धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग

नारद उवाच

यथा गावो नसि प्रोतास्तन्त्यां बद्धाश्च दामभिः ।
वाक्तन्त्यां नामभिर्बद्धा वहन्ति बलिमीशितुः ।।

यथा जिस तरह; गावः बैल; नसि नाक से; प्रोताः नाथी हुई; तन्त्याम् डोरी से; बद्धाः बंधी हुई; च भी; दामभि रस्सियों से; वाक्तन्त्याम्-वैदिक स्तोत्रों के जाल में; नामभिः नाम पद्धति से; बद्धाः बद्ध; वहन्ति पालन करते हैं; बलिम्=आदेशों को; ईशितुः परमेश्वर द्वारा नियन्त्रित होने के लिए।

अनुवाद – जिस प्रकार बैल, एक लम्बी रस्सी से नाक से नत्थी होकर, बद्ध रहता है, उसी तरह मनुष्य जाति विभिन्न वैदिक आदेशों से बंध कर परमेश्वर के आदेशों का पालन करने के लिए बद्ध है।

तात्पर्य – प्रत्येक जीव, चाहे वह मनुष्य हो या पशु या पक्षी, यही सोचता है कि वह स्वतन्त्र है, किन्तु वास्तव में भगवान् के कठोर नियमों से कोई भी स्वतन्त्र नहीं है। भगवान् के नियम कठोर हैं, क्योंकि किसी भी परिस्थिति में उनका उल्लंघन नहीं हो सकता। धूर्त लोग मनुष्य-निर्मित नियमों से बच सकते हैं, किन्तु, परम विधि नियन्ता की संहिता में, नियमों के उल्लंघन की तनिक भी सम्भावना नहीं है। ईश्वर-निर्मित नियम में थोड़ा-सा भी परिवर्तन करनेवाले नियम-भंजक को काफी कष्ट उठाने पड़ सकते हैं। परमेश्वर के ऐसे नियम विभिन्न अवस्थाओं में धर्म-संहिता कहलाते हैं, किन्तु धर्म का सिद्धान्त सर्वत्र एक सा होता है- परमेश्वर के आदेशों का पालन करना। ऐसी है जगत की दशा। सभी जीवों ने इस संसार में अपनी रुचि से बद्ध जीवन का खतरा मोल ले रखा है और इस तरह वे प्रकृति के नियमों द्वारा बँधे हुए हैं। इस बंधन से छूटने की एकमात्र विधि है कि परमेश्वर की आज्ञा का पालन किया जाय। लेकिन, माया के चंगुल से मुक्त होने के बजाय मूर्ख लोग विभिन्न नामों से और अधिक बंध जाते हैं और ब्रह्माण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, हिन्दू, मुसलमान, भारतीय, यूरोपीय, अमरीकी, चीनी आदि कहलाते हैं और इस तरह वे अपने-अपने शास्त्रों या विधानों के प्रभाव में परमेश्वर के आदेशों का पालन करते हैं। राज्य के तत्तत् नियम धार्मिक संहिता के अपूर्ण प्रतिरूप हैं। धर्मनिरपेक्ष राज्य या ईश्वर-विहीन राज्य नागरिकों को ईश्वरीय नियमों को तोड़ने की छूट देते हैं, किन्तु राज्य के नियमों का उल्लंघन करने से रोकते हैं; फल यह होता है कि ईश्वर के नियमों को तोड़ने के कारण जनसामान्य को मनुष्य-निर्मित अपूर्ण नियमों का पालन करने की अपेक्षा अधिक कष्ट उठाने पड़ते हैं। प्रत्येक व्यक्ति जगत की परिस्थिति के अन्तर्गत अपूर्ण है और इसकी तनिक भी सम्भावना नहीं है कि भौतिकता में सर्वाधिक उन्नत व्यक्ति भी पूर्ण विधान का पालन कर सके। दूसरी ओर ईश्वर के नियम हैं, जिनमें ऐसी अपूर्णता नहीं है। यदि नेताओं को भगवान् के नियमों की शिक्षा दी जाय तो निरुद्देश्य व्यक्तियों की काम चलाऊ विधान सभा बनाने की कोई आवश्यकता न रहे। मानव-निर्मित नियमों में परिवर्तन की आवश्यकता तो रहती है, लेकिन ईश्वर-निर्मित नियमों में नहीं, क्योंकि वे परमपूर्ण भगवान् द्वारा पूर्ण बनाये जाते हैं। धर्म-संहिताएँ या शास्त्रीय आदेश, जीव की विभिन्न दशाओं को देखते हुए, ईश्वर के मुक्त प्रतिनिधियों द्वारा बनाये जाते हैं और सारे जीव, भगवान् के आदेशों का पालन करके, संसार-बंधन से मुक्त हो जाते हैं। किन्तु जीव की वास्तविक स्थिति तो परमेश्वर के सेवक की है। अपनी मुक्त अवस्था में वह दिव्य प्रेम से भगवान् की सेवा करता है और पूर्ण स्वतन्त्रता का जीवन बिताता है-कभी-कभी भगवान् के समान, तो कभी-कभी उनसे भी बढ़कर। लेकिन इस बद्ध जगत में प्रत्येक जीव अन्य जीवों के ऊपर प्रभुता जमाना चाहता है। इस तरह माया के भ्रम से यह प्रभुता जताने की प्रवृत्ति बद्ध जीवन को आगे बढ़ाने का कारण बनती है। अतएव जब तक जीव नित्य सेवक भाव की मूल स्थिति को पुनः प्राप्त करके भगवान् की शरण ग्रहण नहीं करता, तब तक वह इस जगत से अधिकाधिक बद्ध होता जाता है। यही भगवद्गीता तथा संसार के मान्य शास्त्रों का अन्तिम उपदेश है।

* * * * * * * * * * * * * * * *

ब्रह्म साक्षात्कार की अपेक्षा नामोच्चारण की महिमा अधिक है-

यद्ब्रह्म-साक्षात्-कृति-निष्ठयापि विनाशमायाति विना न भोगैः।
अपैति नाम-स्फुरणेन तत्ते प्रारब्ध कर्मेति विरौति वेदः ॥

(श्रीरूपगोस्वामीकृत श्रीकृष्णनाम स्तोत्र में ४ श्लोक)

हे नाम भगवन् ! ब्रह्मकी अवच्छिन्न तैलधारावत् ब्रह्म चिन्ताके द्वारा ब्रह्म-साक्षात्कार करनेपर भी जिस प्रारब्ध कर्मको भोगना ही पड़ता है, वह प्रारब्ध कर्म आपके स्फूर्तिमात्रसे अर्थात् भक्तोंकी जिह्वापर स्फुरण होनेमात्रसे दूर भाग जाता है। इस बातको वेद उच्च स्वरसे पुनः पुनः कहते हैं ।

* * * * * * * * * * * * * * *

प्रकृत साधु संग द्वारा भक्तिके क्रमका विकासः यथा श्रीमद्भागवत (३.२५.२५)

सतां प्रसंगनमं वीर्यसम्विदो भवन्ति हृत्‌कर्णरसायनाः कथाः ।
तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनि, श्रद्धारतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ।।

सत्पुरुषोंके समागम से मेरे पराक्रमों का यथार्थ ज्ञान कराने वाली तथा हृदय और कानोंको प्रिय लगनेवाली वीर्यवती कथाएँ होती हैं। उनका सेवन करनेसे शीघ्र ही अविद्या निवृत्तिके पथस्वरूप मुझमें श्रद्धा, रति और प्रेम भक्तिका क्रमशः प्रकाश होता है ।

साधु संगे हय कृष्णकथा रसायन।
ताहे श्रद्धा रति भक्ति क्रमे उद्दीपन ।।

भजनरहस्यवृत्ति- संसारमें भ्रमण करते-करते जीवको सौभाग्यवश भक्तिप्रद सुकृति होती है। वही भक्तिप्रद सुकृति अनेक जन्मोंमें एकत्रित एवं सञ्चित होकर अनन्य भक्तिके प्रति श्रद्धा उत्पन्न करती है। श्रन्द्रा होनेपर शुद्ध भक्तों-सच्चे संतोंका संग प्राप्त करनेके लिए लालसा उत्पन्न होती है। सत्संगसे साधन और भजन क्रमशः होने लगते हैं। अनर्थ दूर होनेपर वही श्रद्धा निर्मल होकर निष्ठाके रूपमें बदल जाती है, निष्ठा भी क्रमशः निर्मल होकर रुचि हो पड़ती है। रुचि भक्तिके सौन्दर्यसे अधिक दृढ़ होनेपर आसक्तिके रूपमें बदल जाती है, वही आक्ति क्रमशः पूर्णता लाभ करनेपर भाव या रति होती है। रति सामग्रीके साथ मिलकर रस हो पड़ता है-यही ‘प्रेमोत्पत्ति’ का क्रम-विकास है।

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा

* * * * * * * * * * * * * * * *

भगवद् – विमुख प्रपञ्च जगत तो दुःखमय परीक्षा का स्थल है । सहिष्णुता, दीनता तथा दूसरों की प्रशंसा इत्यादि हरिभजन में परम सहायक हैं।

श्रीलप्रभुपाद

* * * * * * * * * * * * * * * *

निर्विशेष ज्ञान-मार्ग में बच्चे ही विचरण करते हैं

श्रीचैतन्य महाप्रभु जो स्वयं भगवान कृष्ण हैं, उन्होंने स्वयं आकर भक्ति की महिमा दिखाई है- “भक्तिवशः पुरुषो भक्तिरेव भूयसी।” इस प्रकार समस्त शास्त्रों में ही भक्ति की श्रेष्ठता घोषित की गयी है। यह कोई पक्षपात की बात नहीं है। वहाँ ज्ञान को श्रेष्ठता के आसन पर बैठाये जाने का मतलब ही शास्त्रों के सम्बन्ध में अज्ञानता व्यक्त करना है। धर्म जगत में जो लोग शिशु हैं, वे ही अद्वैत-विचारधारा या निर्विशेष ज्ञान मार्ग में विचरण करते हैं। पाश्चात्य के दार्शनिक लोग भी कहते हैं कि, “Indians are born philosophers” अर्थात् भारतवासी जन्म से ही ज्ञानी हैं। इसलिए यह बालक का धर्म है। जिनको श्रीचैतन्य महाप्रभु की शिक्षा का संपूर्ण रूप से चर्चा करने का सौभाग्य नहीं मिला है, वे ही अद्वैत ज्ञान की प्रशंसा करते हैं। परन्तु भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है।

भक्तिधर्म सहज है। ‘सहज’ शब्द का साधारण लोग अर्थ लगाते हैं-सीधा, जिसे अनायास ही किया जा सकता है। किन्तु ‘सहज’ शब्द का वास्तविक अर्थ यह नहीं है। ‘सहज’ अर्थात् सहजात, इसलिए ‘भक्तिधर्म, सहज है’ ऐसा कहने पर समझा जाता है- आत्मा के साथ-साथ जो धर्म जन्म लेता है, वही ‘भक्ति’ है। अर्थात् भक्ति ही आत्मा की नित्य सहचरी (साथी) है। जो नित्यमुक्त हैं, कभी भी मायाग्रस्त नहीं हुए हैं, उनका एकमात्र कार्य ही भगवद्भक्ति है। केवल मायाग्रस्त जीवों के सम्बन्ध में ही ‘कर्म’ और ‘ज्ञान’ का अस्तित्व देखा जाता है। इसलिए ये दोनों आत्मा का नित्य धर्म नहीं हैं- ‘नैमित्तिक’ धर्म हैं। जैसे दवाई खाना- नैमित्तिक कार्य है; रोग के निमित्त (कारण) ही दवाई ली जाती है- लेकिन स्वस्थ हो जाने पर दवा की आवश्यकता नहीं पड़ती है। उसी प्रकार ‘ज्ञान’ और ‘कर्म’, मन और शरीर का धर्म है और इसीलिए उनके द्वारा कुछ मात्रा में चित्त शुद्ध हो जाने पर शुद्धभक्त के साथ शुद्धभक्ति-याजन की योग्यता प्राप्त होती है। भगवान के साथ लीन हो जाना या एक हो जाना यह बिल्कुल ही असंभव घटना है। कोई लीन हुए हैं, ऐसा उदाहरण कहीं भी दिखाई नहीं पड़ता है। लेकिन मुक्ति के बाद भी अलग सत्ता सुरक्षित रहती है और, भगवान का भजन नित्यकाल चलता रहता है-ऐसा दृष्टांत शास्त्रों में सभी जगह देखा जाता है। जैसे- “मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भगवन्तं भजन्ते” इत्यादि। मुक्ति के बाद भगवान के साथ एक (अर्थात् लीन) हो जाने की धारणा धर्म जगत में प्रचलित कुछ common errors (आम त्रुटियाँ) में से एक है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

* * * * * * * * * * * * * * * *

परम करुणामय श्रीगुरुदेव जी ने मुझे अयोग्य समझकर अपनी अभीष्ट-सेवा-सम्पादन में सहायता के लिये मेरे पास बहुत-से व्यक्तियों को भेज दिया है। पग-पग पर मैं उनकी करुणा की उपलब्धि कर रहा हूँ। श्रीगुरुदेव जी के अन्तर्धान के आठ साल बाद एक बार मेरे किसी बड़े गुरु भाई ने दीक्षा देने की प्रेरणा देते हुए मुझे कहा- “यदि आप दीक्षा नहीं दोगे तो क्या महीने महीने पैसे लेने वाले पुजारी से पूजा करवाओगे?” तभी मुझे आसाम प्रदेश में सरभोग स्थित श्रीगौड़ीय मठ में श्रील गुरुदेव जी के साक्षात् निर्देश की बात याद आ गई। उन्होंने मुझे कहा था, “तुम्हारी गुरुसेबा सारी-की-सारी तुम्हारी ही है। यदि कोई दूसरा कुछ कर दे तो उसके लिये तुम कृतज्ञ रहना। श्रीकृष्ण के संसार की majorodomo (बड़े परिवार की सर्वप्रधान गृहिणी) हैं-श्रीमती राधारानी। वह जानती हैं कि श्रीकृष्ण की समस्त सेवाएँ उनकी ही करणीय हैं, दूसरा कोई कैसी भी सेवा कर दे, वह कृतार्थ हो जाती हैं, उसकी कृतज्ञ रहती हैं।” श्रील गुरुदेव जी के उक्त निर्देश की बात याद आने पर तथा अपने बड़े गुरु भाई की प्रेरणा से मुझे समझ में आ गया और मैंने सन् 1944 से किसी-किसी को हरिनाम-मन्त्रादि देना आरम्भकर दिया। यद्यपि इससे पहले बहुत-से लोगों ने मुझे कहा था कि उन्होंने मुझे स्वप्न में देखा तथा स्वप्न में ही मैंने उन्हें मन्त्र भी दिया, इसलिए व्यवहारिक रूप से भी मैं उन्हें हरिनाम-भन्त्रादि दूँ। किन्तु तब मैंने किसी को भी मन्त्र नहीं दिया।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

* * * * * * * * * * * * * * * *

साक्षात् दर्शन की अपेक्षा श्रीगुरु-भगवान् की अप्राकृत गुणावली का स्मरण करना ही उनके रूप का ध्यान है।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

* * * * * * * * * * * * * * * *

As long as you will not get taste of superior ambrosia, the tendency to get sense – gratification cannot be eradicated. It depends on the intensity of sadhan to getr the desired result quickly.

Srila Bhakti Ballabh Tirtha Goswami Maharaj

* * * * * * * * * * * * * * * *