पांडवों का सामयिक प्रस्थान

अर्जुन उवाच

यो नो जुगोप वन एत्य दुरन्तकृच्छ्राद् दुर्वाससोऽरिरचितादयुताग्रभुम् यः ।
शाकान्नशिष्टमुपयुज्य यतस्त्रिलोकीं तृप्ताममंस्त सलिले विनिमग्नसंग : ।।

यः = जिसने; नः = हमको; जुगोप सुरक्षा प्रदान की; वने वन में; एत्य प्रवेश करके; दुरन्त भयानक; कृच्छ्रात् संकट से; दुर्वाससः दुर्वासा मुनि के; अरि-शत्रु द्वारा; रचितात् बनाया गया; अयुत दस हजार; अग्र-भुक् पहले खानेवाला; यः वह व्यक्ति; शाक-अन्न-शिष्टम् बचा हुआ भोजन, जूठन; उपयुज्य स्वीकार करके; यतः = क्योंकि; त्रि-लोकीम् तीनों संसारों को; तृप्ताम् = संतुष्ट; अमंस्त = मन में सोचा; सलिले जल के भीतर; विनिमग्न्न सङ्घः सभी जल के भीतर घुसे।

अनुवाद – हमारे वनवास के समय, दस हजार शिष्यों के साथ भोजन करनेवाले दुर्वासा मुनि ने हमें भयावह संकट में डालने के लिए, हमारे शत्रुओं के साथ मिलकर चाल चली। उस समय उन्होंने (कृष्ण ने) केवल जूठन ग्रहण करके हमें बचाया था। इस तरह उनके भोजन ग्रहण करने से नदी में स्नान करती मुनि-मण्डली ने अनुभव किया कि वह भोजन से पूर्णतया सन्तुष्ट हो गई और तीनों लोक भी सन्तुष्ट हो गये।

तात्पर्य – दुर्वासा मुनिः ये शक्तिशाली योगी ब्राह्मण थे, जिन्होंने कठिन तपस्या तथा व्रत के द्वारा धर्म के नियमों का पालन करने का संकल्प किया था। उनका नाम अनेक ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें शिवजी की भाँति सरलता से प्रसन्न किया जा सकता था तथा सरलता से रुष्ट किया जा सकता था। प्रसन्न होने पर, वे सेवक का अपार शुभ करते थे और अप्रसन्न होने पर महान् संकट उत्पन्न कर देते थे। कुमारी कुन्ती अपने पिता के घर में सभी ब्राह्मणों की सेवा किया करती थीं और उनके सत्कार से प्रसन्न होकर, दुर्वासा मुनि ने उन्हें ऐसी शक्ति का वर दिया कि जिससे वे इच्छित देवता का आवाहन कर सकती थीं। ऐसा माना जाता है कि वे शिवजी के अंशावतार थे, अतएव वे शीघ्र ही प्रसन्न या रुष्ट किए जा सकते थे। वे शिव के परम भक्त थे और उन्हीं के आदेश से उन्होंने श्वेतकेतु का पुरोहित बनना स्वीकार किया था, क्योंकि श्वेतकेतु एक सौ वर्षों तक यज्ञ कर चुके थे। वे कभी-कभी इन्द्रदेव की स्वर्ग-सभा में भी जाया करते थे और ऐसा समझा जाता है कि वे अपनी योगशक्ति से आकाश में विचरण कर सकते थे और वे वैकुण्ठ-लोक तक विचरण कर चुके थे। उन्होंने इतनी लम्बी दूरी एक वर्ष में तब तै की थी, जब उन्होंने, चक्रवर्ती सम्राट् एवं परमभक्त राजा अम्बरीष, से झगड़ा किया था।

उनके दस हजार शिष्य थे और वे जहाँ कहीं जाते तथा जिन क्षत्रिय राजाओं के अतिथि बनते, वहीं अपने बहुत से शिष्यों को साथ लेते जाते। एकबार वे महाराज युधिष्ठिर के शत्रु-भ्राता दुर्योधन के घर गये। दुर्योधन अत्यन्त बुद्धिमान था, अतएव उसने सभी प्रकार से इस ब्राह्मण को तुष्ट किया। इस पर इस महर्षि ने दुर्योधन को वरदान देना चाहा। दुर्योधन इनकी योगशक्ति से परिचित था और उसे यह भी पता था कि अप्रसन्न होने पर, किस प्रकार ये बवंडर खड़ा कर सकते हैं। अतएव उसने ऐसी चाल सोची कि यह ब्राह्मण अपना क्रोध उनके शत्रु पाण्डवों पर उतारे।

अतएव जब ऋषि ने दुर्योधन को वर देना चाहा तो उसने कहा कि अच्छा हो यदि श्रीमान् हमारे अग्रज तथा प्रमुख महाराज युधिष्ठिर के घर जायें, लेकिन आप तब पहुँचें, जब युधिष्ठिर अपनी महारानी द्रौपदी के साथ भोजन कर चुके हों। दुर्योधन जानता था कि द्रौपदी के साथ भोजन करने के बाद महाराज युधिष्ठिर इतने सारे ब्राह्मण अतिथियों को भोजन नहीं दे पायेंगे और तब यह ऋषि कुद्ध होकर महाराज युधिष्ठिर के लिए संकट उत्पन्न कर देगा। यह थी दुर्योधन की योजना। दुर्वासा मुनि ने उसके प्रस्ताव को मान लिया और दुर्योधन की योजना के अनुसार ही, वनवासी राजा के यहाँ उस समय पहुँचे जब राजा तथा द्रौपदी भोजन कर चुके थे।

महाराज युधिष्ठिर के द्वार पर पहुँचते ही दुर्वासा ऋषि का स्वागत किया गया और राजा ने उनसे प्रार्थना की कि वे दोपहर का धार्मिक कृत्य नदी के किनारे सम्पन्न करें, तब तक भोजन तैयार हो जाएगा। दुर्वासा अपने अनेक शिष्यों सहित नदी में स्नान करने गये और महाराज युधिष्ठिर इन अतिथियों के कारण चिन्ता करने लगे। जब तक द्रौपदी नहीं खाती थी, तब तक चाहे कितने ही अतिथि क्यों न आ जायें, उन्हें भोजन दिया जा सकता था, किन्तु ऋषि तो दुर्योधन की योजना के अनुसार, उस समय पहुँचे थे, जब द्रौपदी भोजन कर चुकी थीं।

जब भक्तगण कठिनाई में होते हैं, तो वे ध्यानमग्न होकर भगवान् का स्मरण करते हैं। अतएव द्रौपदी, उस विषम स्थिति में, भगवान् कृष्ण का स्मरण कर रही थीं और सर्वव्यापी भगवान् तुरन्त अपने भक्तों की कठिन स्थिति को समझनेवाले हैं। अतः वे वहाँ पर उपस्थित हुए और द्रौपदी से कहा कि जितना भी भोजन बचा हो, उसे वे ले आयें। भगवान् की बात सुनकर द्रौपदी अत्यन्त खिन्न हुई, क्योंकि भोजन तो था नहीं और भगवान् भोजन माँग रहे थे। उन्होंने भगवान् से कहा कि यदि वे खा न चुकी होतीं, तो सूर्य द्वारा प्रदत्त रहस्यमयी थाली से वे कितना ही भोजन दे सकती थीं, किन्तु उस दिन वे भोजन कर चुकी थीं, अतएव अब संकट उपस्थित था। वे अपनी कठिनाइयाँ बताकर कृष्ण के समक्ष रोने लगीं, जैसा कि ऐसे अवसरों पर स्त्रियाँ करती हैं। किन्तु भगवान् ने द्रौपदी से रसोई के पात्र लाने को कहा जिससे वे देख सकें कि उनमें कहीं भोजन का कोई कण लगा तो नहीं रह गया। द्रौपदी के ऐसा करने पर, भगवान् ने देखा कि पात्र में शाक का एक कण लगा हुआ है। भगवान् ने उसे निकाल कर तत्क्षण खा लिया। उसके बाद भगवान् ने द्रौपदी से कहा कि दुर्वासा समेत सारे अतिथियों को बुलायें।

भीम को नदी-तट से उन सबों को बुला लाने के लिए भेजा गया। भीम ने कहा, ‘महोदय ! आप क्यों विलम्ब कर रहे हैं? आइये, भोजन तैयार है।” किन्तु भगवान् कृष्ण ने भोजन का एक कण ग्रहण कर लिया था, अतएव नदी में स्नान करते समय अतिथियों का भी पेट भर चुका था। उन्होंने सोचा कि महाराज युधिष्ठिर ने उन सबों के लिए नाना प्रकार के व्यंजन तैयार कराये होंगे और चूँकि उन्हें भूख नहीं लग रही थी और वे खा नहीं सकेंगे, तो महाराज युधिष्ठिर को दुख होगा, अतएव श्रेयस्कर यही होगा कि वे वहाँ जायें ही नहीं। इसलिए उन सबों ने चले जाने का निश्चय किया।

यह घटना सिद्ध करती है कि भगवान् सर्वोच्च योगी हैं, अतएव वे योगेश्वर कहलाते हैं। दूसरी शिक्षा यह मिलती है कि प्रत्येक गृहस्थ को चाहिए कि भगवान् को भोजन भेंट करे। इसका फल यह होगा कि हर व्यक्ति सन्तुष्ट हो जायेगा, भले ही दस हजार अतिथि क्यों न हों, क्योंकि भगवान् सन्तुष्ट हैं। यही भक्ति की विधि है।

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श्रीविष्णोः श्रवणे परीक्षिदभवद्वैयासकिः कीर्त्तने प्रह्लादः स्मरणे तदङ्घ्रिभजने लक्ष्मीः पृथुः पूजने।
अक्रूरस्त्वभिवन्दने कपिपतिर्दास्येऽथ सख्येऽर्जुनः सर्वस्वात्मनिवेदने बलिरभूत् कृष्णाप्तिरेषां परम् ॥

(भ. र. सि. पू. वि. २/१२९)

राजा परीक्षित श्रीविष्णुकी कथा श्रवणसे, शुकदेव उनके कीर्त्तनसे, प्रह्लाद उनके स्मरणसे, लक्ष्मी पादसेवनसे, पृथु महाराज उनके पूजनसे, अक्रूर वन्दनासे, कपिपति हनुमान दास्यसे, अर्जुन उनके साथ सखा भावसे एवं बलिने उनके चरणोंमें सर्वस्व दान और आत्मनिवेदन द्वारा भगवान्‌को प्राप्त किया है।

श्रीगौड़ीय कंठहार

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श्रौत पंथा ही भक्ति पथ है; यथा ब्रह्मयामले-

श्रुतिस्मृतिपुराणादि पञ्चरात्रविधिं विना।
ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव कल्पते ।।

शुद्ध भक्तिका ऐकान्तिक भाव अर्थात् अनन्य भाव पूर्व-पूर्व महाजन पथका अवलम्बन करनेसे ही प्राप्त होता है। पूर्व महाजन पथको छोड़कर अन्य पथकी सृष्टि करनेसे ऐकान्तिक भाव प्राप्त नहीं होता। इसीलिए दत्तात्रेय, बुद्ध आदि अर्वाचीन प्रचारकगण शुद्धभक्तिको समझ न सकनेके कारण उसके कुछ-कुछ भावाभासको ग्रहणकर किसीने मायावाद मिश्र, किसीने नास्तिकता मिश्र एक-एक क्षुद्र पंथका प्रदर्शन कर उसीमें ऐकान्तिकी हरिभक्तिका आरोप किया है, परन्तु वास्तवमें उन लोगों द्वारा प्रवर्तित पंथ हरिभक्ति नहीं है- उत्पात मात्र है।

भजनरहस्यवृत्ति- रागमार्गीय भजनमें श्रुति, स्मृति, पुराण पञ्चरात्रादि विधियोंकी अपेक्षा नहीं रहती। वहाँ केवल ब्रजानुगमनकी अपेक्षा होती है। परन्तु विधि मार्गके अधिकारी साधकोंको ध्रुव, प्रह्लाद, नारद, व्यास और शुक आदि महाजनों द्वारा निर्दिष्ट एकमात्र भक्ति पथका अवलम्बन करना आवश्यक है। अतएव वैध भक्तोंके लिये साधुमार्ग अनुसरणके अतिरिक्त और कोई दूसरा उपाय नहीं है। जो लोग कुछ-कुछ भजन तो करते हैं, किन्तु अनर्थ-नाशके लिए तनिक भी प्रयत्न नहीं करते, वे नाम प्रभुकी कृपाके बिना लाखों प्रयत्न करनेपर भी अनर्थ उसे कदापि नहीं छोड़ते हैं। किन्तु नाम प्रभुके श्रीचरणोंमें निष्कपट होकर क्रन्दन करनेसे थोड़े ही दिनोंमें उसके सारे अनर्थ दूर हो जाते हैं। इस प्रकार अनथोंको छोड़कर श्रवण-कीर्तन करते हुए ऐकान्तिक रूपसे श्रीनामका आश्रय ग्रहण करो।

पूर्व महाजन पथे चले अनायासे।
नवपथे उत्पात आसिया जीवे नाशे।।
अनर्थ-नाशेर यत्न कभु नाहि यार।
नामकृपा नाहि पाय दुर्दैव ताहार।।
नाम कृपा बिना कोटि कोटि यत्न करे।
ताहाते अनर्थ कभु नाहि छाड़े तारे ।।
निष्कपटे यत्ने कांदे नामेर चरणे।
दूर हय अनर्थ ताँहार अल्प दिने ।।
अनर्थ छाड़िया कर श्रवण कीर्त्तन।
एकान्तभावेते लओ नामेर शरण।।

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा

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श्रीहरिनाम एवं भगवान श्रीहरि दोनों पृथक् वस्तुएँ नहीं हैं, एक ही वस्तु हैं। श्रीनाम एवं नामी अभिन्न हैं। श्रीनामप्रभु की कृपा से रूप, गुण, परिकर वैशिष्टय और लीलाएँ नाम में ही प्रस्फुटित हो जाती हैं तथा जीव को मायिक जगत की अनुभूति से अलग कर देती हैं। उस समय जड़बद्ध जीव की भगवान के अतिरिक्त अन्यान्य चिन्ताएँ एवं मन की चञ्चलता दूर हो जाती हैं। जैसे नाम की कृपा हो, श्रीनाम के निकट वैसी ही प्रार्थना करनी चाहिए । अष्टकालीय लीलाओं का स्मरण इत्यादि अनर्थयुक्त अवस्था में करणीय नहीं है। कीर्तन के द्वारा ही श्रवण होता है एवं स्मरण का भी सुयोग प्राप्त होता है, ऐसी अवस्था में ही अष्टकालीन सेवा की अनुभूति सम्भव है । कृत्रिमरूप से अष्टकालीन लीलाओं का स्मरण नहीं करना चाहिए।

श्रीलप्रभुपाद

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सनातन धर्म ही भारत का वैशिष्ट्य

धर्म ही भारत का अस्तित्व है, धर्म ही भारत का गौरव है और धर्म ही भारत का शांतिदाता है। उस सनातन धर्म शास्त्र के प्रणेता श्रीव्यासदेव ही हमारे सर्वकालिक (सब समय), सर्वविषयक (सभी विषयों के) पथप्रदर्शक हैं,’ यह बात भारतवासी, जिस दिन, दिल से समझ लेंगे, उसी दिन से उनके बंधन टूटने शुरु हो जायेंगे और उन्हें वास्तविक शान्ति का पथ प्राप्त होगा। धर्म ही भारत का वैशिष्ट्य है, इसीलिए ईसाइ धर्म के Reverend Bishop को यह मानने को बाध्य होना पड़ा कि, – “India guided by God can lead the whole world back to sanity.” (अर्थात् भगवान द्वारा निर्देशित भारत, पूरी दुनिया को शान्ति की ओर लौटा सकता है।)

इसीलिए आप सब से श्रीव्यास के आनुगत्य में सनातन धर्म. का अनुसरण करने का अनुरोध और आह्वान कर रहा हूँ। केवल आपको ही क्यों पूरे जगत के लोगों को ही सनातन धर्म ग्रहण करके नित्य-शान्ति प्राप्त करने के लिए आह्वान कर रहा हूँ।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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वैष्णव सेवा अत्यधिक गुरुत्वपूर्ण

श्रील प्रभुपाद आश्रित श्रील भक्तिदेशिक आचार्य गोस्वामी महाराज श्रील भक्तिरक्षक श्रीधर गोस्वामी महाराज से सन्यास ग्रहण करने के उपरान्त अधिकांश समय व्रज में श्रीविशाखा सखी के आविर्भाव-स्थल श्रीकामाई करेहला में ही वास करते थे। एक बार वे कुछ अस्वस्थ हुए तथा उन्हें अपनी औषधि के लिए पचास रुपये की आवश्यकता थी। उन्होंने पत्र के माध्यम से गुरु महाराज को इस बात की जानकारी दी।

गुरु महाराज उन दिनों श्रीरासबिहारी एवेन्यू, कोलकाता में एक किराए का घर लेकर कुछेक भक्तों के साथ में रहते थे। भिक्षा में प्राप्त होने वाले चावलों को बेचकर मठ की अन्यान्य आवश्यकताओं को पूर्ण किया जाता था। राणाघाट निवासी श्रीसङ्कर्षण प्रभु के द्वारा प्रदत्त कुछेक पीतल के पात्रों में जिस किसी प्रकार से रन्धन का कार्य सम्पन्न किया जाता था। ऐसी अवस्था में, अपने गुरुभ्राता श्रील आचार्य गोस्वामी महाराज के पत्र को पढ़कर तथा उनके आवेदन

को जानकर गुरु महाराज के नेत्रों में अश्रु भर आए, वे विचार करने लगे, “यद्यपि हमारी अवस्था भी खराब है, तब भी अपने गुरुभ्राता की ऐसे आवश्यकता के समय में सहायता करना मेरा कर्त्तव्य है।” पचास रुपये की इतनी बड़ी रकम की कैसे व्यवस्था की जाए, इसी का चिन्तन करते हुए गुरु महाराज अपने कक्ष में इधर-से-उधर टहलने लगे। कुछ स्थिर करके गुरु महाराज ने मुझे श्रील प्रभुपाद के आश्रित श्रीउद्धारण प्रभु को बुलाकर लाने के लिए कहा।

श्रीउद्धारण प्रभु के आने पर गुरु महाराज ने उनसे प्रार्थना करते हुए कहा, “क्या आप उस दुकानदार के पास जाकर पचास रुपये उधार मांग कर लाने का प्रयास कर सकते हैं, जिसके पास हम अपने भिक्षा वाले चावल बिक्री करते हैं? उससे कहना जितना शीघ्र हो सकेगा, हम अधिक-से-अधिक चावलों की भिक्षा करके शीघ्र ही ऋण उतार देंगे। उनसे यदि पचास रुपये का ऋण नहीं मिल पाए तो जितना वे दे सकें, उनसे उतना ही ले लेना तथा बाकी का बचा हुआ श्रीगोविन्द बाबू के घर से लाने की प्राणपर चेष्टा करना। वैष्णव-सेवा का सुयोग आया है, साथ-ही-साथ इस सुअवसर का लाभ उठाना उचित है। गुरु भ्राता की सेवा का सुयोग वह भी उनकी ऐसी अवस्था में, इसे अत्यधिक गुरुत्व प्रदान करना ही बुद्धिमानी है।”

गुरु महाराज के वचनानुसार श्रीउद्धारण प्रभु दुकानदार से तीस रुपये तथा श्रीगोविन्द बाबू की पत्नी से बीस रुपये ऋण लेकर आए तथा जब उन्होंने पचास रुपये गुरु महाराज के हाथ में प्रदान किए, तब गुरु महाराज ने कुछ धैर्य धारण करते हुए मुझसे कहा, “साथ-ही-साथ अर्थात् इसी समय लेक मार्केट पोस्ट ऑफिस जाकर श्रीभक्तिदेशिक आचार्य महाराज के नाम का टेलिग्राम मनी-ऑर्डर (TMO) करके आओ, एक मुहूर्त की भी देरी मत करो।”

मैंने साथ-ही-साथ जाकर TMO किया तथा गुरु महाराज को आकर सम्वाद दिया। गुरु महाराज ने अपनी क्रिया-मुद्रा से ऐसा आभार प्रकट किया मानो मैंने उन पर बहुत बड़ा एहसान किया हो।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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श्रीगुरु-वैष्णवों के अप्रकट होने के बाद उनके समस्त उपदेशनिर्देश की चर्चा और अनुशीलन करने से ही उनके प्रति श्रद्धा ज्ञापन होती है। इस प्रकार ही उनके साथ सम्बन्ध को संरक्षित रख पाना संभव है।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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कलियुग में नाम-संकीर्तन ही सर्वश्रेष्ठ साधन है। इससे श्रेष्ठ साधन और कोई नहीं है। आप हृदय से कृष्ण को पुकारो। इस विषय में उदासीन नहीं होना। कृष्ण, आपके अन्तःकरण में प्रकट होकर, सभी समस्याएँ दूरकर देंगे व क्रमशः आपको नित्य आनन्द प्रदान करेंगे। निष्ठा के साथ हरिनाम करते रहना।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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