गोप्याददे त्वयि कृतागसि दाम तावद्
या ते दशाश्रुकलिलाञ्जनसम्भ्रमाक्षम् ।
वक्त्रं निनीय भयभावनया स्थितस्य
सा मां विमोहयति भीरपि यद्विभेति ॥

गोपी ग्वालिन (यशोदा) ने; आददे लिया; त्वयि तुम पर; कृतागसि अड़चन डालने पर (मटकी फोड़ने पर); दाम रस्सी; तावत् उस समय; या जो; ते = तुम्हारी; दशा स्थिति; अश्रु-कलिल अश्रुपूरित; अञ्जन काजल; सम्भ्रम= विचलित; अक्षम् नेत्र; वक्त्रम् चेहरा, मुँह; निनीय की ओर; भय-भावनया भय की भावना से; स्थितस्य स्थिति का; सा वह; माम् मुझको; विमोहयति = मोहग्रस्त करती है; भीः अपि साक्षात् भय भी; यत्-जिससे; बिभेति भयभीत है।

अनुवाद – हे कृष्ण ! जब आपने अपराध किया था, तो यशोदा ने जैसे ही आपको बाँधने के लिए रस्सी उठाई, तो आपकी व्याकुल आँखें अश्रुओं से डबडबा आई, जिससे आपकी आँखों का काजल धुल गया। यद्यपि आपसे साक्षात् काल भी भयभीत रहता है, किन्तु आप भयभीत थे। यह दृश्य मुझे मोहग्रस्त करनेवाला है।

तात्पर्य – यहाँ पर भगवान् की लीलाओं से उत्पन्न मोह की दूसरी व्याख्या की जा रही है। भगवान् तो सभी परिस्थितियों में परमेश्वर हैं, जैसे कि इसकी व्याख्या की जा चुकी है। इस उदाहरण में भगवान् परमेश्वर होने के साथ ही अपने शुद्ध भक्त के समक्ष क्रीड़ा भी कर रहे हैं। भगवान् का शुद्ध भक्त अनन्य प्रेम के कारण ही सेवा करता है और इस तरह सेवा करते हुए, वह परमेश्वर की स्थिति को भूल जाता है। परमेश्वर भी अपने भक्तों की प्रेमा-भक्ति को, यदि वह शुद्ध प्रेमवश बिना किसी प्रशंसा के की जाती है, अत्यन्त रुचिपूर्वक ग्रहण करते हैं। सम्मान्यतया भगवान् अपने भक्तों द्वारा आदर की दृष्टि से पूजे जाते हैं, लेकिन भगवान् भक्त से तब विशेष प्रसन्न होते हैं, जब वह शुद्ध प्रेमवश भगवान् को अपने से कम महत्वपूर्ण समझता है। आदि-धाम गोलोक वृन्दावन में, भगवान् की सारी लीलाएँ इसी मनोभाव से विनिमयित होती हैं। कृष्ण के मित्र उन्हें अपने ही तुल्य मानते हैं। वे उन्हें आदरणीय नहीं मानते। भगवान् के माता-पिता (वे शुद्ध भक्त होते हैं) उन्हें केवल शिशु मानते हैं। भगवान् अपने माता-पिता की प्रताड़नाओं को वैदिक स्तोत्रों द्वारा की गयी स्तुतियों से बढ़कर आनन्दप्रद मानते हैं। इसी प्रकार वे अपनी प्रेमिकाओं के उलाहनों को वैदिक स्तोत्रों की अपेक्षा अधिक रुचि से सुनते हैं। जब भगवान् श्रीकृष्ण इस धराधाम में, गोलोक, वृन्दावन के दिव्य जगत की नित्य लीलाओं को जनसामान्य के आकर्षण के लिए प्रकट करने के लिए उपस्थित थे, तो वे अपनी धाय-माता यशोदा के समक्ष विलक्षण विनीत भाव प्रकट करते रहे। वे अपनी बालोचित क्रीड़ाओं से यशोदा माता द्वारा एकत्रित माखन की मटकी तोड़कर उसका सारा मक्खन खराब कर देते थे और उसे मित्रों तथा संगियों में, यहाँ तक कि वृन्दावन के प्रसिद्ध बन्दरों में भी बाँट दिया करते थे और वे सब भगवान् की इस दानशीलता का लाभ उठाते थे। जब यशोदा देखतीं, तो वे शुद्ध प्रेमवश इस दिव्य बालक को अपने दिव्य दण्ड का दिखावा करतीं। वे रस्सी लेकर धमकार्ती कि वे उन्हें बाँध देंगी, जिस प्रकार कि सामान्य घरों में किया जाता है। माता यशोदा के हाथ में रस्सी देखकर, भगवान् अपना सिर नीचे करके सामान्य बालक की भाँति रो पड़ते और उनके अश्रु उनकी सुन्दर आँखों में लगे काजल को पोंछते हुए, कपोलों पर दुलक पड़ते। कुन्ती देवी ने भगवान् के इस रूप की पूजा की, क्योंकि वे उनकी परम स्थिति के प्रति सचेष्ट थीं। जिनसे साक्षात् भय भी भयभीत रहता है, वे अपनी माता से भयभीत हैं, क्योंकि वे उन्हें सामान्य तरीके से दण्डित करना चाह रही थीं। कुन्ती को उनकी श्रेष्ठ स्थिति का पता था, लेकिन यशोदा को नहीं था। अतएव यशोदा की स्थिति कुन्ती की स्थिति से श्रेष्ठ है। माता यशोदा को भगवान् उनके शिशु-रूप में प्राप्त हुए थे और भगवान् ने उन्हें भुलवा दिया था कि उनका शिशु साक्षात् भगवान् है। यदि यशोदा को भगवान् की दिव्य स्थिति का पता होता, तो वे अवश्य ही भगवान् को दण्डित करते हुए हिचकतीं। लेकिन उन्हें यह स्थिति भुलवा दी गई, क्योंकि भगवान् ममतामयी यशोदा के समक्ष पूर्ण बाल-चापल्य का संकेत करना चाहते थे। माता तथा पुत्र में प्रेम का यह आदान-प्रदान सहज ढंग से सम्पन्न हुआ और कुन्ती इस दृश्य का स्मरण करके मोहित थीं, क्योंकि वे दिव्य पुत्र-प्रेम की सराहना करने के अतिरिक्त कर ही क्या सकती थीं? परोक्ष रूप में यशोदा की प्रशंसा उनके प्रेम की दिव्य स्थिति के लिए की जा रही है, क्योंकि वे सर्वशक्तिमान् भगवान् को भी अपने प्रिय पुत्र के रूप में वश में कर सकी थीं।

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नाम-माहात्म्य-वर्णनमें प्राचीन आचार्यवृन्द-

अंहः संहरतेऽखिलं सकृदुदयादेव-सकल-लोकस्य।
तरणिरिव तिमिर-जलधिं जयति जगन्मङ्गलं हरेर्नाम ॥

(पद्यावली १६ संख्याधृत श्रीधरस्वामीकृत श्लोक)

जगत्मङ्गल हरिनामकी जय हो। जिस प्रकार सूर्य उदित होकर अन्धकारका विनाश करता है, उसी प्रकार हरिनाम एकबार मात्र उदित होनेपर लोगोंके समस्त पापोंका नाश कर देता है।

गौड़ीय कण्ठहार

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ब्रजके भक्तोंकी संग की प्रार्थना, यथा ब्रह्मस्तव दशम स्कंध श्रीमद्भागवत (१०.१४.३०)-

तदस्तु मे नाथ स भूरिभागो भवेऽत्र वान्यत्र तु वा तिरश्चाम्।
येनाहमेकोऽपि भवज्जनानां भूत्वा निषेवे तव पादपल्लवम् ।।

– हे भगवन ! मुझे इस मनुष्य जन्ममें, दूसरे जन्ममें या किसी पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदिके जन्ममें भी ऐसा सौभाग्य प्राप्त हो कि आपके भक्तोंका संग पाकर, उनके आनुगत्यमें मैं आपके चरणकमलोंकी सेवा प्राप्त करूँ।

एइ ब्रह्म जन्मेइ वा अन्य कौन भवे।
पशु-पक्षी हये जन्मि तोमार विभवे ।।
एइ मात्र आशा तव भक्तगण संगे।
थाकि तव पद सेवा करि नानारंगे ।।

भजनरहस्यवृत्ति-श्रीकृष्णको अन्य गोप बालकोंके साथ खेलते देख ब्रह्माजी भ्रमित हो गये तथा श्रीकृष्णकी अन्य लीलादर्शन हेतु गोवत्स, ग्वालबालोंको चुराकर ले गये। किन्तु श्रीकृष्णने उतनी ही संख्यामें बछड़े, ग्वाल बालोंका रूप धारणकर एक वर्षतक पूर्ववत् लीला करते रहे। अन्तमें ब्रह्माजीको अपना चतुर्भुज रूप दिखाया। भगवानके ऐश्वर्यका दर्शनकर ब्रह्माजी बहुत पछताए तथा विविध प्रकारसे श्रीकृष्णकी स्तुतिकर अपने अपराधकी क्षमा प्रार्थना करने लगे, ‘हे प्रभो! आपके प्रसादका फल मैंने साक्षात् रूपमें प्राप्त किया। हे सर्वकाल पूरक ! यह ब्रह्मपद पाना मेरा सौभाग्य नहीं है। यदि इस ब्रजमें पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि तिर्यक योनिमें भी जन्म पाऊँ, तभी अपनेको महासौभाग्यशाली समझेंगा। इस ब्रह्म जन्ममें मुझे वह कृपा सुलभ नहीं, जो ब्रजमें हिरणियोंको उपलब्ध है। वे आपके श्रीअंगमें लगी रजको अपनी जिह्वासे मार्जन करती हैं तथा आप भी अपने श्रीहस्तसे उनका स्पर्श करते हैं। जिस योनिमें आपकी सेवा प्राप्त हो, चाहे वह योनि उच्च हो या अति निम्न, उसीमें जन्म प्राप्त कर आपके भक्तोंके आनुगत्यमें आपके श्रीचरणकमलोंकी सेवा कर सकूँ यही मेरी ऐकान्तिक अभिलाषा है तथा यही मेरा सौभाग्य होगा।’

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा

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कृष्ण गुरु के रूप में ही जीवों पर कृपा करते हैं, उन्हें आश्रय प्रदान करते हैं-

कृष्ण यदि कृपा करेन कौन भाग्यवाने ।
गुरु – अन्तर्यामीरूपे सिखाय आपन ।।
गुरु कृष्णरूप हन शास्त्रेर प्रमाणे ।
गुरुरूपे कृष्ण कृपा करेन कौन भक्तगणे ।।

गुरुकृपा और कृष्णकृपा पृथक् नहीं है । गुरुदेव कृष्णभजन के अतिरिक्त और कुछ नहीं करते। कृष्ण भी अपने प्रियजन की सेवा के अतिरिक्त अन्य किसी की सेवा ग्रहण नहीं करते। सभी प्रकार की सेवाओं को गुरुदेव ही कृष्ण के चरणों में निवेदन करते हैं। जिनकी सब समय सेवा करनी होगी, वे श्रीगुरुदेव ब्रह्माण्डवासी कोई साधारण जीव नहीं हैं। वे कृष्ण की इच्छा से पतित जीवों का उद्धार करने के लिए इस जगत में अवतीर्ण होकर जीवों को भक्तिलता का बीज प्रदान करते हैं। भगवान की सेवा करने की सुबुद्धि प्रदान करते हैं। कृष्ण की कृपा गुरु के द्वारा ही हम तक पहुँचती है-

बह्माण्ड भ्रमिते कोन भाग्यवान जीव ।
गुरुकृष्णप्रसादे पाय भक्तिलता-बीज ।।

अर्थात् ब्रह्माण्ड में भ्रमण करते-करते कोई भाग्यवान् जीव गुरु एवं कृष्ण की कृपा से ही भक्तिलता का बीज प्राप्त करता है ।

श्रीलप्रभुपाद

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श्रीहरिनाम अप्राकृत रूपविशिष्ट

जिसका रूप है उसे ही देखा जा सकता है। किन्तु रूपहीन, ‘अरूप’ या ‘निराकार’ वस्तु के दर्शन नहीं होते हैं। इसलिए “आत्मा वा अरे श्रोतव्यः द्रष्टव्यः” कहने से आत्मा या अप्राकृत शब्द रूपहीन या निराकार नहीं-ऐसा ही समझना होगा। अतः श्रीहरिनाम- अप्राकृत आत्मशब्द है; वही दृष्टव्य, अर्थात् वह शब्दस्वरूप श्रीनाम, अप्राकृत रूपविशिष्ट है। अतएव अप्राकृत आत्म-शब्द के जिस आकार की बात हम ‘हरिनाम-चिन्तामणि’ ग्रंथ से जान सकते हैं, उसे ही कहा गया है-श्रीहरिनाम।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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शरणागत व्यक्ति के हृदय में ही भगवान् अपना स्वरूप प्रकाशित करते हैं।

‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो, न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष, आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्’ ॥

(कठ 1/2/23)

परमात्मा बहुत तर्क, मेधा या पाण्डित्य द्वारा प्राप्त नहीं होते। जो शरणागत होते हैं, उनके सामने ही परमात्मा स्वयं को प्रकाशित कर देते हैं। दुनियावी व्यक्ति (empiricist) आरोह-पथ के द्वारा अन्वेषण करते-करते अन्त में भगवान् को निर्विशेष, निराकार कहने को मजबूर होते हैं। कारण, किसी प्रकार के Challenging mood (आरोह-पथ) से हम उन्हें स्पर्श नहीं कर सकते हैं। भगवान् नृसिंह देव द्वारा अलौकिक रूप में स्तम्भ से प्रकट होने पर भी हिरण्यकशिपु उनको भगवान् नहीं समझ पाया, उन्हें एक अद्भुत प्राणी समझ कर युद्ध करने लगा। किन्तु श्रीप्रह्लाद जी ने भक्ति के द्वारा भगवद्-रूप का दर्शन कर उनका स्तव किया। हिरण्यकशिपु ने अजय, अजर, अमर एवं प्रतिपक्षहीन अद्वितीय अधिपति होने की लालसा से सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी का स्तव कर वरदान प्राप्त किया था कि वर्तमान और भविष्य में ब्रह्मा जी द्वारा सृष्ट किसी भी प्राणी से उसकी मृत्यु न हो। किन्तु भगवान् ने ब्रह्मा जी द्वारा दिये गये वरदानों की सत्यता की रक्षा करते हुए भी अपनी सर्वशक्तिमत्ता द्वारा श्रीनृसिंह मूर्ति में आविर्भूत होकर उस का वध किया था : दूसरी तरफ, हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र विष्णु-भक्त श्री प्रह्लाद की हत्या करने के लिये असंख्य उपाय किये किन्तु उसको मारने में सफल नहीं हो पाया। श्रीभगवान् ने अपनी अचिन्त्य शक्ति के प्रभाव से उस की रक्षा की थी।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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जो लोग गुरु-वैष्णवों की सेवा से वंचित हैं, वे ही वृथा समालोचक हैं। उनका कभी कल्याण नहीं हो सकता है।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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पूर्ण के लिए पूर्ण शरणागति

महाभारत में द्यूतक्रीड़ा के समय युधिष्ठिर महाराज ने द्रौपदी को दाँव पर लगा दिया और दुर्योधन की ओर से मामा शकुनि ने द्रौपदी को जीत लिया। दुर्योधन के आदेश पर दुःशासन द्रौपदी को बालों से घसीटता हुआ सभा में ले आया और उसकी साड़ी खींचने लगा। निःसहाय द्रौपदी सहायता के लिए श्रीकृष्ण को पुकारने लगी, “हे गोविन्द, हे केशव, रक्षा करो, रक्षा करो।”

द्रौपदी की पुकार सुन श्रीकृष्ण स्वयं सहायता के लिए वहाँ उपस्थित हुए और साड़ी को इतना लंबा कर दिया कि उसे खींचते-खींचते दुःशासन मूर्च्छित हो गया।

एक दिन द्रौपदी ने श्रीकृष्ण की ओर देख, एक मीठी शिकायत करते हुए कहा, “हे कृष्ण! आप मेरी रक्षा करने के लिए आए तो सही किन्तु आपने आने में इतनी देर क्यों लगा दी? मैं तो बहुत देर से आपको पुकार रही थी।”

श्रीकृष्ण ने कहा, “क्या तुम वास्तविकता में जानना चाहती हो?”

द्रौपदीः “हाँ, केशव!”

श्रीकृष्णः “तुम मुझे पुकार अवश्य रही थी किन्तु सर्वप्रथम तुम्हारी आँखें भीम और अर्जुन को देख रही थीं। तुमने सोचा कि भीम और अर्जुन, दुःशासन को मारकर तुम्हारी रक्षा करेंगे। जब भीम और अर्जुन तुम्हारी रक्षा कर सकते थे तो मुझे आने की क्या आवश्यकता थी?”

द्रौपदीः “हाँ, आपकी बात सच है। मुझे भीम और अर्जुन के बल पर भरोसा था।”

श्रीकृष्णः “भीम और अर्जुन जब तुम्हारी सहायता के लिए नहीं आए तब तुमने द्रोणाचार्य की ओर देखा। तुमने सोचा कि कौरव एवं पांडव दोनों ही द्रोणाचार्य का आदर करते हैं इसलिए द्रोणाचार्य के विरोध करने पर कोई कुछ नहीं कर सकेगा। किन्तु जब द्रोणाचार्य ने भी तुम्हारी सहायता नहीं की, तब तुमने पितामह भीष्म की ओर देखा। पितामह भीष्म को जब तुमने अपना रक्षक माना तो मुझे आने की क्या आवश्यकता थी? भीष्म भी जब तुम्हारी रक्षा करने के लिए नहीं आए तब तुमने धृतराष्ट्र की ओर देखा, जब धृतराष्ट्र ने भी कुछ नहीं किया तब तुमने सोचा कि सभा में बैठे हुए राजाओं में से कोई तुम्हारी रक्षा करेगा। जब किसी ने भी तुम्हारी रक्षा नहीं की तब तुमने दोनों हाथों से साड़ी को कसकर पकड़कर अपनी रक्षा करने का प्रयास किया। यदि तुम स्वयं अपनी रक्षा करने में सक्षम थी तो मुझे आने की क्या आवश्यकता थी? उसके बाद तुम एक हाथ ऊपर उठाकर मुझे पुकारने लगी और एक हाथ से अपनी रक्षा करने का प्रयास करती रही, किन्तु मैं तो पूर्ण वस्तु हूँ। पूर्ण शरणागति से ही मेरा आविर्भाव होता है। जब तुमने अपने दोनों हाथ उठा लिए, उसी क्षण मैं आ गया। क्या मैंने आने में थोड़ी भी देर लगाई?”

द्रौपदी ने लज्जित होकर स्वीकार किया, “हाँ गोविन्द ! आपने आने में ज़रा सी भी देर नहीं की।”

पूर्ण वस्तु पूर्ण शरणागति से ही मिलती है। आंशिक शरणागति से पूर्ण वस्तु को प्राप्त नहीं किया जा सकता। पूर्ण शरणागति होने से भगवान् साक्षात् रूप से प्रकट हो जाते हैं।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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