वेदोंमें अवरोह-मार्गका उपदेश
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ॥
(मुण्डक ३/२/३, कठ २/२३)
(गुरु परम्परा क्रमसे जिस प्रणाली द्वारा तत्त्ववस्तु सत् सम्प्रदायको प्राप्त होती है, उसी प्रणालीका नाम अवरोह-मार्ग अथवा श्रौतपन्था है। इस मन्त्रमें श्रुति यही उपदेश करती हैं,) – यह परबह्म परमात्मा न तो प्रवचनसे, न बुद्धिसे और न बहुत सुननेसे ही प्राप्त होता है, बल्कि जिसको यह कृपाकर स्वीकार कर लेता है, उसके द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि यह परमात्मा उसके निकट ही अपने यथार्थ रूपको प्रकट करता है।
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सिद्ध-देहमें जीव अप्राकृत कृष्णदास है। दास्य रति उदित होनेपर अपने प्राकृत परिचयको तुच्छ जानने लगता है। यथा, महाप्रभुके वाक्य (पद्यावली-६३) –
नाहं विप्रो न च नरपतिर्नापि वैश्यो न शूद्रो
नाहं वर्णी न च गृहपतिर्नो वनस्थो यतिर्वा ।
किन्तु प्रोद्यन्निखिलपरमानन्दपूर्णामृताब्धे-
गर्गोपीभर्तुः पदकमलयोर्दासदासानुदासः ।।
– मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या वर्णी नहीं तथा ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी भी नहीं हूँ। मैं स्वतः प्रकाशमान निखिल परमानन्द स्वरूप पूर्णामृतसिन्धु गोपियोंके भर्त्ता श्रीश्रीराधावल्लभके चरणोंके जो दास वैष्णव हैं, उनके दासोंका भी अनुदास हूँ।। ६ ।।
विप्र, क्षत्र, वैश्य, शूद्र कभु नाहि आमि।
गृही, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, यति, स्वामी।।
प्रभूत परमानन्द-पूर्णामृतावास ।
श्रीराधावल्लभदास-दासेर अनुदास ।।
भजनरहस्यवृत्ति-वस्तुतः जीव अप्राकृत अखिलरसामृतसिन्धु श्रीकृष्णचन्द्र के दास हैं-
अकेला ईश्वर श्रीकृष्ण आर सब भृत्य ।
जारे जैछे नाचाय तैछे करे नृत्य ।।
(चै. च. आदि-५)
जीव मायाबद्ध होकर इस नश्वर जड़ देहाभिमानमें स्वयंका स्त्री, पुरुष एवं नाना प्रकारसे परिचय देते हैं। कलियुग पावनावतारी श्रीगौरसुन्दरने कलिहत मानवोंको अपने मुखारविन्दसे उपदेश दिया है- हमलोग ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रादि वर्ण अथवा ब्रह्मचर्यादि आश्रमसे बंधे हुए नहीं हैं। हमलोगोंका शुद्ध परिचय है- ‘गोपी भर्तुपदकमलयोर्दास-दासानुदासः’।
जीव मायाबद्धताके कारण पूर्व जन्मोंकी वासना तथा संस्कारोंके क्रमसे नवीन देहको प्राप्त करता है तथा किसी-न-किसी वर्णाश्रममें जन्म लेता है। मृत्युके पश्चात् अपने कर्मानुसार गति प्राप्त करता है, यही कर्मचक्र कहलाता है। जीवको अपने शुद्ध स्वरूपकी अनुभूति सद्गुरु चरणाश्रय कर, पूर्व-पूर्व महाजनों द्वारा आचरित भजन पथका अवलम्बन करनेसे होती है। नाम-भजन करते-करते जड़ाभिमान दूर होता है, शुद्ध अप्राकृत चिन्मय-भाव प्रकाशित होते हैं तथा शुद्ध कृष्ण-सेवोपयोगी चिन्मय शरीरकी उपलब्धि होती है। जड़ शरीरकी भाँति ही शुद्ध चिन्मय शरीर भी हस्त पदादि समन्वित स्वरूप है।
शुद्ध चित् स्वभावमें केवल मात्र श्रीकृष्ण ही पुरुष हैं तथा अन्य सभी जीव स्त्री। जीवके चित्के गठनमें वस्तुतः स्त्री-पुरुष चिह्न नहीं होते, किन्तु देहके स्वभाववशतः जीव स्त्री पुरुष अभिमान होता है। साधन भजनके माध्यमसे वे शुद्ध देह प्राप्त करते हैं। जिनकी मधुर रसमें स्पृहा होती है, वह रसिक भक्तोंके आनुगत्यमें साधन भजन करते-करते, अपनी वासना तथा स्वरूपानुसार सिद्ध देह (गोपी देह) प्राप्त करते हैं। योगमाया अघटन घटन पटीयसी शक्ति ही रसकी व्यवस्था करती है।
साधने भाविवे जहाँ सिद्धिते पाइबे।
ताहाँ केवल मात्र पक्व अपक्व विचार ।।
(प्रेमभक्तिचन्द्रिका)
दासानुदास-ब्रज गोपियोंके आनुगत्य बिना श्रीयुगलकिशोरकी मधुर-सेवामें किसीका भी अधिकार नहीं है। उन सखियोंमें भी सखियोंकी अनुगत मञ्जरी सखियोंके आनुगत्यमें भजन करनेसे ही दासी पदकी प्राप्ति होती है। इन व्रजदेवियोंकी भावनानुसार ही श्रीकृष्णकी सेवा-भावना साधनकालमें अभीष्ट है। भावमार्गमें अपनेको किसी व्रजगोपीकी परिचारिका मानकर किसी व्रजदेवी (ललिता सखी) के आनुगत्यमें उनके निर्देशानुसार श्रीराधाकृष्णकी सेवा करते हैं। श्रृंगार रसोपासनामें अपनेको परकीया या परोढ़ा अभिमान करते हैं।
कोई-कोई व्यक्ति अपनेको ललिता और विशाखा मानकर, पुरुष देहको स्त्रीका रूप बनाकर सखी बनकर भजन करते हैं। ऐसा करके अपना और दूसरोंका सर्वनाश ही किया करते हैं। ‘मैं ललिता हैं’, ‘मैं विशाखा हैं यह मायावादियोंकी अहंग्रहोपासना हो जाती है। तथा ललिता-विशाखा आदिके चरणोंमें भी वे अपराधी होकर घोर नरकको प्राप्त होते हैं। जीव कदापि श्रीमती राधाकी नित्य किंकरी रूप-मञ्जरी अथवा ललिता आदि नहीं हो सकता है। ये सखियाँ जीवकोटिकी नहीं हैं, ये तो श्रीमती राधाकी कायव्यूह स्वरूपा हैं। जीव साधनकालमें श्रृंगार रसोपासनामें इन सखियोंके अनुगत होकर ही श्रीराधाकृष्णकी सेवा करें। अपनेमें परकीया या परोढ़ा अभिमान कर ऐसी भावना करे कि ब्रजगोपी-गृहमें जन्म लेकर किसी विशेष गोपके साथ विवाहित अप्रसूतिका एक गोपकिशोरी है।
यह किशोरी परकीया भावयुक्त, श्रीराधाके आनुगत्यमें श्रीकृष्णसेवाके लिए प्रबल लालसावती साधिका होती है। इसी भावकी सिद्धि होनेपर गोपीभाव प्राप्त होता है।
ब्रजगोपी भाव, हइबे स्वभाव,
आन भाव न रहिबे ।।
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
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भगवान की सेवा ही जीव का नित्य धर्म है। भगवान की सेवा त्यागकर जीव इस संसार में जिन वस्तुओं के पीछे भाग रहा है, वे सभी वस्तुएँ उत्पत्ति, स्थिति और विनाश के अधीन हैं। अतः असत् वस्तु में सत्य बुद्धि तथा अनित्य वस्तुओं में नित्य बुद्धि के कारण ही जीव को इस अनित्य संसार में सुख के स्थान पर दुःख ही दुःख प्राप्त होते हैं। परन्तु जब मनुष्य का विवेक जागृत हो जाता है, जागतिक वस्तुओं का परिणाम देखकर या सुनकर वह चतुर हो जाता है, तब वह साधुओं का संग करता है, और संग के प्रभाव से अशोक, अभय एवं अमृत के आधारस्वरूप श्रीभगवान की सेवा में अपने जीवन को लगा देता है। श्रीराधागोविन्द की सेवा ही जीवों का चरम साध्य है। श्रीराधागोविन्द की उस सेवाश्री को प्रदान करने के लिए ही स्वयं श्रीराधागोविन्द मिलित – तनु श्रीगौरसुन्दर इस प्रपञ्च जगत में अवतीर्ण हुए थे। केवल श्रीहरिनाम के आश्रय द्वारा ही वह कृपा प्राप्त होतीहैं । इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है।
श्रीलप्रभुपाद
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विरह के लिए वस्तु का ज्ञान होना आवश्यक
वस्तु के सम्बन्ध में जिसका जितना ज्ञान है, उसका उतना ही विरह जागरूक होता है। वस्तु के ज्ञान का अभाव. रहने पर वहाँ विरह संभव नहीं है। जिसके सम्बन्ध में ‘विरह’, यहाँ उसे ही ‘वस्तु’ कहा जा रहा है, समझना होगा। इसलिए श्रील ठाकुर भक्तिविनोद के सम्बन्ध में वास्तविक ज्ञान नहीं होने पर हमें उनके सम्बन्ध में विरह नहीं होगा। वस्तु-ज्ञान ही मिलन है; वह वस्तु हृदय में प्रतिष्ठित नहीं होने पर, विरह संभव नहीं है। हम उनके संबंध में वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सकें, इसीलिए हर साल ठाकुर की जीवनी की चर्चा किया करते हैं।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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श्रीमद्भागवत के स्कन्ध में हम पाते हैं कि वैष्णवराज शिव की निन्दा करने वाले दक्ष के यज्ञ में विष्णु भी नहीं आये। देवी सती अपने पतिपरमेश्वर शिव जी के निषेध करने पर भी अपने पिता के घर को गई। वहाँ जाकर जब उसने अपने पिता के मुख से पति की निन्दा सुनी तो अत्यन्त दुखी हुई एवं सोचने लगी, कि हाय। मैं स्त्री स्वभाव सुलभ चापल्य के कारण अपने सर्वज्ञ वैष्णवराज पति के मना करने पर भी वैष्णव निन्दक पिता के भवन में आई। और यहाँ मुझे वैष्णव निन्दा श्रवणरूप महादुर्भाग्य को ग्रहण करना पड़ रहा है। धिक्कार है। धिक्कार है। मुझको हजारों बार धिक्कार है। मुझे दिखाई नहीं दे रहा है कि मेरे इस अपराध का प्रायश्चित क्या होगा? फिर भी मैं इस वैष्णव निन्दक पिता के द्वारा दी हुई इस देह को उसी के समीप परित्याग करके अपने पतिदेवता की चरणरज में अभिषिक्त होती हुई क्षमा प्रार्थनी होऊँगी।
ऐसा सोचकर सती पिता को कहने लगी हे पिता। जो सभी देहधारी जीवों के आत्मस्वरूप प्रियतम हैं, जिनके लिए प्रिय एवं अप्रिय कोई भी नहीं है, फलस्वरूप जिनका किसी के साथ विरोध हो ही नहीं सकता है, वैसे परम मंगलमय शिव के प्रति आपके अलावा कौन ऐसा प्रतिकूल आचरण करेगा? साधु का स्वभाव तो यह होता है कि वह दूसरों के दोषों को भी गुण के रूप में देखता है, परन्तु तुम्हारे जैसे ईष्यालु व्यक्ति-याहाँ गुण शत आछे ताँहा, न करे ग्रहण।
गुण मध्ये छल करे दोष-आरोपण।।
(चै.च. अन्त्य 9.79)
हजारों-हजारों अच्छे गुण होने पर भी दूसरे के गुणों में भी दोष का दर्शन करते हैं।
मध्यम अधिकारी वैष्णव वास्तविक रूप से दूसरे वैष्णवों के गुण एवं दोषों का विचार करते हैं। जो उत्तम अधिकारी होते हैं, वह दूसरों के छोटे से गुण को भी बड़ा करके देखते हैं। परन्तु तुम्हारे जैसे छिद्रान्वेषी व्यक्ति परम वैष्णव शिव तक में भी दोषारोपण करते हैं।
दूसरों के दोष निकालने वाले व्यक्ति का स्वभाव ही यह बन जाता है कि वह दूसरों के दोष निकालने में ही लगा रहता है। एक चींटी मणिमय मन्दिर के भीतर भी छेद करती है, उसी प्रकार अधम व्यक्ति भी स्वयं छन्नी (हजारों छेद वाले) होते हुए दूसरो के सुईं के बराबर (एक छेद वाली) दोष को भी बहुत बड़ा करके देखते हैं।
साधु अदोषदर्शी होते हैं। चैतन्य चरितामृत में उत्तम वैष्णव के विषय में इस प्रकार लिखा है-
उत्तम हञा वैष्णव हबे निरभिमान।
जीवे सम्मान दिवे जानि ‘कृष्ण’ अधिष्ठान।
(चै.च. अन्त्य 20.25)
यद्यपि वैष्णव सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति होते हैं तो भी वह निरभिमानी होते हैं और हर एक को कृष्ण का अधिष्ठान समझकर उसका आदर करते हैं।
श्री भक्ति प्रमोद पूरी गोस्वामी महाराज
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सशिष्य होने से उसकी दृष्टि में हमेशा गुरु जी की महिमा ही दृष्टिगोचर होगी। आपसी सम्बन्ध और योग्यता की भिन्नता के कारण व्यवहार भी अलग-अलग देखा जाता है। गृहस्थियों के घर में भगवद्-भक्तों का आगमन और कृष्ण-कथा शुभ सूचना देते हैं। श्रीमान कृष्णपद दास जी ने वैष्णवों को बुलाकर वैष्णवहोम और वैष्णव-सेवा की है। इससे शुभ ही होगा। जिन्हें भगवान् की आवश्यकता है उन्हें अवश्य ही भक्तों का संग करना होगा।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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एकसाथ रहने पर मनमुटाव या मतविरोध हो सकता है। किन्तु बृहत् (व्यापक)-स्वार्थ के खातिर उसे भूल जाना ही उदारता के रूप में प्रमाणित है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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Everything depends upon the determination of self. If anybody realises that the real self is neither the physical body, nor the subtle body, it is beyond these two, it is a particle of eternally existing blissful principle, he will surely try for spiritual development. Therefore, if we sincerely want actual bliss, we should give up our arrogance that we can get it by our own efforts.
Srila Bhakti Ballabh Tirtha Goswami Maharaj
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