
कुन्त्युवाच
नमस्ये पुरुषं त्वाद्यमीश्वरं प्रकृतेः परम् ।
अलक्ष्यं सर्वभूतानामन्तर्बहिरवस्थितम् ।।
कुन्ती उवाच श्रीमती कुन्ती ने कहा; नमस्ये मेरा नमस्कार है; पुरुषम् परम पुरुष को; त्वा तुम; आद्यम् मूल; ईश्वरम् नियन्ताः प्रकृतेः भौतिक ब्रह्माण्डों के; परम् परे; अलक्ष्यम् अदृश्य; सर्व समस्तः भूतानाम्जीवों के; अन्तः भीतर; बहिः = बाहर; अवस्थितम् = स्थित ।
अनुवाद – श्रीमती कुन्ती ने कहाः मैं आपको नमस्कार करती हूँ, क्योंकि आप आदि पुरुष हैं और इस भौतिक जगत के गुणों से निःसंग रहते हैं। आप समस्त वस्तुओं के भीतर तथा बाहर स्थित रहते हुए भी सबों के लिए अलक्ष्य हैं।
तात्पर्य – श्रीमती कुन्ती देवी को भली-भाँति ज्ञात था कि कृष्ण आदि भगवान् हैं, भले ही वे उसके भतीजे लगते थे। ऐसी प्रबुद्ध महिला अपने भतीजे को नमस्कार करने की गलती नहीं कर सकती थी। अतएव, उसने उन्हें आदि पुरुष के रूप में सम्बोधित किया, जो भौतिक जगत से परे हैं। यद्यपि सारे जीव भी दिव्य हैं, लेकिन वे न तो आदि हैं, न अच्युत। जीव भौतिक प्रकृति के चंगुल में पड़कर, नीचे गिर सकते हैं, लेकिन भगवान् ऐसे नहीं हैं। अतएव वेदों में उन्हें समस्त जीवों में प्रधान कहा गया है। (नित्यो नित्यानाम् चेतनश्चेतनानाम्)। उसने उन्हें पुनः ईश्वर या नियन्ता के रूप में सम्बोधित किया। जीव, या चन्द्र तथा सूर्य-जैसे देवता भी, कुछ हद तक ईश्वर हैं, लेकिन इनमें से कोई भी परमेश्वर नहीं है। वे परमेश्वर या परमात्मा हैं। वे अन्तः तथा बाह्य दोनों में विद्यमान रहते हैं। यद्यपि वे श्रीमती कुन्ती के समक्ष उसके भतीजे के रूप में उपस्थित थे, लेकिन वे उसके तथा अन्य सबों के अन्तर में भी थे। भगवद्गीता (१५.१५) में भगवान् कहते हैं, “मैं प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हूँ और मुझी से उसमें स्मृति, विस्मृति, चेतना आदि है। मैं समस्त वेदों के द्वारा ही जानने योग्य है, क्योंकि मैं वेदों का संकलनकर्ता तथा वेदान्त को पढ़ाने वाला हूँ।” रानी कुन्ती पुष्टि करती है कि यद्यपि भगवान् समस्त जीवों के भीतर तथा बाहर हैं, तो भी वे अलक्ष्य हैं। कहने का भाव यह है कि भगवान् सामान्य व्यक्ति के लिए पहेली-तुल्य हैं। महारानी कुन्ती ने साक्षात् अनुभव किया कि भगवान् कृष्ण उसके समक्ष उपस्थित हैं, फिर भी उत्तरा के गर्भमें प्रविष्ट होकर उन्होंने अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से भ्रूण की रक्षा की। वह स्वयं पशोपेश में थी कि कृष्ण सर्वव्यापी हैं, या अन्तर्यामी। वस्तुतः वे दोनों हैं, लेकिन उन्हें इसकी छूट है कि जो लोग उनके शरणागत नहीं हैं, उनके समक्ष प्रकट न हों। यह अवरोध का पर्दा भगवान् की माया-शक्ति कहलाती है और यही उत्पाती जीव की संकुचित दृष्टि को नियन्त्रित करती है।
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म्लेच्छ कुलमें अवतीर्ण होने पर भी हरिभक्त सभीके द्वारा पूज्य हैं-
सकृत् प्रणामी कृष्णस्य मातुः स्तन्यं पिबेत्र हि।
हरिपादे मनो येषां तेभ्यो नित्यं नमो नमः ॥
पुक्कसः श्वपचो वापि ये चान्ये म्लेच्छजातयः ।
तेऽपि वन्द्या महाभागा हरिपादैकसेवकाः ॥
(पद्मपुराण-स्वर्गखण्ड आदि २४ अध्याय)
जिन्होंने एक बार भी श्रीकृष्णको सब प्रकारके अहङ्कारोंका परित्यागकर प्रणाम किया है उसको पुनः मातृस्तन पान करनेकी जरूरत नहीं है। अधम चाण्डाल, कुक्कुरभोजी चाण्डाल यहाँ तक कि म्लेच्छ जातियाँ भी यदि एकान्त भावसे हरिपादपब्योंमें शरण ग्रहणकर सेवा करती हैं, तो वे भी महाभाग और पूजाके योग्य हैं ।
गौड़ीय कण्ठहार
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भजन निष्ठा, यथा मनःशिक्षा (२)
न धर्म नाधर्म श्रुतिगणनिरुक्तं किल कुरु ब्रजे राधाकृष्ण-प्रचुर परिचर्यामिह तनु।
शचीसूनुं नन्दीश्वरपतिसुतत्वे गुरुवरं मुकुन्दप्रेष्ठत्वे स्मर परमजस्त्रं ननु मनः ।।
हे मेरे प्यारे मन ! श्रुतियोंमें कथित धर्म और अधर्म (पुण्यजनक धर्म और पापमूलक अधर्म), कुछ भी मत करो, बल्कि श्रुतियोंने चरम सिद्धान्तके रूपमें जिनको सर्वोपादेय चरम उपास्य एवं सर्वोपरि तत्त्व निर्धारित किया है, उन श्रीश्रीराधाकृष्ण युगलकी प्रेममयी प्रचुर परिचर्या करो। श्रीराधाभाव-कांति सुवलित शचीनन्दन श्रीचैतन्य महाप्रभुको श्रीनन्दनन्दनसे अभिन्न तथा श्रीगुरुदेवको मुकुन्दप्रेष्ठ (प्रिय) जानकर उनका सदासर्वदा स्मरण करो ।
श्रुति उक्त धर्माधर्म, विधि निषेध कर्माकर्म,
छाड़ि भज राधाकृष्ण पद।
गौराङ्गे श्रीकृष्ण जान, गुरु कृष्ण-प्रेष्ठ मान,
एई भाव तोमार सम्पद।
भजनरहस्यवृत्ति – श्रुतियोंमें तथा तदनुगत स्मृति आदि ग्रन्थोंमें धर्म और अधर्मका निरूपण किया गया है। मनुष्य जो कुछ भी करता है, वह इन दोनोंकी श्रेणीमें आ जाता है। धर्म, अधर्मका पूर्ण रूपसे निषेध करके जीवका क्षणमात्र भी जीवित रहना सम्भव नहीं। श्रील रघुनाथ दास गोस्वामीपादने यहाँ इन्द्रियों द्वारा किये जाने वाले समस्त कर्मोंका निषेध नहीं किया है। इनके अंतर्गत धर्म तथा शुभ कर्मोंका पालन अज्ञ व्यक्तियोंके लिए है।
विज्ञ जीव जिन्हें स्वरूपज्ञान प्राप्त हो चुका है, उन्हें आत्मरति या कृष्णरति अथवा श्रीराधाकृष्ण युगलकी प्रेममयी सेवाका उपदेश दिया है। साधकको अपने सभी कार्य भगवत्सेवामयी भावनासे ही करने चाहिए। गृहस्थ भक्त घरमें श्रीठाकुर सेवा प्रकाशकर धनोपार्जन, परिवारका पालन-पोषण, विषय सम्पत्तिकी रक्षा, गृह आदि सभी कार्य प्रभुकी सेवा समझकर करें। अपनेको केवल प्रभुका सेवक मात्र समझें।
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
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हमारा मंगल कैसे होगा ?
कृष्ण एवं कार्ण (कृष्णभक्त) के श्रीचरणकमलों का आश्रय ग्रहण करने से ही हमारा कल्याण होगा। जो व्यक्ति स्वयं को कर्ता मानता है उसका कल्याण नहीं हो सकता। आत्मा की वृत्ति को प्रकाशित करने के लिए शुद्धभक्तों का संग अत्यन्त आवश्यक है। नामधारी भक्तों के संग से कल्याण नहीं होगा ।
श्रीकृष्ण के चरणकमलों की सेवा के अतिरिक्त सब कुछ अमंगल ही अमंगल है । धर्म, अर्थ, कामिनी (स्त्री), प्रतिष्ठा एवं मोक्ष की कामना भक्ति नहीं है। यदि हमारे प्रत्येक कार्य में, पद पद पर एवं प्रत्येक प्रकार की चिन्ता में कृष्ण सेवा होती है, तभी सब कुछ ठीक है, उसी से हमारा कल्याण होगा ।
अपने कल्याण के इच्छुक लोगों को अकृत्रिम (असली) साधुओं की खोज करनी चाहिए। यदि हमारे हृदय में, आलस्य, कपटता या अनेक प्रकार की कामनाएँ रहेंगी, तो हमें वैसे ही साधु या गुरु प्राप्त होंगे। श्रीकृष्ण का कीर्तन करने वाले कृष्ण के प्रिय श्रीगुरुदेव के चरणकमलों का आश्रय ग्रहण करने से ही हमारा वास्तविक मंगल होगा। भाग्य यदि अच्छा हो, तो कृष्ण-कृपा से अवश्य ही हमें सद्गुरु की प्राप्ति होगी ।
दुश्चरित्र व्यक्ति श्रीमद्भागवत का पाठ नहीं कर सकते । भक्त भागवत ही श्रीमद्भागवत का पाठ एवं हरिकीर्तन कर सकते हैं। चरित्रहीन, अन्याभिलाषी एवं दाम्भिक व्यक्ति के मुख से हरिकथामृत नहीं निकलती । वे जो कुछ कहते हैं, वह विष ही होता हैं। इसीलिए जिस किसी के मुख से श्रीमद्भागवत एवं हरिकथा नहीं सुननी चाहिए। उससे कल्याण के स्थान पर अकल्याण ही होता है।
गुरुत्यागी एवं गुरुसेवा विमुख व्यक्ति का संग दृढ़तापूर्वक त्याग करना चाहिए । वे असत् हैं, उनका संग करने से जीवों का सर्वनाश हो जाता है । गुरुनिष्ठ भक्तों से ही हरिकथा सुननी चाहिए, जिससे हमारी भी गुरु के प्रति एवं नाम के प्रति निष्ठा हो जाएगी। हरि एवं गुरुदेव के चरणकमलों में हमारी शरणागति होगी, हृदयमें दृढ़ता, बल एवं साहस आएगा। ऐसे निष्किञ्चन गुरुनिष्ठ भक्तों से हरिकथा श्रवण करने से उनके संग के प्रभाव से हमारे हृदय में ऐसा विचार आएगा कि एकमात्र भक्ति ही कल्याण का मार्ग है। उस समय निर्विशेषवाद, कर्म, ज्ञान एवं योग इत्यादि सब कुछ तुच्छ प्रतीत होंगे ।
कृष्ण का आश्रय ग्रहण करने पर ही कल्याण होता है। यदि भगवान के चरणों का आश्रय ग्रहण किया जाए, तो हमें पढ़ना, लिखना, बोलना आये अथवा नहीं आए, इसका कोई महत्व नहीं रह जाता ।
भगवान के भक्त जीवों का कल्याण करने के लिए इस जगत में आते हैं। इस जगत में उनका कोई कर्तव्य नहीं है। उन्हें इस जगत में आने की कोई आवश्यकता भी नहीं है। जीवों की बहिर्मुख प्रवृत्ति को बदलकर कृष्ण उन्मुख करना ही उनका एकमात्र कार्य और कर्त्तव्य हैं। ऐसे शुद्ध भक्तों का संग ही मंगलप्रद है ।
श्रीलप्रभुपाद
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गुरुतत्त्व और परम्परा
परमहंसगण ही आचार्य की लीला किया करते हैं। बद्धजीव, सद्गुरु के चरणों का आश्रय लेकर, भजन के प्रभाव से मायामुक्त होकर, कृष्णतत्त्ववेत्ता वैष्णव हो जाते हैं। तब उनके पूर्व-जीवन की बद्ध-अवस्था के दोषों के सम्बन्ध में उल्लेख करना अपराध है। वे भी तब नित्य-सिद्ध भक्तों की श्रेणी में ही आ जाते हैं। अनर्थयुक्त अवस्था में, शिष्यतुल्य व्यक्तियों के लिए, नित्य-सिद्ध और साधन-सिद्ध में तब किसी प्रकार का भेदभाव देखना उचित नहीं है। कृष्ण की इच्छा से, वे तब आचार्य का कार्य कर सकते हैं।
भागवत और पंचरात्र मार्ग के अनुसार आचार्य परम्परा दो प्रकार से सुरक्षित रह सकती है। प्रथम का वैशिष्ट्य, भजन मार्ग में आश्रयविग्रह और आश्रितों की परम्परा में भजनानन्दियों में प्रसिद्ध है। ऐकान्तिक नाम-भजनकारी, जैसे भजन-पथ पर उन्नति करते हुए पांचरात्रिक गुरु (दीक्षा गुरु) का आनुगत्य त्याग किये बिना अपनी भजन-पुष्टि, सिद्धि और निपुणता के लिए भागवत मार्ग में, शिक्षागुरु के आनुगत्य में, विषयविग्रह- भगवान की सेवा करते हैं।
मन्त्र-दीक्षा गुरु, एक हैं-दो या अनेक नहीं, किन्तु शिक्षागुरु अनेक हो सकते हैं, यह बात शुद्ध-भक्त समाज में स्वीकृत और शास्त्र व सदाचार सम्मत है; इसलिए दीक्षागुरु और शिक्षागुरु में छोटे-बड़े का विचार करना या उस प्रकार के दर्शन करना शिष्य के लिए बिल्कुल भी उचित नहीं है। लेकिन दोनों का वैशिष्ट्य यह है कि, शिक्षा गुरुवर्ग- श्रीनाम-भजन के आश्रय में भागवत-मार्गीय गुरुदेव हैं और दीक्षागुरु-पांचरात्रिक मन्त्र के आश्रय में अर्चन-मार्गीय गुरुदेव हैं। पांचरात्रिक विधि, भागवत विधि के अनुगत होकर, एक ही अद्वयज्ञान कृष्णसेवा में अवस्थित है।
आचार्य-धारा में किसी प्रकार का gap या अन्तर नहीं रहता है। श्रौतवाणी की धारा के अटूट संरक्षण के लिए कभी इस प्रकार का gap या अन्तर रह भी नहीं सकता है। लेकिन प्रत्येक आचार्य अपनी आचार्यलीला के प्रकाश के वैशिष्ट्य को साम्प्रदायिक-वैभवज्ञान (तत्त्वज्ञान) से रहित व्यक्तियों के पास व्यक्त नहीं करके स्निग्ध, विश्रम्म शिष्यों के पास, आम्नाय-परम्परा को गूढ़-भाव से सुरक्षित रखते हैं। फलस्वरूप साम्प्रदायिक तत्त्वज्ञान-हीन व्यक्ति यदि कुतर्क करते हैं तो इससे उनकी मूर्खता, अयोग्यता और अनाधिकार ही व्यक्त होता है। सत् सम्प्रदाय की गुरुपरम्परा का रहस्य रूपी रत्न, हाट में, बाज़ार में, रास्ते में, घाट में, मैदान में-इधर-उधर, अयोग्य और अनाधिकारी व्यक्तियों से हमेशा ही रहस्यमय, गुप्त और छिपाकर रखा गया है और रखा जायेगा।”
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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किसी की भोग-वृत्ति की पूर्ति में कभी सहायक मत बनना
एक बार गुरु महाराज ने मुझे एक बहुत ही उत्तम वस्त्र दिया, जो कोमल एवं आरामदायक था। मठ का एक ब्रह्मचारी पुनः पुनः उसे हाथ लगाकर देख रहा था। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ, मानो उसकी उस वस्त्र को लेने में रुचि है। मैंने सोचा कि मैं यह वस्त्र इन्हें ही दे देता हूँ। किन्तु मेरे मन में विचार आया कि गुरु महाराज के श्रीहस्त से यह वस्त्र मुझे कृपा के रूप में प्राप्त हुआ है। इसलिए पहले उन्हीं से पूछ कर बाद में इन्हें यह वस्त्र दूँगा। यह विचार लेकर मैंने गुरु महाराज के समक्ष जाकर उनसे कहा, “मैं तो अधिकतर समय मायापुर में रहता हूँ। श्रमिकों के साथ काम करना पड़ता है। इतने उत्तम वस्त्र की मुझे आवश्यकता नहीं पड़ती और वहाँ यह बहुत कम दिनों में ही फट भी जाएगा। अतः आपकी आज्ञा हो तो मैं यह वस्त्र अमुक ब्रह्मचारी को दे दूँ, जो इसकी प्रशंसा करता हुआ भी प्रतीत हो रहा था।”
मेरी बात सुन कर गुरु महाराज ने अत्यधिक गम्भीर होकर कहा, “नहीं, उसे मत देना। उसकी ऐसे वस्त्र पहनने में रुचि है। मैं यह वस्त्र देकर उसकी रुचि को वर्धित नहीं कर सकता। ऐसा करने से वह विषयी बनेगा। उसका वास्तविक शुभचिन्तक होने के नाते मैं उसके प्रति शत्रुता नहीं कर सकता। माया के चङ्गुल से उस की यथासम्भव रक्षा करना मेरा कर्त्तव्य है। तुम्हारा वस्त्र शीघ्र फटता है तो फटने दो। किन्तु तुम किसी की विषय-रुचि में ईन्धन प्रदान करने के निमित्त मत बनना।”
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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जीवन के प्रत्येक मुहूर्त में गुरु-वैष्णवों की शुभेच्छा व शुभआशीर्वाद हमें चाहिए। हम यदि उनके स्नेह से वंचित हो गये तो भजन-पथ पर कभी भी अग्रसर नहीं हो पायेंगे।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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तब हरिकथा श्रवण से कोई लाभ नहीं होगा
पश्चिम बंगाल में खड़गपुर नामक एक स्थान है। वहाँ हमारे गुरुदेव के गुरुभाई, पूज्यपाद श्रील भक्ति कुमुद संत गोस्वामी महाराज का आश्रम है। आश्रम में प्रत्येक दिन सुबह-शाम भगवान् की कथा चर्चा होती है। विशेषतः शाम के समय अनेक स्थानीय व्यक्ति हरिकथा श्रवण करने के लिए आते हैं। प्रतिदिन आनेवाले श्रोताओं में एक दंपति थे जो आश्रम से थोड़ी ही दूरी पर रहते थे। वे मठ में आकर ठाकुर जी के दर्शन करते और हरिकथा श्रवण करके रात्रि १० बजे के बाद अपने घर पहुँचते। उनका पुत्र, जोकि स्कूल में पढ़ाई करता था, एक दिन माता-पिता को मठ जाते हुए देख कहने लगा, “आप दोनों प्रतिदिन मुझे अकेला छोड़कर चले जाते हैं। आज मुझे भी अपने साथ ले जाइए।”
माताजी ने उत्तर देते हुए कहा, “हम जहाँ जाते हैं वहाँ जाने के लिए अभी तुम बहुत छोटे हो। हम तो वहाँ धर्म-चर्चा सुनने के लिए जाते हैं। बड़े होने के बाद तुम वहाँ जा सकते हो। तुम्हें पहले अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना है, बहुत सारा धन कमाना है, अपने परिवार का पालन-पोषण करना है। सब कुछ हो जाने के बाद भी यदि तुम्हारे पास समय रहेगा तो मठ-मन्दिर जा सकते हो। अभी वहाँ जाकर क्या करोगे? यहाँ रहो और अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो।”
पुत्र कई बार माताजी को उसे अपने साथ ले जाने के लिए आग्रह करता था किन्तु माताजी उसे डांट देती और पढ़ने बिठा देती थी। एक दिन वह माता-पिता के साथ जाने के लिए बहुत आग्रह करने लगा और माताजी के द्वारा मना करने पर बहुत रोने लगा। माताजी को विवश होकर उसे साथ ले जाना पड़ा।
उस दिन आश्रम में श्रील संत गोस्वामी महाराज हरिकथा कर रहे थे। श्रील महाराज ने हरिकथा में कहा, “जो लोग धर्म पालन करने की इच्छा करते हैं उन्हें अधर्म को छोड़ना होगा। धर्म भी करेंगे और अधर्म भी करेंगे तो कोई लाभ नहीं होगा। दूध भी पीएँगे और तम्बाकू भी खाएँगे तो दूध पीने का कोई लाभ नहीं होगा। ‘जहाँ काम ताहाँ नाहि राम, रवि रजनी नाहि मिले एक ठाम’ जैसे रवि (सूर्य) और रजनी (रात्रि) दोनों एक साथ नहीं मिलते, वैसे ही जिस हृदय में इस जगत की कामना-वासना है, वहाँ भगवान् नहीं आते। भगवान् का भजन और भोगों का चिंतन एक साथ नहीं हो सकता। जितना हम पूर्व दिशा में आगे बढ़ते जाएँगे, पश्चिम दिशा से उतने ही दूर होते जायेंगे। धर्म के मार्ग पर चलना है तो अधर्म को छोड़ना होगा। श्रीमद्भागवत में अधर्म (कलि) के चार स्थान बतलाये गए हैं- द्यूतं पानं स्त्रियः सूना यत्राधर्मश्वतुर्विधः। यहाँ द्यूतं का अर्थ है- जुआ-सट्टा, लॉटरी जैसे खेल; पानं का अर्थ है- नशीले पदार्थ जैसे मद, गांजा, भांग, बीड़ी, सिगरेट, चाय इत्यादि का सेवन; स्त्रियः का अर्थ है- विवाहित जीवन के बाहर (अवैध) स्त्री-संग और सूना का अर्थ है-पशु-पक्षियों की हिंसा और उनका माँस-भक्षण। धर्म के मार्ग पर चलने के इच्छुक व्यक्तिओं को यह सब छोड़ना होगा, माँस-मछली खाना छोड़ना होगा। जो वस्तु भगवान् को निवेदन नहीं कर सकते, उसे खाना अधर्म है।”
इस प्रकार श्रील महाराज ने धर्म विषयक अनेक उपदेश दिए। हरिकथा सुनने के बाद माता-पिता और पुत्र वापस घर आ गए। घर आकर तीनों खाना खाने के लिए बैठे। बंगाल में अधिकतर माँस-मछली खाया जाता है। जब माताजी ने बेटे को खाने के लिए मछली दी तो बेटे ने कहा, “माताजी, हम जिस आश्रम में गए थे वहाँ स्वामी जी ने माँस-मछली खाने से मना किया, यह तो कलि (अधर्म) का स्थान है। मैं इसे नहीं खाऊँगा।”
यह सुनकर माताजी अपना सिर पकड़कर बैठ गईं और कहने लगीं, “स्वामी जी की बात सुनकर इस लड़के की बुद्धि ख़राब हो गई है।”
माता-पिता दोनों के बहुत समझाने पर भी लड़के ने मछली नहीं खाई। खाना हो जाने के बाद, लड़के के पिताजी जब हुक्का पान करने लगे तब लड़का उनके पास गया और कहने लगा, “पिताजी, अभी तो हम सुनकर आए कि नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। यह कलि का स्थान है।”
बेटे की इस प्रकार की बातें सुनकर उसके पिताजी ने भी अपना सिर पकड़ लिया और कहने लगे, “तुम्हारी बुद्धि सच में ख़राब हो गई है। इसलिए हम तुम्हें आश्रम में नहीं ले जा रहे थे। हम लोग तो प्रतिदिन आश्रम में जाते हैं और उपदेश भी सुनते हैं। किन्तु जो भी सुनते हैं सब आश्रम में ही छोड़कर आते हैं, घर में कुछ नहीं लाते। तू मूर्ख है, स्वामी जी की बात को घर में ले आया!”
एक बच्चे का हृदय कोमल होता है। जो सुनता है उसे स्वीकार कर लेता है। उस लड़के के माता-पिता अनेक वर्षों से आश्रम में जाते थे फिर भी वे श्रील संत महाराज की बात अपने हृदय में नहीं बिठा सके किन्तु लड़के ने एक ही बार सुनकर उनकी बात को हृदय में बिठा लिया और उसका पालन करने का प्रयास करने लगा। कोमल बाँस को किसी भी दिशा में मोड़ा जा सकता है किन्तु कठोर बाँस को मोड़ना संभव नहीं है। कठोर बाँस को मोड़ने का प्रयास करने से वह टूट जाता है पर मुड़ता नहीं है। हम भी उस कठोर बाँस की तरह हैं। हमने यह तय कर लिया है कि साधु चाहे कितने भी उपदेश दें, हम बदलने वाले नहीं हैं। यदि हम अपने विचार को ही बड़ा मानते हैं तो हरिकथा श्रवण से कोई लाभ नहीं होगा। जब शिक्षा ग्रहण करने के उद्देश्य से हरिकथा सुनेंगे तो ही वास्तविक लाभ होगा।
यदि साधु का उपदेश श्रद्धा के साथ श्रवण करेंगे तो अवश्य ही उसका पालन कर पाएँगे। शिक्षा ग्रहण करने के उद्देश्य से यदि नित्यप्रति श्रद्धा के साथ भगवान् की कथा का श्रवण करेंगे तो अति अल्प समय में भगवान् हृदय में प्रकाशित हो जाएँगे।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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