
श्री नारद उवाच
भवतानुदितप्रायं यशो भगवतोऽमलम् ।
येनैवासौ न तुष्येत मन्ये तद्दर्शनं खिलम् ।।
श्री-नारदः उवाच श्रीनारद ने कहा; भवता तुम्हारे द्वारा; अनुदित-प्रायम् = प्रायः अप्रशंसित; यशः = महिमा; भागवतः भगवान् की; अमलम् निष्कलंक, निर्मल; येन जिससे; एव निश्चय ही; असौ वह (भगवान्); न नहीं; तुष्येत प्रसन्न होता; मन्ये मैं सोचता हूँ; तत् उस; दर्शनम् दर्शन को; खिलम् निम्न ।
अनुवाद – श्रीनारद ने कहाः वास्तव में तुमने भगवान् की अलौकिक तथा निर्मल महिमा का प्रसार नहीं किया। जो दर्शन (शास्त्र) परमेश्वर की दिव्य इन्द्रियों को तुष्ट नहीं कर पाता, वह व्यर्थ समझा जाता है।
तात्पर्य – परमात्मा के साथ जीव का नित्य सम्बन्ध उस शाश्वत स्वामी के नित्य दास का है। भगवान् ने जीवों के रूप में अपना विस्तार इसीलिए किया है कि उन्हें उनसे प्रेमपूर्ण सेवा प्राप्त हो सके और इसी से भगवान् तथा जीव को सन्तोष प्राप्त हो सकता है। वेदव्यास जैसे विद्वान ने वैदिक साहित्य में अनेक विस्तार किये जिनका अन्त वेदान्त दर्शन में होता है, किन्तु इनमें से किसी में भी भगवान् की महिमा का प्रत्यक्ष गान नहीं हुआ था। शुष्क दार्शनिक चिन्तन ब्रह्म जैसे दिव्य विषय से सम्बन्धित होकर भी भगवान् की महिमा के प्रत्यक्ष गान के बिना तनिक भी आकर्षक नहीं होता। दिव्य अनुभूति के लिए भगवान् अन्तिम शब्द है। निराकार ब्रह्म या अन्तर्यामी परमात्मा के रूप में ब्रह्म की अनुभूति उतना दिव्य आनन्द प्रदान करने वाली नहीं होती जितनी कि उनकी महिमा की साक्षात् अनुभूति है।
वेदान्त दर्शन के संकलनकर्ता स्वयं व्यासदेव हैं। किन्तु इसके लेखक होते हुए भी वे विचलित हैं। अतएव उस वेदान्त के पाठक तथा श्रोता उससे कौन-सा दिव्य आनन्द प्राप्त कर सकेंगे जिसकी प्रत्यक्ष व्याख्या व्यासदेव ने की ही नहीं ? यहीं पर आवश्यकता प्रतीत हुई कि लेखक वेदान्त-सूत्र की व्याख्या श्रीमद्भागवत के रूप में करे।
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क्रम प्राप्त श्रवण-
तच्च नामरूपगुणलीलामयशब्दानां श्रोत्रस्पर्शः।
प्रथमं नाम्नः श्रवणमन्तःकरणशुद्धयर्थमपेक्ष्यम्।
शुद्धे चान्तःकरणे रूपश्रवणेन तदुदययोग्यता भवति।
सम्यगुदिते च रूपे गुणानां स्फुरणं सम्पद्येत,
सम्पन्ने च गुणानां स्फुरणे परिकरवैशिष्ट्यैन तद्वैशिष्ट्यं सम्पद्यते।
ततस्तेषु नामरूपगुणपरिकरेषु सम्यक् स्फुरितेषु लीलानां स्फुरणं सुष्ठु भवति।
तत्रापि श्रवणे श्रीभागवत श्रवणस्तु परमश्रेष्ठम् ॥
(श्रीमद्भा. ७/५/१८ श्लोक की क्रमसन्दर्भटीका)
(श्रीभगवान् और भक्तके) नाम-रूप-गुण-लीलामय शब्दसमूहके कानोंद्वारा सुनने पर उसको सुनना या श्रवण कहते हैं। साधनके प्रारम्भमें अन्तःकरणकी शुद्धिके लिए भगवन्नाम-श्रवणकी अपेक्षा रहती है। अन्तःकरणके शुद्ध अर्थात् विषयमल-मुक्त होनेपर भगवान्की रूप सम्बन्धी कथा श्रवण एवं इस कथाके फलसे हृदयमें रूपके उदय होनेकी योग्यता प्राप्त होती है। रूपकी कथा सुननेसे रूपका पूर्णतः उदय होनेपर गुणोंकी स्फूर्ति होती रहती है। गुणोंकी पूर्ण स्फूर्ति होनेपर परिकरोंका सेवा वैचित्र्य एवं उनके साथ उनका लीला वैशिष्ट्य भी स्फुरित होता है। इस प्रकार उसके नाम रूपादिके स्फुरणमें उनकी लीला सर्वाङ्ग सम्पन्न होकर सुन्दर भावसे स्फुरित होती है ।
श्रीगौड़ीय कंठहार
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श्रीकृष्णकी कृपा अचिन्त्य और अहैतुकी है, यथा तत्रैव (१०.१६.३६)-
कस्यानुभावोऽस्य न देव विद्महे तवाङ्घ्रिरेणुस्पर्शाधिकारः ।
यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाऽऽ चरत्तपो विहाय कामान् सुचिरं धृतव्रता ।।
– नागपत्नियाँ श्रीकृष्णकी स्तुति करती हुई कहती हैं- भगवन् ! हम नहीं समझ पार्ती कि यह इसकी किस साधनाका फल है, जो यह आपके चरणकमलोंकी रजका स्पर्श पानेका अधिकारी हुआ है। आपके चरणोंकी रज इतनी दुर्लभ है कि उसके लिए आपकी अर्धागिंनी लक्ष्मीजीको भी बहुत दिनोंतक समस्त भोगोंका त्याग करके नियमोंका पालन करते हुए तपस्या करनी पड़ी थी।
की पुण्ये कालिय पाय पदरेणु तव।
बुझिते ना पारि कृष्ण कृपार सम्भव ।।
जाहा लागि लक्ष्मीदेवी तप आचरिल।
बहुकाल धृतव्रता कामादि छाड़िल ।।
भजनरहस्यवृत्ति-कालिय नागकी पत्नियाँ अत्यन्त विस्मित होकर कहने लगीं – “हे गोकुलेश्वर ! इस नीच कालियने किस सुकृतिके फलस्वरूप आपकी दुर्लभ चरणरेणुको प्राप्त किया, यह हमारी समझसे अतीत है। श्रीनारायण वक्षविलासिनी, परम सुकोमला, अत्यन्त सुन्दरी श्रीलक्ष्मी देवीने पति संग परित्यागकर, कठोर व्रत पालन करके आपकी चरणरज प्राप्तिके लिए घोर तपस्या की, किन्तु प्राप्त नहीं कर सकीं। प्रभो! जिस प्रकार कालियने आपके चरणद्वयका साक्षात् स्पर्श पाया वैसा सौभाग्य श्रीलक्ष्मीजीके लिए भी सम्भवपर नहीं है।”
आलोच्य श्लोकमें कालियका सौभाग्य वर्णन है। श्रीलक्ष्मीजी लक्ष्मी देहसे ही नन्दनन्दन श्रीकृष्णका संग चाहती थीं, किन्तु नन्दनन्दन कृष्ण किसी देवी, स्त्री या रमणीको स्वीकार नहीं करते। उनकी प्राप्तिका एकमात्र उपाय है व्रजदेवियोंका आनुगत्य करके गोपीदेह और गोपीभाव पाना। श्रीलक्ष्मीके लिए ऐसा सम्भव नहीं था, इसीलिए उनको श्रीकृष्ण संगम प्राप्त नहीं हुआ। श्रीजीव गोस्वामीपाद कहते हैं कि श्रीलक्ष्मीमें गोपियोंकी भाँति अनन्यताका अभाव था- ‘अप्राप्तिकारणञ्च गोपीवत् तदनन्यताभाव ऐवति च।’
कालिय द्वारा श्रीकृष्ण चरणोंकी प्राप्तिके दो कारण हो सकते हैं-एक तो परमभक्तिमती पत्नियोंका संग तथा दूसरा वृन्दावनके अंतर्वर्ती स्थान श्रीयमुनामें वास। कालियको पूर्वजन्मके संस्कारवश यह दोनों लाभ-प्राप्त हुए, किन्तु अपनी अपराधी प्रवृत्तिके कारण वह इनकी अवहेलना करता था। अपराधीजनोंके निकट धाम आदि चिन्मय वस्तु समूह अतिशीघ्र क्रिया प्रकाश नहीं करते। श्रीकृष्ण जब कालियके फणोंको नृत्यशील पदोंके प्रहार द्वारा विदीर्ण कर रहे थे, उस समय वह अपने मुखोंसे रक्त उगलने लगा। उसे अपनी पत्नियोंकी बातोंपर विश्वास हुआ कि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान हैं। तब वह शरणागत हुआ। फिर तो कृष्ण कृपा करनेके लिए प्रतीक्षा कर ही रहे थे।
श्रीविश्वनाथ चक्रवर्तीपाद अपनी टीकामें वर्णन करते हैं कि अपनी भक्तिमति पत्नियोंके संगके कारण भक्तिबीज कालियके हृदयमें था, किन्तु अपराध एवं क्रूरताके कारण वह उसके ऊसर भूमि रूपकठोर हृदयमें अंकुरित नहीं हो रहा था। श्रीकृष्णके चरण स्पर्शके द्वारा अपराधयुक्त ऊसर भूमि भक्ति लता बीजके लिए उपजाऊ हो गई तथा बीज अंकुरित हो गया।
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
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दूसरों के द्वारा भगवान का अर्चन एवं भगवान की रसोई बनवाना शोभनीय नहीं है। परन्तु किसी प्रकार विपत्ति के समय आतुर अवस्था में किसी दिन इसे स्वीकार किया जा सकता है। यदि हम आलस्य के कारण कृष्ण को न खिलाएँ और अपने खाने एवं रहने को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लें, तो यह निश्चित है कि भगवान की सेवा के प्रति हमारी श्रद्धा कम हो जायेगी । मठ के सेवकों को विचारों के विपरीत आचरण करना उचित नहीं है । “द्रव्यम् मूल्येन शुद्धयति ” – मूल्य के द्वारा द्रव्य शुद्ध हो जाते हैं। यह विचार असमर्थ लोगों के लिए है। यदि समर्थ व्यक्ति इस विचार को ग्रहण करता है, तो यह उसके आलस्य का परिचय होगा। हमारी समस्त प्रकार की चेष्टाएँ कृष्ण के लिए ही होनी चाहिए । अन्यथा हमारा व्यवहारिक जीवन Godless विचार पूर्ण हो जाएगा । Godloving होने पर ही ऐसी इच्छा होगी कि कृष्ण के लिए रसोई बनाकर उन्हें भोग लगाकर उनका प्रसाद भक्तों को दिया जाय, अन्यथा नहीं। करने पर दिन भक्त सेवा से विमुख होना नहीं चाहिए ।
श्रीलप्रभुपाद
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महाप्रभु की शिक्षा-उच्च-निम्न सभी श्रेणियों के लिए
महाप्रभु ने इस बंगाल भूमि में आविर्भूत होकर धर्म जगत के सबसे. श्रेष्ठ विषय को इस जगत में प्रकाशित किया-क्योंकि इस प्रान्त के लोग सबसे ज़्यादा बुद्धिमान श्रेणी के हैं। मद्रास आदि अन्यान्य सभी स्थान बंगाल की ओर मुख करके बैठे हैं। हमने पिछले साल दक्षिणं भारत की परिक्रमा के दौरान यह सब अनुभव किया था। लेकिन दुख की बात है कि, इस प्रान्त के आम नागरिक महाप्रभु के इस सर्वश्रेष्ठ दान के प्रति उदासीन (विमुख) हैं। इसके अलावा कुछ लोगों की यह सोच भी है कि महाप्रभु की शिक्षा निम्न श्रेणी तक ही सीमित है, इसलिए वह निम्न श्रेणियों के लोगों के लिए है। यह बहुत ही गलत सोच है। महाप्रभु की शिक्षा के सर्वोत्तम विचारों को उच्च-शिक्षित सभ्य लोगों में सम्मानपूर्वक ग्रहण किया जा रहा है और देखा जाता है। लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है; सही प्रचार न होने के कारण ही आज ऐसी दुरावस्था है।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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वैष्णव-सेवा के सुयोग को कभी नहीं छोड़ना
गुरु महाराज ने वृन्दावनस्थ श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ में विग्रह प्रतिष्ठा के उपलक्ष्य में तीन दिन के उत्सव का आयोजन किया। उत्सव में तीन दिन पर्यन्त उत्तम प्रसाद की व्यवस्था की गई, प्रथम दिवस आमन्त्रित समस्त वैष्णवों के लिए, द्वितीय दिवस वैष्णवों के साथ व्रज के समस्त पण्डागण एवं उनके परिजनों के लिए तथा तृतीय दिवस युगल रूप से समस्त वैष्णवों, पण्डागण एवं साधारण समस्त लोगों के लिए।
गुरु महाराज ने इस उत्सव पर लगभग बीस हजार रुपये से भी अधिक व्यय किया। उन दिनों एक रुपये में ढाई किलो आटा मिलता था। उस समय, हमारे मठ में रसोईघर तक भी नहीं बना था। टीन की छत वाले एक अस्थाई कक्ष में रसोई बनती थी। मठ की इस अवस्था को लक्ष्य कर किसी ने गुरु महाराज से कहा, “आपने जितना पैसा इस उत्सव में व्यय किया है, उसमें तो हमारे आठ कमरे बन जाते।”
गुरु महाराज ने उत्तर दिया, “कमरे बनाने के लिए योगदान देने वाले बाद में इतने लोग मिल जाएँगे कि आपके पास स्थान का अभाव पड़ जाएगा। किन्तु आज जिन श्रेष्ठ वैष्णवों की एक साथ एक ही स्थान पर सेवा का सुयोग प्राप्त हुआ है, बाद में वैसा सुयोग पुनः नहीं मिलेगा।” गुरु महाराज ने इसी चित्तवृत्ति के साथ जसड़ा, गुवाहाटी, कोलकाता, पुरी आदि अनेक स्थानों पर समस्त वैष्णवों को आमन्त्रित कर विशाल उत्सवों का आयोजन किया।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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श्रद्धा-भक्ति के द्वारा जीव का अपराध नाश
श्रद्धा-भक्ति वास्तव सत्य है, यह बिल्कुल भी अनित्य और ध्वंस होने वाली वस्तु नहीं है। अपराध के कारण जीव का हृदय वज्ज के समान कठोर हो जाता है। अपराध दूर हो जाने पर मलिन चित्त पुनः बलवान् और पवित्र होकर श्रीभगवान् के निवास स्थान के रूप में परिणत हो जाता है। यह सत्य है कि साधन्न भजनहीन भक्ति-रहित जीवन की कोई आवश्यकता नहीं है, किन्तु मनुष्य शरीर सुदुर्लभ है और साधन-भजन का मूल है, इसलिए इसका सद्-उपयोग करना आवश्यक है। जो लोग साधन-भजन की आवश्यकता को अनुभव नहीं करते हैं, वे ही शोचनीय (शोक करने योग्य), निर्बोध (अज्ञानी), मनुष्यों में अधम, दुराचारी और पाखण्डियों में गिने जाते हैं। उनका वर्तमान और भविष्य दोनों ही विनष्ट है। गुरु-वैष्णवगण अन्तर्यामी और अदोषदर्शी हैं, इसीलिए सबको एक आशा-भरोसा है- इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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हमें एक शुद्ध भक्त की शरण ग्रहण करनी है। वैसा करने से दिव्य जगत के भाव हमारे अन्तर्हृदय में प्रस्फुटित हो जाएँगे। भक्तों की कृपा के अतिरिक्त यह संभवपर नहीं है। इसे अभक्तों से प्राप्त नहीं किया जा सकता।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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यदि पहले नहीं तो अन्त समय में भी असंभव
हमारे गुरुदेव, चट्टग्राम, बांग्लादेश की एक घटना बतलाते थे। वहाँ का एक धनी व्यक्ति गुरुजी में श्रद्धा रखता था। उस व्यक्ति की मृत्यु के बाद जब गुरुजी का एक बार चटटग्राम जाना हुआ तब उसके बेटों ने उन्हें अपने घर पर आमंत्रित किया। उन्होंने कहा, “हमारी माताजी बहुत अस्वस्थ हैं। डॉक्टर ने उन्हें ३-४ दिन का ही समय दिया है। कृपया आप हमारे घर पर पधारिये और उन्हें दर्शन प्रदान कीजिये।”
गुरुजी ने उनकी विनती स्वीकार कर ली और उनके घर गए। गुरुजी ने भी देखा कि माताजी बहुत अस्वस्थ थीं। घर के सभी लोग बहुत चिंतित थे। इस समय माताजी के सगे-सम्बन्धी उन्हें भगवान् के नाम का उच्चारण करने के लिए कह रहे थे।
उनका पुत्र उनके कान में ज़ोर से बोल रहा था, “माताजी, एक बार ‘राधे-गोविन्द’ बोलिये।”
माताजी उत्तर में बोलीं, “मैं इतनी बात नहीं बोल सकती हूँ।”
पुनः पुत्र ने बोला, “माताजी, एक बार तो ‘राधे-गोविन्द’ बोलिये।”
उत्तर में माताजी फिर वही बोलीं, “इतनी बात मैं नहीं बोल सकती हूँ। तुम यदुबाबू को बुलाओ।”
यदुबाबू, एक ऐसा व्यक्ति था जिसने छल-कपट और बेईमानी से बहुत धन कमाया था। माताजी अंतिम समय में एक ऐसे व्यक्ति को याद कर रहीं थीं जिसका नाम सुनने मात्र से पवित्र होने के लिए सवस्त्र स्नान करना पड़ेगा। पुत्र-पौत्र बार-बार कह रहे थे, “माताजी, हरे कृष्ण कहिये, राधे-गोविन्द कहिये”, किन्तु माताजी ने एक बार भी भगवान् के नाम का उच्चारण नहीं किया। बाकी सभी बातें बोल रहीं थीं किन्तु ‘हरे कृष्ण’ नहीं बोल रहीं थीं। बार-बार बोलती थीं, “यदुबाबू को बुलाओ, यदुबाबू को बुलाओ।”
यदुबाबू को बुलाया गया। माताजी उनका हाथ पकड़कर कहने लगीं, “मेरे तीनों लड़के मेरी संपत्ति की देखभाल करने में समर्थ नहीं हैं, आप मुझे वचन दीजिये कि आप मेरी ज़मीन और संपत्ति की देखभाल करेंगे।”
यदुबाबू ने कहा, “आपके बेटे आपकी ज़मीन और संपत्ति की देखभाल करने में सक्षम हैं। आप इस समय इन बातों की चिंता ना करें। आप भगवान् के नाम का उच्चारण करें।”
माताजी ने उनसे भी वही कहा, “मैं इतनी बात नहीं बोल सकती हूँ।”
माताजी, “मैं इतनी बात नहीं बोल सकती हूँ”- बोल रही थीं किन्तु ‘हरे कृष्ण’ नहीं बोल सकती थीं। उनके अंतिम श्वास तक वे भगवान् के नाम का उच्चारण नहीं कर पायीं। संसार की बातों को बोलते-बोलते ही उन्होंने अपना शरीर छोड़ दिया।
मृत्यु के समय वही व्यक्ति भगवान् का स्मरण कर सकता है जिसने पूरा जीवन भगवान् का भजन किया है, उनका नाम लिया है।
यदि कौमार काल से भजन नहीं किया जाए तो जीवन के अन्त समय में भगवान् का स्मरण करना संभव नहीं है। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर अपनी एक गीति में लिखते हैं-
जीवन समाप्ति काले करिब भजन,
ऐबे करि गृह सुख,
कखन ए कथा नहीं बोले विज्ञ-जन,
ए देह पतनोन्मुख।
बुद्धिमान और अनुभवी व्यक्ति कभी यह नहीं कहेंगे कि, “पहले मैं संसार-सुख भोग लेता हूँ और जीवन के अन्त समय में भगवान् का भजन करूँगा”, क्योंकि वे यह जानते हैं कि यह शरीर कभी भी छूट सकता है।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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