
नारद द्वारा व्यासदेव को श्रीमद्भागवत का उपदेश
श्री नारद उवाच
न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशो
जगत्पवित्रं प्रगृणीत कर्हिचित्।
तद्वायसं तीर्थमुशन्ति मानसा
न यत्र हंसा निरमन्त्युशिक्क्षयाः ।।
न नहीं; यत् वहः वचः वाणी; चित्र-पदम् अलंकारिक; हरेः भगवान् का; यशः = महिमा; जगत् ब्रह्माण्ड; पवित्रम् पवित्र; प्रगृणीत वर्णितः कर्हिचित् मुश्किल से; तत्-उस; वायसम्-कौवे को; तीर्थम् तीर्थ-स्थान; उशन्ति सोचते हैं; मानसाः साधु पुरुष; न नहीं; यत्र जहाँ; हंसाः परमहंस पुरुष; निरमन्ति आनन्द लेते हैं; उशिक्-क्षयाः = दिव्य धाम के वासी।
अनुवाद – जो वाणी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के वायुमण्डल को पवित्र करने वाले भगवान् की महिमा का वर्णन नहीं करती, उसे साधु पुरुष कौवों के तीर्थ-स्थान के सदृश मानते हैं। चूँकि परमहंस पुरुष दिव्य लोक के वासी होते हैं, अतः उन्हें ऐसे तीर्थ स्थान में कोई आनन्द नहीं मिलता।
तात्पर्य – भिन्न मानसिक प्रवृत्तियों के कारण कौवे तथा हंस एक से नहीं होते। सकाम-कर्मियों या कामी व्यक्तियों की तुलना कौवों से की गई है और परमहंस साधु पुरुषों की हंसों से। कौवों को कूड़ा-करकट फेंका जाने वाला स्थान प्रिय लगता है जिस प्रकार कि कामी सकाम कर्मियों को सुरा, सुन्दरी तथा स्थूल इन्द्रियतृप्ति के स्थान प्रिय लगते हैं। हंसों को वे स्थान प्रिय नहीं लगते जहाँ कौवे सभाएँ करने के लिए एकत्र होते हैं, अपितु वे प्राकृतिक छटा वाले स्थानों में देखे जाते हैं जहाँ जल का दिव्य आगार होता है और जिसमें प्राकृतिक सौन्दर्य के नाना रंग के कमलों के नाल सुशोभित रहते हैं। इन दो प्रकार के पक्षियों में यही अन्तर है।
प्रकृति ने विभिन्न योनियों को भिन्न-भिन्न मानसिकताएँ दी हैं, अतएव उन्हें एक ही श्रेणी में लाना कठिन है।
इसी प्रकार से विभिन्न मानसिकता वाले व्यक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार का साहित्य होता है। अधिकांशतया बाजारू साहित्य कौवों-सरीखे व्यक्तियों को आकृष्ट करने वाला होता है जिसमें कामुक विषयों का कूड़ा-करकट भरा रहता है। ऐसे विषय सामान्यतास्थूल शरीर तथा सूक्ष्म मन से सम्बद्ध होने से संसारी वार्ताएँ कहे जाते हैं। ये संसारी उपमाओं तथा रूपकों वाली अलंकारमयी भाषा में लिखे होते हैं। ऐसा होने पर इनमें भगवान् की महिमा का वर्णन नहीं रहता। ऐसा पद्य या गद्य, चाहे वह जिस विषय पर हो, शव को अलंकृत करने के तुल्य है। आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत मनुष्य, जो हंसों के समान हैं, ऐसे मृत साहित्य में रुचि नहीं रखते, क्योंकि वह आध्यात्मिक दृष्टि से मृत पुरुषों के लिए ही आनन्द का स्रोत होता है। ऐसा रजो तथा तमो गुणी साहित्य विभिन्न शीर्षकों से वितरित किया जाता है, किन्तु इससे मानव की आध्यात्मिक जिज्ञासा की पूर्ति नहीं हो पाती। अतएव हंस सदृश आध्यात्मिक पुरुषों को ऐसे साहित्य से कोई सरोकार नहीं होता। ऐसे उन्नत पुरुष मानस भी कहलाते हैं, क्योंकि वे आध्यात्मिक धरातल पर भगवान् की दिव्य स्वच्छ सेवा के आदर्श (मानदण्ड) को बनाये रखते हैं। यह चेतना स्थूल शारीरिक इन्द्रिय-तुष्टि के कार्यों या अहंकारी मन के सूक्ष्म चिन्तन के लिए सकाम कर्म करने से मना करती है।
सामाजिक साहित्यिक जन, विज्ञानी, संसारी कवि, मीमांसक तथा राजनीतिज्ञ जो इन्द्रिय-सुख की भौतिक प्रगति में पूर्णतया लीन रहते हैं, सभी माया के हाथ की कठपुतलियाँ हैं। उन्हें उन्हीं स्थानों में आनन्द मिलता है जहाँ निषिद्ध विषय फेंके जाते हैं। श्रीधर स्वामी के अनुसार यह वेश्यागामियों का आनन्द है।
लेकिन जो साहित्य भगवान् की महिमा का वर्णन करता है, उसका आनन्द वे परमहंस लूटते हैं जिन्होंने मानव कार्यों के सार को प्राप्त कर लिया है।
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नाहं वन्दे तव चरणयोर्द्वन्द्वमद्वन्द्वहेतोः कुम्भीपाकं गुरुमपि हरे नारकं नापनेतुम्।
रम्या रामा-मृदुतनुलता नन्दने नाभिरन्तुं भावे भावे हृदयभवने भावयेयं भवन्तम् ॥
(मुकुन्दमालास्तोत्र ४)
हे हरे ! मैं विषय सुखके लिए अथवा कुम्भीपाक तथा अन्य नरकोंसे छुटकारा पानेके लिए आपके पादपद्मोंकी वन्दना नहीं करता हूँ अथवा नन्दनवनमें सुन्दरी सुर-कामिनियोंके सुकोमल तनुलताके बीच विहार करनेके लिए भी आपके चरणोंकी वन्दना नहीं करता हूँ, किन्तु केवल भक्तिकी प्रत्येक सतहपर विलास करनेके लिए ही हृदयमन्दिरमें आपके पादपब्योंका ध्यान करता हैं।
गौड़ीय कण्ठहार
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श्रीकृष्ण विरह विच्छेद से व्याकुल गोपियोंका विधाताके ऊपर दोषारोप, यथा श्रीमद्भागवत (१०.३९.१९)-
अहो विधातस्तव न क्वचिद् दया संयोज्य मैत्र्या प्रणयेन देहिनः।
तांश्चाकृतार्थान् वियुनङ्क्षयपार्थकं विक्रीडितं तेऽर्भकचेष्टितं यथा ।।
धन्य हो विधाता ! तुम सब कुछ विधान तो करते हो, परन्तु तुम्हारे हृदयमें दयाका लेश भी नहीं है। पहले तो तुम सौहार्द और प्रेमसे जगतके प्राणियोंको एक दूसरेके साथ जोड़ देते हो, परन्तु अभी उनकी आशा अभिलाषाएँ पूरी भी नहीं हो पाती हैं, वे तृप्त भी नहीं हो पाते कि तुम उन्हें व्यर्थ ही अलग-अलग कर देते हो। सच है, तुम्हारा यह खिलवाड़ बच्चोंके खेलकी तरह व्यर्थ ही है।
विधातः हे! नाहि दया किछुई तोमार।
मैत्रभावे प्रणयेते, देही देही संयोगेते,
केन एत कैले अविचार।
अकृतार्थ अवस्थाय, वियोग करिले हाय,
बालकेर चेष्टा ए व्यापार ।।
भजनरहस्यवृत्ति – श्रीकृष्ण-गृहीत चित्ता ब्रजदेवियाँ, श्रीकृष्णकी आसन्न विरह आशंकासे व्याकुलित हो रही हैं। उन्होंने सुना है कि प्राणकान्त श्यामसुन्दरको मथुरा ले जानेके लिए अक्रूर रथ लेकर उपस्थित हुये हैं। इस भावी विरहकी आशंकासे व्यथित होकर वे स्वजातीय यूथमें अपनी-अपनी प्रेमभाव विशिष्ट विरह-आर्तिके द्वारा अपनी प्रेम-विवशता प्रकाशित कर रही हैं।
श्रीकृष्ण मधुपुरी जा रहे हैं- यह श्रवणकर भद्रादि तटस्था गोपियोंके मुखारविंदकी कान्ति शुष्क एवं मलीन हो गई। श्यामला आदि सुहृद् पक्ष गोपियोंके वसन वलय, केशादि स्खलित हो गये। विपक्षी चन्द्रावली ध्यान समाहित चित्तके द्वारा समाधिमें श्रीगोविन्दको देखने लगी। समस्त व्रजगोपियोंकी चूड़ामणि महाभाववती श्रीमती राधा तथा अन्य स्वपक्षा ललिता-विशाखा आदि श्रीकृष्ण प्रेयसियोंके हृदयमें प्राण-प्रियतमके विविध प्रेम-विलास, व्यवहार, आचरण, हास्यावलोकन आदिकी स्फूर्ति होने लगी, साथ-ही-साथ सुगम्भीर विरह-वेदनासे विह्वल होकर वे क्रन्दन करने लगीं। भिन्न-भिन्न यूथोंमें गोपियाँ अपनी-अपनी मर्म वेदनाको अपने प्रेमानुसार व्यक्त कर रही हैं। वे सुगम्भीर विरह-वेदनासे सम स्वरसे कह रही हैं- “यदि हमारे प्राण श्रीकृष्ण-विरह वेदनासे निकल जायें तो इसका दायित्व एकमात्र विधातापर ही होगा। हे विधाता ! आप अखिल ब्रह्माण्डका समुचित विधान करते हो, क्या आपके राज्यमें दयाका विधान नहीं है? यदि आपमें न्याय-अन्यायका विचार होता तो आप इस प्रकार कठोर न होते। आप केवल स्वेच्छाचारी होकर प्राणियोंके मिलन-विच्छेदका विधान करते हैं। आप ही जीवोंमें प्रणय मैत्री आदि स्थापित करते हैं। क्षणिक मिलन सुखका आस्वादन कराकर पुनः विरह समुद्रमें निमज्जित कर देते हो। तुम हृदयहीन निष्ठुर हो, इसकी साक्षी हम हैं। आपका आचरण उस मूर्ख अज्ञ बालककी भाँति है जो अपनी इच्छासे खिलौना तैयार करके फिर उसे नष्ट कर देता है। इसलिए हे विधाता ! आप केवल दयाहीन, विवेकहीन, विचारहीन ही नहीं दुष्कृतकारी भी हो। आपका यह वर्तमान आचरण तो अत्यन्त निन्दनीय है। पहले तो तुमने हमारे प्राणकान्त मुकुन्दकी अखिल सौन्दर्य-माधुर्य लावण्यके मूर्तिमान-विग्रहके रूपमें रचना की फिर उस भुवन मनोहर रूपका हमें दर्शन कराया। इस दर्शनसे हमारे हृदयमें असीम प्रीतिरसकी अनुभूति हुई। इस अपूर्व रूपको हमारे नयनोंमें स्थापितकर पुनः छीनकर हमारे प्राणकान्तको दूर ले जा रहे हो। इस प्रकारकी वंचना करना उचित नहीं। केवल दुरात्मा ही इस प्रकारका कार्य करते हैं। आप महाविज्ञ होकर भी ऐसा पापाचरण क्यों कर रहे हो? क्या आपको दत्तापहारी पाप नहीं लगेगा?”
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
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मनुष्यों के रोग विभिन्न प्रकार के होते हैं। अतः सब की चिकित्सा अलग अलग करनी चाहिए। रोग का निर्णय न होने पर चिकित्सा अच्छी प्रकार से नहीं हो सकती, जिससे रोग दूर नहीं होगा। अनुभवहीन चिकित्सक ऐसे भिन्न भिन्न प्रकार के रोगियों की चिकित्सा नहीं कर सकते अर्थात् उनकी चिकित्सा से थोड़ा-बहुत ही लाभ हो सकता है। मुझे चालीस वर्ष तक कोई व्यक्ति ही नहीं मिला। अब जो लोग मिल रहे हैं, वे कुछ कथा तो सुन रहे हैं। परन्तु अपने विद्या बुद्धि का भरोसा नहीं छोड़ना चाहते हैं । जगत में लोग लोकप्रियता चाहने वाले हैं, वास्तव सत्य-वस्तु को कोई नहीं चाहता । जो अपने को धर्म का प्रचारक मानते हैं, वे लोगों के कल्याणजनक कथाओं को न कहकर सबके मन के अनुसार कथाओं को कहकर अपना मान-सम्मान अर्जन करने में ही व्यस्त हैं। सत्यकथा कहने एवं सुनने से लोकप्रिय नहीं हुआ जा सकता, इसीलिए हम बहिर्मुख लोगों की सहानुभूति नहीं चाहते हैं ।
श्रीलप्रभुपाद
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साधक जीवन में विरह की उपयोगिता
श्रीमन् महाप्रभु ने ‘विरह’ या ‘विप्रलम्भ’ भाव को ही इतनी प्रमुखता क्यों दी? इसपर विशेष चर्चा की आवश्यकता है। मुक्त अवस्था में जिस ‘विप्रलम्भ’ की बात कही गयी है, वह अभी हमारी चर्चा का विषय नहीं है। साधक जीवन में यह ‘विरह’ ‘विप्रलम्भ’ ही हमें अनर्थ के हाथ से मुक्ति दिलाने का सबकी अपेक्षा सहज और सरलतम उपाय है। वैष्णवों का जो वैराग्य है, वह इस विरह से ही उत्पन्न होता है। जो वैराग्य हमारे भोग की मात्रा को बढ़ाने के लिए होता है, वह वैराग्य, ‘विप्रलम्भ’ या ‘विरह’ नहीं है।
‘उदर वेग’ सम्पन्न व्यक्तियों के चरित्र में देखा जाता है कि, वे अधि एक भोजन करने की सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए उपवास, संयम इत्यादि करते हैं। यह संयम या वैराग्य-विरह या विप्रलम्भ नहीं है। हृदय में भक्त-विरह और भगवद्-विरह जितनी अधिक मात्रा में पाया जायेगा, उतना ही बाह्य जगत के प्रति स्पृहा दूर होगी और यथार्थ वैराग्य उदित होगा। इसीलिए वैराग्य ही वास्तव में ‘विप्रलम्भ’ है। हमें भौतिक जगत में इस प्रकार के ढेर सारे उदाहरण देखने को मिलते हैं।
हाल ही में पुत्र गंवाने वाली माता जिस प्रकार संसार के प्रति उदासीन हो जाती है, उस प्रकार भाव की संभावना अन्य कहीं दिखायी नहीं देती है। मृत पुत्र को सीने से लगाकर माता जिस समय आर्तनाद (जोर-जोर से रुदन) करती है, उस समय यदि कोई लाख रुपये भी उसके सामने रख दे तो माता के लिए वह विष के समान अग्रहणीय ही होगा। तब उसे आहार-विहार, वेशभूषा सब कुछ कड़वा प्रतीत होगा। इसीलिए इस जगत में ‘संभोग-रस’ नहीं बल्कि ‘विप्रलम्भ’ रस ही परम मंगलदायक है-यही है ठाकुर श्रील भक्तिविनोद की शिक्षा का सार। संभोग से साधक का चित्त कलुषित होता है और विरह, साधक को पवित्र बनाकर, शुद्ध वैराग्य में स्थापित कर देता है। विरह से ही साधक की संसार-स्पृहा नष्ट होती है। विरह के क्लेशबोध से ही साधक-जीव की भोग वासना, कामना इत्यादि दूर हो जाती है अर्थात् उसका संसारमोचन हो जाता है। हम लोग इसीलिए प्रतिवर्ष ठाकुर श्रील भक्तिविनोद के विरह-उत्सव अनुष्ठान का आयोजन करते हैं।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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व्यवसायिक बुद्धि से वैष्णव-सेवा नहीं होती
गुरु महाराज जब ग्वालपाड़ा, आसाम में रहकर नित्यप्रति हरिकथा-कीर्तन आदि का परिवेशन करते थे, तब पहाड़ों पर रहने वाले कुछ भक्त लोग लगभग बीस किलोमीटर साइकिल चलाकर कथा-कीर्तन श्रवण करने के लिए आते थे। एक दिन कथा के समय मूसलाधार वर्षा होने लगी। कथा-कीर्त्तन के समाप्त होने पर भी वर्षा बन्द नहीं हुई।
गुरु महाराज ने मुझे तथा श्रीमाधवानन्द प्रभु को बुलाकर कहा, “जाओ, इन भक्तों के आज रात्रि यहीं पर रहने की तथा प्रसाद आदि की सुव्यवस्था कर दो, ये लोग इतनी अधिक श्रद्धा लेकर बहुत दूर से आते हैं, हमें भी अवसर के उपस्थित होने पर इनकी सेवा करनी चाहिए। इनका हरिकथा-कीर्तन के लिए यहाँ आना-जाना वास्तव में धाम परिक्रमा से अभिन्न है। जिस प्रकार प्रणयी-भक्तों के साथ धाम में जाने पर वहाँ उनके श्रीमुख से निःसृत हरिकथा-कीर्तन के श्रवण से ही धाम-परिक्रमा का फल होता है अन्यथा नहीं, ठीक उसी प्रकार जिस किसी स्थान पर भी शुद्ध भक्त वास करते हैं, वह स्थान वृन्दावन से अभिन्न कहलाता है। वहाँ पर आने-जाने वाले भक्तों की धाम परिक्रमा करने वाले यात्री की भाँति ही सेवा करनी चाहिए। ऐसी सेवा निष्कपट हृदय से होनी चाहिए, It should not be commercial (यह व्यवसायिक नहीं होनी चाहिए)। धाम परिक्रमा करने वाले यात्रियों की सेवा वास्तव में श्रीशिवानन्द सेन के आनुगत्य में सेवा करना है।
“श्रीशिवानन्द सेन बङ्गाल से श्रीचेतन्य महाप्रभु के दर्शन हेतु पुरी जाने वाले भक्तों की वार्षिक यात्रा के समय सेवा करते थे। श्रीशिवानन्द सेन यात्रियों की सुविधा हेतु जिस प्रकार उनके भजन-साधन के अनुकूल समस्त वस्तुओं को उन्हें देकर लाभवान् हुए थे, हम भी उन्हीं की भाँति वैष्णवों की सेवा करके अर्थात् उन्हें देकर लाभवान् होंगे, उनसे उसके विनिमय में कुछ लेकर नहीं। जब लाभ के लिए ही सभी जगत्वासी कुछ करते हैं, तब फिर हम अपने लाभ की चिन्ता क्यों नहीं करेंगे? यदि कोई श्रीशिवानन्द सेन की भाँति यात्रियों की निष्कपट रूप से सेवा करता है तो उसे उन्हीं की भाँति अवश्य ही श्रीनित्यानन्द प्रभु की कृपा की प्राप्ति होती है।”
गुरु महाराज के वचनों को श्रवण कर हमारा हृदय परम आनन्द से नृत्य करने की उन्मत्त दिव्य अभिलाषा से ओतप्रोत हो गया। हृदय में इस परम आनन्द के साथ हमने उत्साहपूर्वक यात्रियों के ठहरने तथा प्रसाद की सम्पूर्ण सुव्यवस्था कर दी।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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हरिभजन के बिना सांसारिक दुःख कष्ट से उबरना असंभव
तुम यदि ऐसा सोचती हो कि, “दीनता ही वैष्णव या भक्त का आभूषण या अलंकार है”, तो ही किसी दिन दंभ-जड़ाहंकार का परित्याग करना तुम्हारे लिए संभव होगा। श्रीनामकीर्तन का अधिकार प्राप्त करने के लिए चार गुण अवश्य ही होने चाहिए “दैन्य, दया, अन्ये मान, प्रतिष्ठा-वर्जन। चारिगुणे गुणे हई करह कीर्तन।।” (दीनता, दया, दूसरों को सम्मान देना, अपने मान्नन्प्रतिष्ठा की इच्छा न करना। यह चार गुण जिसमें हैं उसे ही कीर्तन करने का अधिकार है)। बद्धावस्था में, माया के संसार में हमें घात-प्रतिघात सहन करना ही होगा। इसी में “कृष्ण का भजन करने के लिए संसार में आया हूँ”- यह विचार ही हमें वास्तव लक्ष्य तक पहुँचायेगा। तुमने वैष्णवों से बहुत हरिकथा श्रवण की है, इसीलिए सुन्दर तत्त्व-सिद्धान्त की बात लिखी है। श्रवण नहीं होने पर तुम किस प्रकार कीर्तन करोगी? मैं जब हरिकथा जान जाऊँगा, तब तुम्हें कुछ लिख सकूँगा। अभी भी जानना, सीखना और समझना हुआ नहीं है। वह पूरा होने पर तुम्हारे साथ और बातचीत करने की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी। तब मौन होकर आँखे मूंदकर श्रीराधागोविन्द के ध्यान में विभोर रहूँगा।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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मन्त्रमूलं गुरुवाक्यं
एक बार एक महिला अपने गुरुदेव के दर्शन के लिए गई। उसके गुरुदेव ने उसे इस प्रकार उपदेश प्रदान किया, “भगवान् के नाम का ज़ोर से उच्चारण करने से अधिक लाभ होता है, इसलिये आप, महामंत्र, ‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे’, का ज़ोर से उच्चारण किया करें।”
गुरुजी से मंत्र का उपदेश प्राप्त कर महिला अपने घर आ गई। उसने सोचा, “महामंत्र का उच्चारण ज़ोर से करने से अड़ोस-पड़ोस के लोग कहेंगे कि इस महिला का दिमाग खराब हो गया है। अब क्या करूँ? किन्तु गुरुजी की आज्ञा है इसलिए कम से कम एक दिन तो पालन करनी ही चाहिए।”
ऐसा सोचकर वह महिला अपने तीन मंज़िला मकान की छत पर चढ़ गई। मुख्य समस्या अब शुरू हुई। महामंत्र में ‘राम’ नाम आता है और महिला के पति का नाम भी ‘राम’ था। महामंत्र का ज़ोर से उच्चारण करने से पहले महिला ने सोचा, “पत्नी को तो अपने पति का नाम नहीं लेना चाहिए। मैं महामंत्र का उच्चारण कैसे करूँ? अभी तो गुरुजी भी यहाँ नहीं हैं, नहीं तो उनसे पूछ लेती, वे कुछ उपाय बताते।”
बहुत सोचने के बाद उसे एक युक्ति सूझी और वह ज़ोर-ज़ोर से महामंत्र का उच्चारण इस प्रकार करने लगी, “हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे भेंडा का बाप हरे भेंडा का बाप, भेंडा का बाप भेंडा का बाप हरे हरे”। ‘भेंडा’ उसके बेटे का नाम था।
‘भेंडा का बाप’, ‘भेंडा का बाप’, बोलने से क्या ‘राम’ नाम का फल मिल जाएगा? उत्तर है कभी नहीं; गुरुदेव ने महामंत्र का उच्चारण जैसे बताया है उसी प्रकार उच्चारण करने से ही फल मिलेगा। यहाँ पर भेंडा नाशवान है और उसका बाप भी। उसका नाम ज़ोर-ज़ोर से उच्चारण करने से क्या मंगल होगा? भगवान् का नाम, जोकि चिन्मय है, उसे किसी जागतिक (जड़) वस्तु के समान मानना एक भीषण अपराध होगा। इस अपराध के कारण व्यक्ति कभी भी वास्तविक हरिनाम का उच्चारण नहीं कर सकता। गुरु के आदेशों को यथार्थ रूप से पालन करने से ही हमारा वास्तविक मंगल होगा।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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