हो जाने पर जीव दोबारा मर्त्यलोक में पतित होता है। फिर वेदान्त के सूत्र से भी ज्ञात होता है कि, ‘कृत’ अर्थात् कर्म या पुण्य ‘अत्यये’ अर्थात् गत होने पर ‘अनुशयवान्’ अर्थात् कर्म के क्षय को देखकर पश्चाताप या शोक किया करते हैं। तब उन्हें फिर से जन्म-मरण-माला भोग करने के लिए, तात्कालिक आनन्द प्रदान करने वाले फल की प्राप्ति के लिए अज्ञानी की तरह इस मत्र्यलोक में आना पड़ता है। इस सम्बन्ध में वेदान्त के सूत्रकार ने इस अध्याय के प्रारम्भिक कई सूत्रों को प्रस्तुत किया है। उन सूत्रों ने निरपेक्ष रूप से कर्मकाण्ड का खण्डन कर वैज्ञानिक रूप से दिखाया है कि कर्मियों का पुनर्जन्म अवश्यम्भावी है एवं उनकी मुक्ति भी नहीं है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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भक्ति साथ में मिश्रित हो, तभी कर्म, ज्ञान एवं योग अपना-अपना फल प्रदान कर सकते हैं। किन्तु भक्ति रहित होने पर ये सब फल देने में असमर्थ हैं। जहाँ पर भागवत और वेद के वाक्यों का आनुगत्य है, वहीं पर कर्म का फल – इस लोक और उस लोक में इन्द्रिय सुख की प्राप्ति, ज्ञान का फल-मुक्ति या ब्रह्मसायुज्य की प्राप्ति और योग का फल-सिद्धि या ईश्वर-सायुज्य आदि की प्राप्ति हो सकती है। ‘भक्ति मुख निरीक्षक कर्म-ज्ञान-योग’ किन्तु वे अर्थात कर्म व ज्ञान भगवान को या भगवान के प्रेम को प्राप्त नहीं करा सकते। केवल मात्र निष्काम शुद्धभक्ति के द्वारा ही भगवान या भगवत-प्रेम प्राप्त होता है।

इसलिए भक्ति रहित सभी व्यक्ति ही लंगड़े हैं। प्रेम के द्वारा ही प्रेम की वृद्धि होती है, और किसी साधन से नहीं। भक्ति ही साधन और भक्ति ही साध्य है। जो भगवान को नहीं चाहते, और और वस्तुएँ चाहते हैं, वे भगवान को कैसे प्राप्त कर सकते हैं? ‘शुद्ध-भक्त एकमात्र भगवान को ही चाहते हैं, अन्य वस्तुओं के लिए आकाँक्षा उनके मन में नहीं होती, इसलिए वे ही भगवान को प्राप्त करते हैं। मायावादियों के विचार में शुद्ध-भक्ति नित्य नहीं है, जबकि शुद्ध-भक्ति में- भगवान नित्य हैं, भक्त नित्य है और भक्ति नित्य है। जहाँ पर भगवान के स्वरूप को नहीं मानते हैं, बल्कि ऐसी धारणा करते हैं कि स्वरूप को मानने से तो वह मायिक हो जाएगा, वहाँ पर भक्ति हो ही नहीं सकती’ –

‘प्राकृत करिया माने विष्णु- कलेवर।
विष्णु निन्दा आर नाहि इहार उपर’

(चै.च.आ. 7/115)

(अर्थात् विष्णु के शरीर को प्राकृत मानना, विष्णु भगवान की सबसे बड़ी निन्दा है)। जहाँ पर भगवान के नित्य चिन्मय स्वरूप को स्वीकार किया जाता है, वहीं भगवान की कृपा से कर्म, ज्ञान एवं योग साधना का फल प्राप्त होता है और जहाँ भगवान के स्वरूप का अस्तित्व नित्य नहीं माना जाता, वहाँ किसी भी फल की प्राप्ति नहीं होती।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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बद्धजीव श्रीगुरु और भगवान् की कृपा से समस्त अनर्थों को जीत सकते हैं। इसके अलावा अन्य अभिलाषाओं आदि को जय करने का और कोई उपयुक्त माध्यम नहीं है।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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हमारा रोना भी वैसा ही है

एक दिन की बात है, मैं गुरुजी के साथ मेदिनीपुर के श्रीश्यामानन्द गौड़ीय मठ में था। मैंने देखा एक माताजी भगवान् के सामने खड़ी होकर बहुत रो रही थी। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ। मैंने सोचा, “माताजी का भगवान् के प्रति कितना प्रेम है जो वे उनके लिए इतना रो रही हैं।” कुछ भक्त माताजी को समझा रहे थे, “आप पर भगवान् की कृपा है। आप चिंता मत कीजिये। आप मत रोइए।”

जब इस प्रकार समझाने पर भी माताजी ने रोना बन्द नहीं किया तब एक भक्त ने उनसे पूछा, “क्या बात है माताजी, आप इतना क्यों रो रही हैं?”

बहुत बार पूछने के बाद माताजी ने उत्तर देते हुए कहा, “मैं क्या बताऊँ आपको, मेरी एक बकरी थी, जो मुझे बहुत प्यारी थी। कुछ दिन पहले वह चल बसी। उसकी बहुत सुन्दर सफ़ेद दाढ़ी थी। मन्दिर के पुजारी बाबा की दाढ़ी को इधर-उधर हिलते हुए देखकर मुझे मेरी बकरी की बहुत याद आ रही है।”

यह बोलते-बोलते माताजी और ज़ोर से रो पड़ीं।

इस प्रकार का रोना क्या भगवान् के लिए रोना है? माताजी भगवान् के सामने अपनी बकरी के लिए रो रही है!

हमारा रोना भी ऐसा ही है। भगवान् के पास जाकर उन्हें प्रणाम कर उनसे प्रार्थना करते हैं, “मेरी बेटी की शादी है। उसके लिए पाँच लाख रुपयों की आवश्यकता है, आप कृपा करके उसकी व्यवस्था कर दीजिए। मैं आपको १००० रुपये का भोग अर्पण करूँगा।”

क्या भगवान् के पास इन सब अनित्य वस्तुओं के लिए प्रार्थना करना ठीक है? हमें यह समझना होगा कि एक-न-एक दिन हमें संसार की सभी वस्तुओं एवं व्यक्तियों से बिछड़ना होगा। क्योंकि हम उन्हें अपना समझते हैं, उनके वियोग की आशंका से हमें भय एवं वियोग होने से शोक अनुभव होता है और हम उनके लिए रोते हैं। क्या भय एवं शोक से बचने का कोई उपाय है? श्रीमद् भागवत् में ब्रह्मा जी इस विषय में कहते हैं, “जब तक जीव भगवान् के अभय श्रीचरणों का आश्रय ग्रहण नहीं करता तब तक अनित्य वस्तुओं एवं व्यक्तियों के वियोग के कारण उसे भय एवं शोक होता ही रहेगा।”

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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