
यया सम्मोहितो जीव आत्मानं त्रिगुणात्मकम् ।
चिम परोऽपि मनुतेऽनर्थ तत्कृतं चाभिपद्यते ।।
यया = जिससे; सम्मोहितः = मोहग्रस्त; जीवः जीवात्माएँ; आत्मानम्-स्व; त्रि-गुण-आत्मकम् प्रकृति के तीनों गुणों से बद्ध अथवा पदार्थ का फल; परः दिव्य; अपि के होते हुए भी; मनुते मान लेता है; अनर्थम् अनचाही वस्तुएँ; तत्-उससे; कृतम् च प्रतिक्रिया; अभिपद्यते भोगता है।
अनुवाद – इस बहिरंगा शक्ति से जीवात्मा तीनों गुणों से अतीत होते हुए भी अपने को भौतिक पदार्थ मानता है और भौतिक कष्टों के फलों को भोगता है।
तात्पर्य – यहाँ पर भौतिकतावादी जीवों के कष्ट के मूल कारण के साथ उसके उपचार और अभीष्ट चरम सिद्धि का भी संकेत किया गया है। इन सबका उल्लेख इस श्लोक में हुआ है। जीवात्मा स्वाभाविक रूप से भौतिक पाश से परे है, किन्तु अब वह बहिरंगा शक्ति द्वारा बन्दी बना लिया गया है अतएव वह अपने आपको भौतिक पदार्थ मानता है। अतएव इस अपवित्र संगति से विशुद्ध आध्यात्मिक प्राणी प्रकृति के गुणों के अधीन कष्ट पाता है। जीवात्मा भ्रमवश अपने को भौतिक पदार्थ मान बैठता है। इसका अर्थ यह हुआ कि उसके सोचने, अनुभव करने तथा चाहने की वर्तमान विकृत विधि उसके लिए स्वाभाविक नहीं है। तो भी सोचने, अनुभव करने तथा चाहने का उसका अपना सामान्य तरीक होता है। जीव अपनी मूल अवस्था में सोचने, अनुभव करने तथा चाहने की शक्ति से रहित नहीं होता। भगवद्गीता में भी पुष्टि की गई है कि बद्धजीव का वास्तविक ज्ञान, अज्ञान से प्रच्छन्न रहता है। इस प्रकार इस सिद्धान्त का बहिष्कार हो जाता है कि जीवात्मा परम निराकार ब्रह्म है। ऐसा हो नहीं सकता क्योंकि जीवात्मा अपनी मूल अबद्ध अवस्था में भी अपनी चिन्तन शैली रखता है। वर्तमान बद्ध अवस्था बहिरंगा शक्ति के प्रभाव के कारण है जिसका अर्थ है कि परमेश्वर पृथक् रहता आता है और मोहमयी शक्ति (माया) पहल करती है। भगवान् कभी नहीं चाहते कि जीवात्मा बहिरंगा शक्ति द्वारा भरमाया जाए। बहिरंगा शक्ति भी इस तथ्य से भलीभाँति परिचित है, किन्तु वह अपनी मोहनी शक्ति से विस्मृत जीव को भरमाये रखने का अकृतज्ञ जिम्मा लेती है। भगवान् भ्रामिका शक्ति के कार्य में कोई दखल नहीं देते, क्योंकि उसके ये कार्य बद्धजीव को सुधारने के लिए आवश्यक होते हैं। स्नेहिल पिता नहीं चाहता कि अन्य कोई व्यक्ति उसकी सन्तान को प्रताड़ित करे, तो भी वह अपने उद्दंड पुत्र को सुधारने के लिए निष्ठुर व्यक्ति के संरक्षण में सौंप देता है। लेकिन साथ ही, सर्व-स्नेहिल सर्वशक्तिमान पिता बद्धजीवों को भ्रामिका शक्ति (माया) के चंगुल से छुटकारा दिलाने को उत्सुक रहता है। राजा अवज्ञाकारी नागरिकों को बन्दीगृह की चारदीवारों के भीतर डाल देता है, लेकिन कभी-कभी बन्दी को राहत देने की इच्छा से वह स्वयं बन्दीगृह में जाता है और उससे सुधरने के लिए कहता है और उसके ऐसा करने पर वह बन्दी को मुक्त कर देता है। इसी प्रकार परमेश्वर अपने राज्य से भ्रामिका शक्ति के राज्य में अवतरित होकर भगवद्गीता के रूप में राहत देते हैं जहाँ पर वे व्यक्तिगत रूप से सुझाव देते हैं कि यद्यपि भ्रामिका शक्ति पर विजय पाना दुष्कर है तो भी यदि कोई भगवान् के चरण कमलों की शरण में आता है तो भगवान् के आदेश से वह मुक्त हो जाता है। शरणागति विधि की परिपूर्ति संगति के प्रभाव से हो जाती है। अतः भगवान् का सुझाव है कि सन्त पुरुषों की वाणी के प्रभाव से, जिन्होंने वास्तव में परम की अनुभूति की है, वे लोग भगवान् की दिव्य प्रेमा भक्ति में संलग्न हों। बद्धजीव को भगवान् के विषय में सुनने में स्वाद मिलने लगता है और इस प्रकार श्रवण करने से ही वह भगवान् के प्रति आदर, भक्ति तथा आसक्ति के पद तक उठ जाता है। शरणागति विधि से सारी बात पूरी हो जाती है। यहाँ पर व्यासदेव के अवतार रूप में भगवान् ने यही सुझाव रखा है। इसका अर्थ यह हुआ कि भगवान् द्वारा बद्धजीवों का दोनों प्रकार से उद्धार होता है-एक तो भगवान् की बहिरंगा शक्ति के द्वारा दण्डित होकर तथा दूसरी ओर भगवान् द्वारा अन्तः और बाह्य गुरु बनकर। भगवान् प्रत्येक जीव के अन्तःकरण में परमात्मा रूप में गुरु बनते हैं और बाहर से वे शास्त्रों, सन्तों तथा दीक्षा से, गुरु के रूप में, गुरु बनते हैं। अगले श्लोक में इसकी अधिक स्पष्ट व्याख्या हुई है।
वेदों में (केनोपनिषद् में) देवताओं की नियन्त्रक शक्ति के प्रसंग में भ्रामिका शक्ति की व्यक्तिगत अधीक्षता की पुष्टि की गई है। यहाँ पर भी स्पष्ट कहा गया है कि जीवात्मा बहिरंगा शक्ति द्वारा व्यक्तिगत रूप में नियन्त्रित होता है। इस प्रकार जो जीव बहिरंगा शक्ति के नियन्त्रण में आ जाता है वह भिन्न रूप से स्थित होता है। फिर भी भागवत के इस कथन से स्पष्ट है कि वही बहिरंगा शक्ति, पूर्ण जीव भगवान् के समक्ष, निकृष्ट पद पर स्थित है। पूर्ण जीव या भगवान् तक भ्रामिका शक्ति भी नहीं पहुँच पाती, क्योंकि वह जीवों पर ही अपना कार्य कर पाती है। अतएव यह तो मात्र कल्पना है कि भ्रामिका शक्ति द्वारा भ्रमित होने के बाद परमेश्वर जीव बनते हैं। यदि भगवान् तथा जीव एक ही श्रेणी में होते तो व्यासदेव के लिए इसे देख पाना सम्भव होता और भ्रमित जीवों के भौतिक दुख का प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि परमेश्वर सब कुछ जानते हैं। अतएव अद्वैतवादियों द्वारा भगवान् तथा जीव को एक ही श्रेणी में रखने का प्रयास सर्वथा गर्हित है। यदि भगवान् तथा जीव एक से होते तो श्रील शुकदेव गोस्वामी भगवान् की दिव्य लीलाओं का वर्णन करने का कष्ट न उठाते, क्योंकि ये सब भ्रामिका शक्ति की अभिव्यक्तियाँ होतीं।
श्रीमद्भागवत माया के चंगुल में कष्ट पाने वाली मानवता के लिए रामबाण दवा है। अतएव श्रील व्यासदेव ने सर्वप्रथम बद्धजीवों के वास्तविक रोग अर्थात् बहिरंगा शक्ति द्वारा भ्रमित होने के निदान ज्ञात किये। उन्होंने उन पूर्ण परम पुरुष के भी दर्शन किये जिनसे भ्रामिका शक्ति बहुत दूर रहती है, यद्यपि उन्होंने रुग्ण बद्धजीवों तथा रोग के कारण दोनों को देखा। रोग के उपचार की विधियाँ अगले श्लोक में सुझाई गई हैं। भगवान् तथा जीव दोनों ही निस्सन्देह गुणवत्ता की दृष्टि से एक हैं, लेकिन भगवान् भ्रामिका शक्ति के नियन्ता हैं, जबकि जीव इसी भ्रामिका शक्ति द्वारा नियन्त्रित होते हैं। इस प्रकार भगवान् तथा जीव एकसाथ अभिन्न तथा भिन्न हैं। दूसरा अन्तर इस प्रकार है- भगवान् तथा जीव के बीच का सम्बन्ध दिव्य है अन्यथा वे माया के चंगुल से बद्धजीवों का उद्धार न करते। इसी प्रकार जीव को भी भगवान् के प्रति प्राकृतिक प्रेम तथा स्नेह को जगाने की आवश्यकता रहती है और जीव की यही सर्वोच्च सिद्धि हैं। श्रीमद्भागवत में जीवन के इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर बद्धजीवों का वर्णन हुआ है।
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भागवतगण ‘शूद्र’ नहीं हैं-
न शूद्रा भगवद्भक्तास्ते तु भागवता मताः।
सर्ववर्णेषु ते शूद्रा ये न भक्ता जनार्दने ॥
(ह. भ. वि. १० म. वि. धृत पान्द्मवाक्य)
भगवद्भक्तिपरायण व्यक्ति कभी भी शूद्र नहीं कहलाते, उनको ‘भागवत’ ही कहा जाता है। जनार्दनके प्रति भक्ति न होने पर कोई सी भी जाति क्यों न हो, उनकी ‘शूद्र’ कहकर ही गणना होती है ।
गौड़ीय कण्ठहार
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इन लीलाओंका स्मरण करनेवाले वैष्णव भी भगवानकी भाँति सच्चिदानन्दमय होते हैं। वैष्णवोंका शरीर श्रीकृष्णके शरीरसे अभिन्न होता है। श्रीकृष्ण इस विषयमें उद्धवजीसे कहते हैं। यथा; श्रीमद्भागवत (११.२९.३४) –
मयों यदा त्यक्तसमस्तकर्मा निवेदितात्मा विचिकीर्षितो मे।
तदामृतत्वं प्रतिपद्यमानो मयाऽऽत्मभूयाय च कल्पते वै।।
जिस समय मनुष्य समस्त कर्मोंका परित्याग करके मुझे आत्मसमर्पण कर देता है, उस समय वह मेरे विशेष उपचाररूप कृपाके द्वारा विशेष प्रेमका पात्र बन जाता है, मैं उसको वृद्धावस्थासे छुड़ाकर अमृतत्व-स्वरूप अपनी लीलामें प्रवेश करा देता हूँ, वहाँ मेरी सेवा करता हुआ मेरे साथ ही रहता है।
सर्व कर्म तेयागिया, मोरे आत्म निवेदिया,
येइ करे आमार सेवन।
अमृतत्व धर्म पाइया, लीला मध्ये प्रवेशिया,
आमा सह करये रमण।।
भजनरहस्यवृत्ति-भगवान श्रीकृष्ण अपने प्रिय उद्धवके निकट सम्बन्ध, अभिधेय तथा प्रयोजन तत्त्वके वर्णनके पश्चात् ऐकान्तिक रूपमें श्रीकृष्ण समर्पितात्मा शुद्ध भक्तकी गतिका वर्णनकर रहे हैं- मरणशील जीव संसारमें परिभ्रमण करते-करते सुकृति क्रमसे श्रीकृष्णके नित्यजनोंका संग प्राप्त करते हैं। भक्त शुद्धभक्तोंके संग-प्रभावसे नित्य, नैमित्तिक तथा भोग, मोक्षकी आकांक्षाओंको त्यागकर शुद्धभक्तिका अनुशीलन करते हैं। जिस प्रकार सूर्यके आलोकसे तमका नाश हो जाता है, उसी प्रकार भक्ति-आलोकसे जीवका मोह तम दूर हो जाता है। भक्त भगवानकी ममतामय सेवा करता है, भगवान भी उस भक्तको सेवोपयोगी अमृतमय देह अर्थात् साधककी भावनानुसार देह, रूप, गुण, लीला, सेवाको प्रदान करते हैं। मधुर-रति सम्पन्न साधकगण स्वजातीय स्निग्धाशय भक्तोंके संग प्रभावसे हृदयमें सेवावासना प्राप्त करते हैं तथा भक्ति-अभ्यास एवं भक्तकृपासे सिद्धावस्था लाभ करते हैं। इन भक्तोंकी साधना ललितादि सखियोंके आनुगत्यमें होती है, उनकी कृपासे वे नित्यसिद्ध मञ्जरियोंका सारूप्य प्राप्तकर ब्रजधाममें कुञ्ज सेवाका आनन्द भोग प्राप्त करते हैं। स्वरूप सिद्धिके पश्चात् वस्तुसिद्धि होती है। वस्तुसिद्धि होनेपर जीव नित्य वृन्दावनमें श्रीमती राधाजीकी सेवा नित्यकालके लिए प्राप्त करते हैं। इस सेवाकी प्राप्ति मधुररति साधकोंके अतिरिक्त अन्य किसीको प्राप्त नहीं है।
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
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कलियुग का युगधर्म तो हरिनाम संकीर्तन है । अतः युगधर्म का परित्यागकर युग-वासियों (कलियुग) का मंगल हो ही नहीं सकता । मंगलमय भगवान ने हमारे मंगल के लिए जो व्यवस्था की है, उस हरिनाम को छोड़कर अन्य उपाय के द्वारा हमारा मंगल कैसे हो सकता है ?
जो हरिनाम के अतिरिक्त आत्मकल्याण का कोई अन्य alternative या उपाय बताते हैं, वे तार्किक हैं। हरिनाम के अतिरिक्त अन्य उपायों की कल्पना करना ही आजकल के लोगों का स्वभाव बन गया है। जो हरिनाम करने वाले को एक Party मानते हैं, जो ऐसा मानते हैं कि हनिाम श्रवण अथवा कीर्तन ही आत्म-कल्याण का एकमात्र उपाय नहीं है । वे अप्राकृत वस्तु को जड़ इन्द्रियों के द्वारा जानना चाहते हैं इस प्रकार वे भगवान के आदेशों का उल्लंघन करते हैं। इसीलिए वे सब माया के दल हैं, अथवा अभक्त सम्प्रदाय हैं। खुदा के ऊपर खुदागिरि करना अच्छा नहीं है, इससे सर्वनाश ही होता है, अमंगल ही होता है। इस विषय में शास्त्र कहते हैं-
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम् ।
कलो नास्त्यैव नास्त्यैव नास्त्यैव गतिरन्यथा ।।
अर्थात् कलियुग में हरिनाम के अतिरिक्त आत्मकल्याण का कोई अन्य उपाय नहीं हैं ।
श्रीलप्रभुपाद
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वैष्णवों का तिरोभाव भी जगत के लिए कल्याणकर
वैष्णवों का आविर्भाव और तिरोभाव एक ही उद्देश्य से होता है। वैष्णव जगत के कल्याण के लिए आविर्भूत होते हैं और फिर जगत के कल्याण के लिए ही उनका तिरोभाव होता है। जगत का अकल्याण करने के लिए वैष्णवों का तिरोभाव नहीं होता है। “वैष्णव चरित्र सर्वदा पवित्र”- इसमें अमंगल की कोई छाया नहीं है। श्रील ठाकुर भक्तिविनोद ने जगत में आविर्भूत होकर जितना मंगल किया है, तिरोहित होकर उससे भी अधिक मंगल-विधान किया है। यह एक गूढ़ रहस्यमय तत्त्व है। हम साधारण-दृष्टि से इसका तात्पर्य आसानी से नहीं समझ पायेंगे।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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किसी की सेवा-प्रवृत्ति में बाधा मत देना
मैं जिस समय ब्रह्मचारी अवस्था में कोलकाता मठ में रहता था, उस समय कई बार अनेक ब्रह्मचारी मेरे वस्त्रों को धोने की अथवा मेरे कक्ष को परिष्कार करने की बलपूर्वक चेष्टा करते थे। मैं जिस किसी प्रकार से उन्हें ऐसा नहीं करने हेतु कहता था। एक दिन एक ब्रह्मचारी जब मेरे हाथ से बलपूर्वक मेरे भीगे हुए वस्त्रों से भरी बाल्टी को खींच रहा था, तब गुरु महाराज ने हमें देख लिया तथा मुझसे कहा, “उसे अपने वस्त्र धोने के लिए दे दो। उस की सेवा-प्रवृत्ति में बाधा मत देना। तुम्हारे वस्त्र धोकर वह तुम से जितनी कमाई करेगा, तुम उससे की सेवा करके कमा लेना।” कई गुणा अधिक अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति उनके कहने का तात्पर्य था मान लो कि तुम्हारे वस्त्र धोकर कोई व्यक्ति तुम्हारी कुछ सुकृति ले लेगा, यह तो ठीक है, किन्तु तुम उसी समय में किसी श्रेष्ठ वैष्णव की सेवा करके उससे कहीं गुणा अधिक सुकृति अर्जित कर लो, तो इसमें तुम्हारी कोई हानि नहीं होगी।
“किसी की सेवा-प्रवृत्ति में बाधा मत देना। तुम्हारी सेवा कर वह तुमसे जितनी कमाई करेगा, तुम उससे कई गुणा अधिक अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति की सेवा करके कमा लेना।”
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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गृहस्थों को सम्मान देना होगा, किन्तु गुलामी करना कर्त्तव्य नहीं
साधारण लोगों को ‘ग्राम्यकथा’ अच्छी लगने पर भी सेवकगण उसमें उत्साहित नहीं होते हैं। बहिर्मुख व्यक्तियों को वांछित सम्मान देने से ही अच्छा है। उनके लौकिक व्यवहार को कभी भी आदर या समर्थन नहीं करना चाहिए। भगवान् की सेवा के लिए उपकरण (सामग्री) संग्रह करते समय गृहस्थों के व्यवहारिक सम्मान की रक्षा करनी होगी, किन्तु उनका गुलाम नहीं बन जाना है। “विषयीर अन्न खाइले मलिन हय मन। मलिन मने हइले नहे कृष्णेर स्मरण।।” (विषयी व्यक्ति का अन्न खाने से मन मलिन हो जाता है और मन मलिन हो जाने से कृष्ण का स्मरण नहीं होता है) यह निर्देशनामा हमेशा स्मरण रखना होगा।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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चार आने का भाव
एक बार एक गाँव में दो कीर्तन पार्टियाँ एक साथ इकट्ठी हो गईं। उनमें से एक कीर्तन पार्टी के पास एक बनावटी भाव दिखलानेवाला व्यक्ति था, जिसे देखने के लिए हज़ारों-हज़ारों लोग आने लगे। वह व्यक्ति एक घण्टे से भी अधिक समय तक मूर्च्छित होने का अभिनय करता। दूसरी कीर्तन पार्टी के कीर्तन में कोई नहीं जाता था। उस कीर्तन पार्टी के लोगों ने सोचा कि जन-समुदाय को आकर्षित करने के लिए उन्हें भी भावदशा का अभिनय करनेवाले किसी व्यक्ति को अपनी पार्टी में लाना पड़ेगा। उन्हें ऐसा एक व्यक्ति मिल भी गया। वे उसके पास गए और कहा, “यदि तुम हमारी कीर्तन पार्टी में आकर अलग-अलग भावदशा का अभिनय करोगे, तो हम तुम्हें चार आने देंगे।”
जिस समय की यह बात है उस समय चार आने का मूल्य बहुत था। उस व्यक्ति ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। कीर्तन शुरू होने पर उसने भाव दिखलाना शुरू किया, जिसे देखने के लिए लोग वहाँ इकट्ठा होने लगे। इतनी भीड़ को इकट्ठा हुए देख वह और अधिक बनावटी भाव दिखाते हुए ज़मीन पर लोटपोट करने लगा। जहाँ वह लोटपोट हो रहा था, वहाँ बहुत सारी ज़हरीली लाल चींटियाँ थीं। जैसे ही वह व्यक्ति वहाँ गिरा, चींटियाँ उसे काटने लगीं। उसे भयंकर जलन होने लगी, जिसे वह सहन नहीं कर पाया और बीच कीर्तन में ही उठ खड़ा हुआ। कीर्तन पार्टी के लोग क्रोधित होकर उस पर बरस पड़े, “क्या हुआ? तुम अभी क्यों उठ गए?”
उस व्यक्ति ने कहा, “देखिए, आप तो चार आना देंगे, किन्तु क्या चार आने के लिए मैं अपना जीवन दे दूँ? ज़हरीली लाल चींटियाँ मुझे काट-काट कर मार देतीं।” दर्शक यह सब देखकर वहाँ से चले जाने लगे।
यह है ‘चार आने का भाव’ जो चींटियों के काटने से चला गया। इस प्रकार की भावदशा का नाटक करने से कभी भक्ति नहीं होती। शुद्ध भक्ति में किसी प्रकार का कोई दिखावा नहीं होता। वर्तमान समय में इस प्रकार की बनावटी भक्ति दिखलानेवाले लोग ही अधिक मात्रा में हैं। जो किसी प्रकार का कोई दिखावा नहीं करते, ऐसे शुद्ध-भक्तों का मिलना बहुत दुर्लभ है। गुण माँगेंगे तो संख्या नहीं मिलेगी और संख्या माँगेंगे तो गुण छोड़ना पड़ेगा।
हावड़ा ब्रिज किसी एक इंजीनियर ने बनाया था। वर्तमान समय के इंजीनियर उसके निर्माण को समझ भी नहीं पाते, यहाँ तक कि उसकी मरम्मत भी नहीं कर पाते। इस प्रकार का ब्रिज सभी लोग नहीं बना सकते। एक वैज्ञानिक द्वारा एक नई दवाई के आविष्कार से पूरे जगत के लोगों को फायदा होता है। गुण का मूल्य है या संख्या का? एक चरित्रवान व्यक्ति लाखों-करोड़ों व्यक्तियों का मंगल कर सकता है, किन्तु करोड़ों चरित्रहीन व्यक्ति मिलकर भी एक व्यक्ति का मंगल नहीं कर सकते।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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