महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा

मायाजवनिकाच्छन्नमज्ञाधोक्षजमव्ययम् ।
न लक्ष्यसे मूढदृशा नटो नाट्यधरो यथा ।।

माया ठगने वाली; जवनिका=पर्दा; आच्छन्नम् = ढका; अज्ञा=अज्ञानी; अधोक्षजम् = भौतिक बोध की सीमा से परे (दिव्य); अव्ययम् अविनाशी; न-नहीं; लक्ष्यसे दिखता है; मूढ-दृशा मूर्ख देखनेवाले के द्वारा; नटः = कलाकार; नाट्य-धरः = अभिनेता का भेष धारण किये; यथा जिस प्रकार ।

अनुवाद – सीमित इन्द्रिय-ज्ञान से परे होने के कारण, आप ठगिनी शक्ति (माया) के पर्दे से ढके रहनेवाले शाश्वत तत्त्व हैं। आप मूर्ख दर्शक के लिए उसी प्रकार अलक्ष्य रहते हैं, जिस प्रकार अभिनेता का वस्त्र पहन लेने पर कलाकार पहचान में नहीं आता ।

तात्पर्य – भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण इसकी पुष्टि करते हैं। अल्पज्ञानी पुरुष उन्हें अपने समान ही सामान्य व्यक्ति समझने की भूल करते हैं और इस प्रकार वे सब उनका उपहास करते हैं। यही बात यहाँ पर महारानी कुन्ती द्वारा पुष्ट की गई है। अल्पज्ञानी पुरुष वे हैं, जो भगवान् की सत्ता के प्रति विद्रोह करते हैं। ऐसे पुरुष असुर कहलाते हैं। असुर भगवान् की सत्ता को नहीं पहचान सकते। जब भगवान् हम लोगों के मध्य राम, नृसिंह, वराह या अपने मूल रूप कृष्ण की भाँति प्रकट होते हैं, तो वे अनेक आश्चर्यजनक कार्य करते हैं, जो मनुष्य के लिए असम्भव हैं। जैसा कि हम इस महान् ग्रंथ के दशम स्कंध में देखेंगे, भगवान् श्रीकृष्ण ने तभी से मानव मात्र के लिए असम्भव कार्य-कलाप करने प्रारम्भ कर दिये थे, जब वे अपनी माता की गोद में थे। उन्होंने उस पूतना राक्षसनी का वध किया, जो अपने स्तनों में विष पोतकर उन्हें मारने आयी थी। भगवान् ने सहज भाव से उसका स्तन-पान किया और इस तरह से उसकी जान भी ले ली। इसी प्रकार उन्होंने गोवर्धन पर्वत को उसी तरह धारण किया, जिस प्रकार कोई बच्चा कुकुरमुत्ता उठा लेता है। वे वृन्दावनवासियों को रक्षा प्रदान करने के लिए पर्वत को कई दिनों तक उठाये रहे। ये भगवान् के कतिपय अमानवीय कार्य-कलाप हैं, जिनका वर्णन पुराणों, इतिहासों तथा उपनिषदों में हुआ है। उन्होंने भगवद्‌गीता के रूप में अद्भुत उपदेश दिया। उन्होंने एक बीर, एक गृहस्थ, एक शिक्षक तथा एक त्यागी के रूप में अद्भुत पराक्रम दिखलाया। व्यास, देवल, असित, नारद, मध्व, शंकर, रामानुज, श्रीचैतन्य महाप्रभु, जीव गोस्वामी, विश्वनाथ चक्रवर्ती, भक्ति-सिद्धान्त सरस्वती तथा उस परम्परा के अन्य प्रामाणिक महापुरुषों ने उन्हें भगवान् के रूप में स्वीकार किया है। उन्होंने स्वयं भी प्रामाणिक साहित्य में अनेक स्थलों पर इसे घोषित किया है। फिर भी आसुरी मनोवृत्तिवाला एक ऐसा समुदाय है, जो भगवान् को परम सत्य के रूप में मानने में हिचकिचाता रहता है। यह कुछ तो उनके अल्प ज्ञान के कारण है और कुछ उनके विगत तथा वर्तमान दुष्कर्मों के परिणामस्वरूप घोर मूढ़ता के कारण है। ऐसे लोगों ने श्रीकृष्ण को, उनके समय में भी, मान्यता प्रदान नहीं की थी। दूसरी कठिनाई यह है कि जो लोग अपनी अपूर्ण इन्द्रियों पर आश्रित रहते हैं, वे परमेश्वर के रूप में उनकी अनुभूति नहीं कर पाते। ऐसे व्यक्ति आधुनिक वैज्ञानिकों के समान हैं। वे अपने प्रयोगात्मक ज्ञान से सारी वस्तुओं को जानना चाहते हैं। लेकिन परम पुरुष को अपूर्ण प्रयोगात्मक ज्ञान के द्वारा जान पाना असम्भव है। यहाँ पर उन्हें अधोक्षज कहा गया है, अर्थात् वे प्रयोगात्मक ज्ञान की परिधि के परे हैं। हमारी सारी इन्द्रियाँ अपूर्ण हैं। हम दावा करते हैं कि हम सारी वस्तुएँ देख सकते हैं, लेकिन हमें मानना होगा कि हम कुछ भौतिक परिस्थितियों में ही वस्तुओं को देख सकते हैं, और वे भी हमारे वश में नहीं होतीं। भगवान् इन्द्रियगम्य नहीं हैं। महारानी कुन्ती बद्धजीव की, और विशेष रूप से अल्पज्ञ स्त्री जाति की, इस न्यूनता को स्वीकार करती हैं। अल्पज्ञ लोगों के लिए मन्दिर, मस्जिद या गिरजाघर जैसी वस्तुओं की आवश्यकता होती है, जिससे भगवान् की सत्ता को पहचानें तथा ऐसे पवित्र स्थलों में भगवान् के विषय में प्रामाणिक व्यक्तियों से श्रवण कर सकें। अल्पज्ञों के लिए आध्यात्मिक जीवन का ऐसा शुभारम्भ आवश्यक है और मूर्ख लोग ही इन पूजा-स्थलों की स्थापना का विरोध करते हैं, जिनकी आवश्यकता जनता में आध्यात्मिक गुणों के मानदण्ड को ऊपर उठाने के लिए पड़ती है। अल्पज्ञों के लिए मन्दिरों, मस्जिदों या गिरजाघरों में जाकर भगवान् की सत्ता के समक्ष नतमस्तक होना उतना ही लाभप्रद है, जितना उन्नत भक्तों के लिए क्रियात्मक भक्ति-सेवा द्वारा भगवान् का ध्यान करना।

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कुलाचारविहीनो ऽपि दृढ़भक्तिर्जितेन्द्रियः ।
प्रशस्तः सर्वलोकानां न त्वष्टादशविद्यकः ॥
भक्तिहीनो द्विजः शान्तः सज्जातिर्धार्मिकस्तथा ॥

(भक्तिसन्दर्भ अ. १०० स्कान्दे नारदवचन)

स्कन्द पुराणमें श्रीनारदजीने कहा है- जितेन्द्रिय तथा श्रीभगवान्‌में दृढ़ भक्तिवाला व्यक्ति सत्कुल और सदाचारविहीन होनेपर भी सब लोगोंमें श्रेष्ठ है, किन्तु अठारह प्रकारकी विद्याओंवाला, शान्त, सत्कुलमें पैदा होनेवाला तथा धर्म-कर्मवाला ब्राह्मण, जो भगवद्भक्तिसे विहीन है, वह श्रेष्ठ नहीं है।

गौड़ीय कण्ठहार

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आशाबन्ध युक्त जातरति भजनपरायणजनकी उक्ति, यथा श्रीरूप गोस्वामीधृत श्रीमन्महाप्रभु वाक्य –

न प्रेमा श्रवणादिभक्तिरपि वा योगोऽथवा वैष्णवो, ज्ञानम्बा शुभकर्म वा कियदहो सज्जातिरप्यस्ति वा।
हीनार्थाधिकसाधके त्वयि तथाप्यच्छेद्यमूला सती हे गोपीजनवल्लभ, व्यथयते हा हा मदाशैव माम् ।।

मेरे हृदयमें आपके लिए कोई प्रेम नहीं है, न ही में श्रवण कीर्त्तनके द्वारा भक्ति करने योग्य हूँ। न तो मुझमें ज्ञान व कर्मादि हैं और न ही वैष्णवोचित् योग्यता। मेरा तो किसी उच्च कुलमें जन्म भी नहीं हुआ है। अतः मैं सर्वथा अयोग्य हैं; तथापि हे गोपीजन वल्लभ ! आपकी कृपा तो नीचसे नीचपर भी होती है यही दृढ़ आशा मेरे मनको व्याकुलित कर रही है।।

श्रवणादि भक्ति, प्रेम भक्ति योग हीन।
ज्ञान योग-कर्म हीन, सज्जन्मविहीन ।।
काङ्गालेर नाथ तुमि राधाप्राण धन।
तोमा पदे दृढ़ आशाय व्याकुलित मन।।

भजनरहस्यवृत्ति – ‘भक्तिका मूल अथवा परम अवलम्बन दैन्य है। भक्तिका उद्रेक दैन्यसे ही होता है। श्रील सनातन गोस्वामीजी दैन्यकी परिभाषामें कहते हैं- ‘सर्व सद्‌गुणयुक्त होनेपर भी जब अपने प्रति असमर्थता, अधमता, अपकृष्टताकी बुद्धि हृदयमें उदित होती है उसीको दैन्य कहते हैं। अर्थात् सर्वगुणान्वित होनेपर भी अहंकारशून्य बुद्धिद्वारा भगवत् प्राप्तिकी परम व्याकुलता ही दीनता है।’ दीनता ही कृष्णकृपाको आकर्षित करती है। वास्तविक दैन्यका प्रकाश प्रेमकी परिपक्वावस्थामें ही होता है। इसी दैन्यके कारण जातरति साधक कहता है- हे प्राणवल्लभ ! आपके प्रति मेरा अनुराग नहीं, मैं श्रवणादि नवधा भक्ति पालन करनेमें समर्थ नहीं हूँ, ज्ञानियोंका निर्विच्छिन्न चिन्तन भी मेरे पास नहीं है, वर्णाश्रमोचित सेवा परिचर्या, उच्चकुलमें जन्म या शुभकर्म इत्यादि मेरे पास कुछ भी नहीं हैं। मेरी आशाका अवलम्बन तो केवल आपकी कृपा है, जिसका समस्त महाजन कीर्तन करते हैं, कि आप दीनोंके नाथ हो तथा उनपर कृपा करते हो।

श्रील सनातन गोस्वामीजी सर्वप्रकार गुणान्वित होकर भी दीनतापूर्वक इस शलोकका उच्चारण करते थे। जातरति साधक प्रचुर सेवा करके भी समझते हैं कि, ‘मैंने कोई सेवा नहीं की।’ कर्म ज्ञानादि रहित शुद्ध भक्तिरूपा प्रेमसेवा ही साधककी एकमात्र आकांक्षित वस्तु है। इस स्वरूपसिद्धा भक्तिकी प्राप्ति श्रवण कीर्त्तनादि द्वारा ही होती है। कर्मासक्त व्यक्तियोंके हृदयमें रही-सही भक्ति भी अन्तर्हित हो जाती है। लाभ, पूजा, प्रतिष्ठाकी इच्छा होनेपर भक्तिदेवी उपेक्षा कर देती है। भक्तिका उद्रेक दीन-हीन निष्कपट हृदयमें ही होता है तथा निरभिमान विनय ही कृपाके धाराप्रवाहको बढ़ाता है।

तृणादपि सुनीच होकर नाम कीर्त्तन करना ही नाम साधनकी पद्धति है, ऐसा श्रीमन्महाप्रभु कहते हैं-

तृणादपि सुनीचेन तरोरिव सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्त्तनीयः सदा हरिः ।।

ऊर्ध्व बाहु करि कहों शुन सर्व लोक।
नामसूत्रे गाँथि पर कण्ठे एइ श्लोक ।।
प्रभुर आज्ञाय कर एइ श्लोक आचरण।
अवश्य पाइबे तबे श्रीकृष्ण चरण।।

(चै. च. आ. १७.३२)

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा

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भगवान् ही पूर्ण वस्तु हैं तथा जीव के एकमात्र उपास्य वस्तु हैं। उनकी सेवा प्राप्त करने के लिए उनके विषय में जानकारी देनेवाले उनके प्रकाशविग्रह श्रीगुरुदेव के चरणकमलों का आश्रय ग्रहण करना होगा और प्रीतिपूर्वक उनकी सेवा करनी होगी । श्रीगुरुदेव के अतिरिक्त इस जगत में ऐसा निःस्वार्थ बन्धु तथा परमात्मीय अन्य कोई नहीं हो सकता। गुरु को अपना जानकर प्रीतिपूर्वक उनकी सेवा करने से ही हमारा मंगल होगा। आदरपूर्वक उनकी सेवा करते-करते ही यह अभिमान उत्पन्न होगा कि मैं उनका सेवक हूँ तथा श्रीगुरु – गोविन्द के प्रति प्रीति उत्पन्न होगी ।

श्रीलप्रभुपाद

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अप्राकृत शब्दतत्त्व

जन्म-मृत्यु से ‘आविर्भाव-तिरोभाव’ शब्दों का अधिक वैशिष्ट्य

हम लोग जन्म और मृत्यु के बारे में जो जानते हैं वह ठाकुर भक्त्तिविनोद के सम्बन्ध में प्रयोग नहीं होता है। वैष्णवगण इसके विपरीत आविर्भाव-तिरोभाव, प्रकट-अप्रकट इत्यादि शब्दों का प्रयोग करते हैं। ‘जन्म’ और ‘मृत्यु’ शब्दों में एक प्रकार के हेय, अनुपादेय (निकृष्ट) और शोक-दुख का भाव, चित्त में उदित होती है। लेकिन प्रकट-अप्रकट, आविर्भाव-तिरोभाव-इन सभी शब्दों से इस प्रकार के भावों का प्रकाश नहीं होता है। वस्तुतः वैष्णवों के आविर्भाव-तिरोभाव में जन्म-मृत्यु जैसी क्लेशकर बात नहीं होती है। इसीलिए वैष्णवगण आमतौर पर जन्म के स्थान पर आविर्भाव और प्रकट एवं मृत्यु के स्थान पर तिरोभाव और अप्रकट शब्दों का प्रयोग करते हैं।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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श्रीहरिनाम ही एकमात्र उपाय

गुरु महाराज जब दिल्ली में प्रचार कार्य में व्यस्त थे, उस समय हमारी एक अत्यन्त निष्ठावान गुरु-भगिनी के पति मेरठ निवासी श्रीहोती लाल शर्मा आकर उनसे मिले तथा कहने लगे, “मेरे पिताजी को परलोक सिधारे बहुत समय हो गया है किन्तु अभी भी मैं उन्हें घर में देखता हूँ, वह बहुत दुःखी दिखलाई पड़ते हैं। मुझे बहुत से पण्डितों ने बहुत कुछ बतलाया था, मैंने वह सब भी किया किन्तु कुछ भी परिवर्तन नहीं हुआ। नारायण-बलि इत्यादि भी कराई, किन्तु तब भी वही स्थिति है। मेरी पत्नी पुनः पुनः मुझे आपसे कोई उपाय पूछने के लिए कहती है। आप यदि इसकी कोई स्थायी व्यवस्था कर दें तो बहुत अच्छा हो।”

गुरु महाराज ने उनसे कहा, “आप अपने घर पर एक मास तक महामन्त्र का कीर्त्तन करने की व्यवस्था कीजिए।” उन्होंने पूछा, “कौन करेगा?” गुरु महाराज ने उत्तर दिया, “आप और आपकी पत्नी हाथों से ताली बजाकर महामन्त्र का कीर्त्तन करना। एक मास के बाद मुझसे आकर मिलना, तब बात करेंगे।”

अभी गुरु महाराज दिल्ली में ही थे कि श्रीहोती लाल शर्मा पुनः आकर उनसे कहने लगे, “अभी केवल मुझे और मेरी पत्नी को पन्द्रह दिन ही हरिनाम महामन्त्र करते हुए व्यतीत हुए हैं और पिताजी का आना बन्द हो गया है। आपकी कृपा से मेरा हरिनाम के प्रति अटूट विश्वास उत्पन्न हुआ है। आप कृपा करके मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार कीजिए।” गुरु महाराज ने उन्हें हरिनाम प्रदान किया।

गुरु महाराज की श्रीहरिनाम में अटूट श्रद्धा थी, दृढ़ विश्वास था, इसी कारण उन्होंने अन्य कोई व्यवस्था नहीं बतलाकर केवल यह व्यवस्था ही दी।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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संसार-समुद्र है, इसका पानी सूख जाने पर ही तुम उस पार जाओगी यह सोच गलत है। इसी में रहकर ही आत्मकल्याण के बारे में चिंतन करना होगा।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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मैंने तो कम्बल को छोड़ दिया है किन्तु कम्बल मुझे नहीं छोड़ रहा

ठंड के मौसम में एक दिन दो साधु समुद्र के किनारे-किनारे कहीं जा रहे थे। दोनों साधुओं में से केवल एक के पास कम्बल था। कम्बल ना होने के कारण, ठंड से साधु को जो कष्ट मिल रहा था, उसे देखकर दूसरे साधु बहुत दुःखी हो रहे थे। तभी उन्हें समुद्र में एक कम्बल बहते हुए दिखा। उन्होंने दूसरे साधु से कहा, “अरे, देखो एक कम्बल बहते हुए जा रहा है। क्या आपको तैरना आता है?”

दूसरे साधु ने कहाँ, “जी हाँ, आता है।” “तो जाकर उस कम्बल को ले आइए। बाद में धूप में सुखाकर आप उसे ओढ़ सकते हैं।”

“हाँ, अभी ले आता हूँ।” इतना कहकर उन्होंने समुद्र में छलांग लगा दी और तैरकर कम्बल की ओर जाने लगे। कम्बल के पास जाकर उन्हें पता चला वास्तव में वह कम्बल नहीं, एक भालू है! वे उससे बच पाते उससे पहले ही भालू ने उन्हें पकड़ लिया। वे उससे छुटकारा पाने के लिए बहुत प्रयास करने लगे पर भालू उन्हें छोड़ नहीं रहा था।

जो साधु समुद्र के किनारे खड़े थे, उन्हें दूर से कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वहाँ क्या हो रहा है। उन्होंने आवाज़ लगायी, “क्या कर रहे हो? जल्दी कम्बल लेकर वापस आ जाओ। और यदि नहीं ला सकते तो समय व्यर्थ क्यों कर रहे हो? उसे छोड़ दो और वापस आ जाओ।”

दूसरे साधु ने उत्तर दिया, “मैंने तो कम्बल को छोड़ दिया है किन्तु कम्बल मुझे नहीं छोड़ रहा है!”

“क्यों, क्या बात है?”

“यह कम्बल नहीं, भालू है।”

“सर्वनाश! तुम ठहरो, मैं कुछ करता हूँ।”

वे जल्दी से जाकर कहीं से एक रस्सी व डंडा ले आए। उन्होंने भालू को डंडा दिखाकर भगाया और रस्सी फेंक कर साधू को किनारे की ओर खींच लिया।

इस दृष्टांत में भालू, माया का प्रतीक है। दूर से देखने पर वह (माया) सुख प्रदान करने वाली वस्तु लग रही थी, किन्तु पास जाने पर वही बन्धन और दुःख का कारण बन गई। उसमें सुख की गंध भी नहीं थी। इसी प्रकार संसार के अलग-अलग भोग, जीव को सुख प्रदान करनेवाले लगते हैं। जीव सुख प्राप्त करने की इच्छा से उनकी तरफ आकर्षित होता है। किन्तु वही भोग उसके बन्धन और दुःख का कारण बन जाते हैं। अन्त में वह उन बन्धनों में ऐसा फँस जाता है कि यदि वह उनसे छूटना भी चाहे तो वे उसे नहीं छोड़ते। ऐसी अवस्था में जीव अपने सामर्थ्य से स्वयं को माया के बन्धनों से मुक्त नहीं कर सकता। मायारूपी इस संसार-समुद्र से जीव को वही व्यक्ति पार करा सकता है जो स्वयं माया के बन्धन से मुक्त है। भगवान् अथवा उनके भक्त (मुक्त पुरुष) ही माया में फँसे जीव का उद्धार कर सकते हैं।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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