भगवान् कृष्ण की उपस्थिति में भीष्मदेव का देह-त्याग

भक्त्यावेश्य मनो यस्मिन् वाचा यन्नाम कीर्तयन् ।
त्यजन् कलेवरं योगी मुच्यते कामकर्मभिः ॥

भक्त्या = भक्तिपूर्वक; आवेश्य चिन्तन करके; मनः = मन; यस्मिन् जिसमें; वाचा= शब्दों से; यत् कृष्ण का; नाम पवित्र नामः कीर्तयन् कीर्तन करते हुए; त्यजन् परित्याग करते हुए; कलेवरम् इस भौतिक शरीर को; योगी भक्त; मुच्यते मोक्ष पाता है; काम-कर्मभिः सकाम कर्मों से।

अनुवाद – जो भगवान् भक्ति तथा चिन्तन से एवं पवित्र नाम के कीर्तन से, भक्तों के मन में प्रकट होते हैं, वे उन्हें उनके द्वारा भौतिक शरीर को छोड़ते समय सकाम कर्मों के बन्धन से मुक्त कर देते हैं।

तात्पर्य – योग का अर्थ है अन्य समस्त विषयों से हटाकर, मन को केन्द्रित करना और वास्तव में ऐसी एकाग्रता समाधि है या भगवान् की सेवा में शत-प्रतिशत अनुरक्ति। जो इस प्रकार अपने चित्त को एकाग्र करता है, वह योगी कहलाता है। भगवान् का ऐसा योगी भक्त, भगवान् की सेवा में प्रतिदिन चौबीसों घण्टे लगा रहता है। फलस्वरूप उसका सारा ध्यान नवधा भक्ति में भगवान् के चिन्तन में लगा रहता है। नवधा भक्ति में श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पूजन, स्तुति, दास्य-भाव, आज्ञा-पालन, सख्य-भाव या समर्पण सम्मिलित हैं। योग के ऐसे अभ्यास से भगवान् द्वारा मान्यता मिलती है, जैसा कि समाधि की सर्वोच्च स्थिति का वर्णन करते हुए भगवद्‌गीता में स्वयं भगवान् व्याख्या करते हैं। भगवान् ऐसे विरले भक्त को योगियों में श्रेष्ठ बतलाते हैं। भगवत्कृपा से ऐसा पूर्ण योगी अपना मन पूर्ण चेतना से भगवान् में एकाग्र करता है और इस प्रकार शरीर त्यागने के पूर्व उनके नाम का कीर्तन करने से, वह भगवान् की अन्तरंगा शक्ति द्वारा तुरन्त ऐसे लोक को भेज दिया जाता है, जहाँ भौतिक जीवन तथा उससे सम्बद्ध कारणों का प्रश्न ही नहीं उठता। इस संसार में जीव को अपने कर्मों के अनुसार जन्म-जन्मान्तर तीन प्रकार के कष्टों को सहना होता है। ऐसा भौतिक जीव की स्वाभाविक इच्छाओं के ही कारण उत्पन्न होता है। भगवद्भक्ति से जीव की स्वाभाविक इच्छाओं का अन्त नहीं हो जाता, अपितु वे भक्ति के सद्‌कार्य में लग जाती हैं। इससे इच्छाएँ वैकुण्ठ चली जाती हैं। सेनापति भीष्मदेव यहाँ पर विशेष प्रकार के योग का उल्लेख कर रहे हैं, जिसे भक्तियोग कहते हैं और वे भाग्यशाली थे कि भौतिक शरीर को त्यागने के पूर्व अपने समक्ष साक्षात् भगवान् को देख रहे थे। अतएव उन्होंने अगले श्लोकों में इच्छा व्यक्त की है कि भगवान् उनकी दृष्टि के समक्ष ही रहें।

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प्राकृत दृष्टि से अप्राकृत वैष्णव दर्शन निषिद्ध है; यथा उपदेशामृत षष्ठ श्लोक

तत्पादपद्मप्रवणैः कायमानसभाषितैः ।
प्रणामो वासुदेवस्य वन्दनं कथ्यते बुधैः ॥

(हरिभक्तिकल्पलतिका ९/१)

काय, मन और वाक्य द्वारा वासुदेवके पादपद्मोंमें अनुरक्त व्यक्तियोंका उसके लिए जो प्रणाम है उसको ही पण्डितोंने ‘वन्दन’ नामसे अभिहित किया है ।

दृष्टैः स्वभावजनितैर्वपुषश्च दोषै न प्राकृतत्वमिह भक्तजनस्य पश्येत्।
गङ्गाम्भसां न खलु बुद्बुदफेन पङ्गैर्ब्रह्मद्रवत्वमपगच्छति नीरधर्मैः ।।

इस जगतमें अवस्थित भक्तजनोंमें नीचवर्ण, कठोरता और आलस्य आदि दिखाई पड़नेवाले स्वाभाविक दोषोंके द्वारा अथवा कुरूपता और ज्वर आदि पीड़ाओंसे विकृत दिखाई पड़ने वाले शारीरिक दोषोंके द्वारा भक्तजनोंका प्राकृतपन नहीं देखना चाहिए अर्थात् उन्हें प्राकृत जीव नहीं समझना चाहिए; जैसे बुद्बुद, फेन और कीचड़ आदिके सम्बन्धसे गङ्गाजल जलधर्मको अङ्गीकार करके भी अपना द्रवीभूत-ब्रह्म होनेका धर्म त्याग नहीं करता अर्थात् अप्राकृत धर्म नहीं छोड़ता; वैसे ही आत्मस्वरूप प्राप्त वैष्णवोंमें प्राकृत दोषोंका आरोप नहीं करना चाहिए।

स्वभाव जनित आर वपुदोषे क्षणे।
अनादर नाहि कर शुद्धभक्तजने ।।
पङ्गादि जलीय दोषे कभु गङ्गाजले।
चिन्मयत्व लोप नहे सर्वशास्त्रे बले ।।
अप्राकृत भक्तजन पाप नाहि करे।
अवशिष्ट पाप याय किछु दिन परे ।।

भजनरहस्यवृत्ति – शुद्ध भक्तों में प्राकृत दोषोंको देखकर उन्हें प्राकृत समझना उचित नहीं है, इस श्लोकमें यही उपदेश है। शुद्ध भक्तोंमें कुसंग और नामापराध होना असम्भव है। उनमें शरीरगत और स्वभावगत दोष हो सकते हैं। परन्तु जिस प्रकार जलके धर्मके कारण गङ्गाजलमें बुद्बुद फेन और कीचड़ आदि होनेपर भी वह अपवित्र नहीं समझा जाता, वह अपना ब्रह्म-द्रवत्त्व परित्याग नहीं करता, उसी प्रकार आत्मस्वरूप प्राप्त वैष्णवगण भी जड़देहके जन्म और विकार धर्म द्वारा दूषित नहीं होते। इसीलिए भजन प्रयासी व्यक्ति शुद्ध वैष्णवोंमें इन दोषोंको देखकर भी उनकी अवज्ञा नहीं करेंगे। शुद्ध वैष्णवोंके अवशिष्ट दोष भी शीघ्र ही दूर जाते हैं। फिर भी दोष देखनेपर अपराधी बनेंगे।

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा

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जिस प्रकार आनुगत्य एवं तोषामोद (चापलूसी) एक नहीं है, उसी प्रकार अनुसरण एवं अनुकरण भी एक नहीं है। अनेक लोग अनुकरण कार्य को अनुसरण मानकर भ्रमित होते हैं। यहाँ पर दो बातें हैं- अनुकरण व अनुसरण । नाटक मण्डली का नारद सज्जित होना अनुकरण है (अर्थात् किसी नाटक में नारदजी का वेष धारणकर उनके जैसा अभिनय करना, उनका अनुकरण है) परन्तु श्रीनारदजी के द्वारा प्रदर्शित एवं आचरित भक्तिपथ पर चलना उनका अनुसरण है। कृत्रिमरूप में नकल करने का नाम अनुकरण एवं महाजनों के द्वारा प्रदर्शित पथ पर चलना अनुसरण है ।

हम सोचते हैं कि हम अनुसरण कर रहे हैं, किन्तु वास्तव में हम महाजनों का अनुकरण ही कर रहे हैं, अनुसरण का तात्पर्य आचरण से है। अनुकरण (imitation) विकृत (मूलवस्तु का) प्रतिफलन मात्र है। अनुकरण एवं अनुसरण बाह्यरूप से एक समान दीखते हैं। जैसे मेकि सोना (chemical gold) एवं शुद्ध सोना बाहर से देखने पर एक जैसे दिखाई देते हैं। अनुकरण का दूसरा नाम ढोंग भी है। हमारे हृदय में विप्रलिप्सा नामक एक वृत्ति है, जिसके द्वारा हम दूसरों की वञ्चनाकर उनसे प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए ऐसा ढोंग या अनुकरण करते हैं। श्रौतपथ का मात्र अनुकरण करने से ही अनुसरण नहीं हो जाता । अनुकरण के द्वारा अनमरण न होने के कारण उसका कोई मूल्य नहीं है ।

श्रीलप्रभुपाद

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‘तृणादपि सुनीच’ का मतलब संकुचित रहने का भाव नहीं

‘तृणादपि सुनीच’ शिक्षा का वास्तविक अर्थ बहुत सारे लोग समझ ही नहीं पाते हैं। वे समझते हैं कि, हमेशा संकुचित रहने का भाव ही तृणादपि सुनीचता है। किन्तु महाप्रभु और उनके भक्तों की जीवनी की चर्चा करने पर इस प्रकार की भ्रान्त धारणाएँ दूर हो जाती हैं। ‘तृणादपि सुनीचेन’ के शिक्षक स्वयं महाप्रभु ने संकीर्तन-विरोधी चाँदकाजी के विरुद्ध आंदोलन किया था। किन्तु वह आंदोलन उन्होंने संकीर्तन के द्वारा ही किया था-किसी प्रकार के हथियारों से लैस होकर नहीं। स्वयं महाप्रभु ही भारत में अहिंसक आंदोलन के प्रवर्तक हैं। इसलिए उनकी शिक्षा- ‘तृणादपि सुनीचेन’ की व्याख्या अगौड़ीय (जो गौड़ीय नहीं) के रूप में करने पर, भूल उन लोगों की होगी, महाप्रभु की नहीं। महाप्रभु के भक्तों ने उसी शिक्षा में शिक्षित होकर ही उक्त आंदोलन में भाग लिया था। वही तृणादपि सुनीचता के प्रतीक, श्रीवृन्दावन दास ठाकुर द्वारा लिखित “तबे लाथि मारों तार शिरेर उपरे” (तो फिर उसके माथे पर लात मारो) वाक्य ही महाप्रभु की उस शिक्षा के वास्तविक अर्थ को व्यक्त करता है। दीनता के अवतार, श्रील नरोत्तम ठाकुर के “क्रोध भक्त-द्वेषि-जने” वाक्य में भी ‘तृणादपि सुनीचेन’ श्लोक की आंतरिक शिक्षा को व्यक्त किया गया है। इसलिए अगौड़ीयजन, महाप्रभु की उस शिक्षा के वास्तविक अर्थ को समझ ही नहीं सके-इनकी संख्या भारत में ही ज़्यादा है। इसीलिए भारतवर्ष को पराधीन होना पड़ा था। महाप्रभु के उस ‘तृणादपि सुनीचेन’ श्लोक के यथायथ आचरण करने पर अजित भगवान को भी जीता जा सकता है-ब्रिटिश शासकों की क्या बात करनी है ?

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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उत्साह न होने से कोई भी व्यक्ति, किसी भी मार्ग पर उन्नति नहीं कर सकता। इसलिये आप उत्साह के साथ जितना अधिक से अधिक समय सम्भव हो श्रीभगवान् को पुकारें। संख्या पूर्वक, अपराध त्याग कर श्रीमाला पर श्रीमहामन्त्र का जप करें। अपने आप को श्रीकृष्ण की सम्पत्ति मान लेने पर अपनी इन्द्रियों को तर्पण करने का उत्साह नहीं जागेगा। श्रीकृष्ण-सेवा के निमित्त नियुक्त होने से ही आनन्द और उत्साह होगा।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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श्रीगुरु-वैष्णवगण निःस्वार्थ हैं। जीव के उद्धार के लिए उन्हें बहुत प्रकार के कष्ट सहन करने पड़ते हैं।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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Everything depends upon the determination of self. If anybody realises that the real self is neither the physical body, nor the subtle body, it is beyond these two, it is a particle of eternally existing blissful principle, he will surely try for spiritual development. Therefore, if we sincerely want actual bliss, we should give up our arrogance that we can get it by our own efforts.

Srila Bhakti Ballabh Tirtha Goswami Maharaj
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